भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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भावुकोंका कहना है कि अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सौख्यबिन्दुओंका परम उद्गम-स्थान जो अनन्त सौख्य-सुधा-सिन्धु है, उसका मन्थन करनेपर सारसे भी सारभूत नवनीत-स्थानीय जो तत्त्व हो, उसका भी पुनः सहस्रधा-कोटिधा मन्थन करनेपर जो परम दिव्य-तत्त्व निःसृत हो, वही वृन्दावनधामका स्वरूप है। कारणरूप जो अक्षर-ब्रह्म है, वही व्यापी वैकुण्ठ वृन्दावन है। कार्य-कारणातीत वेदान्तके परम-तात्पर्यके विषयीभूत परमतत्त्व श्रीकृष्णके प्राकट्यका स्थल कारणात्मा अक्षर ही है। ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥’ (ऋग्वेद १०।९०।३), ‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥’ (गीता १०।४२) इत्यादि श्रुति-स्मृतिके अनुसार मायाविशिष्ट कारणब्रह्म एकपाद है। उसके ऊपर त्रिपाद्विभूति अमृत है। जो महानुभाव वेदान्त-वेद्य, कार्य-कारणातीत परमतत्त्वको ही वृन्दावन मानते हैं, उनके सिद्धान्तमें वहाँका निवासी कृष्ण-तत्त्व अवैदिक ही होगा। इतना ही कहना पर्याप्त है; क्योंकि एकहीमें आश्रयाश्रयित्व असम्भव है। ‘अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठितः।’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) इस उक्तिके अनुसार भी अनन्तसंज्ञक अव्याकृत ही भगवान्‌का आसन है। उन्हींका नाम शेष भी है। ‘शिष्यते अवशिष्यते इति शेषः’ अर्थात् जो अवशिष्ट रहे, वही शेष कहा जाता है। कार्यके प्रलयानन्तर कारण ही शेष रहता है। उसका कोई कारणान्तर नहीं है, जिसमें उसका प्रलय हो। कारण सप्रपंच है। निष्प्रपंच ब्रह्मका वही निवासस्थल है। ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ (गीता १४।२७) इस भगवदुक्तिके अनुसार सगुण कारण- ब्रह्मकी, एकपादस्थानीयकी प्रतिष्ठा ‘त्रिपादूर्ध्व उदैत्’ (ऋग्वेद १०।९०।४) ऊर्ध्व अर्थात् कार्य- कारणानन्तर्भूत ब्रह्म परमात्मा ही है। किन्हीं महानुभावोंके सिद्धान्तमें यह प्रकट वृन्दावन ही अक्षर ब्रह्मव्यापी वैकुण्ठ है; परंतु उसका वह स्वरूप अभावितान्तःकरण पुरुषको उपलब्ध नहीं होता है। अद्वैतसिद्धान्तमें समस्त प्रपंच ही ब्रह्मस्वरूप है, परंतु शास्त्राचार्योपदेशजन्य संस्कारोंसे संस्कृतान्तः- करण पुरुष-धौरेयको ही वह उपलब्ध होता है। इसीलिये अद्वैतसिद्धान्त-परिनिष्ठित प्रबोधानन्दसरस्वती तदनुसार ही श्रीवृन्दावनको सच्चिदानन्दमय बतलाते हुए लिखते हैं— यत्र प्रविष्टः सकलोऽपि जन्तुः आनन्दसच्चिद्घनतामुपैति । ‘जिस वृन्दावन-धाममें प्रविष्ट होते ही कीट- पतंगादि भी आनन्दसच्चिद्घनस्वरूप हो जाते हैं’; परंतु तादृशी प्रतीति तबतक नहीं होती, जबतक प्राकृत-संसर्गका बिलकुल अभाव नहीं होता। यद्यपि जीव स्वभावसे ही ‘चेतन अमल सहज सुखरासी’ (रा०च०मा० ७।११७।२) है; परंतु आविद्यिक अनात्मसंसर्गसे अनेकानेक अनर्थ-परिप्लुत प्रतिभासित होते हैं। अविद्याका विद्याद्वारा अपनयन होनेपर उनका स्वाभाविक स्वरूप व्यक्त होता है। अतएव कुछ लोग कहते हैं कि भगवान्‌की अभिव्यक्तिका स्थल ही वृन्दावन है। भगवदाकारसे आकारित वृत्तिपर भगवत्तत्त्वका प्राकट्य होता है, उसे भी वृन्दावन कहते हैं। इस तरह साभास अव्याकृत एवं साभास चरमावृत्तिको भी वृन्दावन कहते हैं। इसीलिये जो महानुभाव वृन्दावनके उपासक होते हुए भी प्रसिद्ध वृन्दावनमें प्रारब्धवश नहीं रह पाते, वे भी व्यापी वैकुण्ठ, कारण-तत्त्व-स्वरूप ब्रह्मके व्यापक होनेसे तत्स्वरूप वृन्दावनका प्राकट्य शक्ति-बलसे कहीं भी रहकर सम्पादन करते हैं। नित्य-निकुंजकी श्रीवृन्दावनसे भी अधिक रसमयता भावुकोंकी दृष्टिमें नित्य-निकुंज श्रीवृन्दावनसे भी अन्तरंग समझा जाता है। नित्य-निकुंजमें वृषभानुनन्दिनी-स्वरूप महाभाव-परिवेष्टित शृंगार- स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द नित्य ही रसाक्रान्त