भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रजभूमि १६९ जैसे सूर्यतत्त्वकी अभिव्यक्ति काष्ठ-कुड्य आदि अस्वच्छ पदार्थोंपर वैसी नहीं होती, जैसी निर्मल जल, काँच आदिपर होती है, वैसे ही राजस-तामस स्थलोंमें ब्रह्मतत्त्वकी अभिव्यक्ति वैसी नहीं हो सकती, जैसी निर्मल विशुद्ध स्थलोंमें। यह निर्मलता जैसे पार्थिव-प्रपंचमें स्पष्ट अनुभूयमान है, वैसे ही त्रिगुणात्मक प्रपंचमें गुण- विमर्द-वैचित्र्यसे क्वचित् प्रत्यक्षानुमानद्वारा, क्वचित् आगम तथा श्रुतार्थापत्तिद्वारा तारतम्योपेत होकर ज्ञात होती है। इसीलिये किसी स्थलमें जानेसे वहाँ अकस्मात् चित्तप्रसाद और किसी स्थलमें चित्तक्षोभ आदि चिह्नोंद्वारा भी स्थल-वैचित्र्यकी अनुभूति होती है। व्रजवन-निकुंजोंमें क्रमशः एककी अपेक्षा दूसरेमें वैचित्र्य है। अतएव वहाँ पूर्ण-पूर्णतर-पूर्णतमरूपसे एक ही श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दका प्राकट्य होता है। तीर्थोंकी यह विशेषता प्रत्यक्ष है कि जिस तीर्थमें जितनी अद्भुत सात्त्विकता एवं शक्ति है, वहाँ उतनी ही सरलतासे प्रभुकी विशेषताकी अनुभूति होती है। परंतु जैसे कामिनीका रूप कामुकोंपर ही प्रभावकारी होता है और सर्प-व्याघ्रादि-दर्शनसे अधिक उद्वेग भीरुको ही होता है, वैसे ही सात्त्विक तथा भगवत्परायणको तीर्थगत विलक्षण शक्तियाँ प्रभावान्वित करती हैं, यद्यपि वैसे कुछ-न-कुछ प्रभाव तो सभी तरहके पुरुषोंपर होता है तथापि वह व्यक्त नहीं होता; परंतु श्रुतार्थापत्तिद्वारा तीर्थोंमें शक्ति-वैलक्षण्य अवश्य ज्ञात है। भावुकोंने व्रजतत्त्वको हिततम वेदवेद्य प्रेमतत्त्वका स्वरूप अर्थात् शरीर ही माना है। प्रेमतत्त्वके व्रजधाम- स्वरूप देहमें श्रीव्रजनवयुवतिजन इन्द्रियरूपिणी हैं। मनःस्वरूप रसिकेन्द्रवर्गमूर्धन्यमणि श्रीव्रजराजकिशोर हैं तथा प्राणरूपा-प्रज्ञाके स्थानमें श्रीव्रजनवयुवति- कदम्ब-मुकुटमणि कीर्तिकुमारी श्रीराधा हैं। यहाँ— इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ (गीता ३।४२) —इस वचनके अनुसार जैसे देह इन्द्रियोंके, इन्द्रियाँ मनके और मन प्राणरूपा प्रज्ञाके परतन्त्र होता है (यहाँपर 'यो वै प्राणः सा प्रज्ञा' (कौषीतकि- ब्राह्मणोपनिषद् ३।४) इस श्रुति-वाक्यके अनुसार क्रिया-शक्ति-प्रधान प्राण और ज्ञानशक्ति-प्रधान प्रज्ञाका ऐक्य विवक्षित है) एवं पूर्व-पूर्वका उत्तरोनरमें ही सम्मिलन होनेसे तद्रूपता ही होती है, उसी तरह व्रज श्रीकृष्णप्रेयसी व्रजांगनाओंसे विभूषित तथा उन्हींके अधीन है। व्रजवनिताजनका जीवन श्रीव्रजेन्द्रकुमार हैं तथा श्रीकृष्ण-हृदयकी अधीश्वरी प्राणाधिका राधिका हैं और वह केवल प्रेमसुधा-जलनिधिमें ही पर्यवसित होती हैं। प्रेममय व्रज प्रेमोद्रेकमें व्रजांगनारूप ही हो जाता है और व्रजांगनाएँ 'असावहं त्वित्यबलास्तदा- त्मिका' (श्रीमद्भा० १०।३०।३), 'कृष्णोऽहं पश्यत गतिम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।१९) इत्यादि वचनोंके अनुसार श्रीकृष्ण-भावरस-भरिता होकर नन्दनन्दनस्वरूपा हो जाती हैं। रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण प्रेमोन्मादमें निजप्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी-स्वरूप हो जाते हैं तथा श्रीराधिका प्रेमस्वरूपमें ही साक्षात् अपने प्रियतमके साथ निमग्न होती हैं। इस प्रकार साक्षात् वेदान्तवेद्य परम-रसात्मक- सुधाजलनिधिके ही दिव्य-विकास-प्रेममय तत्त्व उसीमें पर्यवसित होते हैं। इसी तरह अनाद्यनन्त रससागरमें रसमय प्रिया-प्रियतम और उनके परिकरकी रसमयी लीलाका धाम अप्राकृत श्रीव्रज भी रसमय ही है। यद्यपि व्रजमें माधुर्य-शक्तिका प्राधान्य है तथापि क्वचित् ऐश्वर्य-शक्तिका भी विकास होता ही है; क्योंकि माधुर्य-शक्तिका ही अधिक आदर होनेपर भी ऐश्वर्य-शक्ति मूर्तिमती होकर प्रभुकी सेवा करनेके सुअवसरकी प्रतीक्षा करती रहती है। प्रभु भी उसका अत्यन्त तिरस्कार नहीं करते हैं। इसीसे मृद्भक्षण आदि लीलाओंमें मुखान्तर्गत ब्रह्माण्ड-प्रदर्शन आदि ऐश्वर्य- शक्तिके कार्य देखे जाते हैं। अतः विशुद्ध माधुर्य- भावका प्राकट्य श्रीवृन्दावनधाममें ही माना जाता है।