भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

१६८ भक्तिसुधा प्रीति है। राग यद्यपि प्राणियोंके निःसीम स्वात्मसौख्यका अपहरण करनेवाला होनेके कारण शत्रुवत् परिहार्य है; परंतु परम सौभाग्यशाली इन घोषनिवासियोँका राग तो प्रियतम—परम प्रेमास्पद आपके मंगलमय स्वरूपमें ही है। मोह भी प्राणियोंकी स्वाभाविकी स्वतन्त्रताका अपहरण करनेवाला होनेसे साक्षात् शृंखलारूप है; परंतु इनका तो मोह भी आपमें ही है। अतः इनके तो रागमोहादि दूषण भी भूषणरूप हैं। कारण भगवत्तत्त्व-व्यतिरिक्त प्रांपंचिक पदार्थविषयक ही रागादि त्याज्य हैं। भगवद्विषयक रागादिकी प्रेप्सा तो प्रत्येक प्रेक्षावान्को ही होती है। कथंचित् वैराग्यसे भी विराग हो सकता है, पर प्रेममय भगवान्से नहीं। तात्पर्य यह कि सर्वविषयक राग-त्यागसे यद्विषयक रागकी उत्कट प्रेप्सा सम्पादन की जाती है, तद्विषयक उत्कट राग- सम्पन्न इन घोषनिवासियोंके माहात्म्यकी एक कलाकी भी बराबरी कौन कर सकता है?' एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन्मुह्यति। सद्धेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥ तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्। तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जनाः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३५-३६) प्रभो! अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक स्वयं आप जिनके ऋणी हैं, उन घोषनिवासियोंकी महिमाका कौन वर्णन करे। सत्यलोकाधिपति जगत्पितामह श्रीब्रह्माजी भी व्रजके रजःस्पर्शलाभार्थ व्रजवृन्दाटवीके तृण-गुल्मादिके रूपमें जन्म लेनेके सौभाग्यकी अभिलाषा रखते हैं। उनको आशा है कि यहाँके तृण-गुल्मादि होनेसे भी व्रजवासियोंके चरण-रजका अभिषेक उन्हें प्राप्त होगा। उस व्रजके अन्तर्गत भगवान्की अनेक लीला- भूमियाँ हैं, जो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रविषयिणी प्रीतिका उद्दीपन करनेवाली हैं। यमुना-पुलिन, गोवर्धनाद्रि, गह्वरवन, कदम्बखण्डियाँ, नन्दग्राम, बरसाना, चरणाद्रि आदि ऐसे-ऐसे मनोहर स्थान हैं, जहाँकि परमाणु- परमाणुमें श्रीकृष्ण-प्रीतिका संचार करनेकी अद्भुत शक्ति देखी जाती है। वज्र-सदृश कठोर चित्त भी वहाँ हठात् द्रवीभूत हो जाता है। श्रीवृन्दावन-धाम तो व्रजभूमिका सर्वस्व है। श्रीव्रजभक्तोंकी पद-पंकज-रजके संस्पर्श-लोभसे, 'नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनः' (श्रीमद्भा० ३।४।३१)- के अनुसार, साक्षात् श्रीकृष्णसे भी अन्यून महाभागवत उद्धव भी वृन्दावन-धामके तृण-गुल्मादि होनेकी स्पृहा प्रकट करते हैं— आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) श्रीमत्प्रबोधानन्दसरस्वतीप्रभृति महानुभाव तो वृन्दावनधामबहिर्भूत अनन्त चिन्तामणियोंकी ही नहीं वरं च श्रीहरिकी भी उपेक्षा करनेकी सलाह देते हैं— मिलन्तु चिन्तामणिकोटिकोटयः स्वयं हरिर्द्वारमुपैतु सत्वरः। 'विपिन-राज सीमाके बाहर हरिहूँको न निहारौं' आदि। वेदान्तवेद्य परिपूर्ण सच्चिदानन्दघन परब्रह्म निरतिशय होनेके कारण, तारतम्यविहीन होनेपर भी वृन्दावनधाममें जैसा मधुर अनुभूयमान होता है, वैसा और स्थलोंमें नहीं। अतएव भावुकोंने— 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रेष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्।' —के अनुसार द्वारकास्थ, मथुरास्थ श्रीकृष्ण- व्यतिरिक्त श्रीकृष्णमें भी व्रजस्थ-वृन्दावनस्थ-निकुंजस्थ भेदसे तारतम्य स्वीकृत किया है। अभिप्राय यह है कि जैसे एक ही प्रकारका स्वातिबिन्दु स्थलवैचित्र्यसे विचित्र परिणामवाला होता है, शुक्तिकामें पड़कर मोतीके रूपसे, बाँसमें वंशलोचनरूपसे, गोकर्णमें गोरोचनरूपसे तथा गजकर्णमें गजमुक्तारूपसे परिणत होता है, वैसे ही वेदान्तवेद्य तत्त्व एकरूप होता हुआ भी अभिव्यंजक स्थलकी स्वच्छताके तारतम्यसे तथा अभिव्यक्ति-तारतम्य होनेसे तारतम्योपेत होता है।