भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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जिस परम-पावन धाममें तरु-लता-गुल्मादि भी वेणुछिद्र-निर्गत शब्द-ब्रह्मरूपमें परिणत भगवदीय अधर-सुधाका पानकर कुड्मल-पुष्प-स्तबकादिरूप रोमांचोद्गम छद्मसे तथा मधुधारारूप हर्षाश्रुविमोकसे अपने दुरन्त भावका व्यक्तीकरण कर रहे हैं; जिस धाममें प्रेमातिशयसे प्रभु-पादपद्मांकित ब्रजभूमिगत ब्रह्मादिवन्द्यरजके स्पर्शके लिये आज भी समस्त तरु- लताएँ विनम्र हो रही हैं अथवा मनमोहनके दिये हुए निर्भर प्रेमके भारसे ही विनम्र हो रही हैं; जिस ब्रजकी प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक परमाणु बलपूर्वक जीवन-धनकी स्मृति उत्पन्नकर प्रियतमके सम्मिलनकी उत्कण्ठाको उत्तेजित करते हैं, जिस ब्रजमें निवास करनेवाले सौभाग्यशाली महापुरुष-धौरेयोंके ऋणी अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डनायकको भी होना पड़ा, उस ब्रजका महत्त्व किन शब्दोंमें, किस लेखनीद्वारा व्यक्त किया जाय ? सत्यलोकपति ब्रह्माने कहा कि 'हे नाथ! आप इन लोकोत्तरसौभाग्यशाली ब्रजवासियोंको क्या देकर उनसे उऋण होंगे ?' इस बातको सोचता हुआ मेरा मन निश्चय करनेमें असमर्थ हो व्यामोहको प्राप्त होता है। प्रभुने कहा— 'ब्रह्मन्! मैं अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड- नायक हूँ। मेरे पास दिव्यातिदिव्य अनन्त वस्तुएँ हैं, जिन्हें देकर मैं इनके ऋणसे उन्मुक्त हो सकता हूँ। फिर तुम्हें ऐसा व्यामोह क्यों ?' इसपर ब्रह्माने कहा— 'प्रभो! इन अनन्तानन्त दिव्य वस्तुओंके प्रदानसे आप इन घोष-निवासियोंसे उऋण नहीं हो सकते; क्योंकि अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत सब दिव्यातिदिव्य तत्त्व तो केवल सुखके अभिव्यंजक होनेसे ही उपादेय हो सकते हैं, पर उन अनन्तकोटि- ब्रह्माण्डगत व्यक्त सौख्य-बिन्दुके परम उद्गम-स्थल अचिन्त्यानन्त-सौख्यसिन्धु आप ही हैं। फिर भला जिनके प्रांगणमें साक्षात् अनन्त परमानन्दसुधासिन्धु ही कन्दर्पकामित परम कमनीय कान्तिमय मूर्तिमान् धूलि- धूसरित होकर विहरण करे और रसिकेन्द्रवर्ग नन्दप्रांगणमें जिस अप्रमेय सबाह्याभ्यन्तर तत्त्वको उलूखल-निबद्ध दारुयन्त्रवत् व्रजसीमन्तिनी-वर्ग-विधेय बतलाते हैं, उन्हें तुषार-बिन्दु-स्थानीय सौख्याभिव्यंजक वस्तुके प्रदानसे आप कैसे प्रसन्न कर सकते हैं? जैसे कृतसंज्ञक चतुरंक द्यूतके विजित होनेपर त्र्यंक-द्व्यंक- एकांक द्यूत भी उसके अन्तर्भूत हो जाते हैं, किंवा सर्वतः संप्लुतोदकस्थानीय महासमुद्रको प्राप्त कर लेनेपर वापी-कूप-तड़ागादिगत जलकी अपेक्षा नहीं रह जाती, वैसे ही सौख्य-सुधानिधि सर्वफलात्मास्वरूप प्रभुके स्वायत्त होनेपर फल्गु फलोंकी अपेक्षा कौन विवेकी कर सकता है ? अतः हे गोपालचूड़ामणे! आप व्रजनिवासी वर्गके ऋणसे कैसे उन्मुक्त हो सकते हैं ?' चतुर-चूड़ामणि ब्रजवन-नवयुवराज बोले— 'ब्रह्मन्! तब तो मैं स्वात्मसमर्पणद्वारा इनके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। जब मैं ही सर्वफलात्मा हूँ तो मैं इनको स्वात्म-समर्पणसे भी प्रसन्न कर सकता हूँ।' ब्रह्माजीने कहा— 'नाथ! वह स्वात्म-समर्पण तो आपने सर्वफल-समर्हणीय श्रीचरणोंकी जिघांसासे विषलिप्त-स्तन्यपान करानेवाली द्वेषवती उस पूतनाके लिये भी किया है। आप यदि यह कहें कि कुल- कुटुम्बसमेत व्रजवासियोंको स्वात्म-समर्पणकर उऋण हो सकूँगा तो भी ठीक नहीं; क्योंकि पूतनाका भी कोई कुलकुटुम्ब आपकी प्राप्तिसे वंचित नहीं रहा। भला, जब आपका स्वात्म-समर्पण इतना सस्ता है कि बालघ्नी पूतनाको भी आपने स्वात्म प्रदान कर दिया, तब जो धरा-धन-धाम-सुहृत्-प्रिय तनय तथा आत्माको भी आपके पादारविन्द-माधुर्यपर न्योछावर करनेवाले ब्रजवासी जन हैं, उनसे आप स्वात्म- समर्पणमात्रसे कैसे उऋण हो सकते हैं ? यद्यपि कहा जा सकता है कि बड़े-बड़े योगियोंको भी दुर्लभ स्वात्म-समर्पण उनके लिये पर्याप्त है, परंतु विज्ञजनोंकी दृष्टिमें ब्रजधाम-निवासियोंकी पदवी योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंको भी दुर्लभ है; क्योंकि यम-नियम-प्राणायाम- प्रत्याहारादि-द्वारा बाह्य-विषयोंसे मनको संयतकर योगीन्द्र अनुक्षण जिस तत्त्वके अनुसन्धानका प्रयत्न करते हैं, उसी तत्त्वमें इन व्रजवासियोंकी स्वारसिकी