भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१६६ भक्तिसुधा व्रजभूमि व्रजभूमिका अद्भुत वैभव श्रीव्रजराजकिशोरके प्रेममें विभोर भावुकोंका सर्वस्व श्रीव्रजतत्त्व अपार, महामहिम, वैभवशाली तथा प्रकृति-प्राकृतप्रपंचातीत है। साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द वृन्दावनचन्द्रके ध्वज-वज्रांकुशादियुक्त, परमपावन, योगीन्द्र-मुनीन्द्र-ब्रह्मरुद्रेन्द्रादिवन्द्य पादार- विन्दसे अंकित व्रजतत्त्वके सम्बन्धसे भूमिने अपनेको परम सौभाग्यशालिनी समझा है। अहो! जिसके कृपा-कटाक्षकी प्रतीक्षा ब्रह्मेन्द्रादि देवाधिदेव भी करते रहते हैं, वह वैकुण्ठाधिष्ठात्री सर्वसेव्या महालक्ष्मी ही जहाँ सेविका बनकर रहनेके लिये लालायित है, उस सर्वोच्च-विराजमान व्रजभूमिके अद्भुत वैभवका कौन वर्णन कर सकता है ? परमाराध्यचरण श्रीव्रजदेवियोंने वृन्दावन-नव- युवराज नन्दनन्दनके प्रादुर्भावसे व्रजकी सर्वाधिक विजय बतलायी है— जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि। (श्रीमद्भा० १०।३१।१) लोक और वेदसे अतीत दिव्यप्रेमवती व्रज- युवतीजन वहाँ प्राणपणसे अपने प्राणनाथ प्रियतम परमप्रेमास्पदके अन्वेषणमें प्रेमोन्मादसे उन्मत्त होकर इधर-उधर डोल रही हैं। लोक तथा वेदमें यह प्रसिद्ध ही है कि 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक० २।४।५) अर्थात् संसारभरकी समस्त वस्तुएँ स्वात्म-सम्बन्धसे ही प्रेमास्पद होती हैं। स्वदेह, स्वपुत्र, स्वकलत्र एवं गेह-ग्राम-नगर-राष्ट्र, यहाँतक कि इष्ट देवता भी स्वात्म-सम्बन्धी ही प्रिय होते हैं। परमात्माके स्वरूपान्तरोंमें भी वैसा प्रेम नहीं होता, जैसा स्वात्म-सम्बन्धी इष्टदेवमें होता है। जब शर्करादि मधुर पदार्थोंके सम्बन्धसे अमधुर चूर्णादि भी मधुर प्रतीत होते हैं, तब शर्करादि स्वयं निरतिशय माधुर्यसे सम्पन्न हों—यह बात जैसे निर्विवाद सिद्ध है, वैसे ही जिस स्वात्मतत्त्वके सम्बन्धसे अनात्मा भी प्रेमास्पद होता है, वह स्वात्मतत्त्व स्वयं निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है—यह बात भी निर्विवाद सिद्ध है; परंतु ये व्रजसीमन्तिनियाँ तो अपने जीवनधन अशेषशेखर नट-नागरके लिये ही अपने स्वात्मासे भी प्रेम करती हैं। उनका भाव है कि 'हे दयित ! हे चपल ! आपके सुखके लिये ही हम इन प्राणोंको धारण करती हैं। हृदयेश्वर ! यदि यह देह, प्राण, आत्मादि आपके उपयोगमें न आयें तो ये किस कामके ? हमलोग तो आपके लिये ही इन सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौकुमार्य आदि गुणोंकी रक्षा करती हैं। हे प्राणवल्लभ ! नन्दलाल ! समस्त सौख्यजात तथा तच्छेषी आत्मा—ये सभी आपके लोकोत्तर मनोहर मन्दहास-माधुर्य-सुधासिन्धुपर न्योछावर हैं। किंवा, पादारविन्दगत नखमणि-ज्योत्स्नापर राई-नोनके समान वारनेयोग्य हैं।' धन्य है वह मंगलमय व्रजधाम, जो ऐसी व्रजराजकुमार-प्रेयसी व्रजदेवियोंके पादपद्मसे समलंकृत है; जहाँ नयनाभिराम घनश्याम मनमोहनकी मोहिनी मुरलिकाकी मधुर ध्वनिसे त्रिलोकीके चराचर चकित हो रहे हैं; जहाँ श्रीकृष्णचन्द्र-मुख-पंकज-निर्गत वेणुगीत-पीयूषसे पाषाण द्रवीभूत होकर बह चले तथा प्रेमार्त होकर कलिन्द-नन्दिनी महेन्द्र-नीलमणिके सदृश घनीभूत हो गयी; जहाँ गौएँ छविधाम घनश्यामके परम कमनीय माधुर्यका अनिमीलित नयन-पुटोंसे अधैर्यके साथ पान कर रही हैं और श्रोत्रपुटोंसे वेणुगीत-पीयूषका आस्वादन कर रही हैं; जहाँ प्रेमविभोर वत्सवृन्द सुतवत्सला जननीके प्रेमप्रसूत स्तन्यामृत-पानके लिये प्रवृत्त हुए; परंतु वंशी-निनाद- मन्त्रसे मुग्ध हो गये और उनके मुखसे दुग्ध बाहर गिरने लगा, अन्दर ले जानेकी क्रियाको वे भूल गये; जहाँकि मृग-विहंग भी विविध प्रकारके उपचारोंसे प्रियतमकी प्रसन्नताके लिये व्यग्र हैं।