भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि आपलोग इन रात्रियोंमें रमण करना। अनन्त, अखण्ड और ब्राह्मारसका सम्भोग परिच्छिन्न रात्रियोंमें नहीं हो सकता। अतः एक ही प्रहर-चतुष्टयवती रात्रिमें अनन्त कोटि दिव्य ब्राह्मी रात्रियोंका निवेश करके यह रासलीला श्रीकृष्ण- रमण-सम्पन्न होती है। विलक्षण व्रजांगनाओंकी श्रीकृष्ण-रसदात्री वह रात्रि परम रसमयी है। रासपंचाध्यायीके प्रारम्भमें ही इनका स्मरण किया गया है— भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः। वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) श्रीकृष्ण, उनकी लीलाएँ, लीलाओंका काल और धाम सब भगवत्स्वरूप ही होते हैं। इसीलिये— 'इमाः, ताः' आदि पदोंसे उनकी विलक्षणता, तत्पदार्थता आदि जानी जाती है। बस, इस तरह श्रीकृष्णसे वर पाकर भगवान्के आज्ञानुसार व्रजांगनाएँ भगवान्के चरणाम्भोजका चिन्तन करती हुई बड़ी कृच्छ्रता (कष्ट)-के साथ व्रज गयीं। तास्तथावनता दृष्ट्वा भगवान् देवकीसुतः। वासांसि ताभ्यः प्रायच्छत् करुणस्तेन तोषितः ॥ दृढं प्रलब्धास्त्रपया च हापिताः प्रस्तोभिताः क्रीडनवच्च कारिताः। वस्त्राणि चैवापहृतान्यथाप्यमुं ता नाभ्यसूयन् प्रियसङ्गनिर्वृताः ॥ परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसङ्गमसज्जिताः। गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिँल्लज्जायितेक्षणाः ॥ तासां विज्ञाय भगवान् स्वपादस्पर्शकाम्यया। धृतव्रतानां संकल्पमाह दामोदरोऽबलाः ॥ संकल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम्। मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते। भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथ क्षपाः। यदुद्दिश्य व्रतंमिदं चेरुरार्यार्चनं सतीः ॥ श्रीशुक उवाच इत्यादिष्टा भगवता लब्धकामाः कुमारिकाः। ध्यायन्त्यस्तत्पदाम्भोजं कृच्छ्रान्निर्विविशुर्व्रजम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२२।२१-२८) श्रीकृष्णलीला कृष्णके लिये ही है, किसी दूसरेके लिये नहीं अतएव जैसे सर्वभुक् अग्निके समान कोई सर्वभक्षी नहीं हो सकता, रुद्रके समान कालकूटभोजी नहीं हो सकता, कृष्णके समान गोवर्धन नहीं उठा सकता, वैसे ही चीरहरण और रासलीलाका भी आचरण कोई नहीं कर सकता। यदि मूढ़तासे कोई करेगा तो अवश्य ही उसका सर्वनाश हो जायगा। शास्त्रविरुद्ध श्रेष्ठोंके आचरणोंका अनुकरण कदापि नहीं करना चाहिये। अतएव श्रुतिने कहा है— 'यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि।' (तैत्तिरीय० १।११) वही कार्य किसीके लिये अदोषवह होता है, किसीके लिये शास्त्रविरुद्ध एवं सावद्य होता है। ऋषभदेवके लिये अवधूतचर्या ठीक ही है, परंतु औरोंके लिये वही अनुचित है। वैसे ही कृष्ण-लीला कृष्णके ही लिये है, दूसरोंके लिये नहीं। दूसरे तो यही शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि ओह! श्रीकृष्ण ऐसी परम सुन्दरी स्वाधीन नग्न व्रजबाललाओंके दर्शनसे निर्विकार एवं अक्षुब्धमनस्क रहे, ऐसे ही दृढ़ ब्रह्मचर्य और मनकी स्थिरता और एकाग्रता बनानी चाहिये।