भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

१७४ भक्तिसुधा थे। वे किस प्रकार इस बृहत् आख्यानका श्रवण करानेमें प्रवृत्त हो गये?' उनकी महिमाको द्योतित करनेवाला एक अन्य श्लोक भी है— यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव। पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु- स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ (श्रीमद्भा० १।२।२) अर्थात् जिन्होंने उपनयनसंस्कारके लिये विधिवत् गुरूपसदन नहीं किया और जैसे-तैसे पिताके उपनयन- संस्कार कर देनेपर भी जो उपनयन-सम्बन्धी क्रियाकलापसे उपरत थे, उन शुकदेवजीको जाते देखकर उनके विरहसे आतुर होकर जिस समय 'हे पुत्र! हे पुत्र!', इस प्रकार पुकारते हुए श्रीव्यासजी उनके पीछे गये तो प्रत्येक वृक्षमेंसे जो 'पुत्र' शब्दकी प्रतिध्वनि आ रही थी, वह ऐसी जान पड़ती थी, मानो वृक्ष भी तन्मयभावसे 'पुत्र-पुत्र' चिल्ला रहे हैं। भगवान् शुकदेवजी परम तत्त्वज्ञ और महायोगी होनेके कारण सर्वभूतहृदय हैं। 'सर्वभूतानां हृत् अयते विजानाति।' जो सम्पूर्ण भूतोंके हृत् और उसके विचारोंको जानते हैं अथवा 'स सर्वभूतानां हृत् अयते नियमयति' जो समस्त प्राणियोंके हृत्का अयन—नियमन करते हैं, इन व्युत्पत्तियोंके अनुसार श्रीशुकदेवजी सर्वभूतहृदय हैं। उनके सिवा अन्य तत्त्वज्ञ भी यद्यपि अपने पारमार्थिक स्वरूपसे सर्वान्तरात्मा ही हैं तथापि दूसरेके चित्तके नियन्त्रणादिकी शक्ति बिना योगके नहीं हो सकती; इसीसे 'हृत् अयते नियमयति' यह दूसरी व्युत्पत्ति उनके महायोगित्वका परिचय देती है। उससे उनका परमतत्त्व और महायोगी होना सिद्ध होता है। इस प्रकार सबके हृदय होनेके कारण वे वृक्षोंके भी अन्तरात्मा हैं। अतः उस समय वृक्षोंसे 'पुत्र' शब्दकी जो प्रतिध्वनि हो रही थी, उससे जान पड़ता था कि वह वृक्षोंके द्वारा मानो स्वयं ही श्रीव्यासजीको 'पुत्र' कहकर सम्बोधन कर रहे थे। ऐसा करके वे उन्हें उपदेश कर रहे थे कि 'पिताजी! आप जो हमें पुत्र-पुत्र कहकर पुकार रहे हैं, यह आपका व्यामोह ही है। हमारा-आपका जो पिता- पुत्र-सम्बन्ध है, वह तात्त्विक नहीं है। कभी हम आपके पुत्र होते हैं तो कभी आप भी हमारे पुत्र हो जाते हैं; अतः आपको इस मायिक सम्बन्धके मोहमें न फँसना चाहिये।' उस समय एक दूसरी घटना भी हुई। उससे भी उनकी निर्विकार समदृष्टिका पता चलता है। उस घटनाका वर्णन इस श्लोकद्वारा किया गया है— दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं देव्यो हिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम्। तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः॥ (श्रीमद्भा० १।४।५) श्रीशुकदेवजीके पीछे-पीछे भगवान् व्यास जा रहे थे। मार्गमें एक जलाशयपर कुछ देवांगनाएँ स्नान कर रही थीं। श्रीव्यासजी यद्यपि वस्त्र धारण किये हुए थे तथापि उन्हें देखकर उन अप्सराओंने लज्जावश अपने वस्त्र धारण कर लिये; किंतु बाल-योगी दिगम्बर-वेश शुकदेवजीको देखकर ऐसा नहीं किया। भगवान् शुकदेवजी परम सुन्दर थे। वे श्यामवर्ण होनेके कारण साक्षात् आनन्दकन्द भगवान् कृष्णचन्द्रके समान मनोमोहक थे। उनकी मनोहर मूर्तिको देखकर कुल-कामिनियोंके अन्तःकरणोंमें भी क्षोभ हो जाता था तथा बहुत-से बालक उनके पीछे लगे रहते थे। ऐसे होनेपर भी उन्हें देखकर देवांगनाओंने वस्त्र धारण नहीं किये, किंतु वृद्ध और विकलेन्द्रिय व्यासजीको देखकर बड़ी फुर्तीसे वस्त्र पहन लिये। यह देखकर जब व्यासजीने उनसे इसका कारण पूछा तो वे कहने लगीं—'महाराज! आपको तो स्त्री- पुरुषका भेद है, किंतु आपके पवित्र-दृष्टि पुत्रको ऐसा कोई भेद नहीं है। इसका आत्मभाव शुद्ध परब्रह्ममें सुस्थिर है, दृश्यपर तो इसकी दृष्टि ही नहीं