भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १७५ है। हमलोग अप्सराएँ हैं। हमसे लोगोंकी मनोवृत्ति छिपी नहीं रह सकती। महर्षियोंकी तपस्या भंग करनेके लिये ही हमारी नियुक्ति की जाती है। अतः 'ताँत बाजी और राग बूझा', हम महर्षियोंको देखते ही उनके हृदयको परख लेती हैं।' वस्तुतः दृश्य-संसर्ग ही दृष्टिके मालिन्यका हेतु है। जहाँ वह दृश्य-संसर्गसे निवृत्त हुई कि उसका मालिन्य भी निर्मूल हो गया। ऐसी स्थिति प्राप्त होते ही परब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। यही स्थिति श्रीशुकदेवजीकी थी। भला जो गोदोहन-वेलासे अधिक कहीं खड़े नहीं होते थे, उन श्रीशुकदेवजीने किस प्रकार श्रीमद्भागवत सुनायी ? ऐसी शंका होनेपर श्रीसूतजीने कहा—यह महाराज परीक्षित्का सौभाग्य ही था। स गोदोहनवेलां वै गृहेषु गृहमेधिनाम्। अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्वंस्तदाश्रमम्॥ यहाँ एक दूसरी शंका भी हो सकती है। महाभारतके कथनानुसार श्रीशुकदेवजी अपने तपके प्रभावसे ब्रह्मभावापन्न हो गये थे। उन्हें बाह्य प्रपंचका अनुसन्धान भी नहीं रहा था। फिर इस महासंहिताके स्वाध्यायमें उनकी किस प्रकार प्रवृत्ति हुई ? इसका उत्तर श्रीसूतजी महाराजने इस प्रकार दिया है— हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः। अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा० १।७।११) सूतजी कहते हैं—ठीक है, यद्यपि श्रीशुकदेवजी ऐसे ही निर्विशेष परब्रह्ममें परिनिष्ठित थे, शास्तृ, शिष्य आदि सम्बन्धोंमें उनकी प्रवृत्ति होनी सर्वथा असम्भव थी तथापि उन्हें एक व्यसन था। उससे आकृष्ट होकर ही उन्होंने इस महान् आख्यानका अध्ययन किया था। व्याससूनू भगवान् शुकदेवजीकी बुद्धि श्रीहरिके गुणोंसे आक्षिप्त थी, वह हरिगुणगानकी मनोमोहिनी माधुरीमें फँसी हुई थी। 'हरते इति हरिः' जो बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंके मनको भी हर लेते हैं, उन दिव्य मंगलमूर्ति भगवान्का नाम ही 'श्रीहरि' है। भगवान्के परम दिव्य नाम, गुण, चरित्र एवं स्वरूप ऐसे ही मधुर हैं। उन्हींके गुणोंने श्रीशुकदेवजीके शुद्धब्रह्माकारवृत्तिसम्पन्न मनको भी हठात् अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। इसीसे उन्होंने इस बृहत् संहिताका स्वाध्याय किया था। अहा! उन श्रीव्यासनन्दनकी हरिभक्तिप्रवणताका कहाँतक वर्णन किया जाय ? यद्यपि निरन्तर आत्मसुखमें विश्रान्त रहनेके कारण उनकी मनोवृत्ति किसी दूसरी ओर नहीं जाती थी; उनके हृदयसे द्वैतप्रपंचका सर्वथा तिरोभाव हो गया था; तथापि परमानन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्रकी ललित लीलाओंने उन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर ही लिया। इसीसे उन्होंने भगवल्लीलाके निगूढ़तम रहस्यभूत इस महाग्रन्थका आविर्भाव किया। स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो- ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि ॥ (श्रीमद्भा० १२।१२।६८) 'स्वसुखनिभृतचेताः' स्वानन्दसे ही पूर्ण है चित्त जिनका, यद्यपि प्राणियोंका चित्त विषयोंसे पूर्ण देखा जाता है तथापि स्वभावतः वह आत्मानन्दसे ही पूर्ण है। जिस प्रकार घटकी आकाशद्वारा स्वाभाविक पूर्णता जलादिद्वारा होनेवाली अस्वाभाविक पूर्णतासे निवृत्त-सी हो जाती है, उसी प्रकार चित्तकी स्वाभाविक ब्रह्माकाराकारिता उसकी अस्वाभाविक विषयाकारा- कारितासे निवृत्त हुई-सी जान पड़ती है। किंतु श्रीशुकदेवजीका चित्त तो विषयव्यामोहसे निवृत्त होकर आत्मानन्दमें ही विश्रान्त हो गया था। इसीसे उन्हें 'स्वसुखनिभृतचेताः' कहा है। इस प्रकार 'तद्व्युदस्तान्यभावः' आत्मानन्दमें विश्रान्त होनेके कारण अन्य पदार्थोंसे जिनकी सत्यत्वबुद्धि निवृत्त हो गयी है, ऐसे जिन शुकदेवजीने 'अजितरुचिर- लीलाकृष्टसारः' जिनकी ब्रह्माकारवृत्तिकी निश्चलता भगवान् अजितकी रुचिर लीलासे अपहृत हो गयी है;