भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१७६ भक्तिसुधा ऐसे होकर कृपावश इस तत्त्वप्रदर्शक पुराणका विस्तार किया, उन निखिलपापापहारी श्रीव्यासनन्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। यद्यपि ऐसे महानुभावोंकी प्रवृत्ति ग्रन्थाध्ययनमें नहीं हुआ करती तथापि भगवल्लीलाओंसे आकृष्टचित्त होनेके कारण ही उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया था। परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) इस सम्बन्धमें एक इतिहास भी प्रसिद्ध है। एक बार श्रीशुकदेवजी संसारसे उपरत होकर वनमें चले गये और वहाँ ध्यानाभ्यासमें तत्पर होकर समाधिस्थ हो गये। उनकी बुद्धिवृत्ति निखिल दृश्यप्रपंचका निरासकर अशेष-विशेष-शून्य शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्ममें लीन हो गयी और उन्हें बाह्य जगत्का कुछ भी भान न रहा। इसी समय भगवान् व्यासदेवके कुछ शिष्यगण उधर आ निकले। उन्होंने उन बालयोगीन्द्रको देखकर कुतूहलवश श्रीव्यासजीसे जाकर कहा कि भगवन्! हमने वनमें एक परम सुन्दर बालकको देखा है। वह बहुत दिनोंसे पाषाण-प्रतिमाके समान निश्चल भावसे एक ही आसनसे बैठा हुआ है। उसे बाह्य जगत्का कुछ भी भान होता नहीं जान पड़ता। तब भगवान् व्यासदेवने सारी परिस्थिति समझकर उन्हें एक श्लोक कण्ठ कराया और कहा कि तुम उस बालयोगीके पास जाकर इसे सुमधुर ध्वनिसे गाया करो। तदनन्तर शिष्यगण वनमें जाकर इस श्लोकका गान करने लगे— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) शिष्योंके निरन्तर गान करनेसे भगवान् शुकदेवजीके अन्तःकरणमें इस श्लोकके अर्थकी स्फूर्ति हुई। यह नियम है कि जितना ही चित्त शुद्ध होगा, उतना ही शीघ्रतर उसमें भगवत्तत्त्वका अनुभव होगा। इसीसे किन्हीं-किन्हीं उत्तम अधिकारियोंको, जिनकी उपासना पूर्ण हो चुकी होती है, महावाक्यका श्रवण करते ही स्वरूप-साक्षात्कार हो जाता है। उस श्लोकार्थकी स्फूर्ति होनेपर भगवद्विग्रहकी अनुपम रूपमाधुरीने उनके चित्तको क्षुभित कर दिया। उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने श्रीश्यामसुन्दरकी स्वरूपमाधुरीका वर्णन करनेवाले इस श्लोकको कई बार उन बालकोंसे कहलाया और कितनी ही बार आनन्दविभोर होकर स्वयं भी कहा। शिष्योंने भगवान् व्यासदेवके पास उन्हें यह सारा वृत्तान्त सुनाया। श्रीव्यासजी सोचने लगे कि इसे सुनकर भी वह आया क्यों नहीं! जब उन्होंने ध्यानस्थ होकर इसके कारणका अन्वेषण किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि उसे यह सन्देह है कि जिसका सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा विलक्षण है, वह मेरे-जैसे अकिंचन पुरुषसे स्नेह क्यों करेगा? तब व्यासजीने इस शंकाकी निवृत्ति करनेके लिये भगवान्की दयालुताको प्रकट करनेवाला यह श्लोक उन बालकोंको पढ़ाया और पूर्ववत् उन्हें श्रीशुकदेवजीके पास जाकर इसे गानेका आदेश किया— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) इस श्लोकको सुनकर श्रीशुकदेवजीको आश्वासन हुआ और उन्होंने बालकोंसे पूछा कि तुमने यह श्लोक कहाँसे याद किया है? बालकोंने कहा— 'हमारे गुरुदेव श्रीव्यासभगवान्ने एक अष्टादश सहस्र श्लोकोंकी महासंहिता रची है। ये श्लोक उसीके हैं।' यह सुनकर वे भगवान् व्यासदेवके पास आये और उनसे उस महाग्रन्थका अध्ययन किया। अध्ययन करनेमें एक दूसरा हेतु और भी था। 'नित्यं विष्णुजन-