भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रियः' (श्रीमद्भा० १।७।११) भगवान् शुकदेवजीको सर्वदा विष्णुभक्तोंका संग प्रिय था। श्रीमद्भागवत वैष्णवोंका परमधन है। अतः इसके कारण उन्हें सदा ही वैष्णवोंका सहवास प्राप्त होता रहेगा, इस लोभसे भी उन्होंने उसका अध्ययन किया। इससे शौनकजीके प्रश्नका उत्तर हो जाता है। वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे, इसीलिये आत्माराम होनेपर भी उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया। वस्तुतः भगवान्के गुणगण ही ऐसे हैं— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) यहाँ 'निर्ग्रन्थाः' इस पदके दो अभिप्राय हैं— (१) 'निर्गता ग्रन्थयो येभ्यस्ते' अर्थात् ब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जो आत्मानात्मसम्बन्धी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो गये हों, वे निर्ग्रन्थ हैं। अथवा (२) 'निर्गता ग्रन्था येभ्यस्ते' परब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जिनका ग्रन्थावलोकन छूट गया हो। वास्तवमें योगकी सिद्धि तो होती ही उस समय है, जिस समय कि शास्त्रोक्त विविध वादोंसे विचलित हुई बुद्धि उन सब विवादोंसे ऊपर उठकर निश्चल भावसे एक तत्त्वमें स्थित हो जाय। श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ (गीता २।५३) जिस समय बुद्धि मोहातीत हो जाती है, उस समय वह श्रोतव्य और श्रुतसे उपरत हो जाती है; फिर तो एकमात्र ब्रह्मवीथीमें ही उसका विचरण हुआ करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ (गीता २।५२) श्रीविद्यारण्यस्वामी तो ऐसी अवस्थामें शास्त्र- संन्यासकी व्यवस्था भी करते हैं— शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत्॥ भगवती श्रुति भी कहती है— 'तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ***।' (मु० उ० २।२।५) यहाँ यह विरोध प्रतीत होता है कि जब श्रुति- स्मृति और आचार्य सभीका यह मत है कि स्वरूप- साक्षात्कार होनेके पश्चात् शास्त्राभ्यासमें प्रवृत्ति नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिये तो श्रीशुकदेवजीकी इस महाग्रन्थके अध्ययनमें कैसे प्रवृत्ति हुई? इसका एकमात्र हेतु, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, यही था कि वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे। वे यद्यपि स्वयं उसमें प्रवृत्त नहीं हुए थे तथापि भगवान्के गुणोंकी मधुरिमाने उन्हें स्वयं उस ओर खींच लिया था। वेदान्तसिद्धान्तमें भी यह युक्तियुक्त ही है। इस विषयमें आचार्योंका ऐसा मत है कि जिस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय आवरण नष्ट हो जाता है, किंतु प्रारब्धभोगोपयोगी विक्षेप तो बना ही रहता है। ब्रह्मज्ञानसे केवल मूलाविद्याका नाश होता है, लेशाविद्या तब भी रह जाती है। उसकी निवृत्ति प्रारब्धक्षय होनेपर होती है। इसीसे श्रीनारद, सनकादि, शुकदेव और वसिष्ठादि परमसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ महात्माओंकी लोकमें भी नाना प्रकारकी चेष्टाएँ देखी जाती हैं। जिस प्रकार परम ब्रह्मनिष्ठ होनेपर भी श्रीनारदजीको हरिनाम-संकीर्तन और सनकादिको हरिगुणगानका व्यसन था, उसी प्रकार श्रीशुकदेवजीको भी हरिकथामृतके पानका व्यसन था। जिस प्रकार स्वरूपानुभव हो जानेपर भी प्रारब्धभोगके लिये इन्द्रियोंकी विषयोंमें प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार हरिगुणगानमें भी प्रीति हो ही सकती है। वस्तुतः भगवान्में आत्माराम-चित्ताकर्षकत्व एक गुण है। उसीसे आकृष्ट होकर भगवान् शुकदेवजीने इस शास्त्रका अध्ययन किया था। इससे सिद्ध हुआ कि ऐसे पूर्ण परब्रह्ममें परिनिष्ठित महामुनि शुकदेवजीकी इस कारणसे इस