भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभागवत-शास्त्रके अध्ययनमें प्रवृत्ति हुई तथा इसके वर्णनमें इसलिये भी प्रवृत्ति हुई कि जिससे विष्णुजन स्वयं ही आकर उन्हें मिल जाया करें। इस भागवत- शास्त्रमें भगवान्का दिव्यातिदिव्य रहस्य निहित है; अतः जिस प्रकार वशीकरणमन्त्रसे लोगोंको अपने अधीन कर लिया जाता है, उसी प्रकार इस परम मन्त्रके कारण भक्तजन स्वयं ही आकृष्ट हो जाते हैं। इसके सिवा भगवान्के गुण, चरित्र और स्वरूपकी माधुरी स्वयं भी ऐसी मोहिनी है कि बड़े-बड़े सिद्ध- मुनीन्द्र भी उनके कीर्तनमें प्रवृत्त हो जाया करते हैं। भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने नृसिंहतापिन्युपनिषद्के भाष्यमें कहा है— 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा तं भजन्ते।' अर्थात् मुक्तजन भी लीलासे देह धारणकर भगवान्का गुणगान किया करते हैं। यही बात सनकादिके विषयमें भी कही जा सकती है। भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है जिस समय महाराज परीक्षित् गंगातटपर आकर बैठे, उस समय बहुतसे ऋषि, मुनि, सिद्ध एवं योगीन्द्रगण उनके पास आये। उन सबसे उन्होंने यही प्रश्न किया कि 'भगवन्! मैं मरणासन्न हूँ; अतः मुमूर्षु पुरुषके लिये जो एकमात्र कर्तव्य हो, वह मुझे बतलाइये।' इस विषयमें उस मुनीन्द्र-मण्डलीमें विचार हो रहा था; भिन्न-भिन्न महानुभाव अपने भिन्न- भिन्न मत प्रकट कर रहे थे; अभी कुछ निश्चय नहीं हो पाया था कि इतनेमें ही शुकदेवजी आ गये। उनसे भी यही प्रश्न हुआ। राजाने पूछा—'भगवन्! अब मेरी मृत्युमें केवल सात दिन शेष हैं; अतः कोई ऐसा कृत्य बतलाइये, जिसके करनेसे मैं धीरोंकी प्राप्तव्य गतिको प्राप्त कर सकूँ।' तब श्रीशुकदेवजी बोले—'राजन्! अन्य अनात्मज्ञ लोगोंके लिये तो सहस्रों साधन हैं, परंतु भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है।' इसके तीन भेद हैं—श्रीहरिका स्वरूपश्रवण, गुणश्रवण और नामश्रवण। इसी प्रकार श्रीहरि-कीर्तन भी तीन प्रकारका है—स्वरूपकीर्तन, गुणकीर्तन और नामकीर्तन। उपनिषदादिसे भगवान्का स्वरूपकीर्तन होता है, इतिहास-पुराणादिसे रूप-गुण-कीर्तन होता है और विष्णुसहस्रनामादिसे नामकीर्तन होता है। कर्मकाण्ड भी भगवान्का ही स्वरूप है— 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।' (यजु० ३१।१६) कर्म ही क्या, यह सारा प्रपंच एकमात्र भगवान् ही तो है; भूत, भविष्यत्, वर्तमान जो कुछ है