भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १७९ वह दशम तत्त्व आश्रय है। श्रीमद्भागवतमें आश्रयका लक्षण इस प्रकार किया गया है— आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते। स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० २।१०।७) यहाँ 'आभास' और 'निरोध' इन दो शब्दोंसे ही उपर्युक्त नौ तत्त्वोंका निरूपण किया है। अतः 'निरोध' शब्दसे यहाँ मुक्ति अभिप्रेत है। आभास अध्यारोपको कहते हैं और निरोध अपवादको। इन अध्यारोप और अपवादके द्वारा ही उसके अधिष्ठानभूत निष्प्रपंच ब्रह्मतत्त्वका वर्णन किया जाता है— 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते।' अध्यारोपके द्वारा ब्रह्मको निखिल प्रपंचका चरम कारण मानकर उससे सृष्टिका क्रम बतलाया जाता है और अपवादके द्वारा दृश्यमात्रका अनात्मत्व- प्रतिपादन करते हुए साक्षी चेतनका शोधन किया जाता है। इसी क्रमसे शुद्ध परब्रह्म लक्षित हो सकता है। जीवको स्वभावतः तो शुद्धतत्त्वका बोध है नहीं; अतः इस दृश्यप्रपंचके कारणके अन्वेषणपूर्वक ही उसका बोध कराया जाता है। इसीसे मातृपितृशतादपि हितैषिणी भगवती श्रुतिने भी यही कहा है— सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्। तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। (छान्दोग्य० ६।२।१, ३) इत्यादि। इस प्रकार ब्रह्मको प्रपंचका कारण प्रतिपादन करनेमें श्रुतिका केवल यही तात्पर्य है कि जिसमें लोग परमाणु, प्रकृति आदि जड़ वस्तुओंको इसका कारण न मान लें। इसमें यह शंका हो सकती है कि दृश्य तो असत्, जड़ एवं दुःखस्वरूप है; उसका कारण सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म कैसे हो सकता है? कार्यमें सर्वदा कारणके गुणोंकी अनुवृत्ति हुआ करती है। कारण और कार्यकी विजातीयता प्रायः देखनेमें नहीं आती। इसका समाधान यह है कि यद्यपि मुख्यतया तो यही नियम देखा जाता है, परंतु कहीं-कहीं इसमें विषमता भी होती देखी गयी है। देखो, जड़ गोबरसे बिच्छू आदि चेतन जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार चेतन ब्रह्मसे जड़ प्रपंचकी उत्पत्ति भी हो ही सकती है। इस प्रकार यद्यपि आरम्भमें तो ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्तिका ही प्रतिपादन किया जाता है तथापि अन्ततः सिद्धान्त तो यही है कि प्रपंचकी उत्पत्ति ही नहीं हुई। इसलिये यह जो कुछ प्रतीत होता है, बिना हुआ ही दिखायी देता है। इसीसे यह अनिर्वचनीय है। अतः आभास और निरोध—आरोप और अपवाद अर्थात् बन्ध और मोक्ष अज्ञानजनित ही हैं— अज्ञानसञ्ज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२६) श्रुति कहती है— 'न प्रेत्य संज्ञास्तीत्य···विनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा॥' (बृहदारण्यक० ४।५।१३-१४) यहाँ 'प्रेत्य' का अर्थ है 'मरना'। जिस समय तत्त्वज्ञ देहेन्द्रियाद्याकारमें परिणत भूतोंसे उत्थान करता है, उस समय वह मानो मर जाता है। फिर उसका कोई नाम-रूप नहीं रहता। जैसे नमकका डला समुद्रका जल ही है। वह वायु आदिके संयोगसे लवणखण्डके रूपमें परिणत हो गया है। उसे यदि समुद्रमें डाल दिया जाय तो वह फिर उपाधिके संसर्गसे शून्य होकर समुद्ररूप ही हो जायगा। उसी प्रकार अन्नमयादि कोशोंमें परिणत जो उपाधि है, उससे सम्बन्ध छूट जानेपर आत्मा अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित हो जाता है। मोक्ष क्या है? श्रीमद्भागवत (२।१०।६)-में कहा गया है— 'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥' अर्थात् आत्मा जो देहेन्द्रियादिरूप उपाधिके