भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतादात्म्याध्यासकर्तृत्वसे भोक्तृत्वादि अनेकानर्थयुक्त- सा प्रतीत होता है, उसका सब प्रकारके सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदोंको छोड़कर अपने शुद्धस्वरूपमें स्थित होना ही मुक्ति है। वैष्णवाचार्य कहते हैं कि जीव ब्रह्मका नित्य दास है; अतः भगवद्विप्रयोगको छोड़कर उसका भगवत्सान्निध्यमें स्थित होना ही मुक्ति है तथा जो मधुर भाववाले हैं, वे ऐसा मानते हैं कि जीव जो प्राकृत स्त्री-पुरुषादि भावोंको प्राप्त हो गया है, उसका इनसे छूटकर गोपीभावमें स्थित होना ही मुक्ति है। जीव सत्य भी है और मिथ्या भी। ऐसा होनेपर ही उसमें बन्ध और मोक्षकी भी सिद्धि हो सकती है। जीव स्वरूपसे तो नित्य है, किंतु अन्तःकरणादि विशेषणविशिष्ट होनेके कारण अनित्य भी है, जिस प्रकार आकाश आकाशरूपसे तो नित्य है, किंतु घटरूप विशेषणके नाशवान् होनेके कारण अनित्य भी है, क्योंकि विशेषणके अभावसे भी विशिष्टका अभाव माना जाता है। विशिष्ट वस्तुका अभाव तीन प्रकारसे माना गया है- (१) विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; (२) विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव और (३) उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; अर्थात् विशेषण, विशेष्य और उन दोनोंके अभावके कारण होनेवाला अभाव; जिस प्रकार दण्डी पुरुषका अभाव दण्डाभाव, पुरुषाभाव अथवा इन दोनोंका ही अभाव होनेपर भी माना जाता है; जिस तरह घटाकाशका परिच्छिन्नत्व घटरूप उपाधिके ही कारण है, उसी प्रकार उपाधिसंसर्गके कारण ही पूर्ण परब्रह्ममें जीवभाव है। भगवान् भाष्यकार कहते हैं- 'एकमपि सन्तमात्मानमनेकमिव अकर्त्तारं सन्तं कर्त्तारमिव अभोक्तारं सन्तं भोक्तारमिव मन्यन्ते इत्येव जीवस्य जीवत्वम्।' अतः उपाधिके मिथ्यात्वके कारण जीवत्व भी मिथ्या है और उपाधिके असम्बन्धसे वह सत्य भी है। यह अवच्छेदवादकी प्रक्रिया है। इस प्रकार आभास और निरोध दोनों ही मिथ्या हैं तथा ये दोनों जिसमें अधिष्ठित होनेसे सिद्ध होते हैं, वह परब्रह्म ही आश्रय नामक दसवाँ तत्त्व है। इसका दशम स्कन्धमें निरूपण किया गया है- 'दशमे दशमो हरिः'। पहले नौ स्कन्ध इसीकी परिशुद्धिके लिये हैं। दशम स्कन्धके आदि, अन्त और मध्यमें बहुत-सी ऐश्वर्यपूर्ण घटनाओंका वर्णन किया गया है। जिस प्रकार एक सुधासिन्धुमें नाना प्रकारकी तरंगोंका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार दशम स्कन्धमें जितनी लीलाओंका प्रादुर्भाव हुआ है, वे सब भगवान्की नित्य लीलाकी ही अभिव्यक्तिमात्र हैं। अतः भगवल्लीला- सम्बन्धी जितना विषय है, वह सब भगवद्रूप ही है। भागवतमें दशमस्कन्ध सार है और उसका भी सारातिसार है रासपंचाध्यायी आचार्योंका ऐसा मत है कि सम्पूर्ण भागवतमें दशम स्कन्ध सार है, उसका भी सारातिसार रासपंचाध्यायी है। सम्पूर्ण शास्त्र भगवान्के वाङ्मय-विग्रह हैं; भिन्न-भिन्न शास्त्र उस वाङ्मय भगवद्विग्रहके ही स्वरूप हैं। उनमें श्रीमद्भागवत भगवान्का सविशेष- निर्विशेष सम्मिलित स्वरूप है। उनमें सर्ग-विसर्गादि दसों तत्त्वोंका सांगोपांग वर्णन है, किंतु दशम स्कन्धमें केवल आश्रय नामक दशम तत्त्वका ही वर्णन है। अतः दशम स्कन्ध मानो आश्रय नामक दशम तत्त्वका ही वाङ्मय-विग्रह है तथा उसमें जो रासपंचाध्यायी है, वह उसका प्राण है। इस रासपंचाध्यायीके अनेक प्रकार अर्थ किये जाते हैं। आचार्यगण जो एक ही वाक्यकी अनेक प्रकार व्याख्या किया करते हैं, उसमें उनका यही तात्पर्य होता है कि किसी-न-किसी प्रकार जीवोंका भगवान्में प्रेम हो। देवर्षि नारदको संक्षेपमें श्रीमद्भागवतका उपदेश करके उनसे भी ब्रह्माजीने यही कहा था- यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति। सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सङ्कल्प्य वर्णय॥ (श्रीमद्भा० २।७।५२) श्रीमद्भागवतमें यद्यपि शुद्ध निर्विशेष सच्चिदानन्द- घनतत्त्व ही वर्णित है तथापि यह आग्रह भी उचित