भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १८१ नहीं है कि उसमें द्वैतका वर्णन है ही नहीं और न निर्गुणवादियोंका यह कथन ही उचित है कि उसमें सगुणवाद नहीं है। वास्तवमें भागवतमें प्रेम-विघातक वेदान्त नहीं है। इसमें तो भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्रबोध तीनोंका ही वर्णन है। रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है पहले कहा जा चुका है कि रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है। इसमें सर्वान्तरतम वस्तुका प्रतिपादन किया गया है। याज्ञिकोंके यहाँ इसका बड़ा अच्छा क्रम है। वेदीके सबसे निकट यूप होता है। पात्र उसकी अपेक्षा भी अन्तरतम है। देवताओंका अन्तरंग हविष्य है और पात्र उसकी अपेक्षा बहिरंग हैं तथा अध्वर्यु उनकी अपेक्षा भी बहिरंग हैं। इसलिये यदि ऋत्विक्गण कोई पात्र लाते हैं तो स्वयं यूपके बाहर होकर निकलते हैं, किंतु पात्रको यूप और वेदीके बीचमें होकर निकालते हैं। यद्यपि यह दशम स्कन्ध समग्र ही आश्रयरूप है तथापि लीलाविशेषके लिये इसमें भी अन्तरंग- बहिरंगकी कल्पना की गयी है। जिनका भगवान्से जितना ही अधिक संसर्ग है, वे उतने ही अधिक अन्तरंग हैं। इसका वर्णन 'उज्ज्वलनीलमणि' नामक ग्रन्थमें बहुत स्पष्टतया किया गया है। मथुरावासियोंकी अपेक्षा गोकुलनिवासी अधिक अन्तरंग हैं, उनसे भी श्रीदामादि नित्यसखा अन्तरंग हैं, उनकी अपेक्षा गोपांगनाएँ अन्तरंग हैं, गोपांगनाओंमें ललिता-विशाखा आदि प्रधान यूथेश्वरियाँ अधिक अन्तरंग हैं और उन सभीकी अपेक्षा श्रीवृषभानुनन्दिनी अन्तरतम हैं; इस क्रमसे रासलीलामें सर्वान्तरतम व्रजांगनाओंका ही प्रसंग है, यह सर्वान्तरतम लीला है। इससे पूर्व भगवान्ने गोपोंको अपना स्वरूप- साक्षात्कार कराया था। यद्यपि कालियदमन, गोवर्धन- धारण, अघासुरादिके वध तथा अन्य अनेकों अतिमानुष-लीलाओंके कारण गोपगण यह समझ चुके थे कि कृष्ण कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। फिर वरुणलोकमें उनका ऐश्वर्य देखकर तो गोपोंको यह निश्चय हो ही गया था कि ये साक्षात् भगवान् हैं तथापि अन्तमें भगवान्ने अपने योगबलसे उन्हें अपने निर्विशेष स्वरूपका साक्षात्कार कराया और फिर वैकुण्ठलोकमें ले जाकर अपने सगुण स्वरूपका भी दर्शन कराया। इस प्रकार उन्होंने गोपोंको रासदर्शनका अधिकारी बनाया। यह अधिकार बिना स्वरूप- साक्षात्कारके प्राप्त नहीं होता। ब्रजमें इसे छठी भावना कहते हैं—'छठी भावना रास की।' पहली पाँच भावनाओंको क्रमशः पार कर लेनेपर ही रासदर्शनका अधिकार प्राप्त होता है। पाँचवीं भावनामें देह-सुधि भूल जाती है—'पाँचे भूले देह-सुधि' अर्थात् इस भावनामें ब्रह्मस्थिति हो ही जाती है। ऐसी स्थिति हुए बिना पुरुष रासदर्शनका अधिकारी नहीं होता। श्रीमद्भागवतमें जहाँ गोपोंको वैकुण्ठधाममें ले जाकर अपने सगुण-स्वरूपका साक्षात्कार करानेकी बात आती है, वहाँ उनके प्रत्यावर्तनके विषयमें कोई उल्लेख नहीं है। इससे कुछ लोगोंका ऐसा मत है कि यह भगवान्के नित्यधामकी नित्यलीलाका ही वर्णन है। इस लोकमें यह लीला हुई ही नहीं थी। यदि ऐसी बात हो तब तो भगवान्की इस लोकोत्तर लीलाके विषयमें कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती; क्योंकि इस लोकमें न होनेके कारण इसमें इस लोकके नियमोंकी रक्षा करना आवश्यक नहीं हो सकता, किंतु यदि भगवान्ने इस लोकमें ही यह लीला की हो तब भी उनके— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरौ जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (गीता ३।२१) —इस कथनसे जो विरोध प्रतीत होता है, वह ठीक नहीं; क्योंकि भगवान्के विषयमें ऐसा नियम नहीं है कि वे लोकमर्यादाका अतिक्रमण करते ही न हों। जब उनके अनन्य भक्त और तत्त्वनिष्ठ मुनिजन भी मर्यादातिलंघन करते देखे गये हैं तो साक्षात् भगवान्के विषयमें तो कहना ही क्या है। उनके