भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१८२ भक्तिसुधा पादपद्ममकरन्दका सेवन करनेवाले मुनिजनोंकी गतिविधि भी सर्वसाधारणके लिये सुबोध नहीं हुआ करती। यत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम्। वस्तुस्थिति तो ऐसी है कि आत्मतत्त्व सभी प्रकारके शुभाशुभ कर्मोंसे शून्य है। जब कि उस आत्मतत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंकी अविलुप्त महिमा भी कर्मोंसे न्यूनाधिक नहीं होती तो श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण साक्षात् परमात्मतत्त्वका किसी भी शुभाशुभ कर्मसे किस प्रकार संश्लेष हो सकता है? कूटस्थ स्वयंप्रकाश परब्रह्ममें अध्यस्त देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि उपाधियोंके व्यापारयुक्त होनेसे ही उस निर्व्यापार आत्मतत्त्वमें व्यापारवत्ताकी कल्पना होती है। इस प्रकारके कल्पित गुणों या दोषोंसे अधिष्ठानमें कोई गुण या दोष नहीं हो सकता। ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’, ‘घनैरुपे तैर्विगतै रखेः किम्’ इत्यादि श्रुति-स्मृति भी परमात्माको सब प्रकारके कर्मोंसे असंस्पृष्ट बतलाती है। अतः प्रकृति और प्राकृत सब प्रकारके प्रपंचसे अतीत परमात्मा सब प्रकारकी शृंखलाओंसे शून्य है। वस्तुस्थिति ऐसी होनेपर भी अनादि एवं अनिर्वचनीय अविद्याजनित मायामय शोकमोहादि सन्तापोंसे सन्तप्त प्रत्येक प्राणीको दुःख-निवृत्ति और सुख-प्राप्तिके लिये अनेक उपायोंका अन्वेषण करना ही पड़ता है; इसीसे मायामय देहादिके चेष्टारूप कर्मोंमें उनके शुभाशुभ भेदसे विधि या निषेध किया जाता है। जिस प्रकार विषकी निवृत्ति विषसे ही की जाती है, उसी प्रकार मायामयी उच्छृंखल प्रवृत्तियोंके निराकरणके लिये वैदिक और स्मार्त शृंखलाओंको स्वीकार किया जाता है। अभिप्राय यह है कि प्रपंच हेतुभूत अनादि अज्ञानकी निवृत्ति परमात्मतत्त्वके ज्ञानके बिना नहीं हो सकती। परमात्माके ज्ञानके लिये मनःसमाधानकी आवश्यकता है; क्योंकि उस परमतत्त्वका अपरोक्ष साक्षात्कार निर्वृत्तिक चित्तद्वारा ही हो सकता है और मनोनिरोधके लिये देह तथा इन्द्रियादिकी चेष्टाओंका निरोध होना चाहिये। इनका निरोध सहसा नहीं हो सकता। पहले उनकी प्रवृत्तिको नियमित करना होगा और उन्हें नियमित करनेके लिये ही विधि-निषेधात्मक वैदिक-स्मार्त कर्मोंका विधान किया गया है। इसीसे कहा है— ‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥’ (ईशावास्यो० ११) इस प्रकार हम देखते हैं कि विधि-निषेधकी अपेक्षा अज्ञानियोंको ही है; किंतु जो जन्म-मरणरूप संसारसे अतीत, मृत्युंजय तत्त्वदर्शी हैं, उन्हें इस प्रकारकी शृंखला अपेक्षित नहीं है; फिर जो उन मुक्तात्माओंके भी गन्तव्य हैं, उन श्रीभगवान्के लिये तो ऐसी कोई शृंखला हो ही कैसे सकती है? भगवान्में तो दो विरुद्ध धर्मोंका आश्रयत्व देखा ही जाता है। वे ‘अणोरणीयान्’ भी हैं और ‘महतो महीयान्’ भी। भगवान्में ही नहीं, यह बात तो कारणमात्रमें रहा करती है। देखो, एक ही पृथिवीतत्त्वमें दुर्गन्ध और सुगन्ध दोनों ही रहते हैं। अतः भगवान् एक ही साथ दोनों प्रकारके आचरण दिखलायेंगे। वे योगारूढ़ोंके लिये समस्त वैदिक और स्मार्त शृंखलाओंका उच्छेद करके एकमात्र भगवान्में ही स्वारसिकी प्रीतिका उपदेश करेंगे तथा आरुरुक्षुओंके लिये अपने वर्णाश्रमधर्मका यथावत् पालन करनेकी आवश्यकता प्रदर्शित करेंगे। श्रीभगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन— अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्ति- योगका विधान करना जो भगवच्चरणानुरागी हैं, वे भी अपने वर्णाश्रमधर्मका तिरस्कार नहीं किया करते। हाँ, यह अवश्य है कि उनकी मुख्य लगन भगवत्प्रेमके लिये ही होती है। उनकी यह भावना रहती है— या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु॥ वे यह भी चाहते हैं कि उनकी लौकिक-वैदिक प्रवृत्ति यथावत् बनी रहे तथापि भगवत्प्रेमका अतिरेक