भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १८३ होनेपर उसमें विश्रृंखलता हो ही जाती है। यही बात आत्माराम तत्त्वज्ञोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। भगवान्के दिव्य मंगलमय रूपमें प्रादुर्भूत होनेके जो मुख्य उद्देश्य हों, सबसे पहले उन्हींका निश्चय करना उचित भी है; इसलिये अब हमें यह विचार करना है कि भगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन क्या है। भगवान् स्वयं कहते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) परंतु यह बात ऐसी है, जैसे मच्छरको मारनेके लिये तोप लगायी जाय। भला जो भगवान् सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जिनके संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण प्रपंच बन गया है तथा जिनके विषयमें यह कहा जाता है— 'निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च- भूतानि स्मितमेतस्य चराचरम्, अस्य च सुप्तं महाप्रलयः।' उन्हें क्या इस तुच्छ कार्यके लिये अवतार लेनेकी आवश्यकता है? अतः इसका तो कोई ऐसा कारण होना चाहिये, जहाँ भगवान्की सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती हो और जिसके लिये उन्हें दिव्य-मंगल-विग्रह धारण करना अनिवार्य हो जाता हो। इसका उत्तर महारानी कुन्तीके इन शब्दोंसे मिलता है— तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) कुन्ती कहती हैं—'भगवन्! जो अमलात्मा परमहंस मुनि हैं, उनको भक्तियोगका विधान करनेके लिये आपका अवतार होता है; हम स्त्रियाँ इस रहस्यको कैसे समझ सकती हैं।' अब हम इस हेतुकी महत्ताका विचार करते हैं। यहाँ भगवान्के अवतारका प्रयोजन अमलात्मा मुनियोंके लिये भक्तियोगका विधान करना बतलाया गया है। जैसे कर्मका स्वरूप द्रव्य और देवता है, उसी प्रकार भक्तिका स्वरूप भजनीय है। भजनीयके बिना भक्ति नहीं हो सकती। प्रेमलक्षणा भक्तिका आलम्बन कोई अत्यन्त चित्ताकर्षक और परम अभिलषित तत्त्व ही हो सकता है। जो महामुनीश्वर प्रकृति-प्राकृत प्रपंचातीत परमतत्त्वमें परिनिष्ठित हैं, उनके मनका आकर्षक भगवान्के सिवा प्राकृत पदार्थोंमें तो कोई नहीं हो सकता। अतः इस बातकी आवश्यकता होती है कि उनके परमाराध्य भगवान् ही अचिन्त्य एवं अनन्त सौन्दर्य-माधुर्यमयी मंगलमूर्तिमें अवतीर्ण होकर उन्हें भजनीय रूपसे अपना स्वरूप समर्पणकर भक्तियोगका सम्पादन करें; क्योंकि जो कार्य पूर्ण परब्रह्म परमात्माके अवतीर्ण हुए बिना सम्पन्न न हो सकता हो, जिसके सम्पादनमें उनकी सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता कुण्ठित हो जाय, उसीके लिये उनका अवतीर्ण होना सार्थक हो सकता है। वस्तुतः उन महात्माओंके लिये भजनीय स्वरूप समर्पण करनेमें भगवान्की सर्वज्ञता एवं सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती है; क्योंकि ये शक्तियाँ शुद्ध परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं, ये उन्हींके अन्तर्गत हैं। अतः जो लोग शुद्ध परब्रह्ममें ही निष्ठा रखनेवाले हैं, उनपर इनका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार स्पष्टतया कहें तो यों समझना चाहिये कि यह सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता प्रकृति और प्राकृत अंशको लेकर ही है। ये मायाविशिष्ट ब्रह्मके गुण हैं। इसीसे तत्त्वज्ञपर इनका प्रभाव नहीं होता; क्योंकि वह गुणातीत होता है, इसलिये गुण उसे अपनी स्थितिसे विचलित नहीं कर सकते— 'गुणैर्यो न विचाल्यते।' (गीता १४।२३) किंतु फिर भी कहा जा सकता है कि तत्त्वज्ञका प्रारब्ध तो शेष रह ही जाता है। इसीसे प्रारब्धभोगके निर्वाहक पदार्थ उसके भी मन और इन्द्रियादिको अपनी ओर खींच लेते हैं। जिस प्रकार प्रारब्धभोगके लिये उसकी विषयोंमें प्रवृत्ति होती है, उसी तरह विलक्षण कोई रूपमाधुरी उसे अपनी ओर खींच ले