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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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१८४ भक्तिसुधा सकती है। तत्त्वज्ञको भी क्षुधातुर होनेपर अन्नभक्षणमें प्रवृत्त होना ही पड़ता है तथा तृषित होनेपर उसे जलकी इच्छा भी होती ही है; क्योंकि 'पश्वादिभिश्चाविशेषात्' इस भाष्यके अनुसार भोजनाच्छादनादिमें तो पशु आदिसे उनकी समानता ही है। फिर भगवान्‌के अवतरणकी क्या आवश्यकता है और उनकी सर्वशक्तिमत्तादि क्यों कुण्ठित होगी ? इसका निराकरण करनेके लिये उपर्युक्त श्लोकमें 'अमलात्मनां परमहंसानां मुनीनाम्' ऐसा कहा गया है। जिस प्रकार हंस परस्पर मिले हुए दूध और पानीको अलग-अलग कर देता है, उसी तरह जो आत्मा-अनात्मा, दृक्-दृश्य अथवा पुरुष-प्रकृतिका विवेक कर सकता है, वह हंस कहलाता है। यह योग्यता सांख्यवादियोंमें भी देखी जाती है। इसलिये वे भी 'हंस' कहे जा सकते हैं। वे क्षीर-नीर- विवेकके समान दृक्-दृश्य अथवा आत्मा-अनात्माका विवेक कर सकते हैं; किंतु उनकी दृष्टिमें वे दोनों ही तत्त्व सत्य रहते हैं। वेदान्तियोंकी दृष्टिमें दृश्यकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये उन्हें परमहंस कहा जाता है। इस प्रकार जिसकी दृष्टिमें सम्पूर्ण दृश्यका बाध होकर केवल शुद्ध चेतन ही अवशिष्ट रह गया है, उसे परमहंस कहते हैं। ऐसी स्थितिमें भी विचार दृष्टिसे तो दृश्यका अत्यन्ताभाव निश्चित हो जाता है, किंतु उसकी प्रतीति तो बनी ही रहती है। कहा है— आरूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः सङ्गेन योगी किमुताल्पसिद्धिः। तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात्॥ इससे सिद्ध होता है कि तत्त्वज्ञको भी कभी- कभी भगवान्‌की विश्वविमोहिनी मायाके अधीन हो जाना पड़ता है। श्रीदुर्गासप्तशती (१।५५-५६)-में कहा है— ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरइ। बरिआई बिमोह मन करइ॥ (रा०च०मा० ७।५९।५) अतः सिद्ध हुआ कि प्रारब्धवश तत्त्वज्ञका भी पतन हो जाता है। मनुजीने भी कहा है—'ज्ञानं क्षरति' अर्थात् ज्ञान बह जाता है। इसीलिये ऐसा कहा जाता है कि तत्त्वज्ञ होनेपर भी सदा सावधान रहना चाहिये। अतः यहाँ 'अमलात्मनाम्' ऐसा पद और दिया है। अर्थात् जो मलविक्षेप यानी रजोलश- तमोलेशसे निर्मुक्त हैं, जिन महानुभावोंके चित्तोंको खींचनेवाली कोई भी लौकिक सत्ता नहीं है और जो सदा ही दृश्यातीत शुद्ध चेतनमें ही परिनिष्ठित रहते हैं, उनका आकर्षण किसी लौकिक पदार्थसे नहीं हो सकता। अतः उन्हें अपनी परमानन्दमयी अहैतुकी भक्ति प्रदान करनेके लिये उनके परमाराध्य और एकमात्र ध्येय-ज्ञेय शुद्ध परब्रह्म ही अपनी लीला- शक्तिसे सगुण विग्रह धारण करते हैं। यहाँ यह शंका हो सकती है कि उन्हें भक्ति प्रदान करनेकी ऐसी आवश्यकता ही क्या है ? इसका उत्तर यही है कि भगवान् ऐसा करके उन्हें परमहंससे श्रीपरमहंस बनाते हैं। तत्त्वज्ञ लोग यद्यपि सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेद-शून्य शुद्ध परब्रह्मका अनुभव करते हैं, परंतु प्रारब्धशेषपर्यन्त निरुपाधिक नहीं होते। यद्यपि उन्होंने देहेन्द्रियादिका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है तथापि व्यवहारकालमें इनकी सत्ता बनी ही रहती है। समाधिकालमें भी निर्वृत्तिक मनरूप उपाधि रहती ही है। इसीसे वाचस्पतिमिश्रने कहा है कि निरुपाधिक ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं होता। संक्षेप- शारीरककार भी अविद्याका आश्रय शुद्ध चेतनको ही मानते हैं। उनका कथन है— 'आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला।' अर्थात् अज्ञानका आश्रय और विषय अखण्ड शुद्ध चेतन ही है, किंतु जिस समय शुद्ध चेतन अज्ञानका आश्रय और विषय होता है, उस समय वह अज्ञानोपहित तो होना ही चाहिये। अतः इसका तात्पर्य यही है कि अज्ञान अज्ञानातिरिक्त उपाधिशून्य

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