भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य १८५

ब्रह्मको ही विषय करता है। जिस प्रकार संसारका आदि मूलाज्ञान है, उसी प्रकार उसका अन्त भी चरमावृत्ति है। वस्तुतः मूलाज्ञान और चरमावृत्तिमें कोई अन्तर नहीं है। चरमावृत्ति परब्रह्मको विषय करती है—इसका तात्पर्य यही है कि वह चरमावृत्तिसे व्यतिरिक्त उपाधिहीन ब्रह्मको विषय करती है; क्योंकि चरमावृत्ति तो वहाँ मौजूद ही है। निरुपाधिक ब्रह्मका अनुभव तो प्रारब्धक्षयके अनन्तर उपाधिका नाश होनेपर ही होता है। किंतु जिस समय वे ही शुद्ध परब्रह्म अपनी अचिन्त्य लीला-शक्तिसे कोटिकामकमनीय महामनोहर श्रीकृष्ण-मूर्तिमें प्रादुर्भूत होंगे, उस समय उस तत्त्वज्ञको भी उनका वह दिव्य-दर्शन निर्विशेष ब्रह्मदर्शनकी अपेक्षा अधिक आनन्दप्रद प्रतीत होगा। जिस प्रकार सूर्यको दूरवीक्षण यन्त्रद्वारा देखनेपर उसमें जो विचित्रता प्रतीत होती है, वह केवल नेत्रोंसे देखनेपर प्रतीत नहीं होती, उसी प्रकार लीलाशक्त्युपहित सगुण ब्रह्मदर्शनमें जो आनन्दानुभव होता है, वह अशेष-विशेषशून्य शुद्ध परब्रह्मके साक्षात्कारमें भी नहीं होता। इसीसे श्रीरामचन्द्रका दर्शन होनेपर तत्त्वज्ञशिरोमणि महाराज जनकने कहा था— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५,३) महाराज जनकके इस बरबस ब्रह्मसुखत्याग और रामदर्शनानुरागमें क्या कारण था? केवल यही कि अबतक वे शुद्ध परब्रह्मरूप सूर्यको अपने नेत्रोंसे ही देखते थे, किंतु इस समय वे उसके लीलाशक्तिरूप दूरवीक्षणोपहित स्वरूपका दर्शन कर रहे थे। केवल नेत्रसे दीखनेवाले आदित्यकी अपेक्षा दूरवीक्षणोपहित आदित्यदर्शनमें विशेषता है ही। यहाँ एक बात और स्मरण रखनी चाहिये। आदित्यका वास्तविक स्वरूप कितना वैचित्र्यमय है—यह बात हमारे अनुमानमें भी नहीं आ सकती। इसका अनुभव तो आदित्यकी पूर्ण सन्निधि प्राप्त होनेपर ही हो सकता है। इस समय हमें उसका जो कुछ रूप दिखायी देता है, वह किसी-न-किसी उपाधिसे संश्लिष्ट ही होता है। जिस प्रकार दूरवीक्षण यन्त्र उसका उपाधि है, उसी प्रकार मेघ भी है, किंतु मेघ उसके स्वरूपका आवरक है, जिसके कारण हमें सूर्यकी स्फुट प्रतीति नहीं हो सकती। इसी प्रकार इधर ब्रह्मदर्शनमें भी जहाँ भगवान्‌की लीलाशक्ति भगवद्दर्शनमें पटुता प्रदान करनेवाली है, वहाँ मल, विक्षेप और आवरण उसके प्रतिबन्धक हैं। इसीलिये अज्ञजन वस्तुतः ब्रह्मदर्शन करते हुए भी उसे अदृष्ट ही समझते हैं। किंतु भगवान्‌के स्वरूपकी स्फुट और यथावत् अनुभूति तो सम्पूर्ण उपाधियोंसे मुक्त होकर उनके साथ तादात्म्य होनेपर ही होगी। भगवान्‌के सगुण दिव्य मंगलविग्रहमें विशेष आकर्षण है उपर्युक्त कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मदर्शी तत्त्वज्ञगण जिस निर्विशेष शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार करते हैं, उसकी अपेक्षा भगवान्‌का सगुण दिव्य-मंगलविग्रह अधिक आकर्षक क्यों है? इस विषयमें भावुकोंका ऐसा कथन है कि जिस प्रकार पार्थिवत्वमें समानता होनेपर भी पाषाणादिकी अपेक्षा हीरा अधिक मूल्यवान् होता है तथा कपासकी अपेक्षा उससे बना हुआ वस्त्र बहुमूल्य होता है, उसी प्रकार शुद्ध परब्रह्मकी अपेक्षा उसीसे विकसित भगवान्‌की दिव्य-मंगलमयी मूर्ति कहीं अधिक माधुर्य-सम्पन्न होती है। इक्षुदण्ड स्वभावसे ही मधुर है, किंतु यदि उसमें कोई फल लग जाय तो उसकी मधुरिमाका क्या कहना है? मलयाचलोत्पन्न चन्दनके वृक्षमें यदि कोई पुष्प आ जाय तो वह कैसा सौरभसम्पन्न होगा? इसी प्रकार भगवान्‌की सगुण मूर्तिके सम्बन्धमें समझना चाहिये। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि भगवान्‌के निर्गुण निर्विशेष स्वरूपमें वह परमानन्द है ही नहीं, जो कि उनकी सगुण मूर्तिमें है। कारण, इक्षुदण्डकी मधुरिमा, पाषाणादिका मूल्य और चन्दनादिकी सुगन्धि—