भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ भक्तिसुधा
ये सब सातिशय हैं। इनमें न्यूनाधिकता हो सकती है, परंतु भगवान्में जो सौन्दर्य, माधुर्य एवं आनन्दादि हैं, वे निरतिशय हैं। इसलिये चाहे भगवान्की सगुण मूर्ति हो चाहे निर्गुण, इनमें कोई तारतम्य नहीं हो सकता; क्योंकि जो तत्त्व निरतिशय बृहत् और निरतिशय आनन्दमय है, उसीको तो निर्गुण ब्रह्म कहते हैं। जहाँ बृहत्ता अथवा आनन्दका तारतम्य है, वह तो ब्रह्म ही नहीं हो सकता। जहाँ यह तारतम्य समाप्त हो जाता है, उस अपार संवित्सुखसारहीको तो परब्रह्म कहते हैं। जो तत्त्व देशकालवस्तुकृत् परिच्छेदसे रहित है, वही अनन्त ब्रह्म है; 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' तथापि यहाँ जो विलक्षणता बतलायी गयी है, वह भगवदभिव्यक्तिके तारतम्यको लेकर भावुक भक्तोंके हृदयकी भावना हो सकती है। तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञके अन्तःकरणपर अभिव्यक्त परब्रह्मके माधुर्यादिकी अपेक्षा स्वयं उन्हींकी परमाह्लादिनी लीलाशक्तिपर अभिव्यक्त भगवत्स्वरूपके सौन्दर्य-माधुर्यादि अत्यन्त विलक्षण हो सकते हैं, किंतु वास्तवमें तो सगुणोपासकके लिये जैसा सगुण स्वरूप परमानन्दमय है, वैसा ही निर्गुणोपासकके लिये भगवान्का निर्गुण-निर्विशेष स्वरूप भी है। जो लोग निर्विशेष परब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार कर चुके हैं, उन्हें कैवल्य तो ज्ञानसे ही प्राप्त होता है; किंतु वे जीवन्मुक्तिकालमें भी भगवान्की अचिन्त्य लीलामयी शक्तिके योगसे दिव्य मंगलमय विग्रहमें आविर्भूत हुए परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्रकी सौन्दर्य- माधुर्य-सुधाका समास्वादन किया करते हैं। अचिन्त्यानन्द सुधासिन्धु श्रीभगवान्के जिस माधुर्यका समास्वादन केवल वृत्ति-शून्य अन्तःकरणसे नहीं किया जा सकता, उसे भी तत्त्वज्ञ भावुकगण भगवान्की दिव्य लीलाशक्तिकी सहायतासे अनुभव कर लेते हैं। ऊपर यह कहा जा चुका है कि केवल नेत्रोंसे सूर्यकी वैसी दीप्तिमत्ता अनुभव नहीं होती, जैसी कि स्वच्छ काँच आदिकी सहायतासे होती है। उपाधि-विशुद्धिके तारतम्यसे माधुर्य-विशेषके प्राकट्यका भी तारतम्य रहता है। यद्यपि प्राण और इन्द्रियादिकी अपेक्षा तो शुद्ध निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी स्वच्छता विशेष है तथापि भगवान्की जो लीलाशक्ति उनके अशेष विशेषातीत परमानन्दात्मक शुद्ध स्वरूपको ही अचिन्त्य एवं अनन्त आनन्दमय सौन्दर्य-सुधानिधि, परम दिव्य श्रीकृष्णविग्रहमें अभिव्यक्त कर देती है, वह उस निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी अपेक्षा भी अनन्तगुण स्वच्छ है; क्योंकि उसमें रजोगुण या तमोगुणका थोड़ा-सा भी संस्पर्श नहीं है। अन्तःकरण चाहे कितना भी स्वच्छ हो, परंतु वह रजोगुण-तमोगुणसे सर्वथा शून्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह तमःप्रधाना प्रकृतिके परिणामभूत पंचभूतोंका ही कार्य है और कार्यमें कारणांशकी अनुवृत्ति अनिवार्य है। अतः सिद्ध हुआ कि तत्त्वज्ञगण केवल निर्वृत्तिक अन्तःकरणसे वैसी मधुरताका अनुभव नहीं कर सकते, जैसी कि लीलाशक्तिके योगसे आविर्भूत हुए भगवान्के सगुण स्वरूपका साक्षात्कार करनेपर होती है। इसीसे अमलात्मा तत्त्वज्ञ मुनियोंको उनका भजनीय स्वरूप समर्पणकर भक्तियोगके द्वारा उन्हें अपने सौन्दर्य-माधुर्यका समास्वादन करानेके लिये ही परब्रह्म परमात्मा अवतीर्ण होते हैं। उन्हें यदि सगुण साकार ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाय तो भी देहपातके अनन्तर वे कैवल्यपद ही प्राप्त करेंगे। किंतु सगुणोपासक अपने इष्टदेवका नित्यधाम प्राप्त करेंगे; इसीसे भक्ति- रसायनादि ग्रन्थोंमें तत्त्वज्ञको सगुण-दर्शनसे केवल दृष्ट-फल माना है और उपासकको दृष्ट और अदृष्ट दोनों। अतः ऊपर जो बतलाया है, इससे यही निश्चय होता है कि भगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान करना है। इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये वे अपनी लीलाशक्तिसे दिव्य मंगलमय देह धारण करते हैं। यह लीलाशक्ति भगवान्की परम अन्तरंगा है। जिस प्रकार वृक्षके बीजमें उसके शाखा, पल्लव, पुष्प और फल आदि सभी अंगोंको उत्पन्न करनेकी अनेक शक्तियाँ