भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासलीलारहस्य १८७ रहती हैं, उसी प्रकार महाशक्तिमें ही विश्वविकासकी समस्त शक्तियाँ निहित हैं अर्थात् वह भगवदीय महामायाशक्ति अनन्त शक्तियोंका पुंज है। उसमें जिस प्रकार अनन्तकोटिब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्वर्ती विचित्र भोग्य, भोक्ता और उनके नियामक आदि प्रपंचको उत्पन्न करनेकी अनन्त शक्तियाँ हैं, उसी प्रकार उन अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर श्रीभगवान्‌के दिव्य मंगलमय विग्रहमें आविर्भूत होनेके अनुकूल भी एक परम विशुद्धा अन्तरंगा शक्ति है और वह भगवान्‌की अनिर्वचनीया आत्मयोगभूता महाशक्तिके अन्तर्गत होनेके कारण अनिर्वचनीयतामें अन्य प्रपंचोत्पादनानुकूल शक्तियोंके समान होनेपर भी उनकी अपेक्षा कहीं अधिक स्वच्छ और दिव्य है। इसे दृष्टान्तद्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है—जैसे किसी अत्यन्त दिव्य पुष्पके बीजमें अंकुर, स्कन्ध, पत्र और कण्टकादि उत्पन्न करनेकी भी शक्तियाँ रहती हैं तथापि उन सबकी अपेक्षा उसमें जो महामनोहर सुरभित सुमन उत्पन्न करनेकी शक्ति है, वह उन सबकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। यदि एक ही बीजमें अनेकों अतीन्द्रिय शक्तियाँ न होतीं तो उसमें पत्र, पुष्प, कण्टक और शाखा आदि परस्पर अत्यन्त विलक्षण वस्तुएँ उत्पन्न नहीं हो सकतीं। अतः जिस प्रकार कण्टकादि उत्पन्न करनेवाली शक्तियोंकी अपेक्षा सुकोमल एवं सुगन्धित पुष्प उत्पन्न करनेवाली शक्ति अत्यन्त उत्कृष्ट और विशुद्ध होती है, उसी प्रकार प्रपंचोत्पादिनी शक्तियोंकी अपेक्षा भगवान्‌की दिव्य मंगलमयी मूर्तिका स्फुरण करनेवाली शक्ति परम विलक्षण होनी ही चाहिये। उसीके द्वारा भगवान् अचिन्त्य सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी मंगलमूर्ति धारण करते हैं, इसीसे प्रपंचातीत प्रत्यगभिन्न परमात्मतत्त्वमें निष्ठा रखनेवाले महामुनीन्द्रोंके मन भी अनायास ही उस भगवन्मूर्तिकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं। इसी विलक्षणशक्तिका निर्देश पराशक्ति एवं अन्तरंगा शक्ति आदि शब्दोंसे भी किया है। वह शक्ति भी भगवत्स्वरूपमें अप्रविष्ट रहती हुई ही उसके प्राकट्यका निमित्त होती है। जिस प्रकार उपाधिविरहित, अतएव दाहकत्वप्रकाशकत्वरहित अग्निके दाहकत्व- प्रकाशकत्व-विशिष्ट दीप-शिखादिरूपकी अभिव्यक्तिमें तेल और बत्ती आदि केवल निमित्तमात्र ही हैं, मुख्य अग्नि तो दीपशिखा ही है अथवा जैसे तरंगविरहित नीरनिधिके तरंगयुक्त होनेमें वायु केवल निमित्तमात्र ही है, वास्तवमें तो तरंगयुक्त समुद्र विलक्षणरूपमें प्रतीत होनेपर भी सर्वथा वही है, जो कि निस्तरंगावस्थामें था, ठीक उसी प्रकार विशुद्ध लीलाशक्तिरूप निमित्तसे शुद्ध परब्रह्म ही अनन्त कल्याणगुणगणविशिष्ट सगुण विग्रहमें अभिव्यक्त होते हैं; किंतु वस्तुतः उनका वह विग्रह मूर्तिमान् शुद्ध परमानन्द ही है। उसमें उस दिव्य शक्तिका भी निवेश नहीं है, वह तो तटस्थ रूपसे ही उसकी निमित्त होती है। इसीसे भगवान्‌की सगुणमूर्तिके विषयमें 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि', 'आनन्दैकरसमूर्तयः' इत्यादि उक्तियाँ हैं। इसीसे उसकी मधुरिमा बड़े-बड़े सिद्ध-मुनीश्वरोंके भी मनोंको मोहित कर देती है। जिस समय बालयोगी सनकादि वैकुण्ठ-धाममें भगवान्‌की सन्निधिमें पहुँचे, उस समय प्रभुके पादारविन्द-मकरन्दके आघ्राणमात्रसे उनका प्रशान्त चित्त क्षुभित हो गया— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) इसीसे बहुत-से सहृदय महानुभाव निर्विशेष परब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर भी प्रभुके प्रेम- पथके पथिक होते हैं। श्रीगोसाईंजी उन्हें 'सयाने सन्त' कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) वे भगवान्‌से भगवत्सेवाके सिवा और कुछ नहीं चाहते; यहाँतक कि मुक्ति और अपुनर्जन्मको भी अस्वीकार कर देते हैं—