भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

१८८ भक्तिसुधा न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) वस्तुतः भोग-मोक्षादिकी वासना रहते हुए तो भगवद्भक्तिकी प्राप्ति ही नहीं हो सकती। भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते। तावद् भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥ अतः जिनका चित्त केवल भगवान्‌के सौन्दर्य- सुधा-समास्वादनके लिये ही लालायित हो रहा है, उन्हें केवल संकल्पमात्रसे भगवान् सन्तुष्ट नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो मोक्षका भी तिरस्कार कर देते हैं— 'दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' (श्रीमद्भा० ३।२९।१३) भला, जब उनका सन्तोष कैवल्य भी नहीं कर सकता तो भगवान् क्या करें ? उन्हें स्वयं आविर्भूत होना ही पड़ता है। यहाँ गोपांगनाओंको भी भगवद्दर्शनके बिना 'त्रुटिर्युगायते' एक-एक पल युगके समान हो रहा था। उन्हें सन्तुष्ट करनेमें भगवान्‌का निर्विशेष रूप असमर्थ था। इसलिये ऐसी अवस्थामें भगवान्‌को मूर्तिमान् होकर अवतीर्ण होना ही पड़ा; क्योंकि उनकी तृप्ति तथा जीवन बिना इसके नहीं हो सकते। भगवान्‌के अवतीर्ण हुए बिना वे कार्य नहीं हो सकते थे। इसीसे प्रभुका प्रादुर्भाव हुआ। अब, साथ ही यह भी सोचना चाहिये कि— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) —यह श्लोक भी ठीक ही है। यहाँ 'साधु' शब्दसे गोपांगना-जैसे साधु ही समझने चाहिये, जिनका परित्राण भगवान्‌के दर्शनोंके बिना हो ही नहीं सकता था तथा दुष्कृती भी साधारण नहीं, बल्कि भगवान्‌के अन्तरंग जय-विजय-जैसे दुष्कृती समझने चाहिये, जिनका दुष्कृत भगवान्‌की लीलाविशेषके विकासके ही लिये था; अन्य दुष्कृतियोंको तो उनका दुष्कर्म ही नष्ट कर देगा। इसके सिवा धर्म- संस्थापनसे भी भक्तियोगरूप धर्मकी ही स्थापना समझनी चाहिये, जो कि ऐसे भजनीयके बिना नहीं हो सकती। इस श्लोककी व्याख्या करते हुए भगवान् भाष्यकारादिने भगवान्‌के अवतारका प्रयोजन सर्वसाधारणके कल्याणोपयुक्त धर्मकी स्थापना ही बतलाया है। इस प्रकार यद्यपि उनके प्रादुर्भावका प्रधान प्रयोजन अमलात्माओंके भक्तियोगका विधान करना ही है तथापि अवान्तर प्रयोजन सन्मार्गस्थ साधुओंकी रक्षा और वैदिक-स्मार्तादि कर्मोंकी स्थापना भी हो सकता है। आगेके कथनानुसार भगवान्‌में लोक-शिक्षादि भी देखे ही जाते हैं। भगवान् तो सर्वनियन्ता हैं, इसलिये उनका प्रादुर्भाव योगारुरुक्षुओंके लिये भी था और योगारूढ़ोंके लिये भी। योगारुरुक्षुओंको वैदिक-स्मार्त कर्मोंमें प्रवृत्त करना था और योगारूढ़ोंको सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक केवल भगवन्निष्ठामें नियुक्त करना था। अतः भगवान्‌की यह उक्ति उचित ही है— न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ (गीता ३।२२-२३) भगवान् विधिनिषेधातीत हैं वस्तुतः भगवान् तो विधि-निषेधातीत हैं। वे केवल लोकशिक्षाके लिये ही शास्त्रीय शृंखलाका अवलम्बन करते हैं; क्योंकि शास्त्रादि लोगोंको मर्यादापालनमें वैसा परिनिष्ठित नहीं कर सकते, जैसा कि उस मर्यादाका पालन करनेवाले महापुरुष कर सकते हैं। अतः शास्त्रके अर्थज्ञानके साथ शास्त्रार्थके अनुष्ठानमें परिनिष्ठित व्यक्तियोंके सहवासकी भी बहुत आवश्यकता है। अतः लोगोंको वैदिक-स्मार्त कर्मोंमें प्रवृत्त करनेके लिये ही भगवान् स्वयं भी उनका यथाविधि अनुष्ठान किया करते थे— अथाप्लुतोऽम्भस्यमले यथाविधि क्रियाकलापं परिधाय वाससी।