भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १८९ चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमो हुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यतः ॥ (श्रीमद्भा० १०।७०।६) इस प्रकारके लोकसंग्रहके लिये ही इन सारी वैदिक एवं स्मार्त मर्यादाओंका पालन किया करते थे। जो बन्दर बहुत चंचल होता है, उसे संयत करनेके लिये बहुत लम्बी श्रृंखला बाँधी जाती है। फिर वह जैसे-जैसे शान्त होता जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी श्रृंखला छोटी कर दी जाती है। यहाँतक कि अन्तमें उसे खुला छोड़ देनेपर भी वह चुपचाप बैठा रहेगा। इसी प्रकार अत्यन्त चंचल चित्तके निरोधके लिये विधि-निषेधरूप लम्बी श्रृंखलाकी आवश्यकता है। कारण, शास्त्रीय श्रृंखलाशून्य पुरुषके देहेन्द्रियादिकी चेष्टाओंका भी नियमन अशक्य है, फिर उनके मनकी चेष्टाओंका निरोध कैसे हो सकता है? इसीसे मनको सर्वथा निश्चेष्ट करनेके लिये पहले देहादिकी शास्त्रीय श्रृंखलानिबद्ध चेष्टा सम्पादित करनी चाहिये, परंतु पीछे जैसे-जैसे उसकी उच्छृंखलता कम होती जाती है, वैसे-वैसे ही उसकी श्रृंखला भी छोटी होती जाती है। वह पहले तो काम्य कर्मद्वारा स्वाभाविक काम और कर्मका निराकरण करता है, फिर पारलौकिक महत्फलवाले कर्मोंसे क्षुद्रफलदायक काम्य कर्मोंको त्यागता है। तत्पश्चात् निष्काम कर्मद्वारा सभी काम्य कर्मोंको छोड़ देता है और फिर ध्यान-समाधि आदिसे सब प्रकारकी चेष्टाओंका निरोधकर ठीक-ठीक नैष्कर्म्यको प्राप्त होता है। इस प्रकार उत्तरोत्तर सूक्ष्मतम-साधनका अभ्यास करते-करते अन्तमें समाधिस्थ होता है। उस समय कोई आलम्बन न होनेपर भी उसका मन सर्वथा निश्चेष्ट रहता है और फिर उसे किसी प्रकारकी श्रृंखलाकी अपेक्षा ही नहीं रहती। इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग आरुरुक्षु हैं, जो संसारसागरसे पार नहीं हुए हैं, उनके उपदेशार्थ तो भगवान् लौकिक-वैदिक मर्यादाओंका पालन करते हैं। इसलिये जिन्हें संसाररूप स्वाभाविक मृत्युको पार करना है, उन्हें तो मर्यादापालनरूप महौषधका सेवन करना चाहिये। उनके लिये तो भगवान् भी मर्यादापालन करते हैं; किंतु जो योगारूढ़ हैं, उनके लिये ऐसी कोई विधि नहीं है; उन्हें एकमात्र भगवन्निष्ठामें ही स्थिर करनेके लिये भगवान् मर्यादाका उल्लंघन कर देते हैं; क्योंकि वे स्वयं तो समस्त विरुद्ध धर्मोंके आश्रय ही हैं। उनके लिये मर्यादापालन और मर्यादातिलंघन दोनों ही समान हैं। जो अमलात्मा परमहंस योगारूढ़ हैं, उनके लिये तो मर्यादापालनकी अपेक्षा भगवान्का मर्यादातिलंघन ही अधिक श्रेयस्कर है; क्योंकि उन्हें तो भगवत्तत्त्वमें स्वारसिकी प्रीति ही अभिलषित है और वह तभी हो सकती है, जब किसी प्रकारकी श्रृंखला न रहे। जहाँ कोई श्रृंखला होती है अर्थात् जहाँ विधिका बन्धन होता है, वहाँ स्वारसिक प्रेम नहीं होता। लोकमें यह देखा जाता है कि वैषयिक सुखके अभिव्यंजक स्त्री- पुत्रादिमें मनुष्योंका जैसा स्वाभाविक राग होता है, वैसा श्रौतस्मार्तादि कर्मोंमें नहीं होता। यही नहीं, जिन्होंने मनोनिरोधपूर्वक अपनी बुद्धिको शुद्ध परब्रह्ममें स्थापित कर दिया है, देखा जाता है कि विषय उन्हें भी आकर्षित कर लेते हैं। दृष्ट दुःख उन्हें भी बना ही रहता है। वस्तुतः सुखी तो वे ही हैं, जो नारायण- परायण हैं। ऐसे नारायण-परायण महानुभाव विरले ही होते हैं। करोड़ोंमें कोई एक-आध ही भाग्यशाली होता है। मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) तथापि सुखी वे ही हैं, जो नारायण-परायण हैं। वे नारायण कौन हैं ? 'नारो जीवसमूहस्तस्य अयनं प्रवृत्तिर्यस्मात् स नारायणः ।' नार जीव-समूहको कहते हैं, उसकी जिससे प्रवृत्ति होती है, वह नारायण है; अथवा- 'नारो जीवसमूहः अयनं यस्य असौ नारायणः ।' नार यानी जीव-समूह है आश्रयस्थान जिसका