भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० भक्तिसुधा अर्थात् जो अन्तर्यामीरूपसे समस्त जीवोंमें बसा हुआ है, वह नारायण है। 'नारं जीवसमूहमयते साक्षित्वेन विजानातीति नारायणः।' अर्थात् प्रमात्रादि समस्त प्रपंचके साक्षीको नारायण कहते हैं। इस प्रकार शुद्ध परमात्मा ही नारायण है। वही जिसका परायण—आश्रय है अर्थात् जिसके एकमात्र ध्येय श्रीनारायण ही हैं, वह नारायण-परायण कहलाता है। उसे विषय अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते; क्योंकि उसकी तो एकमात्र श्रीनारायणमें ही स्वारसिकी प्रीति होती है। अतः भगवान्के अवतारका मुख्य प्रयोजन यही है कि जो अमलात्मा मुनि हैं, उनकी श्रीनारायणमें स्वारसिकी प्रीति हो। वस्तुतः ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्त्वज्ञोंकी भी ऐसी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती, जैसी विषयी पुरुषोंकी विषयोंमें होती है। इस स्वारसिकी प्रवृत्तिके तारतम्यसे ही तत्त्वज्ञोंकी भूमिकाका तारतम्य होता है। चतुर्थ, पंचम, षष्ठ और सप्तम भूमिकावाले तत्त्वज्ञोंमें केवल बाह्य विषयोंसे उपरत रहते हुए तत्त्वोन्मुख रहनेमें ही तारतम्य है। ज्ञान तो सबमें समान ही है। जितनी ही प्रयत्न-शून्य स्वारसिकी भगवदुन्मुखता है, उतनी ही उत्कृष्ट भूमिका होती है। जिनकी मनोवृत्ति, कामुककी कामिनी-विषयक लालसाके समान ब्रह्मके प्रति अत्यन्त स्वारसिकी होती है, वे ही नारायण- परायण हैं। वे उसकी अपेक्षा भिन्न भूमिकावाले जीवन्मुक्तोंसे उत्कृष्टतम हैं। निर्विशेष परब्रह्ममें हमारी जो प्रवृत्ति होती है— वह तो शास्त्रविधिके कारण है, किंतु मनोरमा नारीमें चित्त स्वयं ही आकर्षित हो जाता है। हमें शास्त्रविधिके कारण परब्रह्ममें तो बलपूर्वक चित्तको लगाना पड़ता है और निषेधके भयसे परस्त्रीकी ओरसे उसे बलपूर्वक हटाना पड़ता है। विधि कहाँ होती है?— 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ'—जो वस्तु स्वतः सर्वथा प्राप्त न हो, उसके लिये विधि होती है। अग्निहोत्र स्वतः प्राप्त नहीं है; इसीसे वेदभगवान् 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' ऐसा विधान करते हैं। इसी प्रकार आत्मदर्शनके लिये भी विधि की गयी है—'आत्मा वा रे द्रष्टव्यः'। अतः आत्मदर्शनमें स्वारसिकी प्रीति नहीं है और जहाँ स्वारसिकी प्रीति नहीं होती, वहाँ निरतिशय प्रेम भी नहीं हुआ करता। * यद्यपि वेदान्तियोंने आत्मदर्शनमें विधि नहीं मानी; क्योंकि विधि पुरुषाधीन क्रियामें ही हुआ करती है, जिसके कि करने-न-करनेमें पुरुषकी स्वतन्त्रता होती है, जिस प्रकार अमुक पुरुष घोड़ेपर चढ़कर जाता है, पैदल जाता है अथवा नहीं जाता। किंतु वस्तु या प्रमाणाधीन ज्ञानमें विधि नहीं हुआ करती; क्योंकि वह तो विधिकी अपेक्षा न रखकर केवल प्रमाणके अधीन है। यदि प्रमाणको अपने प्रमेयके प्रकाशनमें किसी विधिकी अपेक्षा मानी जाय तो विधिको भी अपने अर्थका बोध करानेके लिये दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी। अतः आत्मदर्शन तो प्रमाणसे ही होता है, उसके लिये विधिकी आवश्यकता नहीं है तथापि तत्त्वदर्शनके लिये प्रमाणके व्यापारकी अपेक्षा तो है ही और वह प्रमाण-व्यापार पुरुषाधीन है; इसीलिये केवल उसीकी विधि मानी गयी है। अतएव भगवान् भाष्यकारने बहिर्मुखतादिका व्यावर्तन करनेवाले द्रष्टव्य आदि वचनोंको 'विधिच्छाय' (विधिकी छायामात्र) कहा है।
- यहाँ यह शंका हो सकती है कि आत्मा तो परप्रेमका ही आस्पद बतलाया गया है और इस कथनसे वह ऐसा सिद्ध नहीं होता, परंतु बात ऐसी नहीं है। यहाँ केवल आत्मदर्शनमें ही स्वारसिकी प्रीतिका अभाव बतलाया गया है, आत्मामें नहीं। वस्तुतः अज्ञानी पुरुषोंकी भी जो शब्दादि विषयोंमें स्वारसिकी प्रवृत्ति होती है, वह अज्ञानवश आत्मारूपसे माने हुए देहेन्द्रियादिकी तुष्टिके ही लिये होती है। वे अपने परमार्थस्वरूपसे अनभिज्ञ होते हैं, इसलिये देहेन्द्रियादि मिथ्यात्माके ही परितोषका प्रयत्न करते हैं, परंतु वस्तुतः उस समय वैसा करके भी वे अपने सत्यात्माकी ही प्रीतिका सम्पादन करते हैं; क्योंकि देहेन्द्रियादि मिथ्यात्माकी प्रसन्नताका साक्षी तो शुद्ध चेतन ही है। शास्त्र तो केवल इतना ही करता है कि उन्हें सत्यात्माका ज्ञान करा देता है; इसीसे फिर वे मिथ्यात्माकी प्रसन्नताके लिये उद्विग्न नहीं होते।