भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासलीलारहस्य १९१
वास्तवमें यही कारण है कि प्राणियोंकी मनोवृत्ति शब्द-स्पर्शादिमें समासक्त है, वह शुद्ध परब्रह्मकी ओर जाती ही नहीं। अतः भगवान् उनकी स्वारसिकी प्रवृत्ति-सम्पादनके लिये ही शब्द-स्पर्श-रसादिविरहित होनेपर भी उनके मन और इन्द्रियोंको आकर्षण करनेके लिये दिव्य रूप, दिव्य गन्ध और दिव्य स्पर्शवान् होकर अभिव्यक्त होते हैं; क्योंकि परमपुरुषार्थ तो यही है। जबतक भगवान्के प्रति जीवकी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती, तबतक तो वह अकृतार्थ ही है। जिस प्रकार रसनाके पित्तादि दोषसे दूषित हो जानेपर जब किसी बालकको मधुरातिमधुर पदार्थ भी जो उसकी रोग-निवृत्तिके भी हेतु होते हैं, अरुचिकर प्रतीत होने लगते हैं तो उसकी माता उन्हें उसी वस्तुमें मिलाकर देती है, जो कि उसे रुचिकर होती है। उसी प्रकार जो परब्रह्म परमात्मा मधुरातिमधुर है, जिससे बढ़कर और कोई मधुर नहीं है, उसमें जीवोंको मोह- वश प्रेम नहीं होता; बल्कि विषके समान कटु विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। अतः अपने तत्त्वज्ञ भक्तोंको प्रेमानन्द प्रदान करनेके लिये ही वे अशब्द एवं रूपरसादिविरहित होनेपर भी महामनोहर दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारणकर अवतीर्ण होते हैं। हाँ, इतना अन्तर अवश्य रहता है कि प्राकृत रूपरसादि वस्तुतः विषरूप ही हैं; किंतु भगवदीय रूपादि स्वरूपसे भी निरतिशय माधुर्यसम्पन्न परमानन्द ही हैं। अतः उनके प्रति अमलात्मा मुनिजन एवं अन्य साधारण प्राणियोंकी भी समान रूपसे स्वारसिकी प्रीति हो जाती है। देवताओंके प्रति स्वाभाविक प्रेम नहीं होता; क्योंकि वे अदृष्ट होते हैं। इसीलिये उनमें प्रेम करनेके लिये शास्त्रको विधान करना पड़ा है। गुरु दृष्ट हैं, इसलिये देवताओंकी अपेक्षा उनके प्रति अनुराग होना अधिक सुगम है, परंतु उनमें आत्मीयताका अभाव है, इसीसे स्वारसिक प्रेम उनमें भी नहीं होता। इसी प्रकार पिता, माता और पत्नीमें उत्तरोत्तर आत्मीयताकी अधिकता होनेके कारण प्रेमकी भी अधिकता होती है; तथापि स्वारसिकी प्रीति उनके प्रति भी नहीं होती; इसीसे उनके प्रति प्रेम करनेके लिये भी विधि है। यहाँतक कि विधिनियन्त्रित सर्वापेक्षया अधिक कामुककी कामिनी-विषयिणी प्रीति भी श्रृंखलाशून्य परकीया कामिनीमें होनेवाली प्रीतिसे न्यून ही है। यह बात प्रायः देखी जाती है कि जहाँ-जहाँ विधि है, वहाँ- वहाँ स्वारसिकी प्रीतिकी न्यूनता होती है। इस दृष्टिसे यदि भगवान्की प्रवृत्ति वैदिक अथवा स्मार्त श्रृंखलाओंसे नियन्त्रित हो तो वह स्वारसिकी प्रीतिको बढ़ानेवाली नहीं होगी और ऐसा न होनेपर उनके अवतारका मुख्य प्रयोजन ही सिद्ध न हो सकेगा। यह ठीक है कि वे मर्यादापालन करते हुए आरुरुक्षुओंको तो मार्गदर्शन कर देंगे, परंतु अमलात्मा परमहंसोंको अपने निरपेक्ष अनन्य प्रेमका पथ न दिखला सकेंगे। व्यवहारमें देखा जाता है कि कितने ही स्थलोंमें चांचल्य ही रसकी अभिव्यक्ति करनेवाला है। जैसे बालककी तो चंचलता ही माता-पिताकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली है। यदि वह समाहित मुनियोंके समान शान्तभावसे बैठा रहे तो यह माता-पिताके मोदमें बाधक ही होगा। अतः जो रसज्ञ हैं, उनसे यह बात छिपी नहीं है कि बहुत स्थानोंमें तो अचांचल्य रसका विघातक ही है। इसलिये यदि भगवान्की चेष्टाएँ वैदिक-स्मार्त श्रृंखलाओंसे बँधी हुई होंगी तो वे अमलात्मा परमहंसोंका परप्रेमसे छादन न कर सकेंगी। उन महात्माओंको मर्यादापालनका आदर्श अपेक्षित ही नहीं है; क्योंकि ऐसा तो वे पहले ही कर चुके होते हैं। उन्हें तो भगवान्में विशुद्ध प्रेम ही अपेक्षित है, किंतु जहाँ भगवान् अपने ऐश्वर्ययोगसे सम्पन्न होंगे, वहाँ उसका आविर्भाव होना प्रायः असम्भव है। जिस प्रकार शिशुका अद्भुत चांचल्य माता-पिताके हृदयको आकर्षित कर लेता है, प्रियतमाके मर्यादातीत रसमय हाव- भाव-कटाक्षादि प्रियतमका मोद बढ़ाते हैं, उसी प्रकार यदि भगवान् परमदिव्य मंगलमय विग्रह धारणकर