भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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रसमयी उच्छृंखल चेष्टाएँ करें तो उन्हींसे उनके प्रति उनकी स्वारसिकी प्रीति होनी सम्भव है। इस दृष्टिसे विचार करें तो यही निश्चय होता है कि भगवान्‌का शास्त्रातिलंघन दूषण नहीं; प्रत्युत भूषण है। बहुत-से भाव ऐसे होते हैं, जो ऊपरसे तो अन्य प्रकारके जान पड़ते हैं; किंतु भीतरसे उनका और ही रहस्य होता है। यह बात स्पष्ट ही है कि भगवान् प्राकृत नहीं हैं। वे शुद्ध परब्रह्म ही उस रूपसे आविर्भूत हुए हैं तथा ये मुनिजन भी पंचकोशातीत होनेके कारण प्राकृत-प्रपंचसे परे हैं। इस प्रकार घटाकाश और महाकाशके समान स्वरूपसे उनका सम्मिलन है ही। उनका ऐक्य सभीको अभिमत है, किंतु इस समय वह तत्पदार्थ परमात्मा ही दिव्य मंगलमय भगवद्विग्रह-रूपसे आविर्भूत हुए हैं और उसी प्रकार त्वं-पदार्थ अमलात्मा परमहंसोंके रूपमें स्थित है। ऐसी स्थितिमें जैसे अव्यक्त रूपसे उनका तादात्म्य है, उसी प्रकार यदि व्यक्त रूपसे भी तादात्म्य हो तो क्या अभिज्ञोंकी दृष्टिमें वह प्राकृत सम्भोग होगा? स्वरूपसे तो उनका नित्य सम्भोग है ही। ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥’ (तैत्तिरीय० २।१।१), 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' इत्यादि वाक्योंसे यह बात कही गयी है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण 'तत्' पदार्थ हैं और गोपांगनाएँ 'त्वं' पदार्थ हैं। यदि इन दोनोंका परस्पर संश्लेष हो तो क्या वह कामक्रीड़ा कही जायगी? स्थूल दृष्टिसे तो अवश्य यह कामक्रीड़ा-सी मालूम होती है, परंतु अन्तरंग दृष्टिसे तो यह जीव और ब्रह्मका अद्भुत संयोग ही है। श्रीमद्भागवतमें यह कई स्थानोंमें देखा जाता है कि गोपांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्रके वियोगमें संतप्त रहती थीं और हर समय उनके दर्शनोंके लिये लालायित रहती थीं और इसी प्रकार भगवान् भी व्रजसुन्दरियोंकी विरह-व्यथासे व्याकुल रहते थे। उन दोनोंको ही पारस्परिक संयोग बहुत अभीष्ट था। प्रेमका यह स्वभाव है कि प्रेमी परस्पर गाढालिंगनके लिये उत्सुक रहा करते हैं। माता अपने सुकुमार शिशुको हृदयसे लगानेमें कितना सुख अनुभव करती है। जो जितना अधिक प्रेमास्पद होता है, उसका व्यवधान उतना ही अधिक असह्य होता है, यहाँ ऐसा भी कहा जाता है कि जिस समय व्रजांगनाएँ भगवान्‌का आलिंगन करती थीं, उस समय उन्हें अपने हार, आभूषण और कंचुकीका व्यवधान तो असह्य था ही, प्रत्युत प्रेमातिरेकके कारण जो रोमांच होता था, वह भी अत्यन्त अप्रिय जान पड़ता था। अतः सिद्धान्त यही है कि प्रेमका पर्यवसान अभेदमें ही होता है, भेदमें नहीं होता। बात क्या है ? भगवान् गोपांगनाओंके आत्मा हैं; आत्माका व्यवधान भला कैसे सह्य हो ? द्वारकामें जो भगवान्‌की पट्टमहिषी थीं, उनके विषयमें कहा जाता है कि जिस समय भगवान् दीर्घकालीन प्रवासके पश्चात् हस्तिनापुरसे आये, उस समय उन्हें देखकर वे तुरंत आसन और शय्यासे उठीं। किसलिये ?— देशकृत व्यवधानको दूर करनेके लिये, किंतु उस समय उन्हें यह विचार हुआ कि हम तो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—इन पाँच कंचुकोंको पहनकर अपने प्रेमास्पदसे मिल रही हैं। अतः हमारा यह सम्मिलन समुचित आनन्दवर्धक नहीं हो सकता। इसलिये वे उन सब कंचुकोंको उतारकर सच्चिदानन्द रूपसे भगवान्‌को मिलीं। यहाँ गोपांगनाएँ और भगवान्—दोनों ही सच्चिदानन्द-स्वरूप थे। अतः उनकी लीला प्राकृत है ही नहीं। इसलिये इसमें मर्यादातिलंघनका प्रश्न ही नहीं हो सकता। यह तो वह स्थिति है, जिसकी प्राप्तिके लिये सारी मर्यादाओंका पालन किया जाता है। अतः जिस समय भगवान्‌का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय उन्होंने यही विचार किया कि पहले अवतारके प्रधान प्रयोजनकी ही पूर्ति करनी चाहिये। इसीसे पहले उन्होंने अमर्यादित दिव्य लीलाएँ कीं