भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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और पीछे मर्यादित लोक-संग्रहमयी। लोकमें भी यह प्रायः देखा जाता है कि उपनयन-संस्कारसे पूर्व उच्छृंखल प्रवृत्ति रहती है और उसके पीछे मर्यादानुसार आचरण किया जाता है। यही बात भगवान्के विषयमें भी देखी जाती है। इस प्रकार प्रधान प्रयोजनकी पूर्तिके लिये स्वीकार की हुई भगवान्की उच्छृंखलतामें भी एक प्रकारकी सुशृंखलता ही है; इस मर्यादातिलंघनमें भी एक प्रकारका मर्यादापालन ही है। वेद जो कहता है कि 'जायमानो वै ब्राह्मणः त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् जायते'- उत्पन्न होते ही ब्राह्मण तीन ऋणोंसे ऋणवान् हो जाता है—सो इन तीनों ऋणोंमें स्वाध्यायद्वारा ऋषि-ऋणकी निवृत्ति होती है, प्रजोत्पादनसे पितृ-ऋणका अपाकरण होता है और यज्ञ-यागादिसे देव-ऋणका शोधन होता है। यहाँ यदि 'जायमान' शब्दका अर्थ 'जन्म लेते ही' किया जाय तो बालक प्रत्यवायी सिद्ध होगा; क्योंकि उपनयन होनेसे पूर्व वह इनमेंसे न तो कोई क्रिया करनेमें समर्थ ही है और न इनका अधिकारी ही। इसलिये इसका अर्थ 'गृहस्थः सम्पद्यमानः'- गृहस्थावस्थाको प्राप्त होनेपर ऐसा करना चाहिये। अतएव भगवान्ने संस्कारादिसे पहले अमलात्मा परमहंसोंके प्रेम-रसाभिवर्धनके लिये उच्छृंखल लीलाओंका ही प्रदर्शन किया तथा संस्कारादिके पश्चात् मर्यादित लीलाओंका प्रदर्शन किया। इस प्रकार यद्यपि इस मर्यादातिक्रमणमें भी मर्यादाकी रक्षा ही है तथापि भगवान् तो समस्त विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। इसलिये वे एक कालमें भी दोनों प्रकारके कार्य कर सकते हैं। जिस प्रकार सर्वाधिष्ठान होनेके कारण आत्मा एक ही समयमें एक (अपवाद) दृष्टिसे अकर्ता-अभोक्ता है, किंतु दूसरी (अध्यारोप) दृष्टिसे सर्वकर्ता और सर्वभोक्ता भी है, उसी प्रकार भगवान्में एक ही साथ दो विरुद्ध धर्म रहा करते हैं। निर्व्यापार रहते हुए व्यापार करना और व्यापार करते हुए भी निर्व्यापार रहना—ये यद्यपि परस्पर-विरुद्ध धर्म हैं तथापि तत्त्वज्ञ महापुरुषोंकी तो यही दृष्टि है— कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ (गीता ४।१८) यहाँ 'पश्येत्'—देखे यह भी क्रिया ही है। ध्यानयोगी जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी गतिको रोककर निश्चल भावसे अपने निर्विशेष स्वरूपका साक्षात्कार करता है, वह भी तो एक प्रकारकी क्रिया ही है। जो भगवान् अपने भावुक भक्तोंके लिये रसस्वरूप हैं, जिनका 'रसो वै सः। रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।' (तैत्तिरीय० २।७)—इस श्रुतिद्वारा प्रतिपादन किया गया है, वे ही अज्ञानियोंके लिये भयके स्थान हैं, 'तत्तेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य' जो आत्मज्ञोंके लिये परम सन्निकृष्ट हैं, वे ही अज्ञोंके लिये दूरसे भी दूर हैं। अतः भगवान्में तो स्वभावसे ही सम्पूर्ण विरुद्ध धर्म रहते हैं, इसलिये यदि एक कालमें ही वे विरुद्ध प्रकारके आचरण करें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यही नहीं, जिस प्रकार भगवान्के अवतार मर्यादा-पालनके लिये अपेक्षित होते हैं, उसी प्रकार कर्म-संन्यासके लिये भी उनकी अपेक्षा हुआ करती है। भगवान् रामका अवतार मर्यादापालनके लिये था और ऋषभदेवजीका सर्वकर्म-संन्यासके लिये। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि एक ही भगवान्ने दो प्रकारकी चेष्टाएँ क्यों कीं ? इस विषयमें यही कथन है कि वे भिन्न-भिन्न चेष्टाएँ भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये थीं। जो मर्यादापालनका अधिकारी है, उसके आदर्श श्रीरामचन्द्र हैं और जो सर्वकर्म- संन्यासके अधिकारी हैं, उसके पथप्रदर्शक भगवान् ऋषभदेव हैं। सर्वकर्म-संन्यासी तत्त्वज्ञ महानुभावोंकी भी दो प्रकारकी चर्या देखनेमें आती है। उनमें अधिकांश तो ऐसे हैं, जो कामिनी-कांचनादि भोग्यपदार्थोंका स्वरूपसे त्याग कर देते हैं और सर्वदा अलक्षित गतिसे