भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ भक्तिसुधा
[स्तम्भ १]
एकान्त-सेवन किया करते हैं, उनमें साधकोंके आदर्श तो बदरिकाश्रमनिवासी भगवान् नर-नारायण हैं और सिद्धोंके भगवान् ऋषभदेव। वे लोग स्वप्नमें भी स्त्री आदि भोग्य विषयोंका संग नहीं करते। उनका नियम होता है— 'सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य पारं परमारुरुक्षुः।' (श्रीमद्भा० ३।३१।३९) किंतु कोई-कोई महानुभाव ऐसी विलक्षण धारणावाले होते हैं कि अनेकविध भोग्य सामग्रियोंके सान्निध्यमें रहकर भी वे उनसे अक्षुण्ण रहते हैं। ऐसे सिद्धकोटिक महानुभावोंके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाएँ हैं, किंतु वे लीलाएँ अनुकरणीय नहीं हैं, उनके द्वारा तो इस कोटिके महापुरुषोंकी उच्चतम स्थितिका केवल दिग्दर्शनमात्र होता है। यद्यपि साधकोंके लिये स्त्रियोंका चिन्तनमात्र भी महान् अनर्थका हेतु होता है तथापि भगवान्ने तो कामजयके लिये ही यह अद्भुत लीला की थी। टीकाकार श्रीश्रीधरस्वामी लिखते हैं— ब्रह्मादिजयसंरूढदर्पकन्दर्पदर्पहा । जयति श्रीपतिर्गोपीरासमण्डलमण्डनः ॥ अर्थात् ब्रह्मादि लोकपालोंको जीत लेनेके कारण जो अत्यन्त अभिमानी हो गया था, उस कामदेवके दर्पको दलित करनेवाले गोपियोंके रासमण्डलके भूषणस्वरूप श्रीलक्ष्मीपतिकी जय हो। वस्तुतः रासक्रीड़ामें प्रवृत्त होकर भगवान्ने मर्यादाका उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उन्होंने तत्त्वज्ञोंकी निष्ठाकी दृढ़ता ही प्रदर्शित की है। अहो! जो साक्षात् शृंगाररसकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं, उन अनेकविध दिव्य हाव- भाव कटाक्षोंका सम्प्रयोग होनेपर भी उनका चित्त तनिक भी विचलित नहीं हुआ। भगवान्की इस स्थितिका श्रीशुकदेवजीने भिन्न-भिन्न शब्दोंमें कई जगह वर्णन किया है, जैसे—'साक्षान्मन्मथमन्मथः' (श्रीमद्भा० १०।३२।२), 'आत्मन्यवरुद्धसौरतः', 'आत्मा- रामोऽप्यरीरमत्' (श्रीमद्भा० १०।२९।४२) इत्यादि।
[स्तम्भ २]
भगवान्की रासक्रीड़ा कामजयके लिये भगवान् सर्वेश्वर हैं; उनकी यह लीला कामजयके लिये ही हुई थी। कामने ब्रह्मादिको जीत लिया था। इससे उसका अभिमान बहुत बढ़ गया था और अब उसने उन सबके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे भी युद्ध करनेका निश्चय किया। भगवान्ने उसका यह निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। कन्दर्पने भी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको जानकर विजयकी लालसासे श्रीव्रजांगनाओंके अंगरूप कांचनमय कामग दुर्गका आश्रयण किया और वहाँ प्रधान-प्रधान अवयवोंको अपना खास निवासस्थान चुना और अपने मित्र वसन्तकी सहायतासे नाना प्रकारके कुसुमोंका ही धनुष-बाण तथा अस्त्र- शस्त्र लेकर स्वाधीन व्रजांगनाओंके कांचनमय अंगरूप कामग दुर्गमें स्थित होकर युद्धकी पूर्ण तैयारी कर ली। इतनेपर भी श्रीकृष्णने उसे दुर्बल ही देखा। यह नियम है कि बड़े-बड़े योद्धा दुर्बल शत्रुसे युद्ध करना उचित नहीं समझा करते। इसलिये युद्ध करनेसे पूर्व वे उसे सबल कर देते हैं। अपूर्ण चन्द्रपर राहु भी आक्रमण नहीं करता। जब एक राक्षसकी भी ऐसी नीति है तो सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ही ऐसा कैसे कर सकते थे? अतः भगवान्ने पहले तो श्रीमहादेवजीके कोपानलसे दग्ध हुए कन्दर्पको पुष्ट किया। वह गोपांगनाओंके हृदयमें स्थित था। उसे वेणुनादद्वारा अपनी दिव्य अधर-सुधाका पान कराकर भगवान्ने सबल कर दिया। परंतु गोपांगनाओंके हृदयमें तो मन भी रहता है और वह भगवान् श्रीकृष्णका परम भक्त है तथा कामदेव मनोज होनेके कारण उसका पुत्र है। अतः अपने पिताके विरुद्ध वह कोई चेष्टा कैसे कर सकता था और वृद्ध पिताके सामने उससे कोई धृष्टता भी कैसे बन सकती थी ? इसलिये उसे निःसंकोच करनेके लिये भगवान्ने वेणुनादद्वारा उस मनको अपने पास बुला दिया। अब कामदेव स्वतन्त्र हो गया। गोपांगनाओंके अंग-प्रत्यंगोंने उसके अस्त्र-शस्त्र होकर भी सहायता की तथा चन्द्रमा, वसन्त, यमुनापुलिन, निकुंज और मलय-मारुत भी उसके सहकारी हो