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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

१७६ भक्तिसुधा ऐसे होकर कृपावश इस तत्त्वप्रदर्शक पुराणका विस्तार किया, उन निखिलपापापहारी श्रीव्यासनन्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। यद्यपि ऐसे महानुभावोंकी प्रवृत्ति ग्रन्थाध्ययनमें नहीं हुआ करती तथापि भगवल्लीलाओंसे आकृष्टचित्त होनेके कारण ही उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया था। परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया। गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ (श्रीमद्भा० २।१।९) इस सम्बन्धमें एक इतिहास भी प्रसिद्ध है। एक बार श्रीशुकदेवजी संसारसे उपरत होकर वनमें चले गये और वहाँ ध्यानाभ्यासमें तत्पर होकर समाधिस्थ हो गये। उनकी बुद्धिवृत्ति निखिल दृश्यप्रपंचका निरासकर अशेष-विशेष-शून्य शुद्ध बुद्ध मुक्त परब्रह्ममें लीन हो गयी और उन्हें बाह्य जगत्का कुछ भी भान न रहा। इसी समय भगवान् व्यासदेवके कुछ शिष्यगण उधर आ निकले। उन्होंने उन बालयोगीन्द्रको देखकर कुतूहलवश श्रीव्यासजीसे जाकर कहा कि भगवन्! हमने वनमें एक परम सुन्दर बालकको देखा है। वह बहुत दिनोंसे पाषाण-प्रतिमाके समान निश्चल भावसे एक ही आसनसे बैठा हुआ है। उसे बाह्य जगत्का कुछ भी भान होता नहीं जान पड़ता। तब भगवान् व्यासदेवने सारी परिस्थिति समझकर उन्हें एक श्लोक कण्ठ कराया और कहा कि तुम उस बालयोगीके पास जाकर इसे सुमधुर ध्वनिसे गाया करो। तदनन्तर शिष्यगण वनमें जाकर इस श्लोकका गान करने लगे— बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।५) शिष्योंके निरन्तर गान करनेसे भगवान् शुकदेवजीके अन्तःकरणमें इस श्लोकके अर्थकी स्फूर्ति हुई। यह नियम है कि जितना ही चित्त शुद्ध होगा, उतना ही शीघ्रतर उसमें भगवत्तत्त्वका अनुभव होगा। इसीसे किन्हीं-किन्हीं उत्तम अधिकारियोंको, जिनकी उपासना पूर्ण हो चुकी होती है, महावाक्यका श्रवण करते ही स्वरूप-साक्षात्कार हो जाता है। उस श्लोकार्थकी स्फूर्ति होनेपर भगवद्विग्रहकी अनुपम रूपमाधुरीने उनके चित्तको क्षुभित कर दिया। उनकी समाधि खुल गयी और उन्होंने श्रीश्यामसुन्दरकी स्वरूपमाधुरीका वर्णन करनेवाले इस श्लोकको कई बार उन बालकोंसे कहलाया और कितनी ही बार आनन्दविभोर होकर स्वयं भी कहा। शिष्योंने भगवान् व्यासदेवके पास उन्हें यह सारा वृत्तान्त सुनाया। श्रीव्यासजी सोचने लगे कि इसे सुनकर भी वह आया क्यों नहीं! जब उन्होंने ध्यानस्थ होकर इसके कारणका अन्वेषण किया, तब उन्हें मालूम हुआ कि उसे यह सन्देह है कि जिसका सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा विलक्षण है, वह मेरे-जैसे अकिंचन पुरुषसे स्नेह क्यों करेगा? तब व्यासजीने इस शंकाकी निवृत्ति करनेके लिये भगवान्की दयालुताको प्रकट करनेवाला यह श्लोक उन बालकोंको पढ़ाया और पूर्ववत् उन्हें श्रीशुकदेवजीके पास जाकर इसे गानेका आदेश किया— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) इस श्लोकको सुनकर श्रीशुकदेवजीको आश्वासन हुआ और उन्होंने बालकोंसे पूछा कि तुमने यह श्लोक कहाँसे याद किया है? बालकोंने कहा— 'हमारे गुरुदेव श्रीव्यासभगवान्ने एक अष्टादश सहस्र श्लोकोंकी महासंहिता रची है। ये श्लोक उसीके हैं।' यह सुनकर वे भगवान् व्यासदेवके पास आये और उनसे उस महाग्रन्थका अध्ययन किया। अध्ययन करनेमें एक दूसरा हेतु और भी था। 'नित्यं विष्णुजन-

प्रियः' (श्रीमद्भा० १।७।११) भगवान् शुकदेवजीको सर्वदा विष्णुभक्तोंका संग प्रिय था। श्रीमद्भागवत वैष्णवोंका परमधन है। अतः इसके कारण उन्हें सदा ही वैष्णवोंका सहवास प्राप्त होता रहेगा, इस लोभसे भी उन्होंने उसका अध्ययन किया। इससे शौनकजीके प्रश्नका उत्तर हो जाता है। वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे, इसीलिये आत्माराम होनेपर भी उन्होंने इस महासंहिताका अध्ययन किया। वस्तुतः भगवान्‌के गुणगण ही ऐसे हैं— आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भा० १।७।१०) यहाँ 'निर्ग्रन्थाः' इस पदके दो अभिप्राय हैं— (१) 'निर्गता ग्रन्थयो येभ्यस्ते' अर्थात् ब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जो आत्मानात्मसम्बन्धी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो गये हों, वे निर्ग्रन्थ हैं। अथवा (२) 'निर्गता ग्रन्था येभ्यस्ते' परब्रह्ममें परिनिष्ठित होनेके कारण जिनका ग्रन्थावलोकन छूट गया हो। वास्तवमें योगकी सिद्धि तो होती ही उस समय है, जिस समय कि शास्त्रोक्त विविध वादोंसे विचलित हुई बुद्धि उन सब विवादोंसे ऊपर उठकर निश्चल भावसे एक तत्त्वमें स्थित हो जाय। श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ (गीता २।५३) जिस समय बुद्धि मोहातीत हो जाती है, उस समय वह श्रोतव्य और श्रुतसे उपरत हो जाती है; फिर तो एकमात्र ब्रह्मवीथीमें ही उसका विचरण हुआ करता है। श्रीभगवान् कहते हैं— यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ (गीता २।५२) श्रीविद्यारण्यस्वामी तो ऐसी अवस्थामें शास्त्र- संन्यासकी व्यवस्था भी करते हैं— शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत्॥ भगवती श्रुति भी कहती है— 'तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ***।' (मु० उ० २।२।५) यहाँ यह विरोध प्रतीत होता है कि जब श्रुति- स्मृति और आचार्य सभीका यह मत है कि स्वरूप- साक्षात्कार होनेके पश्चात् शास्त्राभ्यासमें प्रवृत्ति नहीं होती और होनी भी नहीं चाहिये तो श्रीशुकदेवजीकी इस महाग्रन्थके अध्ययनमें कैसे प्रवृत्ति हुई? इसका एकमात्र हेतु, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, यही था कि वे हरिगुणाक्षिप्तमति थे। वे यद्यपि स्वयं उसमें प्रवृत्त नहीं हुए थे तथापि भगवान्‌के गुणोंकी मधुरिमाने उन्हें स्वयं उस ओर खींच लिया था। वेदान्तसिद्धान्तमें भी यह युक्तियुक्त ही है। इस विषयमें आचार्योंका ऐसा मत है कि जिस समय ब्रह्मज्ञान होता है, उस समय आवरण नष्ट हो जाता है, किंतु प्रारब्धभोगोपयोगी विक्षेप तो बना ही रहता है। ब्रह्मज्ञानसे केवल मूलाविद्याका नाश होता है, लेशाविद्या तब भी रह जाती है। उसकी निवृत्ति प्रारब्धक्षय होनेपर होती है। इसीसे श्रीनारद, सनकादि, शुकदेव और वसिष्ठादि परमसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ महात्माओंकी लोकमें भी नाना प्रकारकी चेष्टाएँ देखी जाती हैं। जिस प्रकार परम ब्रह्मनिष्ठ होनेपर भी श्रीनारदजीको हरिनाम-संकीर्तन और सनकादिको हरिगुणगानका व्यसन था, उसी प्रकार श्रीशुकदेवजीको भी हरिकथामृतके पानका व्यसन था। जिस प्रकार स्वरूपानुभव हो जानेपर भी प्रारब्धभोगके लिये इन्द्रियोंकी विषयोंमें प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार हरिगुणगानमें भी प्रीति हो ही सकती है। वस्तुतः भगवान्‌में आत्माराम-चित्ताकर्षकत्व एक गुण है। उसीसे आकृष्ट होकर भगवान् शुकदेवजीने इस शास्त्रका अध्ययन किया था। इससे सिद्ध हुआ कि ऐसे पूर्ण परब्रह्ममें परिनिष्ठित महामुनि शुकदेवजीकी इस कारणसे इस

भागवत-शास्त्रके अध्ययनमें प्रवृत्ति हुई तथा इसके वर्णनमें इसलिये भी प्रवृत्ति हुई कि जिससे विष्णुजन स्वयं ही आकर उन्हें मिल जाया करें। इस भागवत- शास्त्रमें भगवान्‌का दिव्यातिदिव्य रहस्य निहित है; अतः जिस प्रकार वशीकरणमन्त्रसे लोगोंको अपने अधीन कर लिया जाता है, उसी प्रकार इस परम मन्त्रके कारण भक्तजन स्वयं ही आकृष्ट हो जाते हैं। इसके सिवा भगवान्‌के गुण, चरित्र और स्वरूपकी माधुरी स्वयं भी ऐसी मोहिनी है कि बड़े-बड़े सिद्ध- मुनीन्द्र भी उनके कीर्तनमें प्रवृत्त हो जाया करते हैं। भाष्यकार भगवान् शंकराचार्यने नृसिंहतापिन्युपनिषद्के भाष्यमें कहा है— 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा तं भजन्ते।' अर्थात् मुक्तजन भी लीलासे देह धारणकर भगवान्‌का गुणगान किया करते हैं। यही बात सनकादिके विषयमें भी कही जा सकती है। भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है जिस समय महाराज परीक्षित् गंगातटपर आकर बैठे, उस समय बहुतसे ऋषि, मुनि, सिद्ध एवं योगीन्द्रगण उनके पास आये। उन सबसे उन्होंने यही प्रश्न किया कि 'भगवन्! मैं मरणासन्न हूँ; अतः मुमूर्षु पुरुषके लिये जो एकमात्र कर्तव्य हो, वह मुझे बतलाइये।' इस विषयमें उस मुनीन्द्र-मण्डलीमें विचार हो रहा था; भिन्न-भिन्न महानुभाव अपने भिन्न- भिन्न मत प्रकट कर रहे थे; अभी कुछ निश्चय नहीं हो पाया था कि इतनेमें ही शुकदेवजी आ गये। उनसे भी यही प्रश्न हुआ। राजाने पूछा—'भगवन्! अब मेरी मृत्युमें केवल सात दिन शेष हैं; अतः कोई ऐसा कृत्य बतलाइये, जिसके करनेसे मैं धीरोंकी प्राप्तव्य गतिको प्राप्त कर सकूँ।' तब श्रीशुकदेवजी बोले—'राजन्! अन्य अनात्मज्ञ लोगोंके लिये तो सहस्रों साधन हैं, परंतु भक्तोंके लिये तो एकमात्र श्रीहरिश्रवण ही परमावलम्ब है।' इसके तीन भेद हैं—श्रीहरिका स्वरूपश्रवण, गुणश्रवण और नामश्रवण। इसी प्रकार श्रीहरि-कीर्तन भी तीन प्रकारका है—स्वरूपकीर्तन, गुणकीर्तन और नामकीर्तन। उपनिषदादिसे भगवान्‌का स्वरूपकीर्तन होता है, इतिहास-पुराणादिसे रूप-गुण-कीर्तन होता है और विष्णुसहस्रनामादिसे नामकीर्तन होता है। कर्मकाण्ड भी भगवान्‌का ही स्वरूप है— 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।' (यजु० ३१।१६) कर्म ही क्या, यह सारा प्रपंच एकमात्र भगवान् ही तो है; भूत, भविष्यत्, वर्तमान जो कुछ है

श्रीरासलीलारहस्य १७९ वह दशम तत्त्व आश्रय है। श्रीमद्भागवतमें आश्रयका लक्षण इस प्रकार किया गया है— आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते। स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० २।१०।७) यहाँ 'आभास' और 'निरोध' इन दो शब्दोंसे ही उपर्युक्त नौ तत्त्वोंका निरूपण किया है। अतः 'निरोध' शब्दसे यहाँ मुक्ति अभिप्रेत है। आभास अध्यारोपको कहते हैं और निरोध अपवादको। इन अध्यारोप और अपवादके द्वारा ही उसके अधिष्ठानभूत निष्प्रपंच ब्रह्मतत्त्वका वर्णन किया जाता है— 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते।' अध्यारोपके द्वारा ब्रह्मको निखिल प्रपंचका चरम कारण मानकर उससे सृष्टिका क्रम बतलाया जाता है और अपवादके द्वारा दृश्यमात्रका अनात्मत्व- प्रतिपादन करते हुए साक्षी चेतनका शोधन किया जाता है। इसी क्रमसे शुद्ध परब्रह्म लक्षित हो सकता है। जीवको स्वभावतः तो शुद्धतत्त्वका बोध है नहीं; अतः इस दृश्यप्रपंचके कारणके अन्वेषणपूर्वक ही उसका बोध कराया जाता है। इसीसे मातृपितृशतादपि हितैषिणी भगवती श्रुतिने भी यही कहा है— सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्। तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। (छान्दोग्य० ६।२।१, ३) इत्यादि। इस प्रकार ब्रह्मको प्रपंचका कारण प्रतिपादन करनेमें श्रुतिका केवल यही तात्पर्य है कि जिसमें लोग परमाणु, प्रकृति आदि जड़ वस्तुओंको इसका कारण न मान लें। इसमें यह शंका हो सकती है कि दृश्य तो असत्, जड़ एवं दुःखस्वरूप है; उसका कारण सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म कैसे हो सकता है? कार्यमें सर्वदा कारणके गुणोंकी अनुवृत्ति हुआ करती है। कारण और कार्यकी विजातीयता प्रायः देखनेमें नहीं आती। इसका समाधान यह है कि यद्यपि मुख्यतया तो यही नियम देखा जाता है, परंतु कहीं-कहीं इसमें विषमता भी होती देखी गयी है। देखो, जड़ गोबरसे बिच्छू आदि चेतन जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार चेतन ब्रह्मसे जड़ प्रपंचकी उत्पत्ति भी हो ही सकती है। इस प्रकार यद्यपि आरम्भमें तो ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्तिका ही प्रतिपादन किया जाता है तथापि अन्ततः सिद्धान्त तो यही है कि प्रपंचकी उत्पत्ति ही नहीं हुई। इसलिये यह जो कुछ प्रतीत होता है, बिना हुआ ही दिखायी देता है। इसीसे यह अनिर्वचनीय है। अतः आभास और निरोध—आरोप और अपवाद अर्थात् बन्ध और मोक्ष अज्ञानजनित ही हैं— अज्ञानसञ्ज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्रचित्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।२६) श्रुति कहती है— 'न प्रेत्य संज्ञास्तीत्य···विनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा॥' (बृहदारण्यक० ४।५।१३-१४) यहाँ 'प्रेत्य' का अर्थ है 'मरना'। जिस समय तत्त्वज्ञ देहेन्द्रियाद्याकारमें परिणत भूतोंसे उत्थान करता है, उस समय वह मानो मर जाता है। फिर उसका कोई नाम-रूप नहीं रहता। जैसे नमकका डला समुद्रका जल ही है। वह वायु आदिके संयोगसे लवणखण्डके रूपमें परिणत हो गया है। उसे यदि समुद्रमें डाल दिया जाय तो वह फिर उपाधिके संसर्गसे शून्य होकर समुद्ररूप ही हो जायगा। उसी प्रकार अन्नमयादि कोशोंमें परिणत जो उपाधि है, उससे सम्बन्ध छूट जानेपर आत्मा अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित हो जाता है। मोक्ष क्या है? श्रीमद्भागवत (२।१०।६)-में कहा गया है— 'मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥' अर्थात् आत्मा जो देहेन्द्रियादिरूप उपाधिके

तादात्म्याध्यासकर्तृत्वसे भोक्तृत्वादि अनेकानर्थयुक्त- सा प्रतीत होता है, उसका सब प्रकारके सजातीय, विजातीय और स्वगत भेदोंको छोड़कर अपने शुद्धस्वरूपमें स्थित होना ही मुक्ति है। वैष्णवाचार्य कहते हैं कि जीव ब्रह्मका नित्य दास है; अतः भगवद्विप्रयोगको छोड़कर उसका भगवत्सान्निध्यमें स्थित होना ही मुक्ति है तथा जो मधुर भाववाले हैं, वे ऐसा मानते हैं कि जीव जो प्राकृत स्त्री-पुरुषादि भावोंको प्राप्त हो गया है, उसका इनसे छूटकर गोपीभावमें स्थित होना ही मुक्ति है। जीव सत्य भी है और मिथ्या भी। ऐसा होनेपर ही उसमें बन्ध और मोक्षकी भी सिद्धि हो सकती है। जीव स्वरूपसे तो नित्य है, किंतु अन्तःकरणादि विशेषणविशिष्ट होनेके कारण अनित्य भी है, जिस प्रकार आकाश आकाशरूपसे तो नित्य है, किंतु घटरूप विशेषणके नाशवान् होनेके कारण अनित्य भी है, क्योंकि विशेषणके अभावसे भी विशिष्टका अभाव माना जाता है। विशिष्ट वस्तुका अभाव तीन प्रकारसे माना गया है- (१) विशेषणाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; (२) विशेष्याभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव और (३) उभयाभावप्रयुक्त विशिष्टाभाव; अर्थात् विशेषण, विशेष्य और उन दोनोंके अभावके कारण होनेवाला अभाव; जिस प्रकार दण्डी पुरुषका अभाव दण्डाभाव, पुरुषाभाव अथवा इन दोनोंका ही अभाव होनेपर भी माना जाता है; जिस तरह घटाकाशका परिच्छिन्नत्व घटरूप उपाधिके ही कारण है, उसी प्रकार उपाधिसंसर्गके कारण ही पूर्ण परब्रह्ममें जीवभाव है। भगवान् भाष्यकार कहते हैं- 'एकमपि सन्तमात्मानमनेकमिव अकर्त्तारं सन्तं कर्त्तारमिव अभोक्तारं सन्तं भोक्तारमिव मन्यन्ते इत्येव जीवस्य जीवत्वम्।' अतः उपाधिके मिथ्यात्वके कारण जीवत्व भी मिथ्या है और उपाधिके असम्बन्धसे वह सत्य भी है। यह अवच्छेदवादकी प्रक्रिया है। इस प्रकार आभास और निरोध दोनों ही मिथ्या हैं तथा ये दोनों जिसमें अधिष्ठित होनेसे सिद्ध होते हैं, वह परब्रह्म ही आश्रय नामक दसवाँ तत्त्व है। इसका दशम स्कन्धमें निरूपण किया गया है- 'दशमे दशमो हरिः'। पहले नौ स्कन्ध इसीकी परिशुद्धिके लिये हैं। दशम स्कन्धके आदि, अन्त और मध्यमें बहुत-सी ऐश्वर्यपूर्ण घटनाओंका वर्णन किया गया है। जिस प्रकार एक सुधासिन्धुमें नाना प्रकारकी तरंगोंका प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार दशम स्कन्धमें जितनी लीलाओंका प्रादुर्भाव हुआ है, वे सब भगवान्‌की नित्य लीलाकी ही अभिव्यक्तिमात्र हैं। अतः भगवल्लीला- सम्बन्धी जितना विषय है, वह सब भगवद्रूप ही है। भागवतमें दशमस्कन्ध सार है और उसका भी सारातिसार है रासपंचाध्यायी आचार्योंका ऐसा मत है कि सम्पूर्ण भागवतमें दशम स्कन्ध सार है, उसका भी सारातिसार रासपंचाध्यायी है। सम्पूर्ण शास्त्र भगवान्‌के वाङ्मय-विग्रह हैं; भिन्न-भिन्न शास्त्र उस वाङ्मय भगवद्विग्रहके ही स्वरूप हैं। उनमें श्रीमद्भागवत भगवान्‌का सविशेष- निर्विशेष सम्मिलित स्वरूप है। उनमें सर्ग-विसर्गादि दसों तत्त्वोंका सांगोपांग वर्णन है, किंतु दशम स्कन्धमें केवल आश्रय नामक दशम तत्त्वका ही वर्णन है। अतः दशम स्कन्ध मानो आश्रय नामक दशम तत्त्वका ही वाङ्मय-विग्रह है तथा उसमें जो रासपंचाध्यायी है, वह उसका प्राण है। इस रासपंचाध्यायीके अनेक प्रकार अर्थ किये जाते हैं। आचार्यगण जो एक ही वाक्यकी अनेक प्रकार व्याख्या किया करते हैं, उसमें उनका यही तात्पर्य होता है कि किसी-न-किसी प्रकार जीवोंका भगवान्‌में प्रेम हो। देवर्षि नारदको संक्षेपमें श्रीमद्भागवतका उपदेश करके उनसे भी ब्रह्माजीने यही कहा था- यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति। सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सङ्कल्प्य वर्णय॥ (श्रीमद्भा० २।७।५२) श्रीमद्भागवतमें यद्यपि शुद्ध निर्विशेष सच्चिदानन्द- घनतत्त्व ही वर्णित है तथापि यह आग्रह भी उचित

श्रीरासलीलारहस्य १८१ नहीं है कि उसमें द्वैतका वर्णन है ही नहीं और न निर्गुणवादियोंका यह कथन ही उचित है कि उसमें सगुणवाद नहीं है। वास्तवमें भागवतमें प्रेम-विघातक वेदान्त नहीं है। इसमें तो भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्रबोध तीनोंका ही वर्णन है। रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है पहले कहा जा चुका है कि रासपंचाध्यायी श्रीमद्भागवतका प्राण है। इसमें सर्वान्तरतम वस्तुका प्रतिपादन किया गया है। याज्ञिकोंके यहाँ इसका बड़ा अच्छा क्रम है। वेदीके सबसे निकट यूप होता है। पात्र उसकी अपेक्षा भी अन्तरतम है। देवताओंका अन्तरंग हविष्य है और पात्र उसकी अपेक्षा बहिरंग हैं तथा अध्वर्यु उनकी अपेक्षा भी बहिरंग हैं। इसलिये यदि ऋत्विक्गण कोई पात्र लाते हैं तो स्वयं यूपके बाहर होकर निकलते हैं, किंतु पात्रको यूप और वेदीके बीचमें होकर निकालते हैं। यद्यपि यह दशम स्कन्ध समग्र ही आश्रयरूप है तथापि लीलाविशेषके लिये इसमें भी अन्तरंग- बहिरंगकी कल्पना की गयी है। जिनका भगवान्‌से जितना ही अधिक संसर्ग है, वे उतने ही अधिक अन्तरंग हैं। इसका वर्णन 'उज्ज्वलनीलमणि' नामक ग्रन्थमें बहुत स्पष्टतया किया गया है। मथुरावासियोंकी अपेक्षा गोकुलनिवासी अधिक अन्तरंग हैं, उनसे भी श्रीदामादि नित्यसखा अन्तरंग हैं, उनकी अपेक्षा गोपांगनाएँ अन्तरंग हैं, गोपांगनाओंमें ललिता-विशाखा आदि प्रधान यूथेश्वरियाँ अधिक अन्तरंग हैं और उन सभीकी अपेक्षा श्रीवृषभानुनन्दिनी अन्तरतम हैं; इस क्रमसे रासलीलामें सर्वान्तरतम व्रजांगनाओंका ही प्रसंग है, यह सर्वान्तरतम लीला है। इससे पूर्व भगवान्‌ने गोपोंको अपना स्वरूप- साक्षात्कार कराया था। यद्यपि कालियदमन, गोवर्धन- धारण, अघासुरादिके वध तथा अन्य अनेकों अतिमानुष-लीलाओंके कारण गोपगण यह समझ चुके थे कि कृष्ण कोई साधारण पुरुष नहीं हैं। फिर वरुणलोकमें उनका ऐश्वर्य देखकर तो गोपोंको यह निश्चय हो ही गया था कि ये साक्षात् भगवान् हैं तथापि अन्तमें भगवान्‌ने अपने योगबलसे उन्हें अपने निर्विशेष स्वरूपका साक्षात्कार कराया और फिर वैकुण्ठलोकमें ले जाकर अपने सगुण स्वरूपका भी दर्शन कराया। इस प्रकार उन्होंने गोपोंको रासदर्शनका अधिकारी बनाया। यह अधिकार बिना स्वरूप- साक्षात्कारके प्राप्त नहीं होता। ब्रजमें इसे छठी भावना कहते हैं—'छठी भावना रास की।' पहली पाँच भावनाओंको क्रमशः पार कर लेनेपर ही रासदर्शनका अधिकार प्राप्त होता है। पाँचवीं भावनामें देह-सुधि भूल जाती है—'पाँचे भूले देह-सुधि' अर्थात् इस भावनामें ब्रह्मस्थिति हो ही जाती है। ऐसी स्थिति हुए बिना पुरुष रासदर्शनका अधिकारी नहीं होता। श्रीमद्भागवतमें जहाँ गोपोंको वैकुण्ठधाममें ले जाकर अपने सगुण-स्वरूपका साक्षात्कार करानेकी बात आती है, वहाँ उनके प्रत्यावर्तनके विषयमें कोई उल्लेख नहीं है। इससे कुछ लोगोंका ऐसा मत है कि यह भगवान्‌के नित्यधामकी नित्यलीलाका ही वर्णन है। इस लोकमें यह लीला हुई ही नहीं थी। यदि ऐसी बात हो तब तो भगवान्‌की इस लोकोत्तर लीलाके विषयमें कोई आपत्ति हो ही नहीं सकती; क्योंकि इस लोकमें न होनेके कारण इसमें इस लोकके नियमोंकी रक्षा करना आवश्यक नहीं हो सकता, किंतु यदि भगवान्‌ने इस लोकमें ही यह लीला की हो तब भी उनके— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरौ जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (गीता ३।२१) —इस कथनसे जो विरोध प्रतीत होता है, वह ठीक नहीं; क्योंकि भगवान्‌के विषयमें ऐसा नियम नहीं है कि वे लोकमर्यादाका अतिक्रमण करते ही न हों। जब उनके अनन्य भक्त और तत्त्वनिष्ठ मुनिजन भी मर्यादातिलंघन करते देखे गये हैं तो साक्षात् भगवान्‌के विषयमें तो कहना ही क्या है। उनके

१८२ भक्तिसुधा पादपद्ममकरन्दका सेवन करनेवाले मुनिजनोंकी गतिविधि भी सर्वसाधारणके लिये सुबोध नहीं हुआ करती। यत्पादपद्ममकरन्दजुषां मुनीनां वर्त्मास्फुटं नृपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम्। वस्तुस्थिति तो ऐसी है कि आत्मतत्त्व सभी प्रकारके शुभाशुभ कर्मोंसे शून्य है। जब कि उस आत्मतत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंकी अविलुप्त महिमा भी कर्मोंसे न्यूनाधिक नहीं होती तो श्रीकृष्णरूपमें अवतीर्ण साक्षात् परमात्मतत्त्वका किसी भी शुभाशुभ कर्मसे किस प्रकार संश्लेष हो सकता है? कूटस्थ स्वयंप्रकाश परब्रह्ममें अध्यस्त देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि उपाधियोंके व्यापारयुक्त होनेसे ही उस निर्व्यापार आत्मतत्त्वमें व्यापारवत्ताकी कल्पना होती है। इस प्रकारके कल्पित गुणों या दोषोंसे अधिष्ठानमें कोई गुण या दोष नहीं हो सकता। ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’, ‘घनैरुपे तैर्विगतै रखेः किम्’ इत्यादि श्रुति-स्मृति भी परमात्माको सब प्रकारके कर्मोंसे असंस्पृष्ट बतलाती है। अतः प्रकृति और प्राकृत सब प्रकारके प्रपंचसे अतीत परमात्मा सब प्रकारकी शृंखलाओंसे शून्य है। वस्तुस्थिति ऐसी होनेपर भी अनादि एवं अनिर्वचनीय अविद्याजनित मायामय शोकमोहादि सन्तापोंसे सन्तप्त प्रत्येक प्राणीको दुःख-निवृत्ति और सुख-प्राप्तिके लिये अनेक उपायोंका अन्वेषण करना ही पड़ता है; इसीसे मायामय देहादिके चेष्टारूप कर्मोंमें उनके शुभाशुभ भेदसे विधि या निषेध किया जाता है। जिस प्रकार विषकी निवृत्ति विषसे ही की जाती है, उसी प्रकार मायामयी उच्छृंखल प्रवृत्तियोंके निराकरणके लिये वैदिक और स्मार्त शृंखलाओंको स्वीकार किया जाता है। अभिप्राय यह है कि प्रपंच हेतुभूत अनादि अज्ञानकी निवृत्ति परमात्मतत्त्वके ज्ञानके बिना नहीं हो सकती। परमात्माके ज्ञानके लिये मनःसमाधानकी आवश्यकता है; क्योंकि उस परमतत्त्वका अपरोक्ष साक्षात्कार निर्वृत्तिक चित्तद्वारा ही हो सकता है और मनोनिरोधके लिये देह तथा इन्द्रियादिकी चेष्टाओंका निरोध होना चाहिये। इनका निरोध सहसा नहीं हो सकता। पहले उनकी प्रवृत्तिको नियमित करना होगा और उन्हें नियमित करनेके लिये ही विधि-निषेधात्मक वैदिक-स्मार्त कर्मोंका विधान किया गया है। इसीसे कहा है— ‘अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥’ (ईशावास्यो० ११) इस प्रकार हम देखते हैं कि विधि-निषेधकी अपेक्षा अज्ञानियोंको ही है; किंतु जो जन्म-मरणरूप संसारसे अतीत, मृत्युंजय तत्त्वदर्शी हैं, उन्हें इस प्रकारकी शृंखला अपेक्षित नहीं है; फिर जो उन मुक्तात्माओंके भी गन्तव्य हैं, उन श्रीभगवान्के लिये तो ऐसी कोई शृंखला हो ही कैसे सकती है? भगवान्में तो दो विरुद्ध धर्मोंका आश्रयत्व देखा ही जाता है। वे ‘अणोरणीयान्’ भी हैं और ‘महतो महीयान्’ भी। भगवान्में ही नहीं, यह बात तो कारणमात्रमें रहा करती है। देखो, एक ही पृथिवीतत्त्वमें दुर्गन्ध और सुगन्ध दोनों ही रहते हैं। अतः भगवान् एक ही साथ दोनों प्रकारके आचरण दिखलायेंगे। वे योगारूढ़ोंके लिये समस्त वैदिक और स्मार्त शृंखलाओंका उच्छेद करके एकमात्र भगवान्में ही स्वारसिकी प्रीतिका उपदेश करेंगे तथा आरुरुक्षुओंके लिये अपने वर्णाश्रमधर्मका यथावत् पालन करनेकी आवश्यकता प्रदर्शित करेंगे। श्रीभगवान्के अवतारका प्रधान प्रयोजन— अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्ति- योगका विधान करना जो भगवच्चरणानुरागी हैं, वे भी अपने वर्णाश्रमधर्मका तिरस्कार नहीं किया करते। हाँ, यह अवश्य है कि उनकी मुख्य लगन भगवत्प्रेमके लिये ही होती है। उनकी यह भावना रहती है— या प्रीतिरविवेकानां विषयेष्वनपायिनी। त्वामनुस्मरतः सा मे हृदयान्मापसर्पतु॥ वे यह भी चाहते हैं कि उनकी लौकिक-वैदिक प्रवृत्ति यथावत् बनी रहे तथापि भगवत्प्रेमका अतिरेक

श्रीरासलीलारहस्य १८३ होनेपर उसमें विश्रृंखलता हो ही जाती है। यही बात आत्माराम तत्त्वज्ञोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। भगवान्‌के दिव्य मंगलमय रूपमें प्रादुर्भूत होनेके जो मुख्य उद्देश्य हों, सबसे पहले उन्हींका निश्चय करना उचित भी है; इसलिये अब हमें यह विचार करना है कि भगवान्‌के अवतारका प्रधान प्रयोजन क्या है। भगवान् स्वयं कहते हैं— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) परंतु यह बात ऐसी है, जैसे मच्छरको मारनेके लिये तोप लगायी जाय। भला जो भगवान् सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जिनके संकल्पमात्रसे सम्पूर्ण प्रपंच बन गया है तथा जिनके विषयमें यह कहा जाता है— 'निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्च- भूतानि स्मितमेतस्य चराचरम्, अस्य च सुप्तं महाप्रलयः।' उन्हें क्या इस तुच्छ कार्यके लिये अवतार लेनेकी आवश्यकता है? अतः इसका तो कोई ऐसा कारण होना चाहिये, जहाँ भगवान्‌की सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती हो और जिसके लिये उन्हें दिव्य-मंगल-विग्रह धारण करना अनिवार्य हो जाता हो। इसका उत्तर महारानी कुन्तीके इन शब्दोंसे मिलता है— तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः॥ (श्रीमद्भा० १।८।२०) कुन्ती कहती हैं—'भगवन्! जो अमलात्मा परमहंस मुनि हैं, उनको भक्तियोगका विधान करनेके लिये आपका अवतार होता है; हम स्त्रियाँ इस रहस्यको कैसे समझ सकती हैं।' अब हम इस हेतुकी महत्ताका विचार करते हैं। यहाँ भगवान्‌के अवतारका प्रयोजन अमलात्मा मुनियोंके लिये भक्तियोगका विधान करना बतलाया गया है। जैसे कर्मका स्वरूप द्रव्य और देवता है, उसी प्रकार भक्तिका स्वरूप भजनीय है। भजनीयके बिना भक्ति नहीं हो सकती। प्रेमलक्षणा भक्तिका आलम्बन कोई अत्यन्त चित्ताकर्षक और परम अभिलषित तत्त्व ही हो सकता है। जो महामुनीश्वर प्रकृति-प्राकृत प्रपंचातीत परमतत्त्वमें परिनिष्ठित हैं, उनके मनका आकर्षक भगवान्‌के सिवा प्राकृत पदार्थोंमें तो कोई नहीं हो सकता। अतः इस बातकी आवश्यकता होती है कि उनके परमाराध्य भगवान् ही अचिन्त्य एवं अनन्त सौन्दर्य-माधुर्यमयी मंगलमूर्तिमें अवतीर्ण होकर उन्हें भजनीय रूपसे अपना स्वरूप समर्पणकर भक्तियोगका सम्पादन करें; क्योंकि जो कार्य पूर्ण परब्रह्म परमात्माके अवतीर्ण हुए बिना सम्पन्न न हो सकता हो, जिसके सम्पादनमें उनकी सर्वशक्तिमत्ता और सर्वज्ञता कुण्ठित हो जाय, उसीके लिये उनका अवतीर्ण होना सार्थक हो सकता है। वस्तुतः उन महात्माओंके लिये भजनीय स्वरूप समर्पण करनेमें भगवान्‌की सर्वज्ञता एवं सर्वशक्तिमत्ता कुण्ठित हो जाती है; क्योंकि ये शक्तियाँ शुद्ध परब्रह्मसे व्यतिरिक्त नहीं हैं, ये उन्हींके अन्तर्गत हैं। अतः जो लोग शुद्ध परब्रह्ममें ही निष्ठा रखनेवाले हैं, उनपर इनका प्रभाव नहीं पड़ सकता। यदि हम वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार स्पष्टतया कहें तो यों समझना चाहिये कि यह सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता प्रकृति और प्राकृत अंशको लेकर ही है। ये मायाविशिष्ट ब्रह्मके गुण हैं। इसीसे तत्त्वज्ञपर इनका प्रभाव नहीं होता; क्योंकि वह गुणातीत होता है, इसलिये गुण उसे अपनी स्थितिसे विचलित नहीं कर सकते— 'गुणैर्यो न विचाल्यते।' (गीता १४।२३) किंतु फिर भी कहा जा सकता है कि तत्त्वज्ञका प्रारब्ध तो शेष रह ही जाता है। इसीसे प्रारब्धभोगके निर्वाहक पदार्थ उसके भी मन और इन्द्रियादिको अपनी ओर खींच लेते हैं। जिस प्रकार प्रारब्धभोगके लिये उसकी विषयोंमें प्रवृत्ति होती है, उसी तरह विलक्षण कोई रूपमाधुरी उसे अपनी ओर खींच ले

१८४ भक्तिसुधा सकती है। तत्त्वज्ञको भी क्षुधातुर होनेपर अन्नभक्षणमें प्रवृत्त होना ही पड़ता है तथा तृषित होनेपर उसे जलकी इच्छा भी होती ही है; क्योंकि 'पश्वादिभिश्चाविशेषात्' इस भाष्यके अनुसार भोजनाच्छादनादिमें तो पशु आदिसे उनकी समानता ही है। फिर भगवान्‌के अवतरणकी क्या आवश्यकता है और उनकी सर्वशक्तिमत्तादि क्यों कुण्ठित होगी ? इसका निराकरण करनेके लिये उपर्युक्त श्लोकमें 'अमलात्मनां परमहंसानां मुनीनाम्' ऐसा कहा गया है। जिस प्रकार हंस परस्पर मिले हुए दूध और पानीको अलग-अलग कर देता है, उसी तरह जो आत्मा-अनात्मा, दृक्-दृश्य अथवा पुरुष-प्रकृतिका विवेक कर सकता है, वह हंस कहलाता है। यह योग्यता सांख्यवादियोंमें भी देखी जाती है। इसलिये वे भी 'हंस' कहे जा सकते हैं। वे क्षीर-नीर- विवेकके समान दृक्-दृश्य अथवा आत्मा-अनात्माका विवेक कर सकते हैं; किंतु उनकी दृष्टिमें वे दोनों ही तत्त्व सत्य रहते हैं। वेदान्तियोंकी दृष्टिमें दृश्यकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये उन्हें परमहंस कहा जाता है। इस प्रकार जिसकी दृष्टिमें सम्पूर्ण दृश्यका बाध होकर केवल शुद्ध चेतन ही अवशिष्ट रह गया है, उसे परमहंस कहते हैं। ऐसी स्थितिमें भी विचार दृष्टिसे तो दृश्यका अत्यन्ताभाव निश्चित हो जाता है, किंतु उसकी प्रतीति तो बनी ही रहती है। कहा है— आरूढयोगोऽपि निपात्यतेऽधः सङ्गेन योगी किमुताल्पसिद्धिः। तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात्॥ इससे सिद्ध होता है कि तत्त्वज्ञको भी कभी- कभी भगवान्‌की विश्वविमोहिनी मायाके अधीन हो जाना पड़ता है। श्रीदुर्गासप्तशती (१।५५-५६)-में कहा है— ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति। श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरइ। बरिआई बिमोह मन करइ॥ (रा०च०मा० ७।५९।५) अतः सिद्ध हुआ कि प्रारब्धवश तत्त्वज्ञका भी पतन हो जाता है। मनुजीने भी कहा है—'ज्ञानं क्षरति' अर्थात् ज्ञान बह जाता है। इसीलिये ऐसा कहा जाता है कि तत्त्वज्ञ होनेपर भी सदा सावधान रहना चाहिये। अतः यहाँ 'अमलात्मनाम्' ऐसा पद और दिया है। अर्थात् जो मलविक्षेप यानी रजोलश- तमोलेशसे निर्मुक्त हैं, जिन महानुभावोंके चित्तोंको खींचनेवाली कोई भी लौकिक सत्ता नहीं है और जो सदा ही दृश्यातीत शुद्ध चेतनमें ही परिनिष्ठित रहते हैं, उनका आकर्षण किसी लौकिक पदार्थसे नहीं हो सकता। अतः उन्हें अपनी परमानन्दमयी अहैतुकी भक्ति प्रदान करनेके लिये उनके परमाराध्य और एकमात्र ध्येय-ज्ञेय शुद्ध परब्रह्म ही अपनी लीला- शक्तिसे सगुण विग्रह धारण करते हैं। यहाँ यह शंका हो सकती है कि उन्हें भक्ति प्रदान करनेकी ऐसी आवश्यकता ही क्या है ? इसका उत्तर यही है कि भगवान् ऐसा करके उन्हें परमहंससे श्रीपरमहंस बनाते हैं। तत्त्वज्ञ लोग यद्यपि सजातीय, विजातीय एवं स्वगतभेद-शून्य शुद्ध परब्रह्मका अनुभव करते हैं, परंतु प्रारब्धशेषपर्यन्त निरुपाधिक नहीं होते। यद्यपि उन्होंने देहेन्द्रियादिका मिथ्यात्व निश्चय कर लिया है तथापि व्यवहारकालमें इनकी सत्ता बनी ही रहती है। समाधिकालमें भी निर्वृत्तिक मनरूप उपाधि रहती ही है। इसीसे वाचस्पतिमिश्रने कहा है कि निरुपाधिक ब्रह्मका साक्षात्कार नहीं होता। संक्षेप- शारीरककार भी अविद्याका आश्रय शुद्ध चेतनको ही मानते हैं। उनका कथन है— 'आश्रयत्वविषयत्वभागिनी निर्विभागचितिरेव केवला।' अर्थात् अज्ञानका आश्रय और विषय अखण्ड शुद्ध चेतन ही है, किंतु जिस समय शुद्ध चेतन अज्ञानका आश्रय और विषय होता है, उस समय वह अज्ञानोपहित तो होना ही चाहिये। अतः इसका तात्पर्य यही है कि अज्ञान अज्ञानातिरिक्त उपाधिशून्य

श्रीरासलीलारहस्य १८५

ब्रह्मको ही विषय करता है। जिस प्रकार संसारका आदि मूलाज्ञान है, उसी प्रकार उसका अन्त भी चरमावृत्ति है। वस्तुतः मूलाज्ञान और चरमावृत्तिमें कोई अन्तर नहीं है। चरमावृत्ति परब्रह्मको विषय करती है—इसका तात्पर्य यही है कि वह चरमावृत्तिसे व्यतिरिक्त उपाधिहीन ब्रह्मको विषय करती है; क्योंकि चरमावृत्ति तो वहाँ मौजूद ही है। निरुपाधिक ब्रह्मका अनुभव तो प्रारब्धक्षयके अनन्तर उपाधिका नाश होनेपर ही होता है। किंतु जिस समय वे ही शुद्ध परब्रह्म अपनी अचिन्त्य लीला-शक्तिसे कोटिकामकमनीय महामनोहर श्रीकृष्ण-मूर्तिमें प्रादुर्भूत होंगे, उस समय उस तत्त्वज्ञको भी उनका वह दिव्य-दर्शन निर्विशेष ब्रह्मदर्शनकी अपेक्षा अधिक आनन्दप्रद प्रतीत होगा। जिस प्रकार सूर्यको दूरवीक्षण यन्त्रद्वारा देखनेपर उसमें जो विचित्रता प्रतीत होती है, वह केवल नेत्रोंसे देखनेपर प्रतीत नहीं होती, उसी प्रकार लीलाशक्त्युपहित सगुण ब्रह्मदर्शनमें जो आनन्दानुभव होता है, वह अशेष-विशेषशून्य शुद्ध परब्रह्मके साक्षात्कारमें भी नहीं होता। इसीसे श्रीरामचन्द्रका दर्शन होनेपर तत्त्वज्ञशिरोमणि महाराज जनकने कहा था— इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥ सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ (रा०च०मा० १।२१६।५,३) महाराज जनकके इस बरबस ब्रह्मसुखत्याग और रामदर्शनानुरागमें क्या कारण था? केवल यही कि अबतक वे शुद्ध परब्रह्मरूप सूर्यको अपने नेत्रोंसे ही देखते थे, किंतु इस समय वे उसके लीलाशक्तिरूप दूरवीक्षणोपहित स्वरूपका दर्शन कर रहे थे। केवल नेत्रसे दीखनेवाले आदित्यकी अपेक्षा दूरवीक्षणोपहित आदित्यदर्शनमें विशेषता है ही। यहाँ एक बात और स्मरण रखनी चाहिये। आदित्यका वास्तविक स्वरूप कितना वैचित्र्यमय है—यह बात हमारे अनुमानमें भी नहीं आ सकती। इसका अनुभव तो आदित्यकी पूर्ण सन्निधि प्राप्त होनेपर ही हो सकता है। इस समय हमें उसका जो कुछ रूप दिखायी देता है, वह किसी-न-किसी उपाधिसे संश्लिष्ट ही होता है। जिस प्रकार दूरवीक्षण यन्त्र उसका उपाधि है, उसी प्रकार मेघ भी है, किंतु मेघ उसके स्वरूपका आवरक है, जिसके कारण हमें सूर्यकी स्फुट प्रतीति नहीं हो सकती। इसी प्रकार इधर ब्रह्मदर्शनमें भी जहाँ भगवान्‌की लीलाशक्ति भगवद्दर्शनमें पटुता प्रदान करनेवाली है, वहाँ मल, विक्षेप और आवरण उसके प्रतिबन्धक हैं। इसीलिये अज्ञजन वस्तुतः ब्रह्मदर्शन करते हुए भी उसे अदृष्ट ही समझते हैं। किंतु भगवान्‌के स्वरूपकी स्फुट और यथावत् अनुभूति तो सम्पूर्ण उपाधियोंसे मुक्त होकर उनके साथ तादात्म्य होनेपर ही होगी। भगवान्‌के सगुण दिव्य मंगलविग्रहमें विशेष आकर्षण है उपर्युक्त कथनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मदर्शी तत्त्वज्ञगण जिस निर्विशेष शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार करते हैं, उसकी अपेक्षा भगवान्‌का सगुण दिव्य-मंगलविग्रह अधिक आकर्षक क्यों है? इस विषयमें भावुकोंका ऐसा कथन है कि जिस प्रकार पार्थिवत्वमें समानता होनेपर भी पाषाणादिकी अपेक्षा हीरा अधिक मूल्यवान् होता है तथा कपासकी अपेक्षा उससे बना हुआ वस्त्र बहुमूल्य होता है, उसी प्रकार शुद्ध परब्रह्मकी अपेक्षा उसीसे विकसित भगवान्‌की दिव्य-मंगलमयी मूर्ति कहीं अधिक माधुर्य-सम्पन्न होती है। इक्षुदण्ड स्वभावसे ही मधुर है, किंतु यदि उसमें कोई फल लग जाय तो उसकी मधुरिमाका क्या कहना है? मलयाचलोत्पन्न चन्दनके वृक्षमें यदि कोई पुष्प आ जाय तो वह कैसा सौरभसम्पन्न होगा? इसी प्रकार भगवान्‌की सगुण मूर्तिके सम्बन्धमें समझना चाहिये। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि भगवान्‌के निर्गुण निर्विशेष स्वरूपमें वह परमानन्द है ही नहीं, जो कि उनकी सगुण मूर्तिमें है। कारण, इक्षुदण्डकी मधुरिमा, पाषाणादिका मूल्य और चन्दनादिकी सुगन्धि—

१८६ भक्तिसुधा

ये सब सातिशय हैं। इनमें न्यूनाधिकता हो सकती है, परंतु भगवान्में जो सौन्दर्य, माधुर्य एवं आनन्दादि हैं, वे निरतिशय हैं। इसलिये चाहे भगवान्‌की सगुण मूर्ति हो चाहे निर्गुण, इनमें कोई तारतम्य नहीं हो सकता; क्योंकि जो तत्त्व निरतिशय बृहत् और निरतिशय आनन्दमय है, उसीको तो निर्गुण ब्रह्म कहते हैं। जहाँ बृहत्ता अथवा आनन्दका तारतम्य है, वह तो ब्रह्म ही नहीं हो सकता। जहाँ यह तारतम्य समाप्त हो जाता है, उस अपार संवित्सुखसारहीको तो परब्रह्म कहते हैं। जो तत्त्व देशकालवस्तुकृत् परिच्छेदसे रहित है, वही अनन्त ब्रह्म है; 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।' तथापि यहाँ जो विलक्षणता बतलायी गयी है, वह भगवदभिव्यक्तिके तारतम्यको लेकर भावुक भक्तोंके हृदयकी भावना हो सकती है। तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञके अन्तःकरणपर अभिव्यक्त परब्रह्मके माधुर्यादिकी अपेक्षा स्वयं उन्हींकी परमाह्लादिनी लीलाशक्तिपर अभिव्यक्त भगवत्स्वरूपके सौन्दर्य-माधुर्यादि अत्यन्त विलक्षण हो सकते हैं, किंतु वास्तवमें तो सगुणोपासकके लिये जैसा सगुण स्वरूप परमानन्दमय है, वैसा ही निर्गुणोपासकके लिये भगवान्‌का निर्गुण-निर्विशेष स्वरूप भी है। जो लोग निर्विशेष परब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार कर चुके हैं, उन्हें कैवल्य तो ज्ञानसे ही प्राप्त होता है; किंतु वे जीवन्मुक्तिकालमें भी भगवान्‌की अचिन्त्य लीलामयी शक्तिके योगसे दिव्य मंगलमय विग्रहमें आविर्भूत हुए परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्रकी सौन्दर्य- माधुर्य-सुधाका समास्वादन किया करते हैं। अचिन्त्यानन्द सुधासिन्धु श्रीभगवान्‌के जिस माधुर्यका समास्वादन केवल वृत्ति-शून्य अन्तःकरणसे नहीं किया जा सकता, उसे भी तत्त्वज्ञ भावुकगण भगवान्‌की दिव्य लीलाशक्तिकी सहायतासे अनुभव कर लेते हैं। ऊपर यह कहा जा चुका है कि केवल नेत्रोंसे सूर्यकी वैसी दीप्तिमत्ता अनुभव नहीं होती, जैसी कि स्वच्छ काँच आदिकी सहायतासे होती है। उपाधि-विशुद्धिके तारतम्यसे माधुर्य-विशेषके प्राकट्यका भी तारतम्य रहता है। यद्यपि प्राण और इन्द्रियादिकी अपेक्षा तो शुद्ध निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी स्वच्छता विशेष है तथापि भगवान्‌की जो लीलाशक्ति उनके अशेष विशेषातीत परमानन्दात्मक शुद्ध स्वरूपको ही अचिन्त्य एवं अनन्त आनन्दमय सौन्दर्य-सुधानिधि, परम दिव्य श्रीकृष्णविग्रहमें अभिव्यक्त कर देती है, वह उस निर्वृत्तिक अन्तःकरणकी अपेक्षा भी अनन्तगुण स्वच्छ है; क्योंकि उसमें रजोगुण या तमोगुणका थोड़ा-सा भी संस्पर्श नहीं है। अन्तःकरण चाहे कितना भी स्वच्छ हो, परंतु वह रजोगुण-तमोगुणसे सर्वथा शून्य नहीं हो सकता; क्योंकि वह तमःप्रधाना प्रकृतिके परिणामभूत पंचभूतोंका ही कार्य है और कार्यमें कारणांशकी अनुवृत्ति अनिवार्य है। अतः सिद्ध हुआ कि तत्त्वज्ञगण केवल निर्वृत्तिक अन्तःकरणसे वैसी मधुरताका अनुभव नहीं कर सकते, जैसी कि लीलाशक्तिके योगसे आविर्भूत हुए भगवान्‌के सगुण स्वरूपका साक्षात्कार करनेपर होती है। इसीसे अमलात्मा तत्त्वज्ञ मुनियोंको उनका भजनीय स्वरूप समर्पणकर भक्तियोगके द्वारा उन्हें अपने सौन्दर्य-माधुर्यका समास्वादन करानेके लिये ही परब्रह्म परमात्मा अवतीर्ण होते हैं। उन्हें यदि सगुण साकार ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाय तो भी देहपातके अनन्तर वे कैवल्यपद ही प्राप्त करेंगे। किंतु सगुणोपासक अपने इष्टदेवका नित्यधाम प्राप्त करेंगे; इसीसे भक्ति- रसायनादि ग्रन्थोंमें तत्त्वज्ञको सगुण-दर्शनसे केवल दृष्ट-फल माना है और उपासकको दृष्ट और अदृष्ट दोनों। अतः ऊपर जो बतलाया है, इससे यही निश्चय होता है कि भगवान्‌के अवतारका प्रधान प्रयोजन अमलात्मा परमहंसोंके लिये भक्तियोगका विधान करना है। इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये वे अपनी लीलाशक्तिसे दिव्य मंगलमय देह धारण करते हैं। यह लीलाशक्ति भगवान्‌की परम अन्तरंगा है। जिस प्रकार वृक्षके बीजमें उसके शाखा, पल्लव, पुष्प और फल आदि सभी अंगोंको उत्पन्न करनेकी अनेक शक्तियाँ

श्रीरासलीलारहस्य १८७ रहती हैं, उसी प्रकार महाशक्तिमें ही विश्वविकासकी समस्त शक्तियाँ निहित हैं अर्थात् वह भगवदीय महामायाशक्ति अनन्त शक्तियोंका पुंज है। उसमें जिस प्रकार अनन्तकोटिब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्वर्ती विचित्र भोग्य, भोक्ता और उनके नियामक आदि प्रपंचको उत्पन्न करनेकी अनन्त शक्तियाँ हैं, उसी प्रकार उन अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर श्रीभगवान्‌के दिव्य मंगलमय विग्रहमें आविर्भूत होनेके अनुकूल भी एक परम विशुद्धा अन्तरंगा शक्ति है और वह भगवान्‌की अनिर्वचनीया आत्मयोगभूता महाशक्तिके अन्तर्गत होनेके कारण अनिर्वचनीयतामें अन्य प्रपंचोत्पादनानुकूल शक्तियोंके समान होनेपर भी उनकी अपेक्षा कहीं अधिक स्वच्छ और दिव्य है। इसे दृष्टान्तद्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है—जैसे किसी अत्यन्त दिव्य पुष्पके बीजमें अंकुर, स्कन्ध, पत्र और कण्टकादि उत्पन्न करनेकी भी शक्तियाँ रहती हैं तथापि उन सबकी अपेक्षा उसमें जो महामनोहर सुरभित सुमन उत्पन्न करनेकी शक्ति है, वह उन सबकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। यदि एक ही बीजमें अनेकों अतीन्द्रिय शक्तियाँ न होतीं तो उसमें पत्र, पुष्प, कण्टक और शाखा आदि परस्पर अत्यन्त विलक्षण वस्तुएँ उत्पन्न नहीं हो सकतीं। अतः जिस प्रकार कण्टकादि उत्पन्न करनेवाली शक्तियोंकी अपेक्षा सुकोमल एवं सुगन्धित पुष्प उत्पन्न करनेवाली शक्ति अत्यन्त उत्कृष्ट और विशुद्ध होती है, उसी प्रकार प्रपंचोत्पादिनी शक्तियोंकी अपेक्षा भगवान्‌की दिव्य मंगलमयी मूर्तिका स्फुरण करनेवाली शक्ति परम विलक्षण होनी ही चाहिये। उसीके द्वारा भगवान् अचिन्त्य सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी मंगलमूर्ति धारण करते हैं, इसीसे प्रपंचातीत प्रत्यगभिन्न परमात्मतत्त्वमें निष्ठा रखनेवाले महामुनीन्द्रोंके मन भी अनायास ही उस भगवन्मूर्तिकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं। इसी विलक्षणशक्तिका निर्देश पराशक्ति एवं अन्तरंगा शक्ति आदि शब्दोंसे भी किया है। वह शक्ति भी भगवत्स्वरूपमें अप्रविष्ट रहती हुई ही उसके प्राकट्यका निमित्त होती है। जिस प्रकार उपाधिविरहित, अतएव दाहकत्वप्रकाशकत्वरहित अग्निके दाहकत्व- प्रकाशकत्व-विशिष्ट दीप-शिखादिरूपकी अभिव्यक्तिमें तेल और बत्ती आदि केवल निमित्तमात्र ही हैं, मुख्य अग्नि तो दीपशिखा ही है अथवा जैसे तरंगविरहित नीरनिधिके तरंगयुक्त होनेमें वायु केवल निमित्तमात्र ही है, वास्तवमें तो तरंगयुक्त समुद्र विलक्षणरूपमें प्रतीत होनेपर भी सर्वथा वही है, जो कि निस्तरंगावस्थामें था, ठीक उसी प्रकार विशुद्ध लीलाशक्तिरूप निमित्तसे शुद्ध परब्रह्म ही अनन्त कल्याणगुणगणविशिष्ट सगुण विग्रहमें अभिव्यक्त होते हैं; किंतु वस्तुतः उनका वह विग्रह मूर्तिमान् शुद्ध परमानन्द ही है। उसमें उस दिव्य शक्तिका भी निवेश नहीं है, वह तो तटस्थ रूपसे ही उसकी निमित्त होती है। इसीसे भगवान्‌की सगुणमूर्तिके विषयमें 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि', 'आनन्दैकरसमूर्तयः' इत्यादि उक्तियाँ हैं। इसीसे उसकी मधुरिमा बड़े-बड़े सिद्ध-मुनीश्वरोंके भी मनोंको मोहित कर देती है। जिस समय बालयोगी सनकादि वैकुण्ठ-धाममें भगवान्‌की सन्निधिमें पहुँचे, उस समय प्रभुके पादारविन्द-मकरन्दके आघ्राणमात्रसे उनका प्रशान्त चित्त क्षुभित हो गया— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः। अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) इसीसे बहुत-से सहृदय महानुभाव निर्विशेष परब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर भी प्रभुके प्रेम- पथके पथिक होते हैं। श्रीगोसाईंजी उन्हें 'सयाने सन्त' कहते हैं— अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥ (रा०च०मा० ७।११९।७) वे भगवान्‌से भगवत्सेवाके सिवा और कुछ नहीं चाहते; यहाँतक कि मुक्ति और अपुनर्जन्मको भी अस्वीकार कर देते हैं—

१८८ भक्तिसुधा न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम् ॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) वस्तुतः भोग-मोक्षादिकी वासना रहते हुए तो भगवद्भक्तिकी प्राप्ति ही नहीं हो सकती। भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते। तावद् भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥ अतः जिनका चित्त केवल भगवान्‌के सौन्दर्य- सुधा-समास्वादनके लिये ही लालायित हो रहा है, उन्हें केवल संकल्पमात्रसे भगवान् सन्तुष्ट नहीं कर सकते; क्योंकि वे तो मोक्षका भी तिरस्कार कर देते हैं— 'दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' (श्रीमद्भा० ३।२९।१३) भला, जब उनका सन्तोष कैवल्य भी नहीं कर सकता तो भगवान् क्या करें ? उन्हें स्वयं आविर्भूत होना ही पड़ता है। यहाँ गोपांगनाओंको भी भगवद्दर्शनके बिना 'त्रुटिर्युगायते' एक-एक पल युगके समान हो रहा था। उन्हें सन्तुष्ट करनेमें भगवान्‌का निर्विशेष रूप असमर्थ था। इसलिये ऐसी अवस्थामें भगवान्‌को मूर्तिमान् होकर अवतीर्ण होना ही पड़ा; क्योंकि उनकी तृप्ति तथा जीवन बिना इसके नहीं हो सकते। भगवान्‌के अवतीर्ण हुए बिना वे कार्य नहीं हो सकते थे। इसीसे प्रभुका प्रादुर्भाव हुआ। अब, साथ ही यह भी सोचना चाहिये कि— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (गीता ४।८) —यह श्लोक भी ठीक ही है। यहाँ 'साधु' शब्दसे गोपांगना-जैसे साधु ही समझने चाहिये, जिनका परित्राण भगवान्‌के दर्शनोंके बिना हो ही नहीं सकता था तथा दुष्कृती भी साधारण नहीं, बल्कि भगवान्‌के अन्तरंग जय-विजय-जैसे दुष्कृती समझने चाहिये, जिनका दुष्कृत भगवान्‌की लीलाविशेषके विकासके ही लिये था; अन्य दुष्कृतियोंको तो उनका दुष्कर्म ही नष्ट कर देगा। इसके सिवा धर्म- संस्थापनसे भी भक्तियोगरूप धर्मकी ही स्थापना समझनी चाहिये, जो कि ऐसे भजनीयके बिना नहीं हो सकती। इस श्लोककी व्याख्या करते हुए भगवान् भाष्यकारादिने भगवान्‌के अवतारका प्रयोजन सर्वसाधारणके कल्याणोपयुक्त धर्मकी स्थापना ही बतलाया है। इस प्रकार यद्यपि उनके प्रादुर्भावका प्रधान प्रयोजन अमलात्माओंके भक्तियोगका विधान करना ही है तथापि अवान्तर प्रयोजन सन्मार्गस्थ साधुओंकी रक्षा और वैदिक-स्मार्तादि कर्मोंकी स्थापना भी हो सकता है। आगेके कथनानुसार भगवान्‌में लोक-शिक्षादि भी देखे ही जाते हैं। भगवान् तो सर्वनियन्ता हैं, इसलिये उनका प्रादुर्भाव योगारुरुक्षुओंके लिये भी था और योगारूढ़ोंके लिये भी। योगारुरुक्षुओंको वैदिक-स्मार्त कर्मोंमें प्रवृत्त करना था और योगारूढ़ोंको सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक केवल भगवन्निष्ठामें नियुक्त करना था। अतः भगवान्‌की यह उक्ति उचित ही है— न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ (गीता ३।२२-२३) भगवान् विधिनिषेधातीत हैं वस्तुतः भगवान् तो विधि-निषेधातीत हैं। वे केवल लोकशिक्षाके लिये ही शास्त्रीय शृंखलाका अवलम्बन करते हैं; क्योंकि शास्त्रादि लोगोंको मर्यादापालनमें वैसा परिनिष्ठित नहीं कर सकते, जैसा कि उस मर्यादाका पालन करनेवाले महापुरुष कर सकते हैं। अतः शास्त्रके अर्थज्ञानके साथ शास्त्रार्थके अनुष्ठानमें परिनिष्ठित व्यक्तियोंके सहवासकी भी बहुत आवश्यकता है। अतः लोगोंको वैदिक-स्मार्त कर्मोंमें प्रवृत्त करनेके लिये ही भगवान् स्वयं भी उनका यथाविधि अनुष्ठान किया करते थे— अथाप्लुतोऽम्भस्यमले यथाविधि क्रियाकलापं परिधाय वाससी।

श्रीरासलीलारहस्य १८९ चकार सन्ध्योपगमादि सत्तमो हुतानलो ब्रह्म जजाप वाग्यतः ॥ (श्रीमद्भा० १०।७०।६) इस प्रकारके लोकसंग्रहके लिये ही इन सारी वैदिक एवं स्मार्त मर्यादाओंका पालन किया करते थे। जो बन्दर बहुत चंचल होता है, उसे संयत करनेके लिये बहुत लम्बी श्रृंखला बाँधी जाती है। फिर वह जैसे-जैसे शान्त होता जाता है, वैसे-वैसे ही उसकी श्रृंखला छोटी कर दी जाती है। यहाँतक कि अन्तमें उसे खुला छोड़ देनेपर भी वह चुपचाप बैठा रहेगा। इसी प्रकार अत्यन्त चंचल चित्तके निरोधके लिये विधि-निषेधरूप लम्बी श्रृंखलाकी आवश्यकता है। कारण, शास्त्रीय श्रृंखलाशून्य पुरुषके देहेन्द्रियादिकी चेष्टाओंका भी नियमन अशक्य है, फिर उनके मनकी चेष्टाओंका निरोध कैसे हो सकता है? इसीसे मनको सर्वथा निश्चेष्ट करनेके लिये पहले देहादिकी शास्त्रीय श्रृंखलानिबद्ध चेष्टा सम्पादित करनी चाहिये, परंतु पीछे जैसे-जैसे उसकी उच्छृंखलता कम होती जाती है, वैसे-वैसे ही उसकी श्रृंखला भी छोटी होती जाती है। वह पहले तो काम्य कर्मद्वारा स्वाभाविक काम और कर्मका निराकरण करता है, फिर पारलौकिक महत्फलवाले कर्मोंसे क्षुद्रफलदायक काम्य कर्मोंको त्यागता है। तत्पश्चात् निष्काम कर्मद्वारा सभी काम्य कर्मोंको छोड़ देता है और फिर ध्यान-समाधि आदिसे सब प्रकारकी चेष्टाओंका निरोधकर ठीक-ठीक नैष्कर्म्यको प्राप्त होता है। इस प्रकार उत्तरोत्तर सूक्ष्मतम-साधनका अभ्यास करते-करते अन्तमें समाधिस्थ होता है। उस समय कोई आलम्बन न होनेपर भी उसका मन सर्वथा निश्चेष्ट रहता है और फिर उसे किसी प्रकारकी श्रृंखलाकी अपेक्षा ही नहीं रहती। इसका तात्पर्य यह है कि जो लोग आरुरुक्षु हैं, जो संसारसागरसे पार नहीं हुए हैं, उनके उपदेशार्थ तो भगवान् लौकिक-वैदिक मर्यादाओंका पालन करते हैं। इसलिये जिन्हें संसाररूप स्वाभाविक मृत्युको पार करना है, उन्हें तो मर्यादापालनरूप महौषधका सेवन करना चाहिये। उनके लिये तो भगवान् भी मर्यादापालन करते हैं; किंतु जो योगारूढ़ हैं, उनके लिये ऐसी कोई विधि नहीं है; उन्हें एकमात्र भगवन्निष्ठामें ही स्थिर करनेके लिये भगवान् मर्यादाका उल्लंघन कर देते हैं; क्योंकि वे स्वयं तो समस्त विरुद्ध धर्मोंके आश्रय ही हैं। उनके लिये मर्यादापालन और मर्यादातिलंघन दोनों ही समान हैं। जो अमलात्मा परमहंस योगारूढ़ हैं, उनके लिये तो मर्यादापालनकी अपेक्षा भगवान्‌का मर्यादातिलंघन ही अधिक श्रेयस्कर है; क्योंकि उन्हें तो भगवत्तत्त्वमें स्वारसिकी प्रीति ही अभिलषित है और वह तभी हो सकती है, जब किसी प्रकारकी श्रृंखला न रहे। जहाँ कोई श्रृंखला होती है अर्थात् जहाँ विधिका बन्धन होता है, वहाँ स्वारसिक प्रेम नहीं होता। लोकमें यह देखा जाता है कि वैषयिक सुखके अभिव्यंजक स्त्री- पुत्रादिमें मनुष्योंका जैसा स्वाभाविक राग होता है, वैसा श्रौतस्मार्तादि कर्मोंमें नहीं होता। यही नहीं, जिन्होंने मनोनिरोधपूर्वक अपनी बुद्धिको शुद्ध परब्रह्ममें स्थापित कर दिया है, देखा जाता है कि विषय उन्हें भी आकर्षित कर लेते हैं। दृष्ट दुःख उन्हें भी बना ही रहता है। वस्तुतः सुखी तो वे ही हैं, जो नारायण- परायण हैं। ऐसे नारायण-परायण महानुभाव विरले ही होते हैं। करोड़ोंमें कोई एक-आध ही भाग्यशाली होता है। मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ (श्रीमद्भा० ६।१४।५) तथापि सुखी वे ही हैं, जो नारायण-परायण हैं। वे नारायण कौन हैं ? 'नारो जीवसमूहस्तस्य अयनं प्रवृत्तिर्यस्मात् स नारायणः ।' नार जीव-समूहको कहते हैं, उसकी जिससे प्रवृत्ति होती है, वह नारायण है; अथवा- 'नारो जीवसमूहः अयनं यस्य असौ नारायणः ।' नार यानी जीव-समूह है आश्रयस्थान जिसका

१९० भक्तिसुधा अर्थात् जो अन्तर्यामीरूपसे समस्त जीवोंमें बसा हुआ है, वह नारायण है। 'नारं जीवसमूहमयते साक्षित्वेन विजानातीति नारायणः।' अर्थात् प्रमात्रादि समस्त प्रपंचके साक्षीको नारायण कहते हैं। इस प्रकार शुद्ध परमात्मा ही नारायण है। वही जिसका परायण—आश्रय है अर्थात् जिसके एकमात्र ध्येय श्रीनारायण ही हैं, वह नारायण-परायण कहलाता है। उसे विषय अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते; क्योंकि उसकी तो एकमात्र श्रीनारायणमें ही स्वारसिकी प्रीति होती है। अतः भगवान्‌के अवतारका मुख्य प्रयोजन यही है कि जो अमलात्मा मुनि हैं, उनकी श्रीनारायणमें स्वारसिकी प्रीति हो। वस्तुतः ब्रह्मतत्त्वके चिन्तनमें तत्त्वज्ञोंकी भी ऐसी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती, जैसी विषयी पुरुषोंकी विषयोंमें होती है। इस स्वारसिकी प्रवृत्तिके तारतम्यसे ही तत्त्वज्ञोंकी भूमिकाका तारतम्य होता है। चतुर्थ, पंचम, षष्ठ और सप्तम भूमिकावाले तत्त्वज्ञोंमें केवल बाह्य विषयोंसे उपरत रहते हुए तत्त्वोन्मुख रहनेमें ही तारतम्य है। ज्ञान तो सबमें समान ही है। जितनी ही प्रयत्न-शून्य स्वारसिकी भगवदुन्मुखता है, उतनी ही उत्कृष्ट भूमिका होती है। जिनकी मनोवृत्ति, कामुककी कामिनी-विषयक लालसाके समान ब्रह्मके प्रति अत्यन्त स्वारसिकी होती है, वे ही नारायण- परायण हैं। वे उसकी अपेक्षा भिन्न भूमिकावाले जीवन्मुक्तोंसे उत्कृष्टतम हैं। निर्विशेष परब्रह्ममें हमारी जो प्रवृत्ति होती है— वह तो शास्त्रविधिके कारण है, किंतु मनोरमा नारीमें चित्त स्वयं ही आकर्षित हो जाता है। हमें शास्त्रविधिके कारण परब्रह्ममें तो बलपूर्वक चित्तको लगाना पड़ता है और निषेधके भयसे परस्त्रीकी ओरसे उसे बलपूर्वक हटाना पड़ता है। विधि कहाँ होती है?— 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ'—जो वस्तु स्वतः सर्वथा प्राप्त न हो, उसके लिये विधि होती है। अग्निहोत्र स्वतः प्राप्त नहीं है; इसीसे वेदभगवान् 'अग्निहोत्रं जुहुयात्' ऐसा विधान करते हैं। इसी प्रकार आत्मदर्शनके लिये भी विधि की गयी है—'आत्मा वा रे द्रष्टव्यः'। अतः आत्मदर्शनमें स्वारसिकी प्रीति नहीं है और जहाँ स्वारसिकी प्रीति नहीं होती, वहाँ निरतिशय प्रेम भी नहीं हुआ करता। * यद्यपि वेदान्तियोंने आत्मदर्शनमें विधि नहीं मानी; क्योंकि विधि पुरुषाधीन क्रियामें ही हुआ करती है, जिसके कि करने-न-करनेमें पुरुषकी स्वतन्त्रता होती है, जिस प्रकार अमुक पुरुष घोड़ेपर चढ़कर जाता है, पैदल जाता है अथवा नहीं जाता। किंतु वस्तु या प्रमाणाधीन ज्ञानमें विधि नहीं हुआ करती; क्योंकि वह तो विधिकी अपेक्षा न रखकर केवल प्रमाणके अधीन है। यदि प्रमाणको अपने प्रमेयके प्रकाशनमें किसी विधिकी अपेक्षा मानी जाय तो विधिको भी अपने अर्थका बोध करानेके लिये दूसरी विधिकी आवश्यकता होगी। अतः आत्मदर्शन तो प्रमाणसे ही होता है, उसके लिये विधिकी आवश्यकता नहीं है तथापि तत्त्वदर्शनके लिये प्रमाणके व्यापारकी अपेक्षा तो है ही और वह प्रमाण-व्यापार पुरुषाधीन है; इसीलिये केवल उसीकी विधि मानी गयी है। अतएव भगवान् भाष्यकारने बहिर्मुखतादिका व्यावर्तन करनेवाले द्रष्टव्य आदि वचनोंको 'विधिच्छाय' (विधिकी छायामात्र) कहा है।

  • यहाँ यह शंका हो सकती है कि आत्मा तो परप्रेमका ही आस्पद बतलाया गया है और इस कथनसे वह ऐसा सिद्ध नहीं होता, परंतु बात ऐसी नहीं है। यहाँ केवल आत्मदर्शनमें ही स्वारसिकी प्रीतिका अभाव बतलाया गया है, आत्मामें नहीं। वस्तुतः अज्ञानी पुरुषोंकी भी जो शब्दादि विषयोंमें स्वारसिकी प्रवृत्ति होती है, वह अज्ञानवश आत्मारूपसे माने हुए देहेन्द्रियादिकी तुष्टिके ही लिये होती है। वे अपने परमार्थस्वरूपसे अनभिज्ञ होते हैं, इसलिये देहेन्द्रियादि मिथ्यात्माके ही परितोषका प्रयत्न करते हैं, परंतु वस्तुतः उस समय वैसा करके भी वे अपने सत्यात्माकी ही प्रीतिका सम्पादन करते हैं; क्योंकि देहेन्द्रियादि मिथ्यात्माकी प्रसन्नताका साक्षी तो शुद्ध चेतन ही है। शास्त्र तो केवल इतना ही करता है कि उन्हें सत्यात्माका ज्ञान करा देता है; इसीसे फिर वे मिथ्यात्माकी प्रसन्नताके लिये उद्विग्न नहीं होते।

श्रीरासलीलारहस्य १९१

वास्तवमें यही कारण है कि प्राणियोंकी मनोवृत्ति शब्द-स्पर्शादिमें समासक्त है, वह शुद्ध परब्रह्मकी ओर जाती ही नहीं। अतः भगवान् उनकी स्वारसिकी प्रवृत्ति-सम्पादनके लिये ही शब्द-स्पर्श-रसादिविरहित होनेपर भी उनके मन और इन्द्रियोंको आकर्षण करनेके लिये दिव्य रूप, दिव्य गन्ध और दिव्य स्पर्शवान् होकर अभिव्यक्त होते हैं; क्योंकि परमपुरुषार्थ तो यही है। जबतक भगवान्‌के प्रति जीवकी स्वारसिकी प्रवृत्ति नहीं होती, तबतक तो वह अकृतार्थ ही है। जिस प्रकार रसनाके पित्तादि दोषसे दूषित हो जानेपर जब किसी बालकको मधुरातिमधुर पदार्थ भी जो उसकी रोग-निवृत्तिके भी हेतु होते हैं, अरुचिकर प्रतीत होने लगते हैं तो उसकी माता उन्हें उसी वस्तुमें मिलाकर देती है, जो कि उसे रुचिकर होती है। उसी प्रकार जो परब्रह्म परमात्मा मधुरातिमधुर है, जिससे बढ़कर और कोई मधुर नहीं है, उसमें जीवोंको मोह- वश प्रेम नहीं होता; बल्कि विषके समान कटु विषयोंमें आसक्ति हो जाती है। अतः अपने तत्त्वज्ञ भक्तोंको प्रेमानन्द प्रदान करनेके लिये ही वे अशब्द एवं रूपरसादिविरहित होनेपर भी महामनोहर दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारणकर अवतीर्ण होते हैं। हाँ, इतना अन्तर अवश्य रहता है कि प्राकृत रूपरसादि वस्तुतः विषरूप ही हैं; किंतु भगवदीय रूपादि स्वरूपसे भी निरतिशय माधुर्यसम्पन्न परमानन्द ही हैं। अतः उनके प्रति अमलात्मा मुनिजन एवं अन्य साधारण प्राणियोंकी भी समान रूपसे स्वारसिकी प्रीति हो जाती है। देवताओंके प्रति स्वाभाविक प्रेम नहीं होता; क्योंकि वे अदृष्ट होते हैं। इसीलिये उनमें प्रेम करनेके लिये शास्त्रको विधान करना पड़ा है। गुरु दृष्ट हैं, इसलिये देवताओंकी अपेक्षा उनके प्रति अनुराग होना अधिक सुगम है, परंतु उनमें आत्मीयताका अभाव है, इसीसे स्वारसिक प्रेम उनमें भी नहीं होता। इसी प्रकार पिता, माता और पत्नीमें उत्तरोत्तर आत्मीयताकी अधिकता होनेके कारण प्रेमकी भी अधिकता होती है; तथापि स्वारसिकी प्रीति उनके प्रति भी नहीं होती; इसीसे उनके प्रति प्रेम करनेके लिये भी विधि है। यहाँतक कि विधिनियन्त्रित सर्वापेक्षया अधिक कामुककी कामिनी-विषयिणी प्रीति भी श्रृंखलाशून्य परकीया कामिनीमें होनेवाली प्रीतिसे न्यून ही है। यह बात प्रायः देखी जाती है कि जहाँ-जहाँ विधि है, वहाँ- वहाँ स्वारसिकी प्रीतिकी न्यूनता होती है। इस दृष्टिसे यदि भगवान्‌की प्रवृत्ति वैदिक अथवा स्मार्त श्रृंखलाओंसे नियन्त्रित हो तो वह स्वारसिकी प्रीतिको बढ़ानेवाली नहीं होगी और ऐसा न होनेपर उनके अवतारका मुख्य प्रयोजन ही सिद्ध न हो सकेगा। यह ठीक है कि वे मर्यादापालन करते हुए आरुरुक्षुओंको तो मार्गदर्शन कर देंगे, परंतु अमलात्मा परमहंसोंको अपने निरपेक्ष अनन्य प्रेमका पथ न दिखला सकेंगे। व्यवहारमें देखा जाता है कि कितने ही स्थलोंमें चांचल्य ही रसकी अभिव्यक्ति करनेवाला है। जैसे बालककी तो चंचलता ही माता-पिताकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाली है। यदि वह समाहित मुनियोंके समान शान्तभावसे बैठा रहे तो यह माता-पिताके मोदमें बाधक ही होगा। अतः जो रसज्ञ हैं, उनसे यह बात छिपी नहीं है कि बहुत स्थानोंमें तो अचांचल्य रसका विघातक ही है। इसलिये यदि भगवान्‌की चेष्टाएँ वैदिक-स्मार्त श्रृंखलाओंसे बँधी हुई होंगी तो वे अमलात्मा परमहंसोंका परप्रेमसे छादन न कर सकेंगी। उन महात्माओंको मर्यादापालनका आदर्श अपेक्षित ही नहीं है; क्योंकि ऐसा तो वे पहले ही कर चुके होते हैं। उन्हें तो भगवान्‌में विशुद्ध प्रेम ही अपेक्षित है, किंतु जहाँ भगवान् अपने ऐश्वर्ययोगसे सम्पन्न होंगे, वहाँ उसका आविर्भाव होना प्रायः असम्भव है। जिस प्रकार शिशुका अद्भुत चांचल्य माता-पिताके हृदयको आकर्षित कर लेता है, प्रियतमाके मर्यादातीत रसमय हाव- भाव-कटाक्षादि प्रियतमका मोद बढ़ाते हैं, उसी प्रकार यदि भगवान् परमदिव्य मंगलमय विग्रह धारणकर

रसमयी उच्छृंखल चेष्टाएँ करें तो उन्हींसे उनके प्रति उनकी स्वारसिकी प्रीति होनी सम्भव है। इस दृष्टिसे विचार करें तो यही निश्चय होता है कि भगवान्‌का शास्त्रातिलंघन दूषण नहीं; प्रत्युत भूषण है। बहुत-से भाव ऐसे होते हैं, जो ऊपरसे तो अन्य प्रकारके जान पड़ते हैं; किंतु भीतरसे उनका और ही रहस्य होता है। यह बात स्पष्ट ही है कि भगवान् प्राकृत नहीं हैं। वे शुद्ध परब्रह्म ही उस रूपसे आविर्भूत हुए हैं तथा ये मुनिजन भी पंचकोशातीत होनेके कारण प्राकृत-प्रपंचसे परे हैं। इस प्रकार घटाकाश और महाकाशके समान स्वरूपसे उनका सम्मिलन है ही। उनका ऐक्य सभीको अभिमत है, किंतु इस समय वह तत्पदार्थ परमात्मा ही दिव्य मंगलमय भगवद्विग्रह-रूपसे आविर्भूत हुए हैं और उसी प्रकार त्वं-पदार्थ अमलात्मा परमहंसोंके रूपमें स्थित है। ऐसी स्थितिमें जैसे अव्यक्त रूपसे उनका तादात्म्य है, उसी प्रकार यदि व्यक्त रूपसे भी तादात्म्य हो तो क्या अभिज्ञोंकी दृष्टिमें वह प्राकृत सम्भोग होगा? स्वरूपसे तो उनका नित्य सम्भोग है ही। ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥’ (तैत्तिरीय० २।१।१), 'अत्र ब्रह्म समश्नुते' इत्यादि वाक्योंसे यह बात कही गयी है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण 'तत्' पदार्थ हैं और गोपांगनाएँ 'त्वं' पदार्थ हैं। यदि इन दोनोंका परस्पर संश्लेष हो तो क्या वह कामक्रीड़ा कही जायगी? स्थूल दृष्टिसे तो अवश्य यह कामक्रीड़ा-सी मालूम होती है, परंतु अन्तरंग दृष्टिसे तो यह जीव और ब्रह्मका अद्भुत संयोग ही है। श्रीमद्भागवतमें यह कई स्थानोंमें देखा जाता है कि गोपांगनाएँ श्रीकृष्णचन्द्रके वियोगमें संतप्त रहती थीं और हर समय उनके दर्शनोंके लिये लालायित रहती थीं और इसी प्रकार भगवान् भी व्रजसुन्दरियोंकी विरह-व्यथासे व्याकुल रहते थे। उन दोनोंको ही पारस्परिक संयोग बहुत अभीष्ट था। प्रेमका यह स्वभाव है कि प्रेमी परस्पर गाढालिंगनके लिये उत्सुक रहा करते हैं। माता अपने सुकुमार शिशुको हृदयसे लगानेमें कितना सुख अनुभव करती है। जो जितना अधिक प्रेमास्पद होता है, उसका व्यवधान उतना ही अधिक असह्य होता है, यहाँ ऐसा भी कहा जाता है कि जिस समय व्रजांगनाएँ भगवान्‌का आलिंगन करती थीं, उस समय उन्हें अपने हार, आभूषण और कंचुकीका व्यवधान तो असह्य था ही, प्रत्युत प्रेमातिरेकके कारण जो रोमांच होता था, वह भी अत्यन्त अप्रिय जान पड़ता था। अतः सिद्धान्त यही है कि प्रेमका पर्यवसान अभेदमें ही होता है, भेदमें नहीं होता। बात क्या है ? भगवान् गोपांगनाओंके आत्मा हैं; आत्माका व्यवधान भला कैसे सह्य हो ? द्वारकामें जो भगवान्‌की पट्टमहिषी थीं, उनके विषयमें कहा जाता है कि जिस समय भगवान् दीर्घकालीन प्रवासके पश्चात् हस्तिनापुरसे आये, उस समय उन्हें देखकर वे तुरंत आसन और शय्यासे उठीं। किसलिये ?— देशकृत व्यवधानको दूर करनेके लिये, किंतु उस समय उन्हें यह विचार हुआ कि हम तो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय—इन पाँच कंचुकोंको पहनकर अपने प्रेमास्पदसे मिल रही हैं। अतः हमारा यह सम्मिलन समुचित आनन्दवर्धक नहीं हो सकता। इसलिये वे उन सब कंचुकोंको उतारकर सच्चिदानन्द रूपसे भगवान्‌को मिलीं। यहाँ गोपांगनाएँ और भगवान्—दोनों ही सच्चिदानन्द-स्वरूप थे। अतः उनकी लीला प्राकृत है ही नहीं। इसलिये इसमें मर्यादातिलंघनका प्रश्न ही नहीं हो सकता। यह तो वह स्थिति है, जिसकी प्राप्तिके लिये सारी मर्यादाओंका पालन किया जाता है। अतः जिस समय भगवान्‌का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय उन्होंने यही विचार किया कि पहले अवतारके प्रधान प्रयोजनकी ही पूर्ति करनी चाहिये। इसीसे पहले उन्होंने अमर्यादित दिव्य लीलाएँ कीं

और पीछे मर्यादित लोक-संग्रहमयी। लोकमें भी यह प्रायः देखा जाता है कि उपनयन-संस्कारसे पूर्व उच्छृंखल प्रवृत्ति रहती है और उसके पीछे मर्यादानुसार आचरण किया जाता है। यही बात भगवान्के विषयमें भी देखी जाती है। इस प्रकार प्रधान प्रयोजनकी पूर्तिके लिये स्वीकार की हुई भगवान्की उच्छृंखलतामें भी एक प्रकारकी सुशृंखलता ही है; इस मर्यादातिलंघनमें भी एक प्रकारका मर्यादापालन ही है। वेद जो कहता है कि 'जायमानो वै ब्राह्मणः त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् जायते'- उत्पन्न होते ही ब्राह्मण तीन ऋणोंसे ऋणवान् हो जाता है—सो इन तीनों ऋणोंमें स्वाध्यायद्वारा ऋषि-ऋणकी निवृत्ति होती है, प्रजोत्पादनसे पितृ-ऋणका अपाकरण होता है और यज्ञ-यागादिसे देव-ऋणका शोधन होता है। यहाँ यदि 'जायमान' शब्दका अर्थ 'जन्म लेते ही' किया जाय तो बालक प्रत्यवायी सिद्ध होगा; क्योंकि उपनयन होनेसे पूर्व वह इनमेंसे न तो कोई क्रिया करनेमें समर्थ ही है और न इनका अधिकारी ही। इसलिये इसका अर्थ 'गृहस्थः सम्पद्यमानः'- गृहस्थावस्थाको प्राप्त होनेपर ऐसा करना चाहिये। अतएव भगवान्ने संस्कारादिसे पहले अमलात्मा परमहंसोंके प्रेम-रसाभिवर्धनके लिये उच्छृंखल लीलाओंका ही प्रदर्शन किया तथा संस्कारादिके पश्चात् मर्यादित लीलाओंका प्रदर्शन किया। इस प्रकार यद्यपि इस मर्यादातिक्रमणमें भी मर्यादाकी रक्षा ही है तथापि भगवान् तो समस्त विरुद्ध धर्मोंके आश्रय हैं। इसलिये वे एक कालमें भी दोनों प्रकारके कार्य कर सकते हैं। जिस प्रकार सर्वाधिष्ठान होनेके कारण आत्मा एक ही समयमें एक (अपवाद) दृष्टिसे अकर्ता-अभोक्ता है, किंतु दूसरी (अध्यारोप) दृष्टिसे सर्वकर्ता और सर्वभोक्ता भी है, उसी प्रकार भगवान्में एक ही साथ दो विरुद्ध धर्म रहा करते हैं। निर्व्यापार रहते हुए व्यापार करना और व्यापार करते हुए भी निर्व्यापार रहना—ये यद्यपि परस्पर-विरुद्ध धर्म हैं तथापि तत्त्वज्ञ महापुरुषोंकी तो यही दृष्टि है— कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥ (गीता ४।१८) यहाँ 'पश्येत्'—देखे यह भी क्रिया ही है। ध्यानयोगी जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी गतिको रोककर निश्चल भावसे अपने निर्विशेष स्वरूपका साक्षात्कार करता है, वह भी तो एक प्रकारकी क्रिया ही है। जो भगवान् अपने भावुक भक्तोंके लिये रसस्वरूप हैं, जिनका 'रसो वै सः। रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।' (तैत्तिरीय० २।७)—इस श्रुतिद्वारा प्रतिपादन किया गया है, वे ही अज्ञानियोंके लिये भयके स्थान हैं, 'तत्तेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य' जो आत्मज्ञोंके लिये परम सन्निकृष्ट हैं, वे ही अज्ञोंके लिये दूरसे भी दूर हैं। अतः भगवान्में तो स्वभावसे ही सम्पूर्ण विरुद्ध धर्म रहते हैं, इसलिये यदि एक कालमें ही वे विरुद्ध प्रकारके आचरण करें तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। यही नहीं, जिस प्रकार भगवान्के अवतार मर्यादा-पालनके लिये अपेक्षित होते हैं, उसी प्रकार कर्म-संन्यासके लिये भी उनकी अपेक्षा हुआ करती है। भगवान् रामका अवतार मर्यादापालनके लिये था और ऋषभदेवजीका सर्वकर्म-संन्यासके लिये। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि एक ही भगवान्ने दो प्रकारकी चेष्टाएँ क्यों कीं ? इस विषयमें यही कथन है कि वे भिन्न-भिन्न चेष्टाएँ भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये थीं। जो मर्यादापालनका अधिकारी है, उसके आदर्श श्रीरामचन्द्र हैं और जो सर्वकर्म- संन्यासके अधिकारी हैं, उसके पथप्रदर्शक भगवान् ऋषभदेव हैं। सर्वकर्म-संन्यासी तत्त्वज्ञ महानुभावोंकी भी दो प्रकारकी चर्या देखनेमें आती है। उनमें अधिकांश तो ऐसे हैं, जो कामिनी-कांचनादि भोग्यपदार्थोंका स्वरूपसे त्याग कर देते हैं और सर्वदा अलक्षित गतिसे

१९४ भक्तिसुधा


[स्तम्भ १]

एकान्त-सेवन किया करते हैं, उनमें साधकोंके आदर्श तो बदरिकाश्रमनिवासी भगवान् नर-नारायण हैं और सिद्धोंके भगवान् ऋषभदेव। वे लोग स्वप्नमें भी स्त्री आदि भोग्य विषयोंका संग नहीं करते। उनका नियम होता है— 'सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य पारं परमारुरुक्षुः।' (श्रीमद्भा० ३।३१।३९) किंतु कोई-कोई महानुभाव ऐसी विलक्षण धारणावाले होते हैं कि अनेकविध भोग्य सामग्रियोंके सान्निध्यमें रहकर भी वे उनसे अक्षुण्ण रहते हैं। ऐसे सिद्धकोटिक महानुभावोंके लिये ही भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाएँ हैं, किंतु वे लीलाएँ अनुकरणीय नहीं हैं, उनके द्वारा तो इस कोटिके महापुरुषोंकी उच्चतम स्थितिका केवल दिग्दर्शनमात्र होता है। यद्यपि साधकोंके लिये स्त्रियोंका चिन्तनमात्र भी महान् अनर्थका हेतु होता है तथापि भगवान्ने तो कामजयके लिये ही यह अद्भुत लीला की थी। टीकाकार श्रीश्रीधरस्वामी लिखते हैं— ब्रह्मादिजयसंरूढदर्पकन्दर्पदर्पहा । जयति श्रीपतिर्गोपीरासमण्डलमण्डनः ॥ अर्थात् ब्रह्मादि लोकपालोंको जीत लेनेके कारण जो अत्यन्त अभिमानी हो गया था, उस कामदेवके दर्पको दलित करनेवाले गोपियोंके रासमण्डलके भूषणस्वरूप श्रीलक्ष्मीपतिकी जय हो। वस्तुतः रासक्रीड़ामें प्रवृत्त होकर भगवान्ने मर्यादाका उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उन्होंने तत्त्वज्ञोंकी निष्ठाकी दृढ़ता ही प्रदर्शित की है। अहो! जो साक्षात् शृंगाररसकी अभिवृद्धि करनेवाले हैं, उन अनेकविध दिव्य हाव- भाव कटाक्षोंका सम्प्रयोग होनेपर भी उनका चित्त तनिक भी विचलित नहीं हुआ। भगवान्की इस स्थितिका श्रीशुकदेवजीने भिन्न-भिन्न शब्दोंमें कई जगह वर्णन किया है, जैसे—'साक्षान्मन्मथमन्मथः' (श्रीमद्भा० १०।३२।२), 'आत्मन्यवरुद्धसौरतः', 'आत्मा- रामोऽप्यरीरमत्' (श्रीमद्भा० १०।२९।४२) इत्यादि।


[स्तम्भ २]

भगवान्‌की रासक्रीड़ा कामजयके लिये भगवान् सर्वेश्वर हैं; उनकी यह लीला कामजयके लिये ही हुई थी। कामने ब्रह्मादिको जीत लिया था। इससे उसका अभिमान बहुत बढ़ गया था और अब उसने उन सबके स्वामी भगवान् श्रीकृष्णसे भी युद्ध करनेका निश्चय किया। भगवान्ने उसका यह निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। कन्दर्पने भी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको जानकर विजयकी लालसासे श्रीव्रजांगनाओंके अंगरूप कांचनमय कामग दुर्गका आश्रयण किया और वहाँ प्रधान-प्रधान अवयवोंको अपना खास निवासस्थान चुना और अपने मित्र वसन्तकी सहायतासे नाना प्रकारके कुसुमोंका ही धनुष-बाण तथा अस्त्र- शस्त्र लेकर स्वाधीन व्रजांगनाओंके कांचनमय अंगरूप कामग दुर्गमें स्थित होकर युद्धकी पूर्ण तैयारी कर ली। इतनेपर भी श्रीकृष्णने उसे दुर्बल ही देखा। यह नियम है कि बड़े-बड़े योद्धा दुर्बल शत्रुसे युद्ध करना उचित नहीं समझा करते। इसलिये युद्ध करनेसे पूर्व वे उसे सबल कर देते हैं। अपूर्ण चन्द्रपर राहु भी आक्रमण नहीं करता। जब एक राक्षसकी भी ऐसी नीति है तो सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ही ऐसा कैसे कर सकते थे? अतः भगवान्ने पहले तो श्रीमहादेवजीके कोपानलसे दग्ध हुए कन्दर्पको पुष्ट किया। वह गोपांगनाओंके हृदयमें स्थित था। उसे वेणुनादद्वारा अपनी दिव्य अधर-सुधाका पान कराकर भगवान्ने सबल कर दिया। परंतु गोपांगनाओंके हृदयमें तो मन भी रहता है और वह भगवान् श्रीकृष्णका परम भक्त है तथा कामदेव मनोज होनेके कारण उसका पुत्र है। अतः अपने पिताके विरुद्ध वह कोई चेष्टा कैसे कर सकता था और वृद्ध पिताके सामने उससे कोई धृष्टता भी कैसे बन सकती थी ? इसलिये उसे निःसंकोच करनेके लिये भगवान्ने वेणुनादद्वारा उस मनको अपने पास बुला दिया। अब कामदेव स्वतन्त्र हो गया। गोपांगनाओंके अंग-प्रत्यंगोंने उसके अस्त्र-शस्त्र होकर भी सहायता की तथा चन्द्रमा, वसन्त, यमुनापुलिन, निकुंज और मलय-मारुत भी उसके सहकारी हो

गये। इस प्रकार पहले सर्वसाधन-सम्पन्न करके फिर उसे परास्त करनेके लिये ही भगवान्ने यह ललित लीला की; इसीसे यहाँ उन्हें 'साक्षान्मन्मथमन्मथः' कहा गया है। सृष्टिमात्रका प्रयोजक काम ही है। सृष्टिके आरम्भमें जैसा भाव रहता है, उत्तरकालीन प्रपंच भी उसीका अनुसरण किया करता है। जैसे सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको एकाकी रहनेपर रमण नहीं हुआ, वैसे ही अब भी अकेले रहनेपर लोगोंको भय और अरमण हुआ करता है। सर्गारम्भमें परमेश्वर कामप्रयुक्त (संकल्पद्वारा प्रेरित) प्रकृतिसे संयुक्त होकर प्रपंचकी रचना करते हैं; इसीलिये लौकिक पुरुष भी कामप्रयुक्ता प्रकृतिरूपा पत्नीसे संयोग करके प्रजाकी रचना करते हैं। श्रुति भी कहती है—'सोऽकामयत एकोऽहं बहु स्याम्'—भगवान्ने इच्छा की कि मैं अकेला हूँ, अनेक हो जाऊँ। वह भगवदिच्छा ही आदि-काम है। जिस प्रकार एक सत्तत्त्व ही सुख-दुःखादि शुभाशुभ- विशेषणविशिष्ट होकर हेय और उपादेय होता है, उसी प्रकार लौकिक और अलौकिक आलम्बनके कारण काम भी हेय और उपादेय हो जाता है। शुभाशुभविशेषणशून्य सत्तत्त्व तो निर्विशेष ब्रह्म ही है; वह न हेय है, न उपादेय। यह कहनेकी भी आवश्यकता नहीं कि विशेषण भी विशेष्यसे अभिन्न ही होता है। जिस प्रकार मृत्तिकाका परिणाम अतएव उससे अविभिन्न घट मृत्तिकाके विशेषणरूपमें व्यपदिष्ट होता है तथा जैसे घटाकाशका अवच्छेदक और उसका विशेषणभूत घट भी आकाशसे अभिन्न ही है; क्योंकि वायु, तेज और जलादिके क्रमसे आकाश ही घटरूप हो जाता है और कार्य तथा कारणमें अभिन्नता होती है—यह प्रसिद्ध ही है, उसी प्रकार शुभाशुभ विशेषण भी सत्तत्त्वसे अभिन्न ही हैं तथापि व्यवहारमें उसके विशेषण होनेसे उसके भेदक भी हैं। इस प्रकार प्रपंचोत्पादनके लिये प्रकृतिके संसर्गमें प्रवृत्त करनेवाली इच्छा या रस ही काम है। यही साक्षात् काम (साक्षान्मन्मथ) है। इस कामका एक बिन्दु ही अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है। यह साक्षात्काम रसात्मक ब्रह्मका ही औपाधिक या विकृत रूप है। यह कारणब्रह्मके मायावृत्तिरूप मनमें क्षोभ उत्पन्न करता है, फिर जिस प्रकार पुरुष कामक्षुब्ध होकर प्रजोत्पादनके लिये स्त्रीसे संसर्गकर उसमें गर्भाधान करता है, उसी प्रकार इससे क्षुब्ध हुआ कारणब्रह्म प्रकृतिरूप अपनी योनिसे संसृष्ट होकर उसमें गर्भाधान कर देता है। जिस प्रकार स्त्रीका गर्भाशय पुरुषका वीर्य प्राप्त होनेपर ही प्रजोत्पादनमें समर्थ होता है, उसी प्रकार पुरुषके चैतन्य-प्रतिबिम्बरूप वीर्यके प्राप्त होनेपर ही अर्थात् पुरुषके सान्निध्यसे प्राप्त हुए चैतन्य-सामर्थ्यसे ही प्रकृति महदादि प्रजाओंको उत्पन्न कर सकती है। जिनका हृदय पाशविक संस्कारोंसे दूषित है, उन नरपशुओंको जिस चर्मखण्डमें योनिबुद्धि है, वह वस्तुतः योनि नहीं कही जा सकती। योनितत्त्व तो अतीन्द्रिय है। जिस प्रकार इन्द्रियगोलकसे इन्द्रिय-तत्त्व सर्वथा भिन्न और अतीन्द्रिय है, उसी प्रकार योनितत्त्व भी योनिगोलकसे सर्वथा भिन्न है। जो योनितत्त्वका उद्गमस्थल जागतिक सृष्टिका मूल कारण है, वही मूलयोनितत्त्व है और उसीको 'प्रकृति' भी कहते हैं। पुरुषका अंशभूत चैतन्य-प्रतिबिम्ब ही वीर्य है। अतः यह नियम है कि प्रकृति और पुरुषका संसर्ग होनेपर ही सृष्टि हुआ करती है। अस्तु। इस प्रकार प्राथमिक काम साक्षान्मन्मथ है। वह विकृत रस-स्वरूप है। उस विकृत रसका याथात्म्य या अधिष्ठान अविकृत रसात्मक परब्रह्म ही है। विकृत रसमें जो मन्मथत्व या मोहकत्व है, वह अपने अधिष्ठानसे ही आता है। अतः उसका अधिष्ठान- भूत परब्रह्म ही 'साक्षान्मन्मथमन्मथ' है। जिस प्रकार भगवान्को चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र और मनका मन कहा जाता है, उसी प्रकार वे कामके काम अर्थात् मन्मथमन्मथ हैं। वे अव्यक्त मन्मथमन्मथ ही इस समय अत्यन्त मधुमयी मनोहर माधवमूर्तिमें विराजमान