भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१. प्रथम तरंग: भक्ति-स्वरूप, लक्षण, साधन-भक्ति एवं प्रमाण-मीमांसा
२४ भक्तिसुधा नीलाम्बुदके अंकुरपर शोभायमान सुन्दर विद्युत्कलिका है या किसी दिव्य कसौटीपर रंजित कनक-रेखा है। अरुण-कमलके सदृश मुख, श्रीहस्त और चरणसहित दीप्यमान श्यामल सर्वांगको देखकर समझती हैं कि यह चार-पाँच अरुण कमलकोशसे संयुक्त सुन्दर यमुना-तरंग हैं। अमृतमय मुखचन्द्र और सुन्दर अलकावलियोंको देखकर श्रीनन्दरानी कल्पना करती हैं कि यह क्या सौन्दर्य-माधुर्यमय मादक मधुका अधिक पान कर लेनेसे उन्मदान्ध अतएव भ्रमणमें असमर्थ निश्चल मधुकरसमूह है, किंवा स्निग्ध-श्यामल गाढान्धकारके अंकुर-समूह ही अलक-समूहरूपमें भासमान हो रहे हैं! नयनोंको देखकर उनमें मुकुलित नीलोत्पलकी कल्पना और सुन्दर युगल कपोलोंमें दिव्य नीलमणिमय जलके विशाल बुद्बुदकी कल्पना करती हैं और अति-सुभग युगल श्रवणको देखकर उनमें श्यामल महो (तेजो)-मयी लतिकाके अभिनवोन्मिषित युगल पल्लवकी कल्पना करती हैं। तिमिर-द्रुमके अंकुरके समान नासाशिखर, यमुनाके बुद्बुदके समान दोनों नासापुट, द्विदल जवाकोरकके समान अधर, ओष्ठ परिपक्व तथा छोटे-छोटे यमल (सहजात या युग्म) जम्बूफलके समान चिबुक (ठोढ़ी)-को निरीक्षणकर नयनोंके फलको पाकर व्रजरानीने आनन्द-जलधिमें अपनी आत्माको अवगाहन कराया। बालदर्शनसे श्रीनन्दरायजी आनन्दमूर्च्छित हो गये इतनेमें ही श्रीमन्नन्दरायके समीप जाकर व्रजपुरपुरन्ध्रियोंने पुत्रजन्मका मंगल-सन्देश सुनाया। ग्रीष्मसे सूखे हुए सरोवरको अमृत-धाराओंसे सरस करते हुए अद्भुत मधुर घन-गर्जनकी तरह पुत्रजन्म- श्रवण करते ही श्रीमन्नन्दराय जैसे हर्षवर्षामें स्नानकर, अमृत-महार्णवमें प्रविष्ट होकर, आनन्द-मन्दाकिनीसे आलिंगित होकर बालकके अवलोकनके लिये उत्कण्ठित हो उठे। यद्यपि आनन्द-मूर्च्छाके समय सूतिका- भवनमें प्रवेश असम्भव था तथापि स्वयं उपस्थित मूर्त्तिमान् ब्रह्मानन्द चमत्कारने ही श्रीव्रजराजके श्रीहस्तको पकड़कर सूतिका-भवनमें पहुँचाया। फिर भी स्खलन सम्भव था, अतः समुचित सुकृतसमूह चातुर्य ही आकर्षण करता हुआ सूतिका-भवनकी ओर ले चला। इतना ही नहीं, आनन्द-मूर्च्छाके पश्चात् उत्पन्न होनेवाली उत्कण्ठाने अपने दोनों हस्तोंसे पृष्ठकी ओर प्रेरित किया। इस तरह इन सबकी सहायतासे सूतिका- भवनमें पहुँचकर यशोदोत्संगलालित श्रीकृष्णको देखकर वे विचार करने लगे कि क्या यह अखण्ड सान्द्रानन्दका बीज है, किंवा जगन्मंगल मंगलोदयका अंकुर है अथवा सिद्धांजनलताका पल्लव है या चिरतर-समय- समुत्पन्न सुकृतकल्पमहीरुहा-रामका कुसुम है अथवा समस्त उपनिषद् कल्पलता-श्रेणीका सुन्दर फल है, किंवा श्रीव्रजेश्वरीकी श्रीअंगररूपा अपराजितालताका ही कुसुम है। इस तरह अभिनव बालकको देखकर श्रीनन्दराय मानो सर्वमनोरथ-सम्पत्तिसे सिद्ध हो गये, आनन्द साक्षात्कार चमत्कारसे विक्षिप्त हो गये या लिखित चित्रकी तरह जड़ीकृत हो गये। भगवान्का जातकर्म-संस्कारोत्सव इस प्रकार प्रथम आनन्द-मूर्च्छामें प्रसुप्त होनेके बाद श्रीकृष्ण-दर्शन-सुखका अनुभव करानेके लिये चेतनादेवीने ही इन्हें प्रतिबोधित किया। उज्जृम्भमाण विपुल आनन्दसे पुलकावली और आनन्दवाष्पकणनिकर- निपात आदिसे लक्षित किसी अलौकिक दशाको प्राप्त होकर सनन्द, उपनन्द, सन्नन्द आदि तथा विप्रगणसहित पुरोधससे जातकर्मादि संस्कार कराकर अपार सम्पत्ति रत्न-मणि-भूषण-वसन-गोधनादिका उन्होंने दान दिया। श्रीमन्नन्दरायके दान-कालमें चिन्तामणि, कल्पतरु, कामधेनुओंके समुदाय शक्तिहीनसे हो गये, रत्नाकरोंमें नाना मत्स्यादिमात्र ही शेष रह गये, किं बहुना त्रैलोक्य-लक्ष्मीके भी पास लीला-कमल ही अवशिष्ट रहा। श्रीव्रजराजकुमार श्रीकृष्णका जन्म हुआ, यह मंगलमय ध्वनि मुखोंमुख, मार्गोंमार्ग, कानोंकान सर्वत्र फैल गयी और सब सोचने लगे कि श्रीयशोदा अद्भुत कल्पलता है, जिसमें भगवत्प्रकाश-रूप दिव्य फल प्रकट
श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २५ हुआ। मूर्तिमती वात्सल्य-रसाधिष्ठात्री महालक्ष्मीके समान तथा चलती-फिरती तेजोमयी मंजरीके समान अपने कुलको यश देनेवाली श्रीयशोदा धन्य है। इस तरह अपने मधुर चरित्रोंसे अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्र आत्मारामोंको भक्तियोगमें लगाने (प्रवृत्त करने)-के लिये और नर-लीला रसकी रचनासे अपने भक्तोंको आनन्दित करनेके लिये श्रीव्रजराजके भवनमें मूर्त्तानन्द श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए। मुक्त मुनियोंके अभिलषित परमानन्दसार-सर्वस्व श्रीकृष्ण-फलको श्रीदेवरूपिणी श्रीदेवकीने उत्पन्न किया, श्रीव्रजेन्द्ररोहिणीने उसका प्रकाशन तथा पालन किया और श्रीव्रजांगनाओं एवं तदीय चरणाम्बुजानुरागियोंने उस सुमधुर फलका सम्यक् सम्भोग किया— मुक्तमुनीनां मृग्यं किमपि फलं देवकी फलति। तत्पालयति यशोदा प्रकाममुपभुञ्जते गोप्यः ॥ श्रीगर्गजी
२६ भक्तिसुधा
श्रेणी और मधुर अक्षरोंकी चित्र-श्रेणीने माँको चित्र- सा कर दिया। शुकके समान बालभगवान् धात्रीजनोंसे बोलना सीखते हैं और तर्जनीसे प्रश्न करते हैं। शनैः- शनैः बलराम 'कृष्ण' और कृष्ण बलरामको 'आर्य' कहने लगते हैं। जब माता कहीं जानेसे मना करनेके लिये डराती हैं, तब दोनों वहाँ जानेके लिये कौतुकवशात् प्रवृत्त होते हैं। 'चंचल चल ना ना' माताके ऐसे वाक्यको सुनकर छद्मसे हँसते-हुए लौटकर दोनों माताको निवृत्त करते हैं और फिर उसी वाञ्छित कार्यमें लग जाते हैं— नैव नैव चल चंचल रे रे वाक्यमेतदवकर्ण्य जनन्याः। मायया स्म परिवृत्य हसित्वा तां निवर्त्य ललिते रविवर्ति ॥ अत्यन्त आसक्ता माता कभी हँसते, कभी रोते हुए दोनों शिशुओंको पकड़कर घरमें लाती हैं और उबटन-अभ्यंग, वेश-परिवर्तनादि श्रृंगार करके सुलाती हैं। कभी दोनों जानु तथा हस्तोंसे चलते हुए शुभ्र पाषाणमय स्थलमें अपने अंगका प्रतिबिम्ब देखकर बालक चकित होते हैं और उसे पकड़ने दौड़ते हैं, पर जब प्रतिबिम्ब मूर्ति भी उन्हें पकड़ना चाहती है, तब आप संकुचित होकर साशंक माँके अंकमें छिप जाते हैं। कभी स्फटिक तथा महेन्द्र नीलमणिके समान श्यामगौरदिव्य तेजवाले चन्द्रमा और नवनील नीरदांकुरकी तरह, पुण्डरीक-नीलोत्पलकी तरह, ज्योत्स्नाशकल और तिमिरसार-शकलके समान राम तथा कृष्ण दोनों व्रजकर्दममें आनन्दसे खेलते हैं। एक-दूसरेकी दिव्य- दीप्तिसे श्याम-गौर दोनों तेजोंका विनिमय होने लगता है। कभी दृप्त वृषभादिकोंके सामने निःशंक दौड़ते हैं, कभी व्यालोंको पकड़ना चाहते हैं तो कभी अग्निशिखापर आक्रमण करना चाहते हैं। नवनीतचोरी-लीला एक दिन अपने ही भवनमें श्रीश्यामघन नवनीत चुरा रहे थे। इतनेमें ही मणिमय स्तम्भके भीतर अपनी ही साँवली सलोनी मंगलमयी मूर्तिको देखकर उसीसे कहते हैं कि 'मेरी माँसे चोरी न बताना, बराबर हिस्सा भले ही बँटवा लो।' इन वचनोंको माता एकान्तमें चुपके सुन रही थी। कौतुकात् जननीके पास आ जानेपर कृष्ण अपने अंग-प्रतिबिम्बको दिखलाकर कहते हैं—'माँ, यह कौन है? लोभसे नवनीत चुरानेके लिये घरमें घुसा है। मेरे मना करनेपर भी नहीं मानता, डाँटनेपर यह भी बिगड़ने लगता है। माँ, तू तो जानती है कि मुझे माखन अच्छा नहीं लगता।' किसी दूसरे दिन माँको किसी और काममें व्यग्र देखकर फिर आप नवनीत चुराने पहुँच गये। माँ आकर देखती और पूछती है कि कृष्ण कहाँ है? यह सुनकर आप कहते हैं कि 'मैया, कंकणके पद्मराग-तेजसे मेरा हाथ जल रहा है, इसीलिये उसे नवनीतभाण्डमें छोड़कर शीतल कर रहा हूँ।' ऐसे मनोहर कर्णरम्य वचनोंको श्रवण करके माता कहती है—'आओ, वत्स! आओ, देखूँ तो तेरा हाथ कैसे तप रहा है?' कृष्ण हाथ फैलाते हैं। उसका चुम्बन करके माता कहती है—'सचमुच हाथ जल रहा है, यहाँसे पद्मरागको दूर करो।' मैया, मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों एक दिन पूर्ण-चन्द्रिकासे धौत अपने मणिमय प्रांगणमें व्रज-देवियोंके साथ गोष्ठी करती हुई व्रजरानी विराजमान थीं। वहाँ श्रीकृष्णने चन्द्रमाको देखा और पीछेसे आकर सिरसे खिसके हुए पटपर माताकी स्खलित वेणीको पकड़कर कहने लगे कि 'माँ, मैं इनको लूँगा।' बालकको गद्गद-कण्ठ देखकर माँ स्नेहार्द्रचित्त हो गयी और अपने पास बैठी हुई सखियोंपर दृष्टि डालकर कहने लगी कि 'तुम्हीं पूछो, यह क्या माँगता है?' विनय, प्रणय, स्नेहसहित वे पूछती हैं, 'बेटा, क्या क्षीर चाहते हो?' कृष्ण 'नहीं'। तब फिर क्या 'सुन्दर दधि ?' 'नहीं।' 'फिर क्या कूर्चिका ?' 'नहीं-नहीं।' 'तब क्या आमिक्षा?' 'अरे नहीं'। 'तब बेटा, क्या नवनीत लोगे?' 'उँहूँ।' 'तब फिर क्यों मचलते हो और माँको कुपित करते हो?' श्रीकृष्ण अँगुली उठाकर चन्द्रको दिखलाते हुए कहते हैं कि 'मैं तो वह नवनीत-खण्ड लूँगा।' किं क्षीरं न किमुत्तमं दधि न ना किं कूर्चिका वा न ना- मिक्षा किं न न किं तवेप्सितमहो हैयङ्गवीनं घनम्। दास्यामो न विषीद वत्स नतरां कुप्यस्व मात्रे गृहो- त्पनेनारुचिरित्युदङ्गुलिदलः शीतांशुमालोकयन् ॥ व्रजदेवियाँ कहती हैं कि अरे बेटा, यह नवनीत
श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २७ नहीं है, व्योमवीथी-तड़ागमें यह कलहंस है। कृष्ण— 'तब तो फिर इसीके साथ खेलूँगा, देखो कहीं भाग न जाय' ऐसा कहकर भूमिपर चरणयुगलोंको नचाते हुए बड़ी उत्कण्ठासे व्रजदेवियोंके कण्ठमें लिपट जाते हैं और कहते हैं—'मेरे लिये इसे ला दो।' जब वे बाल्यावेशसे रोने लगते हैं, तब कुछ व्रजदेवियाँ कहती हैं—'बेटा! इन लोगोंने प्रतारण किया है। यह कलहंस नहीं, पीयूष-रश्मि चन्द्रमा है।' इसपर कृष्ण फिर कहते हैं—'मैं उसीको खेलनेके लिये माँग रहा हूँ।' बालकको जोरोंसे रोते देखकर माँ गोदमें उठा लेती है और कहती है—'लाल, यह न राजहंस है, न चन्द्रमा; वह नवनीत ही है, पर दैवात् उसमें विष मिल गया है, उसे कोई खाता नहीं है।' कृष्णने उत्सुक होकर पूछा—'माँ, विष क्या होता है ? वह इसे कैसे लग गया ?' पूर्व आवेश छोड़कर रसान्तरको प्राप्त श्रीकृष्णकी कथा-श्रवणमें जिज्ञासा देखकर माता सोचती है कि चलो अच्छा ही हुआ। फिर आलिंगन करके मधुर स्वरमें कहती है—'बेटा, एक क्षीरसागर है।' झट कृष्ण पूछ बैठते हैं—'वह कौन है ?' माता उत्तर देती है—'जैसे यह दूध दिखायी देता है, वैसे ही दूधका समुद्र है।' पर बालकृष्णको इस उत्तरसे सन्तोष कहाँ ? वे फिर पूछते हैं—'माँ, कितनी गौओंके स्तनोंसे इतना दूध निकला कि समुद्र बन गया ?' यशोदा उत्तर देती हैं—'वत्स, वह गो-दुग्ध नहीं है।' यह बात बालककी समझमें नहीं आती है। वह कहता है—'बस रहने दे माँ, झूठी बातें मत बना। भला बिना गौओंके भी कहीं दूध होता है ?' इसपर हँसते हुए माँ कहती है—'बेटा, जिसने गौओंमें दूध रचा है, वही बिना उनके भी क्षीरसागर रच सकता है।' कृष्ण 'माँ, वह कौन है ?' माता 'वह भगवान् हैं, जो सब संसारके कारण हैं।' कृष्ण 'माँ, फिर भगवान् कौन हैं ?' माता 'वत्स, वे अजन्मा हैं।' इसपर कृष्ण चुप हो जाते हैं और यशोदा कथा आगे बढ़ाती है। 'बेटा, एक बार देवताओं और असुरोंके विवादमें असुरोंको मोहन करनेके लिये उन्हीं भगवान्ने क्षीरसागरका मन्थन किया था। वहाँ मन्दराचल मथानीका दण्ड और नागराज वासुकि रज्जु बने थे, जिसको एक ओरसे देवता और दूसरी ओरसे असुर खींचते थे।' इसपर कृष्ण बीचहीमें बोल उठे 'जैसे गोपांगनाएँ दधि मथती हैं।' 'हाँ' कहकर माता फिर कथा सुनाती है, 'क्षीरसागर मथनेपर उसमेंसे कालकूट नामका विष निकला।' कृष्ण 'दूधमें कहीं विष होता है ? वह तो माँ सर्पमें होता है।' माता—'अरे, सुन तो बेटा, देवताओंकी प्रार्थनापर उस कालकूट विषका भगवान् शंकरने पान किया। उस समय विषके जो बिन्दु गिर पड़े थे, उन्हींको पीकर भुजंग विषधर बन गये। यह उसी भगवान्की शक्ति है, जिससे दुग्धमें भी विष हो गया। यह नवनीत-खण्ड (चन्द्र) भी उसी क्षीरसागरके मन्थनसे निकला था, इसीलिये इसमें विषका अंश है। तभी तो लोग इसमें कलंक मानते हैं। इसके लिये हठ न करके घरका नवनीत खा लो बेटा!' यह कथा समाप्त भी न होने पायी थी कि भगवान् कृष्ण 'हूँ' 'हूँ' करते सो गये। नर्तन और वेणुवादन-लीला कभी व्रजदेवियाँ कहती हैं, 'हे कुलेश लाल, रे मोहन, बलिहारी जाऊँ नेक थि, थि, नाचो तो।' यह सुनकर ताल एवं लयसे भगवान् नाचते हैं। निर्मञ्छनं तव भजाम कुलेशलाल्य बाल्यातिमोहन बलानुज नृत्य नृत्य। इत्यङ्गनाभिरसकृत्थि थि थीत्थि थीत्ति क्लृप्तेन तालवलयेन हरिनर्नर्त॥ मुग्ध होकर जब व्रजांगनाएँ कहती हैं कि 'वाह, वाह, कितना सुन्दर नाच है', तब और नाचते हैं, परंतु जब वे सौष्ठव तथा स्खलनमें मुदित होकर हँसने लगती हैं, तब लज्जित होकर श्यामसुन्दर माँकी गोदमें भाग जाते हैं। कभी वे गोपियोंके कहनेपर माताके समीप वेणु बजाते हैं। 'निर्मञ्छनं तव नयामि मुखस्य तात वेणुं पुनर्ललन वादय वादयेति। ऊचुर्यदा स जननीजनकोपकण्ठे तं वादयन्नथ तदा सरसीकरोति।' श्रीकृष्णभगवान्की बाल-लीलाएँ अनन्त हैं। उनका वर्णन कहाँतक किया जाय। यह सारा विश्वप्रपंच उनकी लीला ही तो है।
२८ भक्तिसुधा भगवान्का मंगलमय स्वरूप भगवान् सर्वथा अनुपमेय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य मंगलमय विग्रहकी तापहारिणी अपारसौन्दर्यशालिनी कान्तिको चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर भगवान्का रूपसौन्दर्य अप्राकृत होनेसे प्राकृत चन्द्र उपमान वहाँ ठीक नहीं घटता। तथापि लोकमें सबसे अधिक पूर्णचन्द्र ही प्राणियोंके मनको हरण करनेवाला है। प्राकृत जनोंकी दृष्टिमें अन्य कोई अप्राकृत वस्तु नहीं आ सकती। इसलिये चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर एक चन्द्रमासे काम नहीं चलेगा। अनन्त कोटि चन्द्रोंकी कल्पना कीजिये और ऐसे अपार चन्द्रसागरका मन्थन करके जो सारातिसार तत्त्व निकले, उस तत्त्वको पुनः मथकर उससे जो सारातिसार तत्त्व निकले, इस प्रकार शतधा मन्थन करके जो सारातिसार चन्द्रतत्त्व निकले, उस चन्द्रका उपमान भगवान्में है। यह चन्द्रका उपमान भगवान्की उस तापहारिणी शीतल ज्योत्स्नामें है। उनके दुर्निरीक्ष्य तेजका वर्णन गीतामें हुआ ही है कि— दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (गीता ११।१२) अस्तु, भगवान्की शान्तिदायिनी शीतल ज्योत्स्ना सारातिसार तत्त्वरूप चन्द्रके समान है, पर चन्द्रमें कलंक है और चन्द्र क्षय-वृद्धिशील है। भगवान्की दिव्य ज्योत्स्ना अमृतमय सारातिसार चन्द्र-तत्त्वके समान है, वह निष्कलंक है, निर्विकार है, उससे भावुकोंको प्रतिक्षणवर्धमान प्रेम प्राप्त होता है। वह ऐसा अद्भुत सौन्दर्य है कि उस सौन्दर्य-सुधाका एक कण भी जो पान कर लेता है, उसकी पिपासा बढ़ती ही जाती है। जिसके नेत्र और मन भगवान्के एक रोमपर भी पड़े हों, वे उस एक ही रोमके सौन्दर्यपर इतने मुग्ध हो जाते हैं कि वहाँसे वे आगे बढ़ ही नहीं सकते। चंचला लक्ष्मी भी वहाँ आकर अचला हो जाती है, फिर औरोंकी बात ही क्या है? भगवान्के दिव्यातिदिव्य सौन्दर्यमें प्राकृत उपमान केवल इतना ही प्रयोजन सिद्ध करते हैं कि इनके द्वारा भगवत्सौन्दर्यका ध्यान करते-करते मन विशुद्ध हो जाता है और मनमें जैसे-जैसे विशुद्धि आती है, वैसे- वैसे भगवान्का जैसा वास्तविक रूप है, वह अचिन्त्य अप्राकृत मंगलमय दिव्यरूप भक्तके सामने प्रकट होने लगता है। भगवान्में केवल चन्द्रमाका ही उपमान नहीं, कारण भगवान् घनश्याम भी हैं, पर यह प्राकृत श्याम नहीं। उनकी श्यामतामें महेन्द्र नीलमणिकी उपमा दी जाती है, जिसमें दीप्तिमत्ता-विशिष्ट विलक्षण नीलिमा है। उस नीलिमामें ऐसी दीप्ति है कि वह अनन्त कोटि चन्द्रोंकी सम्मिलित दीप्तिमत्ताको तिरस्कृत करती है। इस दिव्य दीप्ति-सम्पन्न भगवन्मूर्त्तिरूप नीलकमलमें ऐसी सुकोमलता है कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सुकोमलताकी मूर्ति श्रीलक्ष्मी भी उनके पाँवको स्पर्श करती हुई सकुचाती हैं कि हमारे हाथोंकी कठोरता इसके सुकोमल पाँवोंको कष्टदायक न हो। अनन्तकोटि कमलोंकी सारातिसार कोमलता इस कोमलताके पास भी नहीं आने पाती। ऐसे शीतल, ऐसे सुन्दर, ऐसे सुकोमल भगवान् इतने गम्भीर हैं कि नवीन नीरधरकी गम्भीरता अनन्तकोटिगुणित होकर भी उनका वास्तविक स्वरूप नहीं प्रकट कर सकती। भगवान्का केवल मुख ही चन्द्रोपम है—ऐसा नहीं, सर्वांग ही चन्द्रोपम है। वर्ण स्वभावतः कृष्ण है, दीप्तिसे अकृष्ण है—नीलिमागर्भित दीप्तिमत्ता है। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रह श्याम होते हुए भी अनन्तकोटि चन्द्रकी दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला है। महेन्द्रनीलमणि, नूतन नील नीरधर और नील सरोरुहकी जो उपमाएँ दी गयी हैं, उनसे बहुत-से विवक्षित अंश सूचित होते हैं। महेन्द्रनीलमणिसे दीप्तिमत्ता, चिक्कणता और दृढ़ता तथा नीलिमा
भगवान्का मंगलमय स्वरूप २९ सूचित होती है; नूतन नीरधरसे नीलिमा, रस्यता, तापापनोदकता और गम्भीरता सूचित होती है और नीलसरोरुहसे नीलिमा, सुकोमलता, शीतलता और सौगन्ध्य सूचित होता है, पर ये महेन्द्रनीलमणि आदि सब प्राकृत हैं। इनसे यथार्थ-बोध नहीं होता, पर बोधके समीप पहुँचनेके लिये अन्य कोई उपाय नहीं है। प्राकृत तत्त्वोंसे ही अप्राकृतकी कल्पना कर लेनी है। इन सबसे अनन्तकोटिगुणित ये गुण भगवान्में हैं। भगवान्को देखकर वृन्दावनवर्त्ती मयूरवृन्द घनश्यामको श्याम घन जानकर नृत्य करते हैं। भगवान् जो वंशी बजाते हैं, वह मयूरवृन्दोंके लिये मानो मन्द-मन्द मेघगर्जन ही है। पर मेघ दूर होते हैं और यह मेघश्याम बिलकुल समीप है। परिच्छिन्न होते हुए भी इस मेघकी गम्भीरता ऐसी है कि उनके किसी भी अंगपर किसीके नेत्र पड़ जायँ तो वहीं उनकी टकटकी बँध जाय। आगे बढ़कर उनके सब अंगोंको देखनेकी भला किसमें सामर्थ्य ? व्रजांगनाएँ कहती हैं कि भगवान्के एक-एक रोमके सौन्दर्यको देखनेके लिये यदि हमारे एक-एक रोममें कोटि- कोटि नेत्र होते तो देख सकतीं और तब कह सकतीं कि यह परिच्छिन्न है या अपरिच्छिन्न। भगवान्के मंगलमय दिव्य अंगोंकी शोभा भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी गम्भीरता अपार है। किसीमें उसे ग्रहण करनेकी सामर्थ्य नहीं। यह घनश्याम श्याम घनसे विलक्षण घनश्याम है। श्याम घनमें जो विद्युत् होती है, ऐसी अनन्तकोटि विद्युतोंकी सम्मिलित द्युतिको तिरस्कृत करनेवाली इनकी कौशेयाम्बरदीप्ति है। श्याम घन जीवन (जल)- दाता है तो मनमोहन भी जीवनदाता हैं। श्याम घन जल बरसाता है, परंतु घनश्याम प्रेमामृत-आनन्दामृतकी वर्षा करते हैं। व्रजांगनाओंको हृच्छयाग्निसे दह्यमान होनेके कारण श्यामघनकी आवश्यकता थी। वेणुनिनादसे प्रेम-बीज बोया गया, पुलकावलिरूपसे वह अंकुरित हुआ, पर वह हृच्छयाग्निसे जलने लगा, अश्रुधाराएँ बहकर उसका सिंचन करने लगीं, पर उस उष्ण जलधारासे हृदयको वह शान्ति कहाँसे मिलती ? इसलिये उन्होंने जीवन-प्राप्तिके लिये इन नूतन नील जलधर श्याम घनकी शरण ली। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहके सौन्दर्यादि गुणोंकी महिमा कैसे समझी जाय ? दिव्यातिदिव्य प्राकृत पदार्थोंको असंख्यगुणोपेत करके अपना काम करते-करते चित्त शुद्ध होकर भगवदीय अनुकम्पासे वास्तविक स्वरूपका हृदयमें प्राकट्य होता है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संस्पृष्ट अतसी- पुष्पकी श्यामता दूरसे दमदमाती हुई बड़ी ही मनोहर लगती है। इस मनोहर श्यामताकी शतकोटिगुणित कल्पना करो तो कुछ वैसी श्यामता भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी है। सायंकालमें भी अतसी- पुष्पकी दीप्तियुक्त नीलिमा बड़ी मनोहर होती है। यह मनोहारिता शतकोटिगुणित होकर भगवान्की श्याम मनोहारिताकी कुछ कल्पना करा सकती है अथवा भ्रमरकी श्यामता लीजिये। भ्रमर दूरसे काला दीखता है, पर वह काला नहीं, उसमें बड़ी ही सुन्दर नीलिमा है। ऐसी मनोहर नीलिमा अन्य किसी प्राकृत पदार्थमें नहीं। व्रजांगनाओंने भगवान्की नीलिमाको मधुपकी नीलिमासे ही उपमित किया है और कहा है—हे मधुप, तुम भी मधुपतिकी तरह बड़े कपटी हो। भ्रमरके पीले पंख भी भगवान्के पीतपटका स्मरण दिलाते हैं और उसका मधुमय गुंजार भगवान्के मधुमय वेणुनिनादका या उनके मीठे-मीठे वचनामृतोंका स्मरण दिलाता है। जैसे भ्रमर जबतक रस है, तभीतक ही पुष्पोंसे स्नेह रखता है, नहीं तो भाग जाता है, वैसे ही भगवान् भी रसके ग्राहक हैं, रस नहीं तो भगवान्से भेंट कहाँ ? अस्तु। भगवान्की श्यामता शतकोटिगुणित मधुपकी श्यामतासे तथा भगवान्की दीप्तिमत्ता चन्द्रसिन्धुके सारातिसार तत्त्वका मन्थन करके प्राप्त चन्द्रतत्त्वकी दीप्तिसे कथंचित् उपमित की जा सकती है। कल्पनासे इस प्रकार भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहको पदाम्बुजसे मुखाम्बुजतक अथवा मुखाम्बुजसे पदाम्बुजतक देख जाइये।
मनःकल्पित अनन्ततेजःपुंजके भीतर अनुसन्धान कीजिये अथवा बालसूर्यमें मन और दृष्टिको स्थिर करके देखिये। भगवान्का श्रीमुखचन्द्र चन्द्रवत् वर्तुलाकार दिव्य विकसित अति विलक्षण अरविन्द है, चन्द्रमाके समान दीप्तिमान् वर्तुलाकार मुखारविन्द समुचित तारतम्यके साथ नतोन्नत भावसहित है। इसकी मनोहारिता अत्यद्भुत है। चन्द्रवत् वर्तुलाकार विकसित सुकोमल मुखाम्बुज सारातिसार चन्द्रतत्त्वकी दीप्ति और शतकोटिगुणोपेत भ्रमरनीलिमासे युक्त अति विलक्षण है। यह सम्मिलित समस्त मुखाम्बुज है। यह मन्दहासोपेत दिव्य मुखाम्बुज ऐसा शोभित होता है मानो दिव्यातिदिव्य चन्द्रतत्त्व नीलकमलमें छिपना चाहता है—छिपता है और फिर-फिर प्रकट होता है। यह हास भगवान्के ‘अनुग्राह्याह्वयस्थेन्दुसूचक- स्मितचन्द्रिकः’ अनुग्रह नामक हृदयस्थ चन्द्रकी चन्द्रिका है। अनुग्रहरूप चन्द्रकी ये तापहारिणी किरणें खिन्नातिखिन्न भावुकोंको समाश्वासन दिलाती हैं कि घबराओ मत, अनुग्रहाख्य चन्द्रका यहाँ निवास है। यह समाश्वासन—यह दिव्य आशा ही भावुकोंको उनकी थकावट और खिन्नताको दूर करके आगे बढ़ाती है। आशाबन्ध ही भक्ति-मार्गका मूल है। यह आशा—भगवत्सान्निध्यकी यह तृष्णा अद्भुत है, यह कैवल्यसे खरीदी जाती है। भगवान्का उदार हास ‘शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम्’ शोकाश्रु- सागरोंको सोख लेनेवाला है। बहुल हास जब मुखारविन्दमें प्रादुर्भूत होता है, तब वह ‘हारहासः’ हास हारके समान होता है—कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्ति दिव्यातिदिव्य महेन्द्रनीलके सदृश वक्षःस्थलपर हारवत् प्रतिबिम्बित होती है। यह हारहास अरुणिमा- विशिष्ट है—स्वच्छातिस्वच्छ होता हुआ भी किंचित् अरुण है। यह अधरकी अरुणिमा दन्तपंक्तिमें प्रतिबिम्बित है—जैसे जवाकुसुमके सकाशसे स्फटिक लोहित हुआ हो। यह अरुणिमा-विशिष्ट कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्तियुक्त हास्य दिव्य हारके समान शोभित होता है। कपोल और चिबुक अपने दिव्य सौन्दर्यसे मानो यही कह रहे हैं कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके सारातिसार सौन्दर्यका परमोद्गम-स्थान यही है। यही अचिन्त्य सौन्दर्यसुधानिधि है, जिसका केवल एक कण अनन्तकोटि ब्रह्माण्डमें विस्तीर्ण है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट विकसित कमलका अग्रोर्ध्व-भाग जैसे स्वच्छतामय होता है, वैसे कपोल और चिबुकपर इस नील विकसित मुखाम्बुजकी दीप्तिमत्ता अन्य अंगोंकी अपेक्षा कुछ विशेष है। नीलकमलके केशरका सान्निध्य छोड़कर जो नीलिमायुक्त अंश हैं, वे बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट होकर अधिक दीप्त होते हैं, वैसे ही भगवान्के कपोल और चिबुक विशिष्ट दीप्तिमत्ता-सम्पन्न हैं। विशाल मस्तकपर शोभायमान दिव्य किरीटकी जगमगाती हुई दिव्य कान्ति इन उन्नत अंगोंपर—उच्च स्थल पाकर—अधिक मात्रामें अवतीर्ण और विस्तीर्ण हो रही है तथा वह सौन्दर्य-सुधा उभय कपोलप्रान्तसे भी अधिक चिबुकपर आकर परम विकसित और मनोरम हुई है। भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमा अरुण कमलके समान प्रभुके दिव्य नेत्रोंके सम्बन्धमें ऐसा ध्यान है कि कपोलप्रान्त जैसे-जैसे नेत्रोंके सन्निहित हैं, वैसे-वैसे उनमें अधिकाधिक विशिष्ट दीप्तिमत्तायुक्त अरुणिमा है और कपोलाभिमुख नीचेकी ओर क्रमशः दीप्तिविशिष्ट नीलिमा है और अरुणिमाकी न्यूनता है। खास नेत्र अरुण हैं; यहाँ स्वच्छता और अरुणिमा मानो अरुणिमारूप रजसे भगवान् अपने भावुकोंके अभीष्टका सृजन और स्वच्छतारूप सत्त्वसे पालन करते हैं। नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका ऐसा तारतम्य है कि अनुकम्पा, राग आदि मानस विकृतियोंकी जहाँ अभिव्यक्ति है, वहाँ अरुणिमा अधिक होती है और जहाँ रागादिरहित प्रसन्नता है, वहाँ स्वच्छता अधिक होती है। कोपादि तापक भावोंसे अरुणिमाकी अधिक वृद्धि होती है।
भगवान्का मंगलमय स्वरूप ३१ कोई अरुणिमा अग्निसदृश है, व्रजांगनाओंके स्वच्छातिस्वच्छ नेत्रोंमें जो अरुणिमा है, वह हृच्छयाग्निकी अरुणिमा है। उसीकी शान्तिके लिये वे भगवान्के नीलपादाम्बुजकी नीलरजका अंजन लगाती हैं। भगवान्के नेत्रोंमें कमलकोशकी-सी अरुणिमा है और उनके विशाल नेत्र कर्णप्रान्तपर्यन्त दीर्घ हैं। इनकी कल्पना भावुक ही कर सकते हैं। भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमाके साथ कमलकोशगत अरुणिमाका सादृश्य देखकर 'गोपीगीत' में ऐसी कल्पना की गयी है कि भगवान् मानो इस अरुणिमारूप दिव्यातिदिव्य श्रीको दिव्यकमलोंके सम्राट्के अभेद्य दुर्गको भेदकर अति सुरक्षित अति गुप्त कोषसे चुरा लाये हैं— शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमूषा दृशा। सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।२) दिव्यातिदिव्य कमलसम्राट्को यह पूरी खबर थी कि ये चोरजारशिखामणि एक-एक अंग चोरी करनेवाले हैं। यह कहीं मेरी श्री न हर लें, जो सर्वोत्कृष्ट है। इस भयसे यह पंकजसम्राट् जलमें जाकर रहे। पर जलमें श्रीकृष्ण कहीं जलक्रीड़ा करने आ जायँ, इसलिये उन्होंने जलमें भी ग्रीष्मऋतुका परित्याग करके शरन्निवास ही ग्रहण किया और इस शरत्कालीन जलाशयमें भी अपने-आपको छिपानेके लिये अपने चारों ओर अनन्त कमल उत्पन्न करके उनका पहरा बैठा दिया। इन कमलसैनिकोंकी रक्षाके लिये प्रत्येकको शत-शत पत्र तथा नाल और नालोंमें काँटे देकर ऐसा जलदुर्ग निर्माण किया कि कहींसे कोई घुस न सके। फिर ऐसे अभेद्य दुर्गके बीच चारों ओरसे सुरक्षित स्थानमें आप जा विराजे। फिर भी श्रीको श्रीकृष्ण ले तो नहीं जायँगे, यह भय बना ही रहा। इसलिये उस श्रीको उस पंकजसम्राट्ने स्वयं चारों ओरसे सुरक्षित होकर भी अपने कोश-स्वरूप उदरमें छिपा रखा, जैसे कोई कृपण अपने धनको छिपा रखता है, पर भगवान् ऐसे चतुर चोर-चक्रवर्ती कि उनके नेत्रारविन्द वहाँसे भी उस कमल-कुलपतिकी परम दुर्लभ सम्पत्तिको चुरा ही ले आये। यह चोरी भगवान्की इतनी अद्भुत और भावुकोंके लिये इतनी मधुर है कि गोपियाँ बड़े प्रेमसे इसके गीत गाती फिरती हैं। तभी तो भावुकोंने कहा है—'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥' अस्तु, पद्मगर्भारुणेक्षण भगवान्के इन 'पद्मगर्भारुण' नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका अद्भुत पारस्परिक सम्मेलन है और नेत्रान्तःपाती जो तारक हैं, वे श्याम हैं। इस प्रकार नेत्रारविन्दमें त्रिवेणी संगम हुआ है। यही संगम कुछ विलक्षण रूपसे नेत्रोंकी पलकोंमें भी हुआ है; पलकें अत्यद्भुत दीप्तियुक्त नीलिमा ली हुई हैं और किंचित् अरुणिमाका भी इनमें योग हुआ है। ऐसे दिव्य विशाल नेत्र कर्णप्रान्ततक विस्तीर्ण हैं। भगवान्की दिव्य नासिकाकी शोभा दोनों नेत्रोंके मध्यसे नीचेकी ओर ऊर्ध्वोन्मुख उन्नत दिव्य नासिका कीरतुण्ड-सी शोभा पा रही है। जिसकी दीप्ति दिव्य गण्डस्थलकी-सी ही जगमगा रही है। नासिकामें एक वर-मौक्तिक भी सुशोभित है। नासिकाकी दीप्तियुक्त नीलिमा होठोंकी विलक्षण अरुणिमासे मिलकर अति विलक्षण मनोहारित्व व्यक्त कर रही है। कुन्दकुडमलकी-सी दिव्य दशन- पंक्तिकी स्वच्छता अरुण अधरोंपर और अधरोंकी अरुणिमा दिव्य दशन-पंक्तिपर प्रतिबिम्ब होकर एक बड़े ही दिव्य आदान-प्रदानका भाव दिखा रही है। अधरोंसे बढ़कर शोभा और किसीकी नहीं। सकल- सुधानिधि भगवान्की यह दिव्य अधरसुधा है। व्रजांगनाओंका इसीपर सबसे अधिक प्रेम है। यह पीतिमा दिव्य मकराकृत कुण्डलद्वयसे आकर यहाँ झलक रही है। ये कुण्डल अद्भुत दीप्ति-सम्पन्न हैं और यह दीप्ति पीतिमा लिये हुए है। गोस्वामी तुलसीदासजी 'रामगीतावली' में भगवान्के चंचल कुण्डलद्वयकी दीप्तिमत्ता, शोभा और चंचलताका वर्णन करते हैं कि ये दोनों कुण्डल शुक्र और गुरुसे चमक रहे हैं। इनकी चंचलता यह बतलाती है कि
३२ भक्तिसुधा ये भगवान्के मुखचन्द्र-रूप चन्द्रमाको मध्यस्थ करके कोई विलक्षण शास्त्रार्थ कर रहे कुण्डल अत्यधिक देदीप्यमान हैं और इनके सुवर्णशरीरमें दिव्यातिदिव्य नानाविध रत्न जड़े हुए हैं। ये मकराकृत हैं—मानो मकरध्वज (काम)-को लड़कर जीतनेके लिये ही कुण्डलोंने यह आकार धारण किया है। भगवान्के मधुर मन्द हास्ययुक्त मुखारविन्दकी शोभा भगवान्का मधुरमन्दहासोपेत कटाक्षयुक्त दिव्या- तिदिव्य मुखारविन्द नेत्रवालोंका परम सौख्यमय विश्राम- स्थान है। नन्दनन्दन श्रीवृन्दावनचन्द्रका यह मुखारविन्द भगवान्के वदनारविन्दका सौन्दर्य-सौन्दर्याधिकरण, यहाँ एक-दूसरेसे भिन्न नहीं, पर यह सौन्दर्य-माधुर्यमय परम रस ही है। भगवान्का वक्षःस्थल साक्षात् श्रीका निवास है, मुखारविन्द नेत्रवालोंके नेत्रोंका रससुधा- पानपात्र है, भुजाएँ लोकपालोंके बलका आश्रयस्थान और पदाम्बुज सारतत्त्वके गानेवालोंका परम राग है। श्रियो निवासो यस्योरः पानपात्रं मुखं दृशाम्। बाहवो लोकपालानां सारङ्गाणां पदाम्बुजम्॥ (श्रीमद्भा० १।११।२६) भ्रुकुटी बंक है, नेत्रोंमें भी कुछ बंकपन है, वे तो मानो कामके धनुष ही हैं। दोनों भौंहोंमें नीलिमाकी कुछ विशेष चमचमाहट है। कन्दर्पका दर्पदमन करनेके लिये ही मानो यह धनुष सम्हाला है। कन्दर्प तो व्रजांगनाओंका ही सौन्दर्य देखकर सम्मोहित हो धनुष-बाण छोड़ अचेत गिरा था, अधोक्षज भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके मुखारविन्दतक उसकी पहुँच कहाँ? भगवान् अधोक्षजके जो भावुक हैं, उन्हींके समीप कन्दर्पका कोई चारा नहीं चलता। वहाँ चराचरके चलानेवाले चितचोरके सामने उसकी क्या चले—वहाँतक तो वह पहुँच भी नहीं सकता। रास्तेमें भावुकोंसे ही पछाड़ खाकर मूर्च्छित हो जाता है। भगवान्के सुविस्तीर्ण ललाटमें कुंकुम-कस्तूरी- मिश्रित चन्दन-तिलककी दो रेखाएँ ऐसी शोभा पा रही हैं, जैसे विद्युत्की दो लकीरें अपनी चंचलताको त्यागकर ललाटमेघमें विराम कर रही हों। भगवान्के दिव्य किरीटमें नील, रक्त, शुभ्र, हरित आदि विविध वर्णोंकी नानाविध दिव्यातिदिव्य मणियाँ जड़ी हुई हैं, जिनकी सुसम्मिलित वर्णोंकी दिव्य अतिरंजित आभा, उस किरीटपर अर्द्धचन्द्रवत् विस्तीर्ण दिव्य मौक्तिकमालाओंकी अद्भुत दीप्ति और दिव्य ललाटकी सुषमामयी नीलिमा—ये सब दिव्यातिदिव्य आभाएँ मिलकर एक अति विलक्षण शोभाको प्रस्फुटित कर रही हैं। भगवान्के मस्तक और कपोलोंपर स्निग्ध कुंचित नील अलकावली विलसित हो रही है। ये कृष्णकेश मानो दिव्यातिदिव्य चन्द्रके अमृतके लोभसे काले नागके बच्चे हैं। यदि यह मुखचन्द्र मुखारविन्द है तो ये नीलकेश नील भ्रमर हैं, जो यहाँ दिव्यातिदिव्य सौन्दर्यमय मकरन्दपानकी आशा लगाये मँडरा रहे हैं। ये दिव्य अलकें नित्यमुक्त सनकादि मुनिगण हैं, जो भगवान्के दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यका यहाँ नित्य समास्वादन कर रहे हैं। किरीटके मुक्तामाल भी ऐसे ही मुक्त परमहंसोंकी परम पावन पंक्तियाँ हैं। भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहके सारे ही तत्त्व दिव्य हैं, कोई भी प्राकृत नहीं। कुण्डल सांख्य और योग हैं, वनमाल मायातत्त्व हैं, पीतपट छन्द है, किरीट पारमेष्ठ्यपद है, मुक्ताफल मुक्त हैं। मुक्त पुरुष ही अलकें बनकर भगवान्की इस लीलामें भगवदीय दिव्य अंग बने हैं। ये अलकें जो मुखपर आ-आकर लौटती और फिर आती हैं, ऐसी प्रतीत होती हैं, जैसे भ्रमर इस दिव्य मुखारविन्दके सौरभसे खिंचे चले आते हैं, पर पास आकर उसके दिव्यातिदिव्य तेजको न सहकर लौट जाते हैं, पर मुखारविन्दका ऐसा विलक्षण आकर्षण है कि फिर-फिरकर फिर खिंचे ही चले आते हैं। ये काले भ्रमर जब मकरन्दपानके लोभसे अरुण अधरोंके समीप आते हैं, तब उनकी श्यामता पीछे ही छूट जाती है और अधरोंकी अरुणिमाका रंग इनपर चढ़ जाता है। ये लाल-से हो जाते हैं और ये ही जब गण्डस्थलके समीप आते हैं तब नील हो जाते हैं। मन्दस्मित चन्द्रिकासे इनमें
भगवान् गणेशपंचायतन
राजराजेश्वरी भगवती त्रिपुरसुन्दरीका चिद्विलास
काली तारा षोडशी भुवनेश्वरी त्रिपुरभैरवी छिन्नमस्ता धूमावती बगलामुखी मातंगी कमला दशमहाविद्या
भगवान् हरिहर
देवताओंद्वारा भगवान् सदाशिवकी स्तुति
वेणुधर भगवान् गोविन्द ब्रह्मा, विष्णु, महेश
जगन्नाथ रामराज्याभिषेक
महारासलीला
स्वच्छता भी आ जाती है। ऐसी यह विलक्षण मुखछवि है कि गोस्वामी तुलसीदासजीके शब्दोंमें कहें तो 'कहि न जात मुख बानी।' अधरोंमें अरुणिमा, दिव्य नासिका और गण्डस्थलकी दिव्यातिदिव्य, दीप्तिविशिष्ट नीलिमा और नानाविध भूषणों और कुण्डलोंकी पीतारुण जगमग ज्योतिसे ये कुन्तल अति विलक्षण सुरंजित दीप्तिका प्रकाश करते हैं। ऐसे इन दिव्य नील अलकोंपर वृन्दारण्यधामकी गो-चारण-लीलामें उठी हुई गोधूलि आकर ऐसे जमी हुई है, जैसे नीलकमलका यह पराग हो। ऐसे इस परागक्षुरित अलिकुलमालासंकुलित मुखारविन्दपर स्वेदबिन्दु प्रसन्न तुषार-बिन्दुओंके समान या दिव्यातिदिव्य मोतियोंके समान सुशोभित हो रहे हैं। ऐसे दिव्यातिदिव्य मुखारविन्दके भालदेशमें विद्युत्की लकीरों-सा जो दिव्य तिलक है, वह नीचेकी दोनों भौंहोंकी कमानोंसे छूटनेवाले जैसे दिव्य बाण हों। महालक्ष्मी जिस पद्ममें निवास करती हैं, उस मीनद्वययुक्त अलिकुल-समाश्रित दिव्य पद्मको तिरस्कृत करनेवाला यह दिव्यातिदिव्य मुखारविन्द है। भगवान्के कर्ण अति देदीप्यमान नीलवर्णके हैं, जिनमें नीचे दिव्य कुण्डल लटक रहे हैं। भगवान्के स्कन्ध सिंहके समान विशाल हैं। सुन्दर दिव्य कण्ठ कम्बुरेखासे युक्त है और उसमें आत्मज्योति-स्वरूप कौस्तुभमणि ऐसी शोभा पा रही है, जैसे सारी शोभाओंका यहींसे उद्गम होता हो। कण्ठमें फिर दिव्य मौक्तिकमाल और नीलपीत रत्नहार पड़ा हुआ है, नानाविध रत्नजटित मुक्ताहार तथा वन्य पुष्पमालाएँ हैं। कोई कण्ठमें कण्ठकूपतक हैं, कोई वक्षःस्थलतक हैं, कोई उदर और कटिप्रान्ततक हैं और कोई पादाम्बुजतक हैं। बड़ी ही विलक्षण शोभाका यह बड़ा ही सुन्दर कौशलपूर्ण क्रम है। ये मौक्तिकमाल कण्ठसे पादाम्बुजतक इस दिव्य मंगलमय विग्रहपर ऐसे सोह रहे हैं, जैसे महेन्द्रनीलमणिपर्वतपर गंगाकी दिव्य निर्मल धारा हो अथवा ये मुक्तामाल ऐसे सुशोभित हैं, जैसे नील आकाशमें हंसोंकी पंक्तियाँ उड़ी जाती हों। नील आकाशमें उडुगणोंके समान भगवान्के वक्षःस्थलपर यह रत्न अत्यन्त शोभित होते हैं; मध्य-मध्यमें महामणियाँ अनेक चन्द्रमा तथा सूर्यके समान दीप्यमान होती हैं। दिव्य दीप्त नीलवर्णपर ये नानाविध मौक्तिक, स्तबक, रत्न और वन्य पुष्प आदिके द्वारा विविध प्रकारके वर्ण परस्परसे सुरंजित हो रहे हैं। इन सबकी सम्मिलित शोभा अति विलक्षण है। इस दिव्यातिदिव्य शोभा और सौन्दर्यपर, इसके अति सुरम्य सौरभ और मधुरतम मकरन्दपर मँडराते हुए गुंजारव करनेवाले भ्रमर भगवान्के गुणगान करनेवाले नित्यमुक्त भक्त हैं। दिव्य विग्रहके अनुलेपनकी शोभा इस दिव्य मंगलमय विग्रहके सर्वांगमें कुंकुम- मिश्रित हरिचन्दनका ऐसा सुन्दर शुभ्र विलेपन है, जैसे महेन्द्र-नीलमणिपर्वतपर चन्द्रमाकी चन्द्रिका फैली हो और उस चन्द्रिकामें उज्ज्वल नीलिमा जगमगा रही हो। ऐसी इस उज्ज्वल नीलिमायुक्त चान्द्रमसी ज्योत्स्नासे सुशोभित स्वरूपसे दिव्यातिदिव्य अष्टविध सौगन्ध्यका प्रादुर्भाव हो रहा है। भगवान्के देवदुर्लभ दिव्यातिदिव्य वदनारविन्दका दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्य परम भावुकोंको ही अनुभूत होता है। इस (१) भगवदीय दिव्य- वदनारविन्दके परम दुर्लभ सौगन्ध्यके साथ, (२) सर्वांगमें हरिचन्दनका जो विलेपन है, उसका सौगन्ध्य है, (३) उस हरिचन्दनमें जो कुंकुम मिली हुई है, उसका भी एक अति मनोहर सौगन्ध्य है, (४) पुष्पमालाओंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका शीतल मधुर दिव्य सौगन्ध्य कुछ और ही है, फिर (५) अनेकविध सौगन्ध्योपेत वन्यपुष्पस्तबकोंका सौगन्ध्य अपनी सत्ता अलग बता रहा है, (६) हरिचन्दनका सौगन्ध्य और कुंकुम-कस्तूरीका सौगन्ध्य दोनों मिलकर एक तीसरा ही अद्भुत सौगन्ध्य अनुभूत करा रहे हैं, (७) कुंकुममिश्रित हरिचन्दन और वन्य पुष्प दोनोंके सौगन्ध्य मिलकर भी एक विलक्षण सौगन्ध्य उत्पन्न कर रहे हैं और (८) भगवदीय, वदनारविन्दका सौगन्ध्य तथा इन सब पुष्पादि
३४ भक्तिसुधा
सामग्रियोंका सौगन्ध्य—ये सब मिलकर एक अति विलक्षण, अति दिव्य, अति मनोहर सौगन्ध्य समुत्पन्न कर रहे हैं। ये भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहके दिव्यातिदिव्य अष्टसौगन्ध्य हैं और ऐसे ही दिव्यातिदिव्य अष्टसौगन्ध्य भगवान्के वामपार्श्वमें विराजनेवाली श्रीवृषभानुनन्दिनीजीके भी मंगलमय विग्रहसे प्रादुर्भूत हो रहे हैं। दोनोंके द्विविध अष्टसौगन्ध्य मिलकर एक अलौकिक सौगन्ध्य-माधुर्य-सुधाका वर्षण कर रहे हैं। दयितास्तनमण्डलवर्त्ति कुंकुमस्तूरिका-मिश्रित हरिचन्दन-विलेपनके दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यकी कल्पना और अनुभव परम भावुकके सिवा कौन कर सकता है? फिर इनपर भगवान्के दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्योपेत श्रीचरणोंका संयोग और उससे उत्पन्न होनेवाला दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्य! परम मनोहर, अत्यन्त सुकोमल चरण! उन श्रीचरणोंको परम भक्त व्रजांगनाएँ अपने वक्षःस्थलपर लेती हुई सकुचाती हैं और कहती हैं कि ये कठोर अंग श्रीभगवान्के सुकोमल चरणोंमें गड़ेंगे! इस दिव्यातिदिव्य भावकी कल्पना भी कोई पूर्ण कामजित् परम भावुक ही ठीक तरहसे कर सकता है और तब दयितास्तनमण्डलवर्त्ति कुंकुम-कस्तूरिका- मिश्रित हरिचन्दन-विलेपनके सौगन्ध्यके साथ श्रीभगवान्के श्रीचरण-सौगन्ध्यके दिव्यातिदिव्य संयोग- सौगन्ध्यके समास्वादनका अधिकारी हो सकता है। जिन्होंने व्रजमें विहार करते हुए कहीं तृणमें लगा हुआ कोई दिव्यातिदिव्य कुंकुम देखा और उसके परम दिव्य सौगन्ध्यसे निश्चय किया कि यह दयितास्तनमण्डलवर्त्ति परम पावन हरिचन्दन-विलेपन दिव्य सौगन्ध्यसे युक्त श्रीभगवान्के सुकोमल श्रीचरणोंका सौगन्ध्य है—यह कुंकुम श्रीवृषभानुनन्दिनीजीकी हृदयश्री और श्रीभगवान्के सुकोमल अरुणचरणपंकजश्रीके संयोगका परम सौभाग्यस्वरूप है, उस कुंकुमसे उन्होंने अपना सर्वांग विलेपन किया। कैसा अलौकिक प्रेम और भगवद्भावतादात्म्य है! भगवान्के इस अष्टविध दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको तथा श्रीवृषभानु- नन्दिनीके अष्टविध दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको और दोनोंके संयोगजन्य दिव्यातिदिव्य सौगन्ध्यको परम भावुक उपासक ही जानते हैं। उपास्यके ये दिव्य सौगन्ध्य उपासकोंको भी प्राप्त होते हैं। भगवान्की कामकलभशुण्डके समान सुडौल, गोल, सुन्दर चढ़ाव-उतारवाली दिव्य उज्ज्वलनील भुजाओंपर भी अन्य अंगोंके समान ही कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित शरच्चन्द्रमरीचिवत् दिव्य हरिचन्दनका लेप है। उसपर उज्ज्वल सुवर्णकंकणों और बाजूबन्दोंकी उज्ज्वल पीतिमा भी कुछ-कुछ प्रतिबिम्बित हो रही है। हाथके पंजोंके साथ ये हाथ ऐसे मालूम हो रहे हैं, जैसे दिव्यलोकके पंचशीर्ष नाग हों। ये पाँचों उँगलियाँ उन्हींके पंचशीर्ष-जैसे हैं और इन उँगलियोंमें जो नख हैं, वे पंचशीर्ष नागोंके शीर्षस्थ मणियोंके समान ही चमक रहे हैं। करतलकी सुकोमल अरुणिमा अरुण कमलकी- सी ही विकसित हो रही है और करपृष्ठ सर्वांगके समान ही उज्ज्वल नील हैं और उनपर कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित दिव्य हरिचन्दनकी चाँदनी छिटक रही है। उँगलियोंकी सन्धिमें अरुणिमा और नीलिमाका तारतम्य है। पृष्ठभागसे संलग्न सन्धिका सूक्ष्म भाग अधिकतर उज्ज्वल नील और तल संलग्न सन्धिभाग अरुणिमा-विशिष्ट है। भगवान् अपने इन अरुण करतलोंमें अपना शंख लेकर जब बजाते हैं, तब यह धवलोदर शंख अरुणायमान होकर ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इन दो अब्जखण्डोंके बीच कोई कलहंस कलनाद कर रहा हो। श्रीभगवान्के दिव्य श्रीमुखाम्बुजमें कुंकुम-मिश्रित हरिचन्दनके द्वारा नाना भावपूर्ण नानाविध चित्र ललाट, कपोल, चिबुक और करोंपर भावुक लोग चित्रित करते हैं। उज्ज्वल नील मुखाम्बुज, उसपर मकरन्द-पानके लोभी मधुपोंकी नीलिमा, मकराकृत कुण्डलोंकी चंचल दीप्तिमत्ता और किरीटकी दिव्यातिदिव्य शोभा और इन्हीं विविध आभाओंके भीतर कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित दिव्य हरिचन्दनके परम मनोरम चित्र
भगवान्का मंगलमय स्वरूप ३५ मिलकर ऐसी शोभा उत्पन्न करते हैं, जिसका शब्दोंद्वारा वर्णन नहीं हो सकता। उसका समास्वादन तो भावुकोंको ही होता है। दिव्य सौन्दर्यसम्पन्न मुखाम्बुज तो मुखाम्बुज ही है, भगवान्के दिव्य करोंकी छटाको भी कोई लेशमात्र ही देख ले तो उसके दुःखगर्भ सारे सांसारिक सुख ही छूट जायँ। इस प्रसंगमें श्रीराधावल्लभजीके मन्दिरमें एक वेश्यासक्त राजकुमारकी कथा प्रसिद्ध है। यह राजकुमार इतना वेश्यासक्त था कि उस वेश्याका एक क्षणके लिये भी विरह नहीं सह सकता था। वेश्या सामने न हो तो वह खा-पी नहीं सकता था और न कोई काम कर सकता था। उसकी वेश्यासक्ति छुड़ाकर उसे भगवद्भक्ति प्राप्त करा देनी चाहिये, ऐसी अनुकम्पा सम्प्रदायके आचार्यश्रीके हृदयमें हुई। उन्होंने राजकुमारको अपने यहाँ लिवा लानेका प्रबन्ध किया। बिना वेश्याके राजकुमार भगवान्के मन्दिरमें भी नहीं जा सकता था। इसलिये आचार्यश्रीने उसे वेश्याके साथ ही आनेकी अनुमति दी। वेश्याके साथ, वेश्याका ही मुँह निहारते हुए, राजकुमार पधारे और श्रीभगवान्के मन्दिरमें भी ऐसे बैठ गये कि उनके सामने तो वेश्या थी और वेश्याके पीछे श्रीभगवान्की दिव्य मंगलमय मूर्तिको राजकुमार नहीं देख सकते थे। आचार्यश्रीने वेश्याको राजकुमारके सामने ही रहने दिया, पर ऐसा उपाय किया कि वेश्याके पीछेसे भगवान्का करारविन्द इनकी दृष्टिमें आ जाय। यहाँ भक्तपरवश भगवान्ने आचार्यश्रीकी इच्छाके अनुसार अपने करारविन्दमें वह सौन्दर्य प्रकट कर दिया कि वह वेश्यासक्त क्षणमात्रमें भगवदासक्त हो गया। वेश्याको देखते- देखते ही वेश्याके पीछे चमकते हुए करारविन्दपर इसकी जो दृष्टि पड़ी तो सदाके लिये वहाँ गड़ ही गयी। करारविन्दके उस सौन्दर्यको देखते ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका मदन-सौन्दर्य अधोभूत हो गया। अधोक्षज भगवान्के करारविन्दकी दिव्य छटाने राजकुमारको सदाके लिये अपने वशमें कर लिया। भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा ही है कि एक क्षणके लिये भी उस सौन्दर्य-माधुर्यका लेशमात्र भी किसीपर प्रकट हो जाय तो फिर वहाँसे वह लौट नहीं सकता। इस सौन्दर्य-माधुर्यकी स्फूर्ति भगवान्की अनुकम्पासे विशुद्धातिविशुद्ध अन्तःकरणमें ही होती है। भगवान्की अनुकम्पा जीवको दो प्रकारसे प्राप्त होती है, एक तो अपने साधनसे जैसे ध्रुवको प्राप्त हुई और दूसरे भगवान्की अपनी दयामयी इच्छासे जैसे राजा परीक्षित्को गर्भमें ही प्राप्त हुई। श्रीभगवान्के गलेमें अनेकविध दिव्य वन्यपुष्पोंके स्तबकादिसे युक्त दिव्य सौगन्ध्यमय मालाएँ हैं। उनपर फिर कोटि-कोटि विद्युतोंकी चंचल दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला सुवर्णोज्ज्वल चंचल पीतपट ऐसा उल्लसित हो रहा है, जैसे महेन्द्रनीलमणि पर्वतपर दिव्य विद्युत्-पुंज चमचमा रहा हो और उसमेंसे दिव्य मंगलमय विग्रहकी नीलिमा-दीप्ति भेदकर बाहर निकल रही हो। उज्ज्वल-नीलिमा-सम्पन्न वक्षःस्थलपर सुवर्णो- ज्ज्वल मंगलमय वामावर्त और दक्षिणावर्त रोमराजि दीख रही है। यहीं तो चपला चंचला श्रीमहालक्ष्मीका निवास है। भगवान्को भक्तोंने जो मालाएँ पहनायी हैं, वे लक्ष्मीजीको गड़ती हैं, पर भक्तोंपर आदर दिखानेके लिये भगवान् उन मालाओंको पहने ही रहते हैं और सपत्नीजन्य दुःख लक्ष्मीजीके पीछे लगा ही रहता है। गलेसे लेकर पादाम्बुजतक लटकनेवाले पुष्पहारोंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका तो भगवान् इतना आदर करते हैं कि लक्ष्मीजीसे वह देखा नहीं जाता। पादाम्बुजमें अवश्य ही लक्ष्मीजी तुलसीके साथ रहनेमें सुखी हैं, परंतु वक्षःस्थलपर नहीं; उसपर तो लक्ष्मीजी अकेली ही रहना चाहती हैं। वक्षःस्थलके मध्यमें भगवान् भृगु-चरण धारण किये हैं और लक्ष्मीजीसे मानो यह कह रहे हैं कि महालक्ष्मी ! यहाँ जो तेरी स्थिति है, वह ब्राह्मणके चरणसे ही है। यह हृदय 'हताहंस' होनेके कारण ही चंचला लक्ष्मी यहाँ