भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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२६ भक्तिसुधा

श्रेणी और मधुर अक्षरोंकी चित्र-श्रेणीने माँको चित्र- सा कर दिया। शुकके समान बालभगवान् धात्रीजनोंसे बोलना सीखते हैं और तर्जनीसे प्रश्न करते हैं। शनैः- शनैः बलराम 'कृष्ण' और कृष्ण बलरामको 'आर्य' कहने लगते हैं। जब माता कहीं जानेसे मना करनेके लिये डराती हैं, तब दोनों वहाँ जानेके लिये कौतुकवशात् प्रवृत्त होते हैं। 'चंचल चल ना ना' माताके ऐसे वाक्यको सुनकर छद्मसे हँसते-हुए लौटकर दोनों माताको निवृत्त करते हैं और फिर उसी वाञ्छित कार्यमें लग जाते हैं— नैव नैव चल चंचल रे रे वाक्यमेतदवकर्ण्य जनन्याः। मायया स्म परिवृत्य हसित्वा तां निवर्त्य ललिते रविवर्ति ॥ अत्यन्त आसक्ता माता कभी हँसते, कभी रोते हुए दोनों शिशुओंको पकड़कर घरमें लाती हैं और उबटन-अभ्यंग, वेश-परिवर्तनादि श्रृंगार करके सुलाती हैं। कभी दोनों जानु तथा हस्तोंसे चलते हुए शुभ्र पाषाणमय स्थलमें अपने अंगका प्रतिबिम्ब देखकर बालक चकित होते हैं और उसे पकड़ने दौड़ते हैं, पर जब प्रतिबिम्ब मूर्ति भी उन्हें पकड़ना चाहती है, तब आप संकुचित होकर साशंक माँके अंकमें छिप जाते हैं। कभी स्फटिक तथा महेन्द्र नीलमणिके समान श्यामगौरदिव्य तेजवाले चन्द्रमा और नवनील नीरदांकुरकी तरह, पुण्डरीक-नीलोत्पलकी तरह, ज्योत्स्नाशकल और तिमिरसार-शकलके समान राम तथा कृष्ण दोनों व्रजकर्दममें आनन्दसे खेलते हैं। एक-दूसरेकी दिव्य- दीप्तिसे श्याम-गौर दोनों तेजोंका विनिमय होने लगता है। कभी दृप्त वृषभादिकोंके सामने निःशंक दौड़ते हैं, कभी व्यालोंको पकड़ना चाहते हैं तो कभी अग्निशिखापर आक्रमण करना चाहते हैं। नवनीतचोरी-लीला एक दिन अपने ही भवनमें श्रीश्यामघन नवनीत चुरा रहे थे। इतनेमें ही मणिमय स्तम्भके भीतर अपनी ही साँवली सलोनी मंगलमयी मूर्तिको देखकर उसीसे कहते हैं कि 'मेरी माँसे चोरी न बताना, बराबर हिस्सा भले ही बँटवा लो।' इन वचनोंको माता एकान्तमें चुपके सुन रही थी। कौतुकात् जननीके पास आ जानेपर कृष्ण अपने अंग-प्रतिबिम्बको दिखलाकर कहते हैं—'माँ, यह कौन है? लोभसे नवनीत चुरानेके लिये घरमें घुसा है। मेरे मना करनेपर भी नहीं मानता, डाँटनेपर यह भी बिगड़ने लगता है। माँ, तू तो जानती है कि मुझे माखन अच्छा नहीं लगता।' किसी दूसरे दिन माँको किसी और काममें व्यग्र देखकर फिर आप नवनीत चुराने पहुँच गये। माँ आकर देखती और पूछती है कि कृष्ण कहाँ है? यह सुनकर आप कहते हैं कि 'मैया, कंकणके पद्मराग-तेजसे मेरा हाथ जल रहा है, इसीलिये उसे नवनीतभाण्डमें छोड़कर शीतल कर रहा हूँ।' ऐसे मनोहर कर्णरम्य वचनोंको श्रवण करके माता कहती है—'आओ, वत्स! आओ, देखूँ तो तेरा हाथ कैसे तप रहा है?' कृष्ण हाथ फैलाते हैं। उसका चुम्बन करके माता कहती है—'सचमुच हाथ जल रहा है, यहाँसे पद्मरागको दूर करो।' मैया, मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों एक दिन पूर्ण-चन्द्रिकासे धौत अपने मणिमय प्रांगणमें व्रज-देवियोंके साथ गोष्ठी करती हुई व्रजरानी विराजमान थीं। वहाँ श्रीकृष्णने चन्द्रमाको देखा और पीछेसे आकर सिरसे खिसके हुए पटपर माताकी स्खलित वेणीको पकड़कर कहने लगे कि 'माँ, मैं इनको लूँगा।' बालकको गद्गद-कण्ठ देखकर माँ स्नेहार्द्रचित्त हो गयी और अपने पास बैठी हुई सखियोंपर दृष्टि डालकर कहने लगी कि 'तुम्हीं पूछो, यह क्या माँगता है?' विनय, प्रणय, स्नेहसहित वे पूछती हैं, 'बेटा, क्या क्षीर चाहते हो?' कृष्ण 'नहीं'। तब फिर क्या 'सुन्दर दधि ?' 'नहीं।' 'फिर क्या कूर्चिका ?' 'नहीं-नहीं।' 'तब क्या आमिक्षा?' 'अरे नहीं'। 'तब बेटा, क्या नवनीत लोगे?' 'उँहूँ।' 'तब फिर क्यों मचलते हो और माँको कुपित करते हो?' श्रीकृष्ण अँगुली उठाकर चन्द्रको दिखलाते हुए कहते हैं कि 'मैं तो वह नवनीत-खण्ड लूँगा।' किं क्षीरं न किमुत्तमं दधि न ना किं कूर्चिका वा न ना- मिक्षा किं न न किं तवेप्सितमहो हैयङ्गवीनं घनम्। दास्यामो न विषीद वत्स नतरां कुप्यस्व मात्रे गृहो- त्पनेनारुचिरित्युदङ्गुलिदलः शीतांशुमालोकयन् ॥ व्रजदेवियाँ कहती हैं कि अरे बेटा, यह नवनीत