भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

श्रीकृष्णकी बालक्रीडा २७ नहीं है, व्योमवीथी-तड़ागमें यह कलहंस है। कृष्ण— 'तब तो फिर इसीके साथ खेलूँगा, देखो कहीं भाग न जाय' ऐसा कहकर भूमिपर चरणयुगलोंको नचाते हुए बड़ी उत्कण्ठासे व्रजदेवियोंके कण्ठमें लिपट जाते हैं और कहते हैं—'मेरे लिये इसे ला दो।' जब वे बाल्यावेशसे रोने लगते हैं, तब कुछ व्रजदेवियाँ कहती हैं—'बेटा! इन लोगोंने प्रतारण किया है। यह कलहंस नहीं, पीयूष-रश्मि चन्द्रमा है।' इसपर कृष्ण फिर कहते हैं—'मैं उसीको खेलनेके लिये माँग रहा हूँ।' बालकको जोरोंसे रोते देखकर माँ गोदमें उठा लेती है और कहती है—'लाल, यह न राजहंस है, न चन्द्रमा; वह नवनीत ही है, पर दैवात् उसमें विष मिल गया है, उसे कोई खाता नहीं है।' कृष्णने उत्सुक होकर पूछा—'माँ, विष क्या होता है ? वह इसे कैसे लग गया ?' पूर्व आवेश छोड़कर रसान्तरको प्राप्त श्रीकृष्णकी कथा-श्रवणमें जिज्ञासा देखकर माता सोचती है कि चलो अच्छा ही हुआ। फिर आलिंगन करके मधुर स्वरमें कहती है—'बेटा, एक क्षीरसागर है।' झट कृष्ण पूछ बैठते हैं—'वह कौन है ?' माता उत्तर देती है—'जैसे यह दूध दिखायी देता है, वैसे ही दूधका समुद्र है।' पर बालकृष्णको इस उत्तरसे सन्तोष कहाँ ? वे फिर पूछते हैं—'माँ, कितनी गौओंके स्तनोंसे इतना दूध निकला कि समुद्र बन गया ?' यशोदा उत्तर देती हैं—'वत्स, वह गो-दुग्ध नहीं है।' यह बात बालककी समझमें नहीं आती है। वह कहता है—'बस रहने दे माँ, झूठी बातें मत बना। भला बिना गौओंके भी कहीं दूध होता है ?' इसपर हँसते हुए माँ कहती है—'बेटा, जिसने गौओंमें दूध रचा है, वही बिना उनके भी क्षीरसागर रच सकता है।' कृष्ण 'माँ, वह कौन है ?' माता 'वह भगवान् हैं, जो सब संसारके कारण हैं।' कृष्ण 'माँ, फिर भगवान् कौन हैं ?' माता 'वत्स, वे अजन्मा हैं।' इसपर कृष्ण चुप हो जाते हैं और यशोदा कथा आगे बढ़ाती है। 'बेटा, एक बार देवताओं और असुरोंके विवादमें असुरोंको मोहन करनेके लिये उन्हीं भगवान्ने क्षीरसागरका मन्थन किया था। वहाँ मन्दराचल मथानीका दण्ड और नागराज वासुकि रज्जु बने थे, जिसको एक ओरसे देवता और दूसरी ओरसे असुर खींचते थे।' इसपर कृष्ण बीचहीमें बोल उठे 'जैसे गोपांगनाएँ दधि मथती हैं।' 'हाँ' कहकर माता फिर कथा सुनाती है, 'क्षीरसागर मथनेपर उसमेंसे कालकूट नामका विष निकला।' कृष्ण 'दूधमें कहीं विष होता है ? वह तो माँ सर्पमें होता है।' माता—'अरे, सुन तो बेटा, देवताओंकी प्रार्थनापर उस कालकूट विषका भगवान् शंकरने पान किया। उस समय विषके जो बिन्दु गिर पड़े थे, उन्हींको पीकर भुजंग विषधर बन गये। यह उसी भगवान्की शक्ति है, जिससे दुग्धमें भी विष हो गया। यह नवनीत-खण्ड (चन्द्र) भी उसी क्षीरसागरके मन्थनसे निकला था, इसीलिये इसमें विषका अंश है। तभी तो लोग इसमें कलंक मानते हैं। इसके लिये हठ न करके घरका नवनीत खा लो बेटा!' यह कथा समाप्त भी न होने पायी थी कि भगवान् कृष्ण 'हूँ' 'हूँ' करते सो गये। नर्तन और वेणुवादन-लीला कभी व्रजदेवियाँ कहती हैं, 'हे कुलेश लाल, रे मोहन, बलिहारी जाऊँ नेक थि, थि, नाचो तो।' यह सुनकर ताल एवं लयसे भगवान् नाचते हैं। निर्मञ्छनं तव भजाम कुलेशलाल्य बाल्यातिमोहन बलानुज नृत्य नृत्य। इत्यङ्गनाभिरसकृत्थि थि थीत्थि थीत्ति क्लृप्तेन तालवलयेन हरिनर्नर्त॥ मुग्ध होकर जब व्रजांगनाएँ कहती हैं कि 'वाह, वाह, कितना सुन्दर नाच है', तब और नाचते हैं, परंतु जब वे सौष्ठव तथा स्खलनमें मुदित होकर हँसने लगती हैं, तब लज्जित होकर श्यामसुन्दर माँकी गोदमें भाग जाते हैं। कभी वे गोपियोंके कहनेपर माताके समीप वेणु बजाते हैं। 'निर्मञ्छनं तव नयामि मुखस्य तात वेणुं पुनर्ललन वादय वादयेति। ऊचुर्यदा स जननीजनकोपकण्ठे तं वादयन्नथ तदा सरसीकरोति।' श्रीकृष्णभगवान्की बाल-लीलाएँ अनन्त हैं। उनका वर्णन कहाँतक किया जाय। यह सारा विश्वप्रपंच उनकी लीला ही तो है।

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ) · पृष्ठ 29, कुल 778 में से · BharatKosha