भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ भक्तिसुधा भगवान्का मंगलमय स्वरूप भगवान् सर्वथा अनुपमेय भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके दिव्य मंगलमय विग्रहकी तापहारिणी अपारसौन्दर्यशालिनी कान्तिको चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर भगवान्का रूपसौन्दर्य अप्राकृत होनेसे प्राकृत चन्द्र उपमान वहाँ ठीक नहीं घटता। तथापि लोकमें सबसे अधिक पूर्णचन्द्र ही प्राणियोंके मनको हरण करनेवाला है। प्राकृत जनोंकी दृष्टिमें अन्य कोई अप्राकृत वस्तु नहीं आ सकती। इसलिये चन्द्रमाकी उपमा दी जाती है, पर एक चन्द्रमासे काम नहीं चलेगा। अनन्त कोटि चन्द्रोंकी कल्पना कीजिये और ऐसे अपार चन्द्रसागरका मन्थन करके जो सारातिसार तत्त्व निकले, उस तत्त्वको पुनः मथकर उससे जो सारातिसार तत्त्व निकले, इस प्रकार शतधा मन्थन करके जो सारातिसार चन्द्रतत्त्व निकले, उस चन्द्रका उपमान भगवान्में है। यह चन्द्रका उपमान भगवान्की उस तापहारिणी शीतल ज्योत्स्नामें है। उनके दुर्निरीक्ष्य तेजका वर्णन गीतामें हुआ ही है कि— दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (गीता ११।१२) अस्तु, भगवान्की शान्तिदायिनी शीतल ज्योत्स्ना सारातिसार तत्त्वरूप चन्द्रके समान है, पर चन्द्रमें कलंक है और चन्द्र क्षय-वृद्धिशील है। भगवान्की दिव्य ज्योत्स्ना अमृतमय सारातिसार चन्द्र-तत्त्वके समान है, वह निष्कलंक है, निर्विकार है, उससे भावुकोंको प्रतिक्षणवर्धमान प्रेम प्राप्त होता है। वह ऐसा अद्भुत सौन्दर्य है कि उस सौन्दर्य-सुधाका एक कण भी जो पान कर लेता है, उसकी पिपासा बढ़ती ही जाती है। जिसके नेत्र और मन भगवान्के एक रोमपर भी पड़े हों, वे उस एक ही रोमके सौन्दर्यपर इतने मुग्ध हो जाते हैं कि वहाँसे वे आगे बढ़ ही नहीं सकते। चंचला लक्ष्मी भी वहाँ आकर अचला हो जाती है, फिर औरोंकी बात ही क्या है? भगवान्के दिव्यातिदिव्य सौन्दर्यमें प्राकृत उपमान केवल इतना ही प्रयोजन सिद्ध करते हैं कि इनके द्वारा भगवत्सौन्दर्यका ध्यान करते-करते मन विशुद्ध हो जाता है और मनमें जैसे-जैसे विशुद्धि आती है, वैसे- वैसे भगवान्का जैसा वास्तविक रूप है, वह अचिन्त्य अप्राकृत मंगलमय दिव्यरूप भक्तके सामने प्रकट होने लगता है। भगवान्में केवल चन्द्रमाका ही उपमान नहीं, कारण भगवान् घनश्याम भी हैं, पर यह प्राकृत श्याम नहीं। उनकी श्यामतामें महेन्द्र नीलमणिकी उपमा दी जाती है, जिसमें दीप्तिमत्ता-विशिष्ट विलक्षण नीलिमा है। उस नीलिमामें ऐसी दीप्ति है कि वह अनन्त कोटि चन्द्रोंकी सम्मिलित दीप्तिमत्ताको तिरस्कृत करती है। इस दिव्य दीप्ति-सम्पन्न भगवन्मूर्त्तिरूप नीलकमलमें ऐसी सुकोमलता है कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत सुकोमलताकी मूर्ति श्रीलक्ष्मी भी उनके पाँवको स्पर्श करती हुई सकुचाती हैं कि हमारे हाथोंकी कठोरता इसके सुकोमल पाँवोंको कष्टदायक न हो। अनन्तकोटि कमलोंकी सारातिसार कोमलता इस कोमलताके पास भी नहीं आने पाती। ऐसे शीतल, ऐसे सुन्दर, ऐसे सुकोमल भगवान् इतने गम्भीर हैं कि नवीन नीरधरकी गम्भीरता अनन्तकोटिगुणित होकर भी उनका वास्तविक स्वरूप नहीं प्रकट कर सकती। भगवान्का केवल मुख ही चन्द्रोपम है—ऐसा नहीं, सर्वांग ही चन्द्रोपम है। वर्ण स्वभावतः कृष्ण है, दीप्तिसे अकृष्ण है—नीलिमागर्भित दीप्तिमत्ता है। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रह श्याम होते हुए भी अनन्तकोटि चन्द्रकी दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला है। महेन्द्रनीलमणि, नूतन नील नीरधर और नील सरोरुहकी जो उपमाएँ दी गयी हैं, उनसे बहुत-से विवक्षित अंश सूचित होते हैं। महेन्द्रनीलमणिसे दीप्तिमत्ता, चिक्कणता और दृढ़ता तथा नीलिमा