भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान्का मंगलमय स्वरूप २९ सूचित होती है; नूतन नीरधरसे नीलिमा, रस्यता, तापापनोदकता और गम्भीरता सूचित होती है और नीलसरोरुहसे नीलिमा, सुकोमलता, शीतलता और सौगन्ध्य सूचित होता है, पर ये महेन्द्रनीलमणि आदि सब प्राकृत हैं। इनसे यथार्थ-बोध नहीं होता, पर बोधके समीप पहुँचनेके लिये अन्य कोई उपाय नहीं है। प्राकृत तत्त्वोंसे ही अप्राकृतकी कल्पना कर लेनी है। इन सबसे अनन्तकोटिगुणित ये गुण भगवान्में हैं। भगवान्को देखकर वृन्दावनवर्त्ती मयूरवृन्द घनश्यामको श्याम घन जानकर नृत्य करते हैं। भगवान् जो वंशी बजाते हैं, वह मयूरवृन्दोंके लिये मानो मन्द-मन्द मेघगर्जन ही है। पर मेघ दूर होते हैं और यह मेघश्याम बिलकुल समीप है। परिच्छिन्न होते हुए भी इस मेघकी गम्भीरता ऐसी है कि उनके किसी भी अंगपर किसीके नेत्र पड़ जायँ तो वहीं उनकी टकटकी बँध जाय। आगे बढ़कर उनके सब अंगोंको देखनेकी भला किसमें सामर्थ्य ? व्रजांगनाएँ कहती हैं कि भगवान्के एक-एक रोमके सौन्दर्यको देखनेके लिये यदि हमारे एक-एक रोममें कोटि- कोटि नेत्र होते तो देख सकतीं और तब कह सकतीं कि यह परिच्छिन्न है या अपरिच्छिन्न। भगवान्के मंगलमय दिव्य अंगोंकी शोभा भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी गम्भीरता अपार है। किसीमें उसे ग्रहण करनेकी सामर्थ्य नहीं। यह घनश्याम श्याम घनसे विलक्षण घनश्याम है। श्याम घनमें जो विद्युत् होती है, ऐसी अनन्तकोटि विद्युतोंकी सम्मिलित द्युतिको तिरस्कृत करनेवाली इनकी कौशेयाम्बरदीप्ति है। श्याम घन जीवन (जल)- दाता है तो मनमोहन भी जीवनदाता हैं। श्याम घन जल बरसाता है, परंतु घनश्याम प्रेमामृत-आनन्दामृतकी वर्षा करते हैं। व्रजांगनाओंको हृच्छयाग्निसे दह्यमान होनेके कारण श्यामघनकी आवश्यकता थी। वेणुनिनादसे प्रेम-बीज बोया गया, पुलकावलिरूपसे वह अंकुरित हुआ, पर वह हृच्छयाग्निसे जलने लगा, अश्रुधाराएँ बहकर उसका सिंचन करने लगीं, पर उस उष्ण जलधारासे हृदयको वह शान्ति कहाँसे मिलती ? इसलिये उन्होंने जीवन-प्राप्तिके लिये इन नूतन नील जलधर श्याम घनकी शरण ली। भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहके सौन्दर्यादि गुणोंकी महिमा कैसे समझी जाय ? दिव्यातिदिव्य प्राकृत पदार्थोंको असंख्यगुणोपेत करके अपना काम करते-करते चित्त शुद्ध होकर भगवदीय अनुकम्पासे वास्तविक स्वरूपका हृदयमें प्राकट्य होता है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संस्पृष्ट अतसी- पुष्पकी श्यामता दूरसे दमदमाती हुई बड़ी ही मनोहर लगती है। इस मनोहर श्यामताकी शतकोटिगुणित कल्पना करो तो कुछ वैसी श्यामता भगवान्के दिव्य मंगलमय विग्रहकी है। सायंकालमें भी अतसी- पुष्पकी दीप्तियुक्त नीलिमा बड़ी मनोहर होती है। यह मनोहारिता शतकोटिगुणित होकर भगवान्की श्याम मनोहारिताकी कुछ कल्पना करा सकती है अथवा भ्रमरकी श्यामता लीजिये। भ्रमर दूरसे काला दीखता है, पर वह काला नहीं, उसमें बड़ी ही सुन्दर नीलिमा है। ऐसी मनोहर नीलिमा अन्य किसी प्राकृत पदार्थमें नहीं। व्रजांगनाओंने भगवान्की नीलिमाको मधुपकी नीलिमासे ही उपमित किया है और कहा है—हे मधुप, तुम भी मधुपतिकी तरह बड़े कपटी हो। भ्रमरके पीले पंख भी भगवान्के पीतपटका स्मरण दिलाते हैं और उसका मधुमय गुंजार भगवान्के मधुमय वेणुनिनादका या उनके मीठे-मीठे वचनामृतोंका स्मरण दिलाता है। जैसे भ्रमर जबतक रस है, तभीतक ही पुष्पोंसे स्नेह रखता है, नहीं तो भाग जाता है, वैसे ही भगवान् भी रसके ग्राहक हैं, रस नहीं तो भगवान्से भेंट कहाँ ? अस्तु। भगवान्की श्यामता शतकोटिगुणित मधुपकी श्यामतासे तथा भगवान्की दीप्तिमत्ता चन्द्रसिन्धुके सारातिसार तत्त्वका मन्थन करके प्राप्त चन्द्रतत्त्वकी दीप्तिसे कथंचित् उपमित की जा सकती है। कल्पनासे इस प्रकार भगवदीय दिव्य मंगलमय विग्रहको पदाम्बुजसे मुखाम्बुजतक अथवा मुखाम्बुजसे पदाम्बुजतक देख जाइये।