भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनःकल्पित अनन्ततेजःपुंजके भीतर अनुसन्धान कीजिये अथवा बालसूर्यमें मन और दृष्टिको स्थिर करके देखिये। भगवान्का श्रीमुखचन्द्र चन्द्रवत् वर्तुलाकार दिव्य विकसित अति विलक्षण अरविन्द है, चन्द्रमाके समान दीप्तिमान् वर्तुलाकार मुखारविन्द समुचित तारतम्यके साथ नतोन्नत भावसहित है। इसकी मनोहारिता अत्यद्भुत है। चन्द्रवत् वर्तुलाकार विकसित सुकोमल मुखाम्बुज सारातिसार चन्द्रतत्त्वकी दीप्ति और शतकोटिगुणोपेत भ्रमरनीलिमासे युक्त अति विलक्षण है। यह सम्मिलित समस्त मुखाम्बुज है। यह मन्दहासोपेत दिव्य मुखाम्बुज ऐसा शोभित होता है मानो दिव्यातिदिव्य चन्द्रतत्त्व नीलकमलमें छिपना चाहता है—छिपता है और फिर-फिर प्रकट होता है। यह हास भगवान्के ‘अनुग्राह्याह्वयस्थेन्दुसूचक- स्मितचन्द्रिकः’ अनुग्रह नामक हृदयस्थ चन्द्रकी चन्द्रिका है। अनुग्रहरूप चन्द्रकी ये तापहारिणी किरणें खिन्नातिखिन्न भावुकोंको समाश्वासन दिलाती हैं कि घबराओ मत, अनुग्रहाख्य चन्द्रका यहाँ निवास है। यह समाश्वासन—यह दिव्य आशा ही भावुकोंको उनकी थकावट और खिन्नताको दूर करके आगे बढ़ाती है। आशाबन्ध ही भक्ति-मार्गका मूल है। यह आशा—भगवत्सान्निध्यकी यह तृष्णा अद्भुत है, यह कैवल्यसे खरीदी जाती है। भगवान्का उदार हास ‘शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम्’ शोकाश्रु- सागरोंको सोख लेनेवाला है। बहुल हास जब मुखारविन्दमें प्रादुर्भूत होता है, तब वह ‘हारहासः’ हास हारके समान होता है—कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्ति दिव्यातिदिव्य महेन्द्रनीलके सदृश वक्षःस्थलपर हारवत् प्रतिबिम्बित होती है। यह हारहास अरुणिमा- विशिष्ट है—स्वच्छातिस्वच्छ होता हुआ भी किंचित् अरुण है। यह अधरकी अरुणिमा दन्तपंक्तिमें प्रतिबिम्बित है—जैसे जवाकुसुमके सकाशसे स्फटिक लोहित हुआ हो। यह अरुणिमा-विशिष्ट कुन्दकुद्मलके समान दशनपंक्तियुक्त हास्य दिव्य हारके समान शोभित होता है। कपोल और चिबुक अपने दिव्य सौन्दर्यसे मानो यही कह रहे हैं कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डके सारातिसार सौन्दर्यका परमोद्गम-स्थान यही है। यही अचिन्त्य सौन्दर्यसुधानिधि है, जिसका केवल एक कण अनन्तकोटि ब्रह्माण्डमें विस्तीर्ण है। बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट विकसित कमलका अग्रोर्ध्व-भाग जैसे स्वच्छतामय होता है, वैसे कपोल और चिबुकपर इस नील विकसित मुखाम्बुजकी दीप्तिमत्ता अन्य अंगोंकी अपेक्षा कुछ विशेष है। नीलकमलके केशरका सान्निध्य छोड़कर जो नीलिमायुक्त अंश हैं, वे बालसूर्यकी सुकोमल किरणोंसे संसृष्ट होकर अधिक दीप्त होते हैं, वैसे ही भगवान्के कपोल और चिबुक विशिष्ट दीप्तिमत्ता-सम्पन्न हैं। विशाल मस्तकपर शोभायमान दिव्य किरीटकी जगमगाती हुई दिव्य कान्ति इन उन्नत अंगोंपर—उच्च स्थल पाकर—अधिक मात्रामें अवतीर्ण और विस्तीर्ण हो रही है तथा वह सौन्दर्य-सुधा उभय कपोलप्रान्तसे भी अधिक चिबुकपर आकर परम विकसित और मनोरम हुई है। भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमा अरुण कमलके समान प्रभुके दिव्य नेत्रोंके सम्बन्धमें ऐसा ध्यान है कि कपोलप्रान्त जैसे-जैसे नेत्रोंके सन्निहित हैं, वैसे-वैसे उनमें अधिकाधिक विशिष्ट दीप्तिमत्तायुक्त अरुणिमा है और कपोलाभिमुख नीचेकी ओर क्रमशः दीप्तिविशिष्ट नीलिमा है और अरुणिमाकी न्यूनता है। खास नेत्र अरुण हैं; यहाँ स्वच्छता और अरुणिमा मानो अरुणिमारूप रजसे भगवान् अपने भावुकोंके अभीष्टका सृजन और स्वच्छतारूप सत्त्वसे पालन करते हैं। नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका ऐसा तारतम्य है कि अनुकम्पा, राग आदि मानस विकृतियोंकी जहाँ अभिव्यक्ति है, वहाँ अरुणिमा अधिक होती है और जहाँ रागादिरहित प्रसन्नता है, वहाँ स्वच्छता अधिक होती है। कोपादि तापक भावोंसे अरुणिमाकी अधिक वृद्धि होती है।