भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान्का मंगलमय स्वरूप ३१ कोई अरुणिमा अग्निसदृश है, व्रजांगनाओंके स्वच्छातिस्वच्छ नेत्रोंमें जो अरुणिमा है, वह हृच्छयाग्निकी अरुणिमा है। उसीकी शान्तिके लिये वे भगवान्के नीलपादाम्बुजकी नीलरजका अंजन लगाती हैं। भगवान्के नेत्रोंमें कमलकोशकी-सी अरुणिमा है और उनके विशाल नेत्र कर्णप्रान्तपर्यन्त दीर्घ हैं। इनकी कल्पना भावुक ही कर सकते हैं। भगवान्के नेत्रोंकी अरुणिमाके साथ कमलकोशगत अरुणिमाका सादृश्य देखकर 'गोपीगीत' में ऐसी कल्पना की गयी है कि भगवान् मानो इस अरुणिमारूप दिव्यातिदिव्य श्रीको दिव्यकमलोंके सम्राट्के अभेद्य दुर्गको भेदकर अति सुरक्षित अति गुप्त कोषसे चुरा लाये हैं— शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमूषा दृशा। सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।२) दिव्यातिदिव्य कमलसम्राट्को यह पूरी खबर थी कि ये चोरजारशिखामणि एक-एक अंग चोरी करनेवाले हैं। यह कहीं मेरी श्री न हर लें, जो सर्वोत्कृष्ट है। इस भयसे यह पंकजसम्राट् जलमें जाकर रहे। पर जलमें श्रीकृष्ण कहीं जलक्रीड़ा करने आ जायँ, इसलिये उन्होंने जलमें भी ग्रीष्मऋतुका परित्याग करके शरन्निवास ही ग्रहण किया और इस शरत्कालीन जलाशयमें भी अपने-आपको छिपानेके लिये अपने चारों ओर अनन्त कमल उत्पन्न करके उनका पहरा बैठा दिया। इन कमलसैनिकोंकी रक्षाके लिये प्रत्येकको शत-शत पत्र तथा नाल और नालोंमें काँटे देकर ऐसा जलदुर्ग निर्माण किया कि कहींसे कोई घुस न सके। फिर ऐसे अभेद्य दुर्गके बीच चारों ओरसे सुरक्षित स्थानमें आप जा विराजे। फिर भी श्रीको श्रीकृष्ण ले तो नहीं जायँगे, यह भय बना ही रहा। इसलिये उस श्रीको उस पंकजसम्राट्ने स्वयं चारों ओरसे सुरक्षित होकर भी अपने कोश-स्वरूप उदरमें छिपा रखा, जैसे कोई कृपण अपने धनको छिपा रखता है, पर भगवान् ऐसे चतुर चोर-चक्रवर्ती कि उनके नेत्रारविन्द वहाँसे भी उस कमल-कुलपतिकी परम दुर्लभ सम्पत्तिको चुरा ही ले आये। यह चोरी भगवान्की इतनी अद्भुत और भावुकोंके लिये इतनी मधुर है कि गोपियाँ बड़े प्रेमसे इसके गीत गाती फिरती हैं। तभी तो भावुकोंने कहा है—'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥' अस्तु, पद्मगर्भारुणेक्षण भगवान्के इन 'पद्मगर्भारुण' नेत्रोंमें स्वच्छता और अरुणिमाका अद्भुत पारस्परिक सम्मेलन है और नेत्रान्तःपाती जो तारक हैं, वे श्याम हैं। इस प्रकार नेत्रारविन्दमें त्रिवेणी संगम हुआ है। यही संगम कुछ विलक्षण रूपसे नेत्रोंकी पलकोंमें भी हुआ है; पलकें अत्यद्भुत दीप्तियुक्त नीलिमा ली हुई हैं और किंचित् अरुणिमाका भी इनमें योग हुआ है। ऐसे दिव्य विशाल नेत्र कर्णप्रान्ततक विस्तीर्ण हैं। भगवान्की दिव्य नासिकाकी शोभा दोनों नेत्रोंके मध्यसे नीचेकी ओर ऊर्ध्वोन्मुख उन्नत दिव्य नासिका कीरतुण्ड-सी शोभा पा रही है। जिसकी दीप्ति दिव्य गण्डस्थलकी-सी ही जगमगा रही है। नासिकामें एक वर-मौक्तिक भी सुशोभित है। नासिकाकी दीप्तियुक्त नीलिमा होठोंकी विलक्षण अरुणिमासे मिलकर अति विलक्षण मनोहारित्व व्यक्त कर रही है। कुन्दकुडमलकी-सी दिव्य दशन- पंक्तिकी स्वच्छता अरुण अधरोंपर और अधरोंकी अरुणिमा दिव्य दशन-पंक्तिपर प्रतिबिम्ब होकर एक बड़े ही दिव्य आदान-प्रदानका भाव दिखा रही है। अधरोंसे बढ़कर शोभा और किसीकी नहीं। सकल- सुधानिधि भगवान्की यह दिव्य अधरसुधा है। व्रजांगनाओंका इसीपर सबसे अधिक प्रेम है। यह पीतिमा दिव्य मकराकृत कुण्डलद्वयसे आकर यहाँ झलक रही है। ये कुण्डल अद्भुत दीप्ति-सम्पन्न हैं और यह दीप्ति पीतिमा लिये हुए है। गोस्वामी तुलसीदासजी 'रामगीतावली' में भगवान्के चंचल कुण्डलद्वयकी दीप्तिमत्ता, शोभा और चंचलताका वर्णन करते हैं कि ये दोनों कुण्डल शुक्र और गुरुसे चमक रहे हैं। इनकी चंचलता यह बतलाती है कि