भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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३२ भक्तिसुधा ये भगवान्‌के मुखचन्द्र-रूप चन्द्रमाको मध्यस्थ करके कोई विलक्षण शास्त्रार्थ कर रहे कुण्डल अत्यधिक देदीप्यमान हैं और इनके सुवर्णशरीरमें दिव्यातिदिव्य नानाविध रत्न जड़े हुए हैं। ये मकराकृत हैं—मानो मकरध्वज (काम)-को लड़कर जीतनेके लिये ही कुण्डलोंने यह आकार धारण किया है। भगवान्‌के मधुर मन्द हास्ययुक्त मुखारविन्दकी शोभा भगवान्‌का मधुरमन्दहासोपेत कटाक्षयुक्त दिव्या- तिदिव्य मुखारविन्द नेत्रवालोंका परम सौख्यमय विश्राम- स्थान है। नन्दनन्दन श्रीवृन्दावनचन्द्रका यह मुखारविन्द भगवान्‌के वदनारविन्दका सौन्दर्य-सौन्दर्याधिकरण, यहाँ एक-दूसरेसे भिन्न नहीं, पर यह सौन्दर्य-माधुर्यमय परम रस ही है। भगवान्‌का वक्षःस्थल साक्षात् श्रीका निवास है, मुखारविन्द नेत्रवालोंके नेत्रोंका रससुधा- पानपात्र है, भुजाएँ लोकपालोंके बलका आश्रयस्थान और पदाम्बुज सारतत्त्वके गानेवालोंका परम राग है। श्रियो निवासो यस्योरः पानपात्रं मुखं दृशाम्। बाहवो लोकपालानां सारङ्गाणां पदाम्बुजम्॥ (श्रीमद्भा० १।११।२६) भ्रुकुटी बंक है, नेत्रोंमें भी कुछ बंकपन है, वे तो मानो कामके धनुष ही हैं। दोनों भौंहोंमें नीलिमाकी कुछ विशेष चमचमाहट है। कन्दर्पका दर्पदमन करनेके लिये ही मानो यह धनुष सम्हाला है। कन्दर्प तो व्रजांगनाओंका ही सौन्दर्य देखकर सम्मोहित हो धनुष-बाण छोड़ अचेत गिरा था, अधोक्षज भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके मुखारविन्दतक उसकी पहुँच कहाँ? भगवान् अधोक्षजके जो भावुक हैं, उन्हींके समीप कन्दर्पका कोई चारा नहीं चलता। वहाँ चराचरके चलानेवाले चितचोरके सामने उसकी क्या चले—वहाँतक तो वह पहुँच भी नहीं सकता। रास्तेमें भावुकोंसे ही पछाड़ खाकर मूर्च्छित हो जाता है। भगवान्‌के सुविस्तीर्ण ललाटमें कुंकुम-कस्तूरी- मिश्रित चन्दन-तिलककी दो रेखाएँ ऐसी शोभा पा रही हैं, जैसे विद्युत्की दो लकीरें अपनी चंचलताको त्यागकर ललाटमेघमें विराम कर रही हों। भगवान्‌के दिव्य किरीटमें नील, रक्त, शुभ्र, हरित आदि विविध वर्णोंकी नानाविध दिव्यातिदिव्य मणियाँ जड़ी हुई हैं, जिनकी सुसम्मिलित वर्णोंकी दिव्य अतिरंजित आभा, उस किरीटपर अर्द्धचन्द्रवत् विस्तीर्ण दिव्य मौक्तिकमालाओंकी अद्भुत दीप्ति और दिव्य ललाटकी सुषमामयी नीलिमा—ये सब दिव्यातिदिव्य आभाएँ मिलकर एक अति विलक्षण शोभाको प्रस्फुटित कर रही हैं। भगवान्‌के मस्तक और कपोलोंपर स्निग्ध कुंचित नील अलकावली विलसित हो रही है। ये कृष्णकेश मानो दिव्यातिदिव्य चन्द्रके अमृतके लोभसे काले नागके बच्चे हैं। यदि यह मुखचन्द्र मुखारविन्द है तो ये नीलकेश नील भ्रमर हैं, जो यहाँ दिव्यातिदिव्य सौन्दर्यमय मकरन्दपानकी आशा लगाये मँडरा रहे हैं। ये दिव्य अलकें नित्यमुक्त सनकादि मुनिगण हैं, जो भगवान्‌के दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यका यहाँ नित्य समास्वादन कर रहे हैं। किरीटके मुक्तामाल भी ऐसे ही मुक्त परमहंसोंकी परम पावन पंक्तियाँ हैं। भगवान्‌के दिव्य मंगलमय विग्रहके सारे ही तत्त्व दिव्य हैं, कोई भी प्राकृत नहीं। कुण्डल सांख्य और योग हैं, वनमाल मायातत्त्व हैं, पीतपट छन्द है, किरीट पारमेष्ठ्यपद है, मुक्ताफल मुक्त हैं। मुक्त पुरुष ही अलकें बनकर भगवान्‌की इस लीलामें भगवदीय दिव्य अंग बने हैं। ये अलकें जो मुखपर आ-आकर लौटती और फिर आती हैं, ऐसी प्रतीत होती हैं, जैसे भ्रमर इस दिव्य मुखारविन्दके सौरभसे खिंचे चले आते हैं, पर पास आकर उसके दिव्यातिदिव्य तेजको न सहकर लौट जाते हैं, पर मुखारविन्दका ऐसा विलक्षण आकर्षण है कि फिर-फिरकर फिर खिंचे ही चले आते हैं। ये काले भ्रमर जब मकरन्दपानके लोभसे अरुण अधरोंके समीप आते हैं, तब उनकी श्यामता पीछे ही छूट जाती है और अधरोंकी अरुणिमाका रंग इनपर चढ़ जाता है। ये लाल-से हो जाते हैं और ये ही जब गण्डस्थलके समीप आते हैं तब नील हो जाते हैं। मन्दस्मित चन्द्रिकासे इनमें