भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान्का मंगलमय स्वरूप ३५ मिलकर ऐसी शोभा उत्पन्न करते हैं, जिसका शब्दोंद्वारा वर्णन नहीं हो सकता। उसका समास्वादन तो भावुकोंको ही होता है। दिव्य सौन्दर्यसम्पन्न मुखाम्बुज तो मुखाम्बुज ही है, भगवान्के दिव्य करोंकी छटाको भी कोई लेशमात्र ही देख ले तो उसके दुःखगर्भ सारे सांसारिक सुख ही छूट जायँ। इस प्रसंगमें श्रीराधावल्लभजीके मन्दिरमें एक वेश्यासक्त राजकुमारकी कथा प्रसिद्ध है। यह राजकुमार इतना वेश्यासक्त था कि उस वेश्याका एक क्षणके लिये भी विरह नहीं सह सकता था। वेश्या सामने न हो तो वह खा-पी नहीं सकता था और न कोई काम कर सकता था। उसकी वेश्यासक्ति छुड़ाकर उसे भगवद्भक्ति प्राप्त करा देनी चाहिये, ऐसी अनुकम्पा सम्प्रदायके आचार्यश्रीके हृदयमें हुई। उन्होंने राजकुमारको अपने यहाँ लिवा लानेका प्रबन्ध किया। बिना वेश्याके राजकुमार भगवान्के मन्दिरमें भी नहीं जा सकता था। इसलिये आचार्यश्रीने उसे वेश्याके साथ ही आनेकी अनुमति दी। वेश्याके साथ, वेश्याका ही मुँह निहारते हुए, राजकुमार पधारे और श्रीभगवान्के मन्दिरमें भी ऐसे बैठ गये कि उनके सामने तो वेश्या थी और वेश्याके पीछे श्रीभगवान्की दिव्य मंगलमय मूर्तिको राजकुमार नहीं देख सकते थे। आचार्यश्रीने वेश्याको राजकुमारके सामने ही रहने दिया, पर ऐसा उपाय किया कि वेश्याके पीछेसे भगवान्का करारविन्द इनकी दृष्टिमें आ जाय। यहाँ भक्तपरवश भगवान्ने आचार्यश्रीकी इच्छाके अनुसार अपने करारविन्दमें वह सौन्दर्य प्रकट कर दिया कि वह वेश्यासक्त क्षणमात्रमें भगवदासक्त हो गया। वेश्याको देखते- देखते ही वेश्याके पीछे चमकते हुए करारविन्दपर इसकी जो दृष्टि पड़ी तो सदाके लिये वहाँ गड़ ही गयी। करारविन्दके उस सौन्दर्यको देखते ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका मदन-सौन्दर्य अधोभूत हो गया। अधोक्षज भगवान्के करारविन्दकी दिव्य छटाने राजकुमारको सदाके लिये अपने वशमें कर लिया। भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य भगवान्का दिव्यातिदिव्य सौन्दर्य-माधुर्य ऐसा ही है कि एक क्षणके लिये भी उस सौन्दर्य-माधुर्यका लेशमात्र भी किसीपर प्रकट हो जाय तो फिर वहाँसे वह लौट नहीं सकता। इस सौन्दर्य-माधुर्यकी स्फूर्ति भगवान्की अनुकम्पासे विशुद्धातिविशुद्ध अन्तःकरणमें ही होती है। भगवान्की अनुकम्पा जीवको दो प्रकारसे प्राप्त होती है, एक तो अपने साधनसे जैसे ध्रुवको प्राप्त हुई और दूसरे भगवान्की अपनी दयामयी इच्छासे जैसे राजा परीक्षित्को गर्भमें ही प्राप्त हुई। श्रीभगवान्के गलेमें अनेकविध दिव्य वन्यपुष्पोंके स्तबकादिसे युक्त दिव्य सौगन्ध्यमय मालाएँ हैं। उनपर फिर कोटि-कोटि विद्युतोंकी चंचल दीप्तिको तिरस्कृत करनेवाला सुवर्णोज्ज्वल चंचल पीतपट ऐसा उल्लसित हो रहा है, जैसे महेन्द्रनीलमणि पर्वतपर दिव्य विद्युत्-पुंज चमचमा रहा हो और उसमेंसे दिव्य मंगलमय विग्रहकी नीलिमा-दीप्ति भेदकर बाहर निकल रही हो। उज्ज्वल-नीलिमा-सम्पन्न वक्षःस्थलपर सुवर्णो- ज्ज्वल मंगलमय वामावर्त और दक्षिणावर्त रोमराजि दीख रही है। यहीं तो चपला चंचला श्रीमहालक्ष्मीका निवास है। भगवान्को भक्तोंने जो मालाएँ पहनायी हैं, वे लक्ष्मीजीको गड़ती हैं, पर भक्तोंपर आदर दिखानेके लिये भगवान् उन मालाओंको पहने ही रहते हैं और सपत्नीजन्य दुःख लक्ष्मीजीके पीछे लगा ही रहता है। गलेसे लेकर पादाम्बुजतक लटकनेवाले पुष्पहारोंके मध्यमें जो तुलसिका है, उसका तो भगवान् इतना आदर करते हैं कि लक्ष्मीजीसे वह देखा नहीं जाता। पादाम्बुजमें अवश्य ही लक्ष्मीजी तुलसीके साथ रहनेमें सुखी हैं, परंतु वक्षःस्थलपर नहीं; उसपर तो लक्ष्मीजी अकेली ही रहना चाहती हैं। वक्षःस्थलके मध्यमें भगवान् भृगु-चरण धारण किये हैं और लक्ष्मीजीसे मानो यह कह रहे हैं कि महालक्ष्मी ! यहाँ जो तेरी स्थिति है, वह ब्राह्मणके चरणसे ही है। यह हृदय 'हताहंस' होनेके कारण ही चंचला लक्ष्मी यहाँ