भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ भक्तिसुधा
अचला है। भगवान्के वक्षःस्थलपर रहनेवाले ब्राह्मणचरण और महालक्ष्मी दोनों ही एक स्वरसे मानो यह कह रहे हैं कि जहाँ ब्राह्मणोंके चरणोंकी रज पड़ेगी, वहीं चंचला लक्ष्मी स्थिर हो जायगी। लक्ष्मी वहाँ नहीं ठहरती, जहाँ ज्ञान, विद्या, तप आदि नहीं हैं; क्योंकि ज्ञान, विद्या, तप, भूति आदि लक्ष्मीके ही रूप हैं। अर्थात् श्रीभगवान् मानो यह सूचित करते हैं कि जहाँ ब्राह्मण-चरण निवास करेंगे, वहीं श्रीनिवास होंगे और वहीं सकल प्रकारकी श्रीका निवास होगा। भगवान्के दिव्यातिदिव्य कमलसे सुकोमल वक्षःस्थलमें ब्राह्मणके चरण कठोर नहीं प्रतीत हुए। उलटे भगवान्को यह क्लेश हुआ कि इस वक्षःस्थलकी कठोरतासे भृगुमहाराजके सुकोमल चरणोंमें कुछ चोट तो नहीं आयी। कारण, लक्ष्मीका जहाँ निवास होता है, वहाँ हृदयमें कठोरता आ जाती है। ब्राह्मण इस कठोरतापर पैर देकर भगवान्की स्तुति करते हैं, यही ब्राह्मणोंका ब्राह्मणत्व है। यह कठोरतारूप-अंहस भृगु-चरणोंसे धुला है और जहाँ कहीं यह अंहस है, वहाँ वह ब्राह्मणचरणोंसे ही धुल सकता है और महालक्ष्मीजीका जो दिव्यातिदिव्य सुकोमल भाव है, वह प्रकट हो सकता है। इस दिव्य मंगलमय विग्रहरूपमें अचिन्त्यानन्त ब्रह्मानन्द-सुधासिन्धुस्वरूप परमतत्त्व भगवान् ही श्यामीभूत होकर प्रकट हुए हैं। इनके गलेमें वक्षःस्थलपर गुंजाहार पड़ा हुआ है। ये गुंजाएँ कोई प्राकृत गुंजाएँ नहीं हैं, ये सब परम तपस्वी महामुनि हैं, जिन्होंने इस पुण्यारण्य वृन्दावनधाममें भगवदीय लीलामें योग देनेके लिये गुंजारूप धारण किया है। यहाँ मयूरपिच्छादिको भी भगवान्ने अपना दिव्यातिदिव्य धाम दिया है। इस वृन्दावन लीलाधामकी विलक्षण महिमा है, जिसे देखकर ब्रह्मा भी यहाँ 'गुल्मलताौषधी' बनकर निवास करनेकी इच्छा करते हैं। वामावर्त और दक्षिणावर्त उभय रोमराजियोंके मध्यमें ये भृगुचरण हैं। इनपर वक्षःस्थलमें जो दिव्य मालाएँ पड़ी हैं, उनसे भगवदीय अष्टगन्धसौगन्ध्यसे अतिमत्त हुए भ्रमरोंकी मधुर झंकार निकल रही है। नाभिप्रदेशमें अति सुन्दर मनोहर तीन रेखाएँ (त्रिवलि) हैं और मध्यमें यह दिव्य मनोहर सरोवर श्यामसलिला कालिन्दीका अति विलक्षण आकर्षणवाला भँवर-सा सोह रहा है। इसीसे तो सारे ब्रह्माण्डका प्रादुर्भाव हुआ है। भगवान्की भुजाएँ, भावुकोंकी कल्पनाके अनुसार दो भी हैं और चार भी। इनका गठन कैसा सुन्दर और कैसा गोल! और घुमाव, चढ़ाव तथा उतार भी अत्यन्त मनोहर! सर्वांगके समान इनपर भी कुंकुम- कस्तूरी-मिश्रित हरिचन्दनका शुभ्र लेप है। भुजाओंकी दीप्ति-विशिष्ट नीलिमा, हरिचन्दनकी शुभ्रता और करारविन्दके अन्तर्भागोंकी अरुणिमा-तीनों मिलकर नखमणि-ज्योतिके घाटपर कैसा दिव्य मनोहर गंगा- यमुना-सरस्वतीका संगम साध रहे हैं। इन दिव्य मनोहर भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित हैं। शंख जलतत्त्व है, कौमोदिकी गदा ओजतत्त्व है, सुदर्शन चक्र तेजस्तत्त्व अथवा यदि खड्ग देखें, तो नभस्तत्त्व है। भगवान्के कटितटकी शोभा भगवान्के दिव्य कटितटमें काँची (मेखला) है, जिसकी कई लड़ें हैं। कटितटसे गुल्फपर्यन्त पीताम्बर परिधान धारण किये हैं, जो अति सूक्ष्म और दिव्य है। उसमेंसे भगवान्की नीलकान्तिदीप्ति स्पष्ट ही उद्भासित हो रही है। पीतपटसे समाच्छन्न भगवदीय दीप्तिमत्ता और नीलिमासे युक्त वह नानाविध रत्नोंसे जटिल मुक्तामध्य मेखला नितम्ब-बिम्बपर आकर अत्यधिक सुशोभित हो रही है। काँचीकी बड़ी मधुर झनझनाहट है। भगवान् यहाँ ज्ञानमुद्रावाले परम शान्त गम्भीर पुरुष नहीं हैं। यहाँ तो चंचल चपल त्रिभंगी छविवाले वंशीधर श्रीकृष्ण हैं, जिनकी चंचलता व्रजांगनाओंके अंचल पकड़नेमें भी नहीं चूकती। वाह री! वह कामजित् दिव्य चंचलता, जिसको सम्बोधनकर चंचलताको प्राप्त व्रजांगना परम रसरसिकोंके विनोदार्थ