भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

ही मानो यह कहती है कि—‘मुञ्चाञ्चलं चञ्चल पश्य लोकं बालोऽसि नालोकयसे कलङ्कम्। भावं न जानासि विलासिनीनां गोपाल गोपाल- नपण्डितोऽसि॥’ भगवान्ने किसी व्रजांगनाका मानो अंचल पकड़ा। उसपर व्रजांगना ठिठककर कहती है कि ‘अरे चंचल ! मेरा अंचल क्यों पकड़ा है ? छोड़, छोड़; लोग देखेंगे तो तुझे या मुझे क्या कहेंगे ? लोकलाजका तुझे कुछ ध्यान नहीं, तू कैसा गँवार है ?’ इसपर भगवान्ने उस व्रजवनिताका अंचल छोड़ दिया और दूसरी ओर देखने लगे। तब व्रजांगना कहती है—‘आखिर तू है वही गौएँ चरानेवाला चरवाहा! तू विलासिनियोंका भाव क्या समझे ? ‘गोपाल! गोपालनपण्डितोऽसि’—गोपाल! तू गोपालनका ही पण्डित है।’ अथवा ‘गोपाल! गोपाल! न पण्डितोऽसि!’ अरे गोपाल ! इधर तो देख ! तू तो कुछ समझता ही नहीं। इस दिव्य चांचल्यकी लीलासे मुग्ध होकर जो इस गोपालन-पण्डित गोपालबालके निष्कलंक दिव्य क्रीडनमें अनन्य होकर सम्मिलित हुए, वे ही संसारमें धन्य हुए। अन्योंके लिये तो यहाँ झाँकना भी निषेध है। भगवान्के ऊरु कदलीस्तम्भ-से कहे जाते हैं। कदलीस्तम्भोंमें जो स्थूलता-सूक्ष्मताका तारतम्य तथा जो चिक्कणता होती है, वही यहाँ विवक्षित है। यहाँ भी वही दीप्तिविशिष्ट नीलिमा है, जो पीताम्बरकी मनोहर पीतिमाको भेदकर बाहर निकल रही है। श्रीभगवान्के अतसिका-कुसुमके-से उज्ज्वल नील ऊरुद्वय श्रीगरुड़जीके स्कन्धोंपर अति शोभायमान हो रहे हैं। यह गरुड़जी साक्षात् ऋक्, साम, यजुः- स्वरूप शब्दब्रह्म हैं, जिनपर शब्दातीत अशेष विशेषातीत सच्चिदानन्दघन अक्षर परब्रह्म परमात्मा अधिष्ठित हैं— ‘त्रिवृद्वेदः सुपर्णाख्यो यज्ञं वहति पूरुषम्॥’ (श्रीमद्भा० १२।११।१९) भगवान्के वाम स्कन्धके ऊपर दक्षिण स्कन्धके नीचे कटितटतक वर्तुलाकार त्रिवृत सुवर्णोज्ज्वल पीत यज्ञोपवीत सुशोभित है। यह ब्रह्मसूत्र एकाक्षर प्रणव है, जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डका मूलसूत्र है। भगवान् जो केवल सविशेष नहीं, केवल निर्विशेष भी नहीं, प्रत्युत सविशेष-निर्विशेष दोनों मिले हुए पूर्ण परब्रह्म हैं, वही इस मंगलमय विग्रहरूपमें प्रकट हुए हैं। गरुड़, शेष तथा शंख-चक्रादि अंग जो इस लीलाविग्रहमें प्रकट हैं, वे भी उनके पूर्ण परब्रह्म स्वरूपमें अभिन्नरूपसे अन्तर्गत हैं। सांगोपांग परम भगवत्तत्त्व ही इस लीलामय विग्रहमें प्रादुर्भूत है। इस लीलामय विग्रहकी स्थिति अव्याकृतमें है। कुछ आचार्योंका ऐसा मत है कि यहाँ भी उनका निवास अक्षर ब्रह्ममें है। परब्रह्मके अक्षर रूप तीन हैं—(१) माया, (२) मायाविशिष्ट चैतन्य और (३) परात्पर पूर्णब्रह्म। अव्याकृत मायाविशिष्ट चैतन्य ही शेष भगवान् हैं, उन्हींमें श्रीभगवान्का निवास है— ‘अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठितः।’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) तमोरजोलेशसे असंस्पृष्ट, महावाक्यजन्य ब्रह्माकारा वृत्तिरूपमें परिणत विशुद्ध सत्त्व ही कमल है—‘धर्मज्ञानादिभिर्युक्तं सत्त्वं पद्ममिहोच्यते॥’ (श्रीमद्भा० १२।११।१३) ओजः तत्त्व गदा है, अप्‌तत्त्व शंख है, तेजस्तत्त्व सुदर्शन है और नभोनिभ कृपाण नभस्तत्त्व है। भगवान्के जानुद्वय श्रीमहालक्ष्मीके अति सुकोमल अरुण कर-कमलोंसे लालित हैं। गुल्फोंमें अनेकविध आभूषण और रत्नजटित नूपुर हैं, जिनकी झंकारसे त्रिभुवन आह्लादित होता है। आत्मज्योतिविग्रह कौस्तुभमणिसुशोभित उज्ज्वल-नील कण्ठदेशसे गुल्फप्रदेशपर्यन्त नील पदारविन्द-पारदर्शी उज्ज्वल पीतपट उभय पार्श्वमें विद्युल्लताओं-सा चमक-दमक रहा है और उसका नानाविध रत्नोंसे जटिल किनारा अपनी रंग-बिरंगी छटा उसमें मिलाकर एक अति विलक्षण शोभा उत्पन्न कर रहा है। उसे देख-देखकर भावुक अपने नयनोंकी आस पूरी करना चाहते हैं, पर भगवदीय दिव्य-मंगलमय विग्रहकी यह सारी शोभा अनन्त और नित्य नवीन होनेसे सदा ही उस सौन्दर्य- सुधारस-पानकी प्यास अधिकाधिक बढ़ानेवाली है।