भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
४. चतुर्थ तरंग: नाम-महिमा, अनन्यता, शरणागति एवं भक्ति सुधा उपसंहार
५८६ भक्तिसुधा कुछ लोग कहते हैं कि भक्तकी भावना ही भगवान् है। भक्तकी भावना बहुत प्रधान है, भक्त- भावनाके अनुसार भगवान् अपना रूप बनाते हैं, केवल भावना ही भगवान् नहीं है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भक्त लोग भक्तियुक्त प्रज्ञासे आपके जैसे-जैसे रूपकी भावना करते हैं, आप वैसा-ही- वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। विशुद्ध सत्त्व एवं लीलाशक्तिके योगसे निर्विकार, निराकार परमात्मा ही साकार होकर प्रकट होते हैं। जैसे जलके बर्फ बननेमें शैत्य निमित्त होता है, वैसे ही निराकार, निर्विकार परमात्माके साकार होनेमें विशुद्ध सत्त्व निमित्त होता है। दूसरे पक्षका सिद्धान्त यह है कि कूटस्थ, निर्विकार शुद्ध परमात्मा ही देहवान्-सा प्रतीत होता है, वस्तुतः देहदेहिभाव है ही नहीं। कृष्णचन्द्रका जन्म, कर्म सब कुछ दिव्य है अर्थात् सब कुछ विशुद्ध ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे अतिरिक्त और कोई भी वस्तु नहीं है। भगवान्की अचिन्त्य शक्ति अन्यान्य प्रापंचिक शक्तिसे विलक्षण परम शुद्ध होनेपर भी अनिर्वचनीयता- अंशमें समान ही है। इस तरह अद्वैत-सिद्धान्तकी सुरक्षाके साथ-साथ ही भगवान्का सगुण, साकार स्वरूप भी सिद्ध हो जाता है। सर्वथापि भगवान्के अवतारमें अवान्तर मतभेद होनेपर भी किसी सनातनधर्मीको विवाद नहीं है। भगवान् भाष्यकार शंकराचार्य तो अपने 'प्रबोधसुधाकर' नामक ग्रन्थमें बड़े समारोहसे सगुण-निर्गुणका ऐक्य कहते हैं। उन्हीं आचार्यचरणोंने बदरीनारायण, हृषीकेश (भरतजी) आदि अनेक मूर्तियोंकी स्थापना की है। अद्वैत- सम्प्रदायके अनेक आचार्योंने सगुण, साकार भगवान्के स्वरूपका समर्थन किया है। अतः यह कथन कथमपि संगत नहीं है कि निराकार ब्रह्म साकार नहीं हो सकता। निर्गुण या सगुण ध्याता, ध्यान और ध्येय श्रीभगवान्के स्वरूपमें अन्तरात्मा और अन्तःकरणके आकर्षित हो जानेपर सहजमें ही प्रत्यक् चैतन्याभिन्न अखण्डानन्द स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है। श्रीकपिलदेवजीने अपनी माँ श्रीदेवहूतिजीको प्रथम असंग, अनन्त, निराकार, निर्गुण परतत्त्वका सम्यक् उपदेश करनेके अनन्तर उसमें स्थितिके लिये सगुण स्वरूपका वर्णन करके उसके ध्यानकी परमावश्यकता बतलायी है। अति मधुर सुन्दर भगवान्के स्वरूपमें चित्त जैसे-जैसे अधिक आकर्षित होता है, वैसे-ही- वैसे उसकी निर्मलता और स्वच्छता बढ़ती है एवं चित्तके अधिकाधिक स्वच्छ होनेपर प्रभुस्वरूपमें चित्तकी और अधिक आसक्ति होती है। जैसे अयस्कान्त मणि (चुम्बक)-में स्वच्छ लौहका अत्यधिक आकर्षण होता है, वैसे ही अमलान्तरात्माका भगवत्स्वरूपमें अत्यधिक आकर्षण होता है। प्रेमानन्दके उद्रेकमें मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और सर्वांगका शैथिल्य तथा नैश्चल्य हो जाता है। लौकिक प्रेममें भी वाङ्निरोध, कण्ठावरोध आदि देखा ही जाता है। फिर अलौकिक भगवान्के प्रेमानन्दमें सर्वकरण-शैथिल्य तथा नैश्चल्य होना भी श्रीभरत और रामके सम्मिलनमें प्रसिद्ध ही है— परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अह्मिति बिसराई ॥ कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूॅंछा ॥ (रा०च०मा० २।२४१।२; २४२।७) इस तरह भगवान्के मधुर मुखचन्द्र तथा श्रीचरणारविन्दकी दिव्य नखमणि-चन्द्रिकाओंमें मनको एकाग्र करनेसे मन भी प्रेमोन्मादमें विह्वल हो उठता है। प्रथम बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर अनन्त-कोटि सूर्यके दिव्य-प्रकाशको तिरोहित करनेवाले श्रीभगवान्के परम प्रकाशमय मनोहर श्रीअंग और दिव्यातिदिव्य
निर्गुण या सगुण ५८७ भूषण-वसन तथा सांगोपांग परिकरादिका चिन्तन किया जाता है। पश्चात् प्रेम और अनुरागकी वृद्धिमें श्रीचरणारविन्द या अमृतमय मुखचन्द्रमें ही मनकी एकाग्रता सम्पादन की जाती है। प्रेम-प्राखर्यमें मनकी इतनी शिथिलता होती है कि परम मधुर भगवान्से भिन्न वस्तुके चिन्तनकी तो चर्चा ही क्या ? साक्षात् श्रीभगवान्के अनन्त कोटि चन्द्रसागर-सार-सर्वस्व निष्कलंक पूर्णचन्द्रकी मधुर दीप्तिको लजानेवाले सुस्मित मुखचन्द्रको ग्रहण करनेमें भी वह असमर्थ हो जाता है। इस तरह सर्व प्रपंचोंसे हटकर अपने ध्येयमें स्थित मनको जब ध्येय-ग्रहणमें भी सामर्थ्य न रहा, तब जो वेदान्तवेद्य सच्चिदानन्द भगवान् अभीतक ध्येयरूपमें स्थित थे, वे ही अब ध्येय-ध्यान-ध्याता और उन तीनोंके अभावके प्रकाशरूपसे अभिव्यक्त होते हैं। ध्याता-ध्यान-ध्येय, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय आदि त्रिपुटियोंका ऐसा स्वभाव है कि इनमें एकके मिटनेसे तीनों ही मिट जाते हैं। एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे। त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ (श्रीमद्भा० २।१०।९) ध्येय न रहनेपर ध्यान भी नहीं रहता; क्योंकि ध्येयाकार मानसी वृत्तिको ही ध्यान कहा जाता है और ध्यानरूपा वृत्तिके आश्रय अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही ध्याता कहा जाता है। अतः जब ध्यान नहीं, तब ध्यानका आश्रयभूत ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता है और ध्याता तथा ध्यानके न होनेपर ध्याताके ध्यानका विषयीभूत ध्येय भी कैसे उपलब्ध हो सकता है। इस तरह जो सर्वावभासक भगवान् अभी ध्येय-रूपसे स्थित थे, वे ही किसी समयके सर्वाभावभासक तथा इस समय सर्वाभावके भासकरूपसे अभिव्यक्त हो जाते हैं। इस तरह प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्यामृत- सौन्दर्यामृतपानसे उन्मत्त मनकी शिथिलता और निश्चलता होते ही ध्यान-ध्येय-ध्याताके भाव तथा अभावके भासक शुद्ध प्रत्यक्इडन्तरात्मा स्वरूपसे अनन्त अखण्ड व्यापक आनन्दघन भगवान् प्रकट हो जाते हैं। इस तरह सहजमें ही भगवान् अपने ही मधुर स्वरूपमें मनको खींचकर और अपने माधुर्य सौन्दर्यामृत- पानसे मनको विभोरकर, त्रिपुटी मिटाकर, सर्वाभावभासक शुद्ध सच्चिदानन्दरूपमें प्रकट होकर भक्तको सदाके लिये कृतार्थ कर देते हैं। भागवतके द्वितीय स्कन्धमें भी विराट् आदि भगवान्के स्थूलरूपके ध्यानके अनन्तर अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड-नायक प्रभुकी मधुर मंगलमयी मूर्तिका ध्यान बताया गया है। चित्तकी पूर्ण एकाग्रता होनेपर भगवान्के अखण्ड, अनन्त, स्वप्रकाश बोधस्वरूपका साक्षात्कार ध्यान कहा गया है। उक्त स्वरूपमें दृढ़ निष्ठाके लिये पुनः-पुनः भगवान्के मधुर स्वरूपके श्रीचरणोंका पुनः- पुनः ध्यान और अनुरागसहित परिरम्भण कहा गया है— 'हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे॥' (श्रीमद्भा० २।२।१८) भगवान्के अचिन्त्य, अनन्त, मधुर मंगलमय स्वरूपमें प्रेम और भजन सर्वसाधन तथा सर्वफल स्वरूप है। अतएव इसमें साधक तथा सिद्ध दोनोंकी ही प्रवृत्ति होती है— साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू॥ (रा०च०मा० २।२८९।८) प्रभुके श्रीचरणारविन्द-सौगन्ध्यामृत-सिन्धुके एक बिन्दुके समास्वादन करनेसे सनकादि, शुकादि-जैसे ब्रह्मनिष्ठ महामुनीन्द्र भी मुग्ध हो जाते हैं— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसी मकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) अतएव श्रीजनकजी-जैसे विदेह तत्त्वनिष्ठोंकी यह अनुभूतियाँ हैं— सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ (रा०च०मा० १।२१६।३, ५)
५८८ भक्तिसुधा
ठीक ही है, तभी तो कहा जाता है कि अमलान्तरात्मा परमहंस महामुनीन्द्रोंको भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य अव्यपदेश्य भगवान् अद्भुत सौन्दर्य-माधुर्य-सुधा- जलनिधि दिव्यमूर्ति धारण करते हैं। अन्यथा छोटे कार्योंके लिये ब्रह्मका अवतार वैसा ही है, जैसा मच्छर हटानेके लिये तोपका प्रयोग; परंतु समस्त नामरूप-क्रियात्मक प्रपंचसे व्यावृत्तमनस्क अमलात्मा परमहंसोंको भजनानन्द प्रदान करनेके लिये प्रभुका दिव्य स्वरूप धारण परमावश्यक है। दिव्य स्वरूप-धारणका प्रयोजन अद्वैत-ब्रह्मनिष्ठ परमहंसोंको भक्तियोग प्रदानकर उन्हें श्रीपरमहंस बनाना यही प्रभुके प्राकट्यका मुख्य प्रयोजन है। जैसे मिश्रित क्षीर-नीरका हंस विवेचन करता है, वैसे सांख्यसिद्धान्तके अनुसार प्रकृति प्राकृत-प्रपंचसे पृथक्, असंग अनन्त चेतनतत्त्वका विवेचन करनेवाले हंस कहे जा सकते हैं; परंतु वेदान्त-सिद्धान्तके अनुसार तो दृक्, दृश्य, आत्मा, अनात्मा या परात्पर पूर्णतम सर्वभासक भगवान् और प्रकृति प्राकृत-प्रपंचका ऐसा सम्बन्ध है, जैसे मुक्ताहार और उसमें कल्पित सर्पका। अर्थात् सत्य एवं अनृतका जैसे आध्यासिक सम्बन्ध है, वैसे ही दृश्य प्रकृति और उसके भासक एवं अधिष्ठानभूत भगवान्का आध्यासिक सम्बन्ध है। अतः सत्य एवं अनृतके विवेचनसे जैसे सत्य ही अवशिष्ट रहता है, अनृतका सर्वथा अभाव हो जाता है, वैसे ही दृक्-दृश्यका भी विवेचन करनेपर अनृतस्वरूप दृश्य प्रकृतिका अभाव हो जाता है, केवल सर्वदृक् भगवान्का अवशेष रह जाता है। ऐसे वेदान्तसिद्धान्तानुसार सत्यानृतरूप क्षीर- नीरका विवेचनकर नीरस्थानीय दृश्यको मिटाकर परम सत्य भगवान्में ही स्थित होनेवाले परमहंस कहे जा सकते हैं; परंतु—‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।’ (श्रीमद्भा० १।५।१२) ‘सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।’ (रा०च०मा० २।२७७।५) इत्यादि अभियुक्तोक्तियोंके अनुसार विदित होता है कि बिना भगवान्के मधुर मंगलमय स्वरूपमें पूर्णानुराग हुए उच्च ज्ञान भी सुशोभित नहीं होता। अतः भक्तियोगसे ज्ञानको सुशोभित करके परमहंसोंको श्रीपरमहंस बना देना ही प्रभुके मधुर मंगलमय स्वरूप धारण करनेका मुख्य प्रयोजन है; क्योंकि भजनीयके बिना भक्तियोग बन ही नहीं सकता। भगवत्तत्त्वसे भिन्न प्रपंच जिनकी दृष्टिमें है ही नहीं, उनका भजनीय सिवा भगवान्के और क्या हो सकता है। रहा भगवान्का अचिन्त्य अनन्त अव्यपदेश्य निराकारस्वरूप, सो उस स्वरूपमें तो वे परिनिष्ठित ही हैं। महावाक्यजन्य परब्रह्माकार वृत्तिके साथ ब्रह्मका सम्बन्ध जानकर मन, बुद्धि एवं सर्वेन्द्रियाँ तथा रोम- रोम भी प्रभुके साथ सम्बन्धके लिये लालायित होते हैं। इन्द्रियाँ स्वयम्भूसे पराङ्मुख रची जाकर अपना हिंसन किया जाना इसीलिये समझती हैं कि उन्हें उनके प्रियतमसे बहिर्मुख कर दिया गया है—‘पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः।’ (कठ० २।१।१) महर्षि वाल्मीकि आदिकवि भी यही कहते हैं कि जिसने श्रीरामचन्द्रको स्नेहभरी दृष्टिसे नहीं देखा और श्रीरामचन्द्रने अनुकम्पाभरी दृष्टिसे जिसे नहीं देखा, वह सर्वलोकमें निन्दित है और उसकी स्वात्मा भी उसकी विगर्हणा करती है— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते॥ (वा०रा० २।१७।१४) जैसे कमलनयन पुरुषके वे अतिशोभन नयन व्यर्थ हैं, जिनका रूप-दर्शनमें कभी उपयोग न हुआ, वैसे ही ज्ञानीके भी प्रारब्ध-भोगपर्यन्त अनिवार्य रूपसे रहनेवाले देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहंकारादि व्यर्थ और नीरस ही हैं, यदि इन सबका सदुपयोग प्रभुके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्यामृत आदिके समास्वादनमें न हुआ।
निर्गुण या सगुण ५८९ करणग्रामोंकी सार्थकता किसमें ? इसीलिये श्रीव्रजांगनाओंने भी कहा है कि नेत्रवानोंके नेत्रादि करण-ग्रामोंकी सार्थकता और इनका चरम फल यही है कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्षपातसे युक्त वेणुचुम्बित अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका निर्निमेषनयनोंसे पान किया जाय; घ्राणसे सौगन्ध्यामृत और त्वक्से सुस्पर्शामृतका आस्वादन किया जाय, अन्यथा इन करणग्रामोंका होना बिलकुल व्यर्थ ही है—'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।७) इस प्रकार अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमको अपने दिव्यरससे सरस और मंगलमय बनानेके लिये ज्ञानीके निर्वृत्तिक मनपर अविषय रूपसे प्रकट वही वेदान्त- वेद्य सच्चिदानन्दघन भगवान् अनन्तकोटि कन्दर्पके दर्पको दूर करनेवाले दिव्य सौन्दर्य-माधुर्य-जलनिधि मधुरातिमधुर स्वरूपसे प्रकट होकर अपने स्नेहद्वारा भावुकके द्रवीभूत अन्तःकरणको अपने रंगमें रँग देते हैं। यद्यपि सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्म निरतिशय परप्रेमास्पद और परमानन्दरूप है, उससे अधिक प्रेमास्पदता और परमानन्दरूपताकी कल्पना कहीं नहीं हो सकती; तथापि जबतक प्रारब्धका अवशेष है, तबतक ज्ञानीको भी अन्तःकरणरूप उपाधिपर ही ब्रह्मका दर्शन होता है। अन्तःकरणसे ब्रह्मदर्शन वैसा ही समझना चाहिये जैसे नेत्रसे सूर्यदर्शन। परंतु जैसे दूरवीक्षण यन्त्रकी सहायतासे नेत्र द्वारा सूर्यका अति दिव्य स्पष्ट स्वरूप दिखायी देता है, वैसे ही दिव्य लीला-शक्तिसे वही भगवत्तत्त्व जब परम मनोहर सगुण-रूपमें प्रकट होता है, तब अन्तःकरणसे उसमें विलक्षण चमत्कार अनुभूत होता है। परंतु प्रारब्ध-क्षय हो जाने, सर्वोपाधियोंके मिटने तथा साक्षात् सूर्यरूप हो जानेपर जो सूर्यको आत्मरूप उपलब्ध होता है, वह तो सर्वथा ही अनुपमेय है। जैसे श्रीवृषभानुनन्दिनी दर्पणमें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमाका अनुभव करती हैं। अस्वच्छ दर्पण आदिकी अपेक्षा स्वच्छ आदर्शपर किंवा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर उन्हें अपने मुखचन्द्रकी मधुरिमा अधिक भासित होती है, परंतु उनके मुखचन्द्रका जो मुख्य माधुर्य है, वह तो उनके अन्तरात्मभूत प्रियतम श्रीकृष्णको ही विदित हो सकता है। किंचित् भी व्यवधान रहनेपर रसास्वादनमें कमी ही रहती है, अतएव भावुकोंका कहना है कि यदि मधुर रूपमें ही चक्षु हो, तभी रूप-माधुर्यका और यदि पुष्पमें ही घ्राण हो, तब ठीक सौगन्ध्यका आस्वादन हो सकता है। यह बात तो ठीक यहीं घटती है कि परमानन्द-सारसर्वस्व श्रीकृष्ण ही अपनी मधुरिमा (माधुर्याधिष्ठात्री श्रीवृषभानुनन्दिनी)-का अनुभव करते हैं। वैसे ही काल्पनिक भेदसे ज्ञानी अपने स्वरूपभूत भगवान्के मधुर रूपका अनुभव करते हैं। यद्यपि वस्तु वही है तथापि अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके अद्भुत प्रभावसे ज्ञानियोंका भी मन प्रभुके इस मधुर स्वरूपमें बलात् आकर्षित हो जाता है। जैसे फल, वृक्ष, अंकुर, बीज यद्यपि भूमिके ही स्वरूप-विशेष हैं तथापि फलमें भूमि, बीज, अंकुर, वृक्ष इन सभीकी अपेक्षा विलक्षण सौन्दर्य-माधुर्य-सौगन्ध्य-सौरस्य होता है एवं गुलाबके बीज या नालमें जैसे शाखा-उपशाखा, कण्टक-पत्र आदिके उत्पादन करनेकी शक्ति है, वैसे ही पुष्पके उत्पादन करनेकी शक्ति है, परंतु कण्टकादि-उत्पादिनी शक्तिकी अपेक्षा सौगन्ध्य-माधुर्य-सौन्दर्य-सम्पन्न पुष्प उत्पादन करनेकी शक्ति विलक्षण है, वैसे ही भगवान्की महाशक्तिमें भी प्रपंचोत्पादिनी शक्ति है और उससे परम विलक्षण परात्पर पूर्णतम भगवान्की स्वरूपभूत मधुर मनोहर मंगलमयी मूर्तिको प्रादुर्भाव करनेवाली शक्ति भी है। उसी अचिन्त्य दिव्य लीला-शक्तिके योगसे निराकार भगवान् उसी तरह साकार होते हैं, जैसे शैत्यके योगसे निर्मल जल बर्फरूपमें अथवा संघर्ष- विशेषसे अव्यक्त अग्नि या विद्युत् दाहक और प्रकाशक- रूपमें व्यक्त होता है। निराकार ब्रह्मकी अपेक्षा भी भगवान्की मधुर मूर्तिमें वैसे ही चमत्कार भासित होता है।
५९० भक्तिसुधा परमानन्दघन ब्रह्म अद्भुत रसमय है इक्षु (ईख)-दण्ड और चन्दन-वृक्ष ही मधुर और सुगन्धित होते हैं। यदि कदाचित् इक्षुमें सुमधुर फल और चन्दन-वृक्षमें अति-सुन्दर और सुगन्धित पुष्प प्रकट हों तो उनकी मधुरता और सौगन्ध्यकी जितनी ही बड़ाई की जाय उतनी ही कम है। इसी तरह अनन्त ब्रह्माण्डान्तर्गत आनन्दबिन्दुका उद्गमस्थान अचिन्त्य अनन्त परमानन्दघन ब्रह्म ही अद्भुत रसमय है। फिर उसके फलरूप मधुर मंगल स्वरूपमें कितना चमत्कार हो सकता है, यह सहृदय ही जान सकते हैं। इक्षुरससार शर्करासिता आदिका सार जैसे कन्द होता है, वैसे ही औपनिषद परब्रह्म-रससार भगवान्का मधुर मनोहर सगुण स्वरूप है। तभी किसीने श्रीकृष्णको देखकर कल्पना की थी कि क्या यह श्रीव्रजांगनाओंका प्रेमरससार-समूह है अथवा सात्वतवृन्दका मूर्तिमान् सौभाग्य है, किंवा श्रुतियोंका गुप्तवित्त ब्रह्म ही श्यामल मोहमयी मूर्तिको धारण करके प्रकट हुआ है— पुञ्जीभूतं प्रेम गोपाङ्गनानां मूर्तीभूतं भागधेयं यदूनाम्। एकीभूतं गुप्तवित्तं श्रुतीनां श्यामीभूतं ब्रह्म मे सन्निधत्ताम्॥ इसी तरह— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गणे मया दृष्टम्। धूलीधूसरिताङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः॥ परमिममुपदेशमाद्रियध्वं निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥ कुछ महानुभाव निगमाटवीके ब्रह्मतत्त्वान्वेषकोंके परिश्रमपर दयार्द्र होकर उनके अन्वेष्टव्य ब्रह्मको यशोदाके उलूखलमें बँधा हुआ बतला रहे हैं तो कुछ श्रीमन्नन्दरायके प्राङ्गणमें धूलिधूसरित वेदान्तसिद्धान्तके नृत्यका कौतुक बता रहे हैं। परम कौतुकी प्रभुमें ये सभी कौतुक ही तो हैं। इतनेपर भी लोगोंके प्रश्न होते हैं कि निराकार भगवान् साकार कैसे हो सकते हैं, परंतु इस ओर उनका ध्यान नहीं जाता कि जब कौतुकी कृपालुकी लीलासे निराकार जीव साकार होता है; क्योंकि सर्वमतसे जीव निराकार तथा निरवयव है और स्पर्शविहीन आकाश स्पर्शयुक्त वायुके रूपमें तथा रूपरहित वायु रूपवान् तेजके रूपमें और रसगन्धविहीन तेज जलके रूपमें और रसयुक्त जल गन्धवती पृथ्वीरूपमें अवतीर्ण होता है, तब क्या वे निराकार होकर भी साकार रूपमें प्रकट नहीं हो सकते ? द्रुतचित्तपर भगवान्का प्राकट्य ही भक्ति है भावुकके द्रुतचित्तपर निखिल-रसामृत-मूर्ति भगवान्का प्राकट्य ही 'भक्ति' पदका अर्थ होता है। आशय यह है कि अन्तःकरण लाक्षा (लाख)-के समान कठिन द्रव्य है, परंतु तापक अग्निके साथ सम्बन्ध होनेसे जैसे लाक्षा पिघलती है, वैसे ही स्नेह- रागादि तापक भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे अन्तःकरण भी पिघलता है। यही कारण है कि रागास्पद कामिनी तथा द्वेषास्पद सर्पादि पदार्थोंको ग्रहण करता हुआ चित्त पिघलकर अपनेमें उन पदार्थोंके स्वरूपोंको अंकित कर लेता है। इसीलिये उनका विस्मरण न होकर पुनः-पुनः स्मरण होता है। उसे तृण आदिकी स्मृति इसीलिये कम होती है कि उनमें राग-द्वेष या भय आदि नहीं हुए। अतः चित्तकी द्रुति वहाँ नहीं हुई। भावुकोंका कहना है कि लाक्षा जबतक कम पिघली होती है, तबतक उसमें कोई रंग व्यापक और स्थिर नहीं होता, अतः तापक अग्निके सम्बन्धसे लाक्षा इतनी पिघलायी जाय कि सौ पर्तके कपड़ेमें छानने- लायक हो जाय। तब गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत उस लाक्षामें जो रंग छोड़ा जाय, वह लाक्षाके अणु-अणुमें, सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर होता है, फिर चाहे लाक्षा भी चाहे कि मैं अपनेसे रंगको पृथक् कर दूँ या रंग ही चाहे कि मैं पृथक् हो जाऊँ, परंतु दोनों ही पृथक् होनेमें असमर्थ हैं। ठीक इसी तरह भगवद्विषयक राग आदिसे गंगाजलके समान निर्मल और द्रवीभूत चित्तमें परमानन्दघन भगवान्का प्राकट्य होनेपर फिर पिघलती हुई लाक्षामें रंगकी तरह सर्वांशमें व्यापक तथा स्थिर रूपसे भगवान्की स्थिति होती है। फिर तो भावनाके प्रभावसे अपरिच्छिन्न अनन्त आन्तर
रसकी अभिव्यक्ति अन्तःकरण प्राण तथा रोम-रोममें सर्वत्र फैल जाती है और आन्तर तथा बाह्य रूपसे सर्वथा ही भगवान्का अनुभव होने लगता है। अपने प्रियतम भगवान्के स्वरूपमें होनेवाले तीव्र राग और उनके विरह-व्यथामय तीव्र तापसे भावुकके गुणमय सर्व कोशोंका भस्मीभाव हो जाने और भावनामय भगवत्-सम्मिलनसौख्य रससे मन, प्राण, इन्द्रिय, देह तथा रोम-रोमके आप्यायन होनेपर बाह्य-आभ्यन्तर-सर्वरूपसे भगवत्तत्त्वका अवगाहन होता है। इस तरह जब अनिमित्ता भागवती भक्ति गुणमय कोशोंको जला देती है, तभी निरुपाधिक एवं निरावरण होकर भावुक अपने भगवान्से मिल सकता है। भगवद्विरह-व्यथा-तापमयी भक्तिसे जिसके अन्नमयादि पंचकोशरूप त्रिविध तनु नहीं तप्त हुए, वे परमतत्त्वामृतके समास्वादनके अधिकारी नहीं हो सकते। यही 'अतप्ततनूर्न तदामोऽश्नुते' इस श्रुतिका आशय है। 'तपसा कृच्छ्रा-दिना भगवद्विरहजन्यतीव्रतापेन शक्तिपरिणामभूतेन ज्ञानाग्निना वा न तप्ता तनूर्यस्य स तत् परमात्म-तत्त्वामृतं नाश्नुते।' कृच्छ्रादि तप, भगवद्विरह-जन्य तीव्र ताप और भक्तिके परिणामभूत ज्ञानाग्निसे जिनके स्थूल, सूक्ष्म, कारण-ये तीनों तनु नहीं संतप्त हुए, वे परमतत्त्वका आस्वादन कैसे कर सकते हैं? इसीलिये अनिमित्ता भागवती भक्तिको सिद्धिसे भी श्रेष्ठ कहा जाता है। जैसे निगीर्ण अन्नको जाठराग्नि पचा डालती है, वैसे ही अनिमित्ता भक्ति पंचकोशोंको जीर्ण कर देती है— अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी। जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ (श्रीमद्भा० ३।२५।३३) भक्ति ही ज्ञानरूपमें परिणत होकर मूल अविद्याका भी विध्वंस करती है। भट्टोजिदीक्षित 'क्लृपि संपद्यमाने च' इस वार्तिकके उदाहरणरूपमें कहते हैं—'भक्तिर्ज्ञानाय कल्पते, ज्ञानाकारेण परिणमते।' भक्त और भगवान्का अभिन्न सम्बन्ध श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें ज्ञान, वैराग्य—ये श्रीभक्तिके ही पुत्र बतलाये गये हैं। ज्ञान, भगवत्प्राप्ति, मुक्ति आदि यद्यपि भक्तिके फल हैं तथापि फलकी अपेक्षा साधनमें ही अधिक प्रीति युक्त होती है। यद्यपि धनका फल भोग, धर्म, मोक्ष ही है तथापि लोभी धनके संग्रह और रक्षाके सामने भोग, धर्म, मोक्ष इन सभी पुरुषार्थोंको तिलांजलि दे देते हैं; क्योंकि उनकी यही दृढ़ धारणा है कि यदि साधन है, तब सब साध्य सहजमें ही सिद्ध हो सकते हैं। माता योग्य पुत्रकी उत्पत्तिसे ही सौभाग्यवती समझी जाती है और पुत्र माताकी भक्तिसे ही सौभाग्यवान् होता है। अतः जहाँ ज्ञान, भक्तिका फल है, वहाँ भक्ति, ज्ञान तथा ज्ञानियोंकी भी परम पूज्य एवं भजनीय देवता है। द्रवीभूत लाक्षामें एकमेक हुए रंगकी तरह भक्तके प्रेमार्द्र हृदयमें एकमेक हुए भगवान् यदि चाहें तो भी पृथक् नहीं हो सकते— विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा- द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः । प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ (श्रीमद्भा० ११।२।५५) बरबस भी जिनके मंगलमय नामसे बड़ी-से- बड़ी पापराशि नष्ट हो जाती है, ऐसे परम-स्वतन्त्र सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् जिसके अन्तःकरणमें स्नेहार्द्रतारूप प्रणयपाशमें बँधकर निकल न सकें, वही प्रधान भागवत होते हैं। तभी तो किसी प्रेमीने रागसे पिघले हुए अपने अन्तःकरणमें उसी द्रवावस्थारूप प्रणयपाशसे प्रभुको बाँधकर उनकी सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्ता-महाशक्तिको भी कुण्ठित करके निःशंक होकर कहा है—'अच्छा, यदि आप मेरे हृदयसे निकल सको तो मैं आपके पौरुषको समझूँ'— हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम्। हृदयाद्यदि चेद्यासि पौरुषं गणयामि ते॥
ऐसे ही भक्त भगवान्को यदि अपने हृदयसे पृथक् करना चाहे तो भी नहीं कर सकता। इसीलिये तो व्रजांगना श्रीकृष्णसे अपना मन हटानेके लिये उनमें दोषानुसन्धान करती हैं—‘हे सखि! असितों (कालों)- से सख्य नहीं ही करना चाहिये, परंतु क्या करें; श्यामसुन्दर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनकी कथा और कथार्थ तो हमलोगोंके लिये दुस्त्यज ही है।' एक सखी श्रीकृष्ण- प्रेममें मूर्च्छित अपनी प्रियतमा सखीके उपचारमें लगी हुई थी। इतनेमें ही दूसरी सखी आकर कृष्णकी कुछ चर्चा चलाने लगी। उपचारमें लगी हुई सखी वारण करती हुई कहती है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः। स्मारय किमपि तदितरद्विस्मारय हन्त मोहनं मनसः॥ हे सखि! यदि अपनी प्रिय सखीको विश्रान्ति लेने देना चाहती है तो यहाँ उन (श्रीव्रजराजकुमार)- की चर्चा न चला, परंतु किसी और बातकी याद दिलाकर किसी तरह मनमोहनको इसके मनसे भुला दे। महामुनीन्द्रगण बाह्य विषयोंसे मनको हटाकर श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दमें मन लगाना चाहते हैं, किंतु ये व्रजदेवियाँ अपने मनमोहन श्रीकृष्णसे मन हटाकर अन्य विषयोंमें लगाना चाहती हैं। योगीन्द्रगण अपने हृदयमें जिसके स्मृति-लेशके लिये लालायित हैं, उन्हीं सर्वप्राणि-परप्रेमास्पद जीवनधन प्रभुको वे हृदयसे निकालना चाहती हैं। ठीक ही है, पूर्ण द्रवीभूत लाक्षा और उसमें स्थायिभावापन्न रंग, इन दोनोंका इतना अद्भुत घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है कि दोनोंका ही परस्पर पृथक् होना असम्भव है। उसी तरह भगवद्भावनासे द्रवीभूत अन्तःकरणपर भगवान्की स्थायिभावापत्ति होनेसे फिर परस्परका पार्थक्य असम्भव हो जाता है। यद्यपि जीवका भगवान्के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध इससे भी बहुत अधिक घनिष्ठ है, जैसे तरंगोंकी समुद्रके बिना स्थिति ही नहीं, वैसे भगवान्के बिना जीवकी सत्ता ही नहीं। सो तें ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ (रा०च०मा० ७।१११।६) भगवान्का स्वरूप ही प्रेम है तथापि स्वरूप-साक्षात्कारके पहले यह स्वाभाविकी निरतिशय निरुपाधिक प्रीति असम्भव है, अतः भगवान् और उनमें स्वाभाविकी प्रीति ये सभी उस द्रवावस्थारूप प्रणयके ही पराधीन हैं। इसीलिये किसी महानुभावने कहा है कि— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यदबद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ अहो आश्चर्य! मैं तो उस प्रेमबन्धनका वन्दन करता हूँ, जिससे बँधकर सबको मुक्ति देनेवाला और स्वयं नित्यमुक्त ब्रह्म भी भक्तोंका खिलौना बन जाता है। वस्तुतः निरतिशय निरुपाधिक परप्रेमास्पद पूर्णतम पुरुषोत्तमका स्वरूप ही प्रेम है। लोकमें यद्यपि प्रेम और उसका आश्रय एवं विषय ये तीनों पृथक् होते हैं तथापि अलौकिक दिव्य- प्रेममें तीनों ही एक हैं। अतएव ‘आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।' (बृहदारण्यक० २।४।५) इत्यादि वचनोंसे निरुपाधिक प्रेम और प्रेमास्पदका अभेद कहा गया है—‘प्रेमी प्रेम-पात्रनमें बतायी है अभेद वेद।' इसीलिये ‘जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद' (रा०च०मा० १।१८) इत्यादि वाक्योंसे महानुभावोंने मुख्य प्रेमी और प्रेमास्पद सीता और राममें अभेद कहा है। जैसे अमृत और उसकी मधुरिमाका अतिघनिष्ठ तादात्म्य-सम्बन्ध होता है, वैसे ही परमानन्दसुधासिन्धुसार-सर्वस्व श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र और उनकी माधुर्याधिष्ठात्री परमाह्लादिनी हृदयेश्वरी श्रीजनकनन्दिनीका भी अत्यन्त घनिष्ठ स्वरूपभूत ही सम्बन्ध है अर्थात् सर्वान्तरंग एवं सर्वसे सन्निहितमें ही सर्वोत्कृष्ट सम्बन्ध होता है। अन्तरंगता और सान्निध्यकी समाप्ति या पर्यवसान-निरतिशयता प्रत्यगात्मामें ही होती है। अतः प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्में ही प्राणियोंका मुख्य प्रेम होता है।
निर्गुण या सगुण ५९३ ज्ञानीजन परमार्थतः भगवान्को अपना अन्तरात्मा समझकर पुनः काल्पनिक भेदका अवलम्बन करके भगवान्को भजते हैं। 'पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥' पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस भावनासे यदि भक्ति हो, तब तो यह भक्ति अपरिगणित मुक्तियोंसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि अद्वैत-प्रबोध बिना यह द्वैत सर्वानर्थका मूल ही है। राग, द्वेष, शोक, मोह—सबका प्रसव इस द्वैतसे ही होता है; परंतु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वमनीषाकल्पित द्वैत तो अद्वैतसे भी अति सुन्दर है— द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी। उनकी उपासना भेदभावना तथा अभेदभावना दोनों ही प्रकारसे हो सकती है। स्वयं श्रीमुखकी उक्ति है कि— ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ (गीता ९।१५) कोई भक्तियोगसे, कोई ज्ञानयोगसे मेरा यजन करते हुए उपासना करते हैं। कुछ लोग एकत्वभावसे और कुछ पृथक्त्वभावसे मुझ विश्वतोमुखकी उपासना करते हैं। ज्ञानी अत्यन्त निष्काम तथा निष्कपट होकर भगवान्को भजता है। अतएव 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्तिर्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि स्थलोंमें श्रीभगवान्ने ही ज्ञानीको अपनेमें अनन्य प्रीतिमान और उसे निज अन्तरात्मा ही बतलाया है। भगवद्भावापन्न भगवान्के अन्तरात्मस्वरूप ज्ञानीको भगवान्से भिन्न कोई वस्तु ही दृष्टिगोचर नहीं होती। इसीलिये मुक्तोपसृप्य भगवान्को प्राप्त कर लेनेसे मुक्तिकी भी स्पृहा मिट जाती है। अतएव— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) ये भक्त उसी तरह कभी निर्विकल्प समाधिसे भगवान्के अंकमें उनके साथ एकमेक होकर विराजमान होते हैं और कभी श्रद्धाभक्तिसे भगवान्के श्रीचरणकमलके सौन्दर्य-माधुर्यादिका सेवन करते हैं, जिस तरह प्रेयसी कभी प्रियतमके अंकमें एवं वक्षस्थलपर यथेष्ट क्रीड़ा करती है और कभी सावधानीसे प्रियतमके पादपद्मका आराधन करती है। प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्याम्प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे चतुरा नायिका प्रियतमके साथ एकमेक होकर भी व्यवहारमें अपने प्रियतमको चैलांचलके व्यवधान (घूँघट-पटकी ओट)-से ही देखती है। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी॥ खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ (रा०च०मा० २।११७।६-७) ठीक वैसे ही ज्ञानी यद्यपि अपने निरतिशय निरुपाधिक प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्के साथ सर्वथा एकमेक ही रहते हैं तथापि व्यवहारमें भेद-भावनासे ही अपने भगवान्की भक्ति करते हैं। विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्पनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ तथा रोम- रोममें आन्तर-बाह्य सर्वरूपसे प्रभुका सुमधुर स्वरूप अनुभव करनेके लिये ही ज्ञानीजन भक्तियोगसे श्रीपरमहंस हो जाते हैं और वे ही शुद्ध प्रेमी होते हैं। अतः इनके लिये प्रभुका प्रादुर्भाव है। ऐसे ही शुद्ध-प्रेमियोंमें
५९४ भक्तसुधा श्रीव्रजांगना प्रभृति थीं, जिन्हें श्रीकृष्णके विरहमें एक क्षण भी सहस्रों युगके समान प्रतीत होते थे और श्रीकृष्णके सम्मिलनमें सहस्र कल्प भी क्षणहीके समान प्रतीत होते हैं। इस तरह जो प्रभुके बिना प्राण- धारण ही नहीं कर सकते, उनके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इस शुद्ध तत्त्वनिष्ठ प्रेमीके लिये मुख्यरूपसे प्रभुका प्राकट्य होता है। फिर तो मुमुक्षुओंके लिये, किं बहुना प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इसी वास्ते तो श्रीशुकदेवजीने प्राणिमात्रके निःश्रेयसको ही प्रभु-प्राकट्यका प्रयोजन कहा है—'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) यहाँ 'नृणां' से 'नरमात्राभिमानिनां' यह अर्थ समझना चाहिये। जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' यहाँपर श्रीशंकराचार्य भगवान्ने 'नरे' का 'नरमात्राभिमानिनि' यह अर्थ किया है। भावार्थ यह हुआ कि ज्ञानी और उपासकोंसे भिन्न साधारण अज्ञ-प्राणियोंके निःश्रेयसके लिये निर्गुण निराकार निर्विकार भगवान्का सगुणरूपमें प्राकट्य होता है। भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण अतएव काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय, स्नेह आदि किसी भी भावसे भगवान्में चित्त लगानेसे प्राणियोंका कल्याण हो जाता है, अर्थात् यहाँ ज्ञानके बिना भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जैसे विष-बुद्धिसे भी अमृतपान करनेसे अमृतत्व-लाभ होता है, वैसे ही ब्रह्मबुद्धि बिना भी जिस किसी तरह भी श्रीकृष्णका सेवन करनेसे भगवत्प्राप्ति हो ही जाती है; क्योंकि वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करती। यद्यपि यों तो जब 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सब कुछ ब्रह्म ही है, फिर प्राकृत स्त्री-पुत्र आदिके प्रेमियोंको भी मुक्त हो जाना चाहिये; क्योंकि जब सब वस्तु ब्रह्मकी है, ज्ञानकी अपेक्षा है ही नहीं, फिर पत्नी-सेवन भी ब्रह्मसेवन क्यों न माना जाय? इत्यादि शंकाएँ होती हैं। तथापि भगवान् निरावरण ब्रह्म हैं और प्रपंच सावरण ब्रह्म है। बस, इसी भेदसे भगवान्का सेवन ज्ञान बिना भी कल्याणकारक है और प्रपंच-सेवन ज्ञान बिना प्रपंचका ही प्रापक है। जैसे मेघके सम्बन्धसे आदित्यका रूप छिप जाता है; परंतु दिव्य उपनेत्र या दूरबीनके सम्बन्धसे आदित्यका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु अतिदिव्य स्वरूपमें स्पष्ट होता है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी मलिन शक्तिके सम्बन्धसे प्रपंचरूपमें प्रकट ब्रह्मका निजी दिव्यरूप तिरोहित या आवृत हो जाता है; परंतु दिव्य लीलाशक्तिके योगसे दिव्य मधुर सगुण साकार श्रीराम श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्मका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु दिव्य स्वरूपमें प्रकट होता है। अतः निरावरणरूपमें ज्ञानकी आवश्यकता नहीं, सावरण- रूपमें ही है। सत्त्वादिगुणकृत प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण ही ये निर्गुण भी कहे जाते हैं। इसी आशयसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्' (श्रीमद्भा० १०।८८।५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। इन्हें जार-बुद्धिसे समाश्रयण करके भी कुछ व्रजांगनाएँ मुक्त हो गयीं— 'तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।११) जैसे चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे भी प्रवृत्त होनेसे प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही निरावरण श्रीकृष्ण परमात्मामें किसी भी बुद्धिसे प्रवृत्त क्यों न हो, प्राप्ति अखण्ड अनन्त निरावरण ब्रह्मकी ही होगी।
तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व भगवत्प्राप्ति प्रायः लोग पूछा करते हैं कि 'क्या भगवत्प्राप्ति इसी जन्ममें हो सकती है?' उनके प्रश्नका उत्तर है—ऐसा एक ही जन्ममें हो सकता है या अनेक जन्मोंमें, इसका कोई नियम नहीं है, किंतु जब भी भगवान्के प्रति प्रेमका गाढ़ उदय हो जाता है, भगवान् तभी मिल जाते हैं— हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ (रा०च०मा० १।१८४।५) अनेक जन्मोंतक भी यदि प्रेमका संचार न हो तो भगवान् नहीं प्राप्त होते, प्रेम प्रकट हो जानेपर भगवान् एक ही जन्ममें मिल जाते हैं। जिस समय भक्त भगवान्से मिलनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वाध्याय, ध्यान आदिको प्राप्त होता है; उस समय भगवान्को अवश्य प्रकट होना पड़ता है। आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, परम निष्काम भगवान् परम स्वतन्त्र हैं तथापि भक्तप्रेममें पराधीन होना उनका एक स्वभाव है। अनुभवी लोगोंने कहा है— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यद्बद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ 'अहो! कोई निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मको, कोई सगुण-साकार ब्रह्मको भजते हैं, परंतु मैं तो उस प्रेमबन्धनको भजता हूँ, जिससे बँधकर अनन्त प्राणियोंको मुक्ति देनेवाला, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म भक्तोंका खिलौना बन जाता है।' जिस समय भक्त भगवान्के बिना न रह सके, उस समय भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते। जैसे पंखरहित पतंग-शावक अपनी माँको पानेके लिये व्याकुल रहते हैं, जैसे क्षुधार्त वत्सतर (छोटे गोवत्स) माँका दूध चाहते हैं, किंवा परदेश गये हुए प्रियतमसे मिलनेके लिये प्रेयसी विषण्ण (व्याकुल) होती है, हे कमलनयन! मेरा मन आपको देखनेके लिये वैसे ही उत्कण्ठित होता है— अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥ (श्रीमद्भा० ६।११।२६) भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति इस प्रकारकी सोत्कण्ठ भक्तकी प्रार्थनासे भगवान् द्रुत होकर भक्तसे मिलने दौड़ पड़ते हैं। हाँ, यह ठीक है कि भगवत्सम्मिलनकी ऐसी उत्कट उत्कण्ठा सरल नहीं है, किंतु जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरोंके पुण्यपुंजसे ही भगवान्में उत्कट प्रीति प्राप्त होती है। इसीलिये उपनिषदोंने कहा है कि ब्राह्मणादि अधिकारी यज्ञ, तप, दान और अनशनादि सत्कर्मोंसे उन परमतत्त्व भगवान्को जाननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न करते हैं— 'तमे तं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन विविदिषन्ति।' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२२) जब उस परमतत्त्वकी जिज्ञासा ही उत्पन्न करनेमें अनेक जन्मोंके सत्कर्मोंकी अपेक्षा होती है, तब स्पष्ट ही है कि जिसे भगवत्सम्मिलनकी उत्कट कामना है, जिसे भगवान्के न मिलनेसे महती व्याकुलता है, वह केवल इसी जन्मका सत्कर्मी नहीं, अपितु पहले जन्मोंसे भी उसका इस सम्बन्धमें प्रयत्न चल रहा है। इस दृष्टिसे ध्रुवकी जन्मान्तरीय तपस्याओं तथा 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।' (गीता ७।१९) इत्यादि वचनोंकी संगति लग जाती
५९६ भक्तिसुधा है। प्रेमके उत्कट हो जानेपर उसी क्षण भगवान्का दर्शन होता है। फूल तोड़नेमें विलम्ब हो सकता है, किंतु उस समय भगवान्के मिलनेमें किंचित् भी विलम्ब नहीं होता। भगवान् प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वसाक्षी हैं, उनको पानेमें कौन कठिनाई— कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- रूपासने स्वे हृदि छिद्रवत् स्वतः। (श्रीमद्भा० ७।७।३८) —इत्यादि बातोंकी भी संगति लगती है। भगवत्प्राप्तिमें अत्यन्त प्रयत्न करनेकी अपेक्षा बतलानेके लिये शास्त्रोंने भगवान्को अत्यन्त दुर्लभ कहा है, निराशा मिटाकर उत्साह बढ़ानेके लिये भगवान्को अत्यन्त सुगम भी कहा है— 'दूरात्सुदूरे अन्तिकात् तदु अन्तिके च।' भगवान् दूर-से-दूर और समीप-से भी समीप हैं। नामरूपकी उपयोगिता नामरूपक्रियासे अतीत—अनाम, अरूप, निष्क्रिय परमतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही प्राणीको अनेक क्रियाओं, नामों एवं रूपोंका अवलम्बन करना पड़ता है। अनामके नामकरण एवं अरूपके रूपकी कल्पना सचमुच अपरमेयको परिमित और निःसीमको सीमित करना है। किसी महानुभावने कहा है— गत्यानया व्यापकता हता ते स्तुत्यानया वाक्परता हता ते। दृष्ट्यानयागोचरता तथा हता ममापराधस्त्रितयं क्षमस्व॥ अर्थात् 'हे नाथ! इतने दूर आपके दर्शनार्थ चलकर मैंने आपकी व्यापकतापर तथा दर्शनसे आपकी अगोचरतापर अविश्वास किया और स्तुतिसे आपकी वाक्परताकी भी अवहेलना की। हे दयामय! इन मेरे तीन अपराधोंको कृपया आप क्षमा करना।' जैसे प्राणी व्यष्टि-नामरूपकी उपाधिमें आसक्त होकर व्यक्तिगत स्वार्थके लिये समष्टि-हितका विघातक बन जाता है या समष्टि-हितके कार्योंमें भी सम्मान, ख्याति या धन-लाभादि स्वार्थोंको ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपमें प्रधानता देने लगता है; वैसे ही सर्वाधार, परमतथ्य, पारमार्थिक वस्तुमें भी नाम- रूपोंकी कल्पनाओंसे ही नाना विपत्तियोंको खड़ा करता है। सच बात तो यह है कि नामविशेष और रूपविशेषके अभिमानवालोंको व्यक्तिगत विशिष्ट नामों और रूपोंसे स्तुतिकी स्पृहा होती है। ग्राहसे पीड़ित गजराजने निर्विशेष परब्रह्मका ही स्तवन किया। उस स्तवनमें किसी व्यक्तिविशेष या नामरूपकी व्यंजना नहीं थी। उसने यही कहा कि— ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२) मैं उस परमतत्त्वको नमन करता हूँ, जिससे जड़ विश्व चेतित हो रहा है, जो निखिल विश्वका आदि बीज और परेश है, जिससे तथा जिसमें विश्व उत्पन्न तथा स्थित होता है और जिससे उसका धारण होता है। उस स्वयम्भूको नमस्कार है, जो पर-अपर कार्य- कारणसे अतीत है। भिन्न-भिन्न नामरूपके अभिमानी देवगण गजेन्द्रकी स्थिति देखते थे, उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करनेमें समर्थ भी थे, परंतु उनके नामरूपमें उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिये उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्रके रक्षणमें नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुई, जो किसी नामरूपविशेषका अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपोंको अपना ही मानता था। आज भी सामाजिक क्षेत्रोंमें व्यक्तिगत ख्याति या सम्मानकी ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातियोंको अपना ही समझकर कार्यमें अग्रसर
नामरूपकी उपयोगिता ५१७ होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूपकल्पनाका दुष्परिणाम किसीसे छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वरके नाम और उपचारपद्धतियोंपर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें द्वन्द्व मच रहा है। ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज, ब्रह्मसमाजके अतिरिक्त सनातनधर्मियोंमें ही नामरूपोंपर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित हैं कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवालेके मनमें नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओंके उपासक अपने-अपने इष्ट और अपनी-अपनी उपासना- पद्धतिका ही महत्त्व सिद्ध करनेके लिये दूसरोंकी निन्दा और खण्डनमें कुछ भी कसर नहीं रखते। इतना ही क्यों, विष्णुके ही विविध स्वरूपोंमें इस नाम या इस रूपसे मुक्ति होती है, दूसरेसे नहीं; श्रीकृष्णका वन्दन अमुक वेश-भूषामें ही हो सकता है, दूसरेमें नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित हैं, जो वैमनस्य और विद्वेषके मूल बन रहे हैं, परंतु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओंकी कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञोंका तो कहना है कि प्राणी जबतक सत्त्व, रजस्, तमस् आदि गुणों और विविध नामरूप एवं कर्मोंमें बँधा हुआ है, तबतक उसे गुण एवं नामरूपक्रियाव्यतीत वस्तुका दर्शन और उसकी उपलब्धि असम्भव ही है। नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति वेदान्त तो पग-पगपर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्त्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहारविषय तथ्य नहीं है, परंतु जो अनेक तापोंसे सन्तप्त एवं अशान्त है, उसे क्या मात्र इन वचनोंसे शान्ति हो सकती है? अतः जैसे रजसे ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टकसे ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विषसे ही विषका प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्मसे ही कर्मका निर्हार और नामरूपसे ही नामरूपातीत तत्त्व प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाता है। निर्गुण, निराकार, निष्प्रपंच असंगसे ही सगुण, साकार समस्त प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्त्वसे बहिर्मुख होकर अनादिकालसे इस दुर्गम भवाटवीमें भटक रहे हैं। कहा जाता है कि मन, बुद्धिके हलचलसे ही परमार्थ परमतत्त्व आवृत हो जाता है। जैसे छायाके पीछे चलनेसे वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन-बुद्धिको स्थिर करनेके प्रयत्नसे वे वशमें नहीं किये जा सकते। मनमें निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होनेपर ही निर्दृश्य, निर्विकल्प वस्तुका बोध या उपलब्ध होता है। मनके व्यापारसे ही दृश्य या विकल्पकी उपस्थिति होती है। मनके निर्व्यापारता या अमनीभावमें विकल्प प्रतीतिविरुद्ध होनेसे निर्विकल्प वस्तुका अनायास ही स्फुरण होता है', परंतु यह क्या जैसा कहनेमें सुगम है, वैसे ही अनुष्ठानमें भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षणके लिये भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो। जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय वस्तुकी कोरी बातोंसे क्या लाभ? मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित यह कह देना बहुत सरल है कि 'स्वयं विज्ञाता या मन्ताको ही विचार या मनन करने-न करनेमें स्वतन्त्रता है। कर्ता चाहे तो करणोंको व्यापृत करे- न करे, उनसे काम ले अथवा न ले।' परंतु क्या मन मन्ताकी रुचिका अनुवर्तन करता है अथवा मन्ताकी रुचि न होते हुए भी उसको हठात् आकर्षित करता है? इसीलिये विवेकियोंने अध्यारोप और अपवादसे निष्प्रपंचका ही प्रपंचन किया है—'अध्यारो- पापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते। शिष्याणां बोधसिद्ध्यर्थं तत्त्वज्ञैः कल्पितः क्रमः॥' जब प्रपंच एवं तदन्तर्गत नामरूपक्रियाओंके आलम्बनद्वारा ही सर्वातीत तत्त्वको प्राप्त करना है,
५९८ भक्तिसुधा तब फिर उसमें उल्बण भावोंको सोच-समझकर त्यागनेके लिये पहले शान्त भावोंका अवलम्बन करना पड़ता है। तामस कर्म तथा विचार दूर करनेके लिये राजस और राजसको मिटानेके लिये सात्त्विक कर्मों तथा ज्ञानका आश्रयण किया जाता है। स्वाभाविक या पाशविक कर्मों तथा ज्ञानको मिटानेके लिये वेदशास्त्रसम्मत कर्म और ज्ञानोंका अवलम्बन करना आवश्यक होता है। योगशास्त्रने क्लिष्टा वृत्तियोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये अक्लिष्टा वृत्तियोंका अवलम्बन करना बतलाया है। घोर तथा मूढ़वृत्तियाँ बिना शान्तवृत्तियोंके सेवनके कभी भी दूर नहीं हो सकतीं। जब प्रपंचातीत परमतत्त्वसे प्रच्युत होकर जीव व्यावहारिक जगत्में अवतीर्ण होता है, तब उसके सामने विश्वके शुभ- अशुभ, न्याय-अन्याय, अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकारके विषय और व्यवहार उपस्थित होते हैं। भलाई-बुराई, विष-अमृत आदि भेद जब मानने पड़ते हैं, क्षुधा-पिपासा मिटानेके लिये अन्न-जलकी अपेक्षा होती है, तब फिर पुण्य-पापकी व्यवस्था भी माननी पड़ती है। अतएव वर्णाश्रमानुसार वेदशास्त्रोक्त कर्म- धर्मकी आवश्यकता होती है। बिना किसी निर्दोष सात्त्विक आलम्बनके मनको निरालम्ब नहीं किया जा सकता। नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीला- शक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण- साकार रूपमें अभिव्यक्ति वैदिकोंका मत है कि नामरूपसे अतीत वेदान्तवेद्य, परमतत्त्व ही स्वांशभूत प्राणियोंके कल्याणार्थ अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे परम मनोहर नामरूपको स्वीकार करते हैं। जैसे कोई परमकारुणिक चिकित्सक किसी कुपथ्यप्रिय, अदीर्घदर्शी, अबोध शिशुको उसके अभीष्ट कुपथ्यरूपमें दिव्य महौषध प्रदान करता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयोंमें आसक्तचित्त प्राणियोंके मनको प्रपंचातीत भगवान्के निजस्वरूपमें आकर्षित करनेके लिये ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्ययका ही दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रूप-सम्पन्न रूपमें प्रादुर्भाव होता है। भक्तोंके अभीष्ट भिन्न स्वरूपोंके विशिष्ट सौन्दर्य, माधुर्यादि लोकोत्तर गुणगणोंमें चित्तके आसक्त होनेके अनन्तर वही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य परमतत्त्व सुस्पष्ट रूपमें व्यक्त हो जाता है। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि वेदशास्त्र- सम्मत सभी स्वरूपोंमें एक वही पूर्णतम तत्त्व व्यक्त होता है। इसीलिये उनके माहात्म्य-प्रतिपादक सभी सद्ग्रन्थोंमें अन्तिम स्वरूप एक ही मिलता है। एक अनन्त, अखण्ड, निर्विशेष, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्द ही सर्वाधार, साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है। सभी नामरूप भगवान्के ही हैं गीतामें तो यहाँतक कहा गया है कि विश्वमें जो भी कोई ‘विभूतिमत् ऊर्जिततत्त्व’ दिखलायी देता हो, उसे भी भगवान्का ही रूप समझना चाहिये— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ (१०।४१) आचार्यप्रवर श्रीविद्यारण्यजीने ‘पंचदशी’ में कहा है कि परमेश्वरके भिन्न स्वरूपोंमें विवाद नहीं करना चाहिये। जब निखिल विश्व ही परमेश्वरका स्वरूप है, तब अमुक परमेश्वर है, अमुक नहीं, ऐसे विवादका अवसर ही कहाँ? इसीलिये अश्वत्थ, वट, हल, कुदालतककी पूजा अपने धर्ममें होती है। सभीमें पूर्णतम, परमतत्त्वका ही पारमार्थिक रूप उपलब्ध हो सकता है, फिर उसका नाम या रूप चाहे जो कुछ भी हो। इसीलिये नामविशेषपर आग्रह न करके अभिज्ञोंने ‘कस्मै चिन्महसे नमः, कस्मै देवाय हविषा विधेम’ इस रूपसे ही परमतत्त्वका वन्दन किया है, परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भगवान्में नाम और रूप हैं ही नहीं। यदि नामरूप हैं तो सब भगवान्के ही हैं, अन्य किसीके नहीं।
इष्टदेवकी उपासना ५९९
'किम्' शब्द सर्वनाम है, अतः वह सभीका वाचक है। जो सर्वस्वरूप है, उसमें ही 'किम्' शब्दका प्रयोग हो सकता है। जिस वस्तुपर किसी एकका अधिकार नहीं होता, वह राजाकी समझी जाती है। जो राजाकी वस्तु है, वह सबके उपयोगमें आती है। अतः 'किम्' शब्दका जैसे यह अर्थ है कि परमतत्त्वका विशेष नाम नहीं है, वैसे ही यह भी आशय है कि सब नाम और रूप उन्हींके हैं। भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति फिर भी राजस, तामस, सात्त्विक ऋषि, देवता या भगवत्सम्बन्धिनी नामरूपक्रियाएँ भवबन्धनसे छुड़ाकर परमतत्त्वको प्राप्त कराती हैं और उनके विपरीत नामरूपक्रियाएँ अनेक अनर्थयुक्त संसारमें भटकानेवाली होती हैं। इसीलिये वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त क्रियाएँ, मन्त्र एवं भगवन्नाम आदरणीय तथा समाश्रयणीय हैं। इसी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न गुणरूपविशिष्ट विग्रह और प्रतिमाओंकी आराधनाएँ मान्य हैं। उन सबकी पद्धति, अधिकार, शुद्धि, अशुद्धि सभी शास्त्रविधानके अनुसार ही होनी चाहिये। पारमार्थिक चर्चाओं एवं ज्ञानाभिमानसे उन सबकी अवहेलना केवल प्रमाद है। जैसे घी और बत्तीके संयोगसे व्यापक निर्विकार अग्नि दिव्य दीपशिखाके रूपमें प्रकट होती है, जैसे शैत्यके योगसे जल हिमरूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही अचिन्त्य लीलाशक्तिके योगसे अनामरूप भगवान् ही दिव्य नामरूप स्वरूपमें प्रकट होते हैं। अतएव भगवान्का नाम और रूप निरावरण भगवान्का साक्षात्स्वरूप ही है। जैसे काष्ठ, पाषाण, प्रासाद—जहाँ भी कहीं पैर रखा जाय, वह सब कुछ पृथ्वी ही है, वैसे ही जिस किसी भी नामरूपसे भगवान्का ही दर्शन और श्रवण है। तब भी विशुद्ध लीलाशक्तिकी महिमासे प्रकट भगवान्के नामरूप एवं लीलाएँ निरावरण भगवान्के रूप हैं, त्रिगुणमयी प्रकृतिके योगसे अभिव्यक्त इतर नामरूपक्रियाएँ सावरण भगवान्के रूप हैं। जैसे मेघादि अस्वच्छ उपाधियोंसे सूर्यमण्डल आवृत रहता है, परंतु दूरवीक्षणादि विशेष मन्त्रोंके द्वारा व्यवधान होनेपर भी वह आवृत नहीं होता, वैसे ही अविद्यादि मलिन शक्तियोंके योगसे नामरूप विवर्तमें पारमार्थिक तत्त्व आवृत रहता है, परंतु विद्या या लीला आदि दिव्य शक्तियोंके योगसे प्रकट भगवान्के नामरूपमें निरावरण भगवान्का स्पष्ट रूपसे भान होता है।
इष्टदेवकी उपासना
निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें शास्त्ररहस्यको जाननेवाले महानुभावोंका कहना है कि शैवग्रन्थोंमें श्रीविष्णुकी और वैष्णवग्रन्थोंमें श्रीशिवकी जो निन्दा पायी जाती है, वहाँ इस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अन्य देवताकी निन्दामें नहीं है, अपितु वह ग्रन्थ जिस देवताका वर्णन कर रहा है, उसकी प्रशंसामें है। इसपर कोई कहे कि 'अपने इष्ट देवतामें अनन्यताकी प्राप्तिके लिये उनसे भिन्न देवताकी उपेक्षा अपेक्षित है और वह उपेक्षा बिना अन्य देवताकी निन्दाके कैसे सिद्ध हो सकती है? इस तरह उस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अपने इष्ट देवतासे अन्य देवताकी उपेक्षाके लिये उसकी निन्दामें ही हो सकता है। किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसने अनन्यताके स्वरूपको ही यथार्थतया समझा नहीं है। क्या अपने एकमात्र इष्टदेवमें ही तत्परताको अनन्यता कहें? किंतु ऐसी अनन्यता खान-पान आदि लौकिक एवं सन्ध्यावन्दनादि वैदिक व्यवहार करनेवाले पुरुषमें सम्भव नहीं है। यदि कहा जाय कि उन लौकिक- वैदिक सब कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी ही उपासना करनेसे अनन्यता बन जायगी तो फिर जैसे अन्यान्य लौकिक-वैदिक कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी उपासना की जा सकती है, वैसे ही अन्य देवताकी पूजा
आदिके द्वारा भी अपने इष्टदेवकी उपासना करते हुए अनन्यता बन सकती है। यथार्थमें तो— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ अर्थात् '[हे राजन्!] प्राणी अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्म करते हुए उस पुरुषोत्तम हरिकी आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त भगवान्की प्रसन्नताका और अन्य कोई साधन नहीं है।' यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (गीता ९।२७) अर्थात् 'हे अर्जुन ! भोजन, होम, दान, तपस्या आदि जो कुछ भी करो, वह सब मुझे अर्पण कर दो।' 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) अर्थात् 'मनुष्य अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्की पूजा करके मुक्तिको प्राप्त कर सकता है।' —इत्यादि वचनोंसे शास्त्रोंने अपने-अपने वर्ण- आश्रमके अनुसार श्रौत-स्मार्त कर्मोंसे ही श्रीभगवान्की उपासना करना बतलाया है और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें तो पद-पदपर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र, प्रजापति आदि देवताओंकी पूजा दिखलायी पड़ती है। ऐसी हालतमें अपनेको वैदिक माननेवाला कोई पुरुष यह कहनेका साहस कैसे कर सकता है कि 'विष्णुके सिवाय कोई अन्य देवता मेरे लिये पूजनीय नहीं है।' यदि कहा जाय कि वहाँ उन इन्द्रादि देवताओंके रूपमें भगवान् विष्णुकी ही पूजा होती है तो इस तरह फिर सभी देवताओंकी पूजा की जा सकती है। जिन कामिनी, कांचन आदि विषयोंकी बड़े-बड़े विवेकी महापुरुषोंने निन्दा की है, उन्हीं तुच्छ विषयरूप विषसे भस्मीभूत चित्तवाले और उन्हीं विषयोंकी प्राप्तिके लोभसे वशीभूत होकर और तो क्या, म्लेच्छोंके चरणोंपर भी मस्तक झुकानेवाले लोग समस्त पापसमुदायका नाश करनेमें समर्थ श्रीशिव, विष्णु आदिके वन्दनको जब अनन्यताका विघातक कहते हैं, तब बड़ा आश्चर्य होता है। अपने इष्टमें अनन्यता अस्तु, इस तरह यह सिद्ध होता है कि श्रीभगवान्को प्रसन्न करनेकी बुद्धिसे भगवान्के लिये ही किये गये समस्त कर्मोंको परमगुरु श्रीभगवान्के चरणोंमें समर्पण करना ही यथार्थ अनन्यता है। काशीखण्डके इक्कीसवें अध्यायमें ध्रुवजी श्रीविष्णुजीसे स्तुतिमें कहते हैं कि— मित्राणां हि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबन्धुषु । त्वत्तो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण चराचरे ॥ त्वमेव माता त्वं तातस्त्वं सुहृत्त्वं महाधनम्। त्वमेव सौख्यसम्पत्तिस्त्वमायुर्जीवनेश्वरः ॥ सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्त्वदर्पितम्। तत्कर्म यत्त्वदर्थं वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः॥ अहो पुंसां महामोहस्त्वहो पुंसां प्रमादता। वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः ॥ अधोक्षजातपरो धर्मो नार्थो नारायणात्परः । न कामः केशवादन्यो नापवर्गो हरिं विना ॥ इयमेव परा हानिरुपसर्गोऽयमेव हि। अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं न यत्स्मरेत् ॥ गोविन्दं परमानन्दं मुकुन्दं मधुसूदनम्। त्यक्त्वाऽन्यं नैव जानामि न भजामि स्मरामि न ॥ न नमामि न च स्तौमि न पश्यामीह चक्षुषा । न स्पृशामि न वा यामि गायामि न हरिं विना ॥ अर्थात् 'हे नारायण ! इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्में आपसे अन्य कुछ भी नहीं है। मित्रोंमें भार्या, सब बन्धुओंमें परम हितैषी धर्म आप ही हैं। माता, पिता, सुहृद्, धन, सौख्य, सम्पत्ति और तो क्या— प्राणेश्वर आप ही हैं। कथा वही है, जिसमें आपका नाम हो, मन वही है जो आपमें अर्पित हो, काम वही है जो आपके लिये ही किया जाय और तपस्या वही है, जिसमें आपका स्मरण होता रहे। प्राणियोंके उस
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महामोहको उस प्रमादिताको देखकर बड़ा ही खेद और आश्चर्य होता है, जिससे आपका अनादर करके वे अन्य विषयोंमें महान् परिश्रम करते हैं। हे भगवन्! आपसे श्रेष्ठ ऐसा अन्य कोई न धर्म है, न अर्थ, न काम और न मोक्ष ही। भगवान् वासुदेवका स्मरण न होना ही परम हानि, परम उपद्रव, परम दुर्भाग्य है। परमानन्दकन्द मुकुन्द मधुसूदन भगवान् गोविन्दको छोड़कर मैं न तो अन्य किसीको जानता ही हूँ, न स्मरण करता हूँ, न भजता हूँ। न नमन करता हूँ, न किसी दूसरेकी स्तुति करता हूँ, न अन्यको आँखसे देखता हूँ, न स्पर्श करता हूँ, न अन्यत्र कहीं जाता हूँ, न बिना हरिके अन्यका गान करता हूँ।' इत्यादि श्लोकोंके द्वारा अनन्यताका स्वरूप प्रदर्शित किया है। शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि इतना सब मन्थन करनेका तात्पर्य यही है कि भगवान् श्री
६०२ भक्तिसुधा करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरी जो परमशक्ति है, उसको देनेवाले सुदर्शनचक्रके दाता श्रीविश्वनाथ ही हैं। पूर्वकालमें जालन्धर नामका एक दैत्य हुआ था, जिसके पराक्रमसे मैं भी भयभीत हो गया था। किंतु भगवान् श्रीशंकरने अपने पैरके अँगूठेके अग्रभागसे चक्र बनाकर, उससे जालन्धरको मार डाला था। अपने नेत्रकमलोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करके मैंने वही चक्र उनसे प्राप्त किया। दैत्यसमुदायको मर्दन करनेवाला वही यह सुदर्शनचक्र मेरे पास है। समस्त दुष्ट प्राणियोंको भगानेवाले उस सुदर्शनचक्रको तुम्हारी रक्षाके लिये आगे भेजकर मैं यहाँ आया हूँ। अब इस समय श्रीविश्वनाथका दर्शन करनेके लिये मैं काशीकी ओर चल रहा हूँ। उसके बाद पंचक्रोशीकी सीमाके पास पहुँचकर वे गरुड़से नीचे उतरे और उन्होंने ध्रुवका हाथ पकड़कर मणिकर्णिकामें स्नान किया। फिर श्रीविश्वनाथका पूजन करके ध्रुवके हितकी कामनासे कहा—हे ध्रुव ! तुम इस अविमुक्त वाराणसीक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्के लिंगकी स्थापना करो। इससे त्रैलोक्यस्थापन करनेका अक्षय पुण्य तुम्हें प्राप्त होगा' इत्यादि। ऐसे इस गम्भीर शास्त्रीय अभिप्रायको न समझकर शैव-वैष्णव-नामधारी पाखण्डसे नष्टबुद्धि मायामोहित जन ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमें भेदभाव देखते हैं। यह नहीं जान पाते कि वे तीनों एक ही सच्चिदानन्दघन पूर्ण अद्वितीय तत्त्व हैं। ब्रह्माणं केशवं रुद्रं भेदभावेन मोहिताः। पश्यन्त्येकं न जानन्ति पाषण्डोपहता जनाः ॥ वे ऐसे सैकड़ों शास्त्रवचनोंसे उपदेश किये गये अभेदको नहीं देखते। इस बातकी उपेक्षा करते हैं कि एक ही परमकारण तत्त्व अनेक रूपमें विराजमान है। उन परमेश्वरके अनेक रूपोंमेंसे किसी एकको लेकर दूसरे रूपोंकी निन्दा करते हुए आपसमें कलह करते हैं। ऐसा करके मानो अपने उसी आराध्य भगवान्से ही द्रोह करके नरकमें जानेकी तैयारी करते हैं। एक-दूसरेपर अनन्य प्रीति करनेवाले दो मालिकोंके नौकर यदि एक-दूसरेके स्वामीकी निन्दा करें तो वे दोनों जैसे स्वामिद्रोही ही कहे जाते हैं, वैसे ही एक- दूसरेके आत्मा और एक-दूसरेके ध्यानमें निमग्न मा- धव श्रीविष्णु और उमा-धव श्रीशिवकी निन्दा करनेवाले स्वामिद्रोही ही हैं। जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये कोई जिज्ञासु ऐसा प्रश्न कर सकता है कि भगवान् शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि देवताओंमेंसे किसकी उपासना करनी चाहिये ? कोई किसीको निकृष्ट तो कोई किसीको बड़ा बतलाता है। ऐसी स्थितिमें बुद्धि व्याकुल हो जाती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि भगवान्के विचित्र प्रपंचमें विचित्र स्वभावके जीवोंका निवास है। इसीलिये श्रीभगवान् भिन्न स्वभाववाले जीवोंकी विभिन्न रुचियोंका अनुसरण करके विभिन्न रूपोंमें प्रकट होते हैं। किसीका चित्त भगवान्के किसी स्वरूपमें खिंचता है, किसीका किसीमें। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रतिपादित सभी रूप भगवान्के ही हैं। अतः जिस रूपमें प्रीति हो, उसी रूपकी उपासना करनी चाहिये। अनभिज्ञ लोग एककी निन्दा और दूसरे रूपकी प्रशंसा करते हैं, अभिज्ञ तो सभी रूपोंमें अपने प्रभुको ही देखकर सन्तुष्ट होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अनेक विद्याओंमें निपुण होनेके कारण अपने अनेक वेष और नामोंसे अनेक कार्य करता हो, भिन्न-भिन्न कार्यार्थी पृथक् वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों और उसे ही सर्वोत्कृष्ट समझने लगें। दूसरे लोग दूसरे वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों। उनमें कुछ लोग किसी रूपके प्रशंसक हों और कुछ किसीके निन्दक हों, इसलिये परस्पर युद्ध होने लगे, वहाँ जो लोग वस्तु-स्थितिको जाननेवाले होंगे, वे तो दोनों ही विवादी दलोंकी मूर्खतापर परिहास करेंगे; क्योंकि वे दोनों ही वेषोंमें एक ही तत्त्वको देखते हैं।
इष्टदेवकी उपासना ६०३ उपासनाके लिये अपनी कुल- परम्पराका समादर योगवासिष्ठके विपश्चिदाख्यानमें मृगरूपसे समागत विपश्चित्को देखकर श्रीवसिष्ठजीने यही विचार किया था कि जिस व्यक्तिका जो स्वरूप कभी भी उपास्य हो, उसका कल्याण उसके ही द्वारा सुगम होता है। यह समझकर करोड़ों जन्मके पहले अग्निकी उपासना करनेवाले मृगरूप विपश्चित्के सामने अपने योगबलसे उन्होंने अग्निका प्राकट्य किया। अग्निका दर्शन होते ही वह मृग ऐसी स्नेहभरी दृष्टिसे अग्निको देखने लगा, जैसे अग्निके साथ उसका कोई बहुत पुराना सम्बन्ध हो। अनन्तर वसिष्ठजीकी कृपासे उसका कल्याण हुआ। अस्तु, प्रकृतमें कहना यही है कि स्वप्नदर्शन तथा माहात्म्यश्रवण आदिसे चित्तका आकर्षण देखकर अपने इष्टदेवका निर्णय करना चाहिये। यह स्पष्ट है कि अनेक जन्मके साधनोंसे प्राणीकी उपासनामें उन्नति होती है। जन्म-जन्ममें मार्ग-परिवर्तन करनेसे यथेष्ट लाभ सम्भव नहीं है। अतः पूर्वकी उपासनाके संस्कारका ज्ञान करके उसी उपासनामें प्रवृत्त होना चाहिये। पितृपितामह-परम्पराकी उपासनाओंके अनुसार ही प्राणीको उपासना करनी चाहिये। वर्तमान जन्मकी सत्प्रवृत्ति और दुष्प्रवृत्तिमें पिछले जन्मोंके संस्कार भी अपेक्षित होते हैं। यदि किसीको दुर्देववश किसी ऐसे देश-कालमें ऐसे माता-पिता, गुरुजनों तथा ग्रन्थोंका संसर्ग हुआ कि जिनसे दुराचार-दुर्विचारको ही उत्तेजना मिली तो उस व्यक्तिके लिये दुःसंग और असद्विचारवाले शास्त्रोंको छोड़कर सत्पुरुषसंग, सच्छास्त्रके अभ्यास एवं तदनुसार सदाचार-सद्विचारके सम्पादनमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिसे पूर्वसंस्कारके अनुसार शुद्ध विचारवाले देश-काल तथा माता-पिता एवं गुरुजनोंका संयोग प्राप्त हुआ और सच्छास्त्र ही अध्ययन करनेको मिले, उसके लिये सदाचार-सद्विचारकी वृद्धिमें बड़ी सहायता मिलती है। इसीलिये प्रायः सन्मार्गस्थ सदाचारीको उसकी भावना और उपासनाके अनुसार ही समीचीन देश-काल और माता-पिता तथा शास्त्रोंका संसर्ग मिलता है। इसी बातकी इंगना श्रीभगवान्ने 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' 'अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।', 'पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।' (गीता ६।४१-४२,४४) इत्यादि वचनोंसे की है। इसीलिये यह बहुत सम्भव है कि हमारी उपासनाके अनुकूल ही कुलमें हमारा जन्म हुआ हो। अतः हमें माता-पिता, गुरुजनोंके अनुसार ही उपासना करनी चाहिये। यों भी इस बातके समझनेमें सुगमता होगी कि जैसे कोई पुरुष किसी अपरिचित मार्गसे किसी अभीष्ट देशमें जा रहा हो, आगे चलकर उसे तीन मार्ग दिखायी दें और तीनोंपर कुछ लोग चल रहे हों, प्रश्न करनेपर सभी अपने मार्गको ही निर्विघ्न बतलाते हों, साथ ही दूसरे मार्गोंको नाना प्रकारके सिंह- व्याघ्र-सर्प-वृश्चिक-कण्टकाकीर्ण गर्तोंसे उपद्रुत बतलाते हों, ऐसी स्थितिमें यदि जाना आवश्यक ही हो तो वह प्राणी किस मार्गका अवलम्बन करेगा? समझदार तो यही कहेंगे कि उन मार्गानुगामियोंमेंसे अधिक विश्वास उन्हींपर किया जा सकता है; जो अपने राष्ट्र, प्रान्त, नगर तथा ग्रामके हों या अपने कुटुम्बियोंमेंसे हों। यह बात दूसरी है कि जब बहुत विशिष्ट अनुभवोंसे उस मार्गके दूषित तथा मार्गान्तरके निर्विघ्न होनेकी बात निश्चित हो गयी हो, तब किसी दूसरे मार्गका अवलम्बन किया जाय। इसलिये भी अपनी पितृ-पितामह-परम्परामें जो उपासना और आचार तथा शास्त्र मान्य हों, वही उचित हैं। वेदने भी 'किंस्वित् पुत्रेभ्यः पितरावुपावतः' इस वाक्यसे परम्परागत आचारका समर्थन किया है। श्रीनीलकण्ठजीने इसका यही अभिप्राय बतलाया है कि पुत्रके हितके लिये माता, पिता या पितामह- प्रभृतिने जिस व्रतका पालन किया हो या जिस देवताकी उपासना की हो, उस पुत्रको उसी व्रत या देवताका अवलम्बन करना चाहिये। ऐसे ही
सम्प्रदायभेदसे भस्म, गोपीचन्दन आदिकी भी व्यवस्था बतायी गयी है। उसमें भी यह व्यवस्था शुद्ध शास्त्रीय है कि स्नान करके मृत्तिका और होम करके भस्म और देवपूजनके पश्चात् चन्दन आदि लगाया जाय; क्योंकि भस्म वैदिकोंके लिये किसी अवस्थामें त्याज्य नहीं हो सकता। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि 'यद्यपि इस तरहसे किसी भी देवताकी आराधना, भस्म, रुद्राक्ष, गोपीचन्दनादिका धारण संगत मालूम होता है तथापि साम्प्रदायिक लोगोंकी बातें सुनकर जी घबराता है। कोई शिवजीके तथा भस्म-रुद्राक्षके निन्दनमें सहस्रों वचन उपस्थित करते हैं तो कोई विष्णु तथा गोपीचन्दनादिके निन्दनमें सहस्रों वचन देते हैं। इसका क्या आशय है? उनको यही उत्तर दिया जा सकता है कि कुछ वचन तो निन्दामें तात्पर्य न रखकर एककी स्तुतिमें ही तात्पर्य रखते हैं। जैसे शैवोंकी शिवमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये विष्णुके निन्दासूचक और विष्णुमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये शिवके निन्दापरक वचन कहे जा सकते हैं, परंतु कुछ ऐसे भी वचन हैं, जिनका सिवा राग-द्वेषके और कोई मूल ही नहीं हो सकता। बहुत-से सद्ग्रन्थ साम्प्रदायिकोंके कलहोंमें बिगाड़े गये हैं। इसीलिये तो गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ (रा०च०मा० ४।१४) ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायोंमें कहा यह जाता है कि बिना इन आचारोंके प्राणीका कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परंतु इन आचारोंके बिना उसके हाथसे जल भी अग्राह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारोंके विषयमें भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचारसे एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचारसे दूसरा सम्प्रदाय सर्वथा पतन बतलाता है। एक वैसे आचारविहीनके दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्तवालेके ही दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदायमें जो आचार प्रचलित है, उसीके लिये उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ- पितामहादिमें जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिये। विवादका मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्योंकी निन्दा करके अपने सम्प्रदायके आचारों एवं सिद्धान्तोंको स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥' (गीता ६।३२) भगवान्के इन भावोंको भूल जाते हैं। लोगोंको इस बातपर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्तिको अपने सम्प्रदायमें मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदायके व्यक्तिको अपनेमें मिलायेंगे तो अन्य लोगोंको भी वैसे ही क्षोभ होगा। परंतु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायोंमें मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई साम्प्रदायिक भी स्मार्त बना लिये जाते हैं। यही राग- द्वेषका मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दू- मुसलमानोंसे भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिकोंमें दृष्टिगोचर होता है। कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण वेदान्तवेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान् ही सकल सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यके विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्मसे समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवनका चरम फल है। परंतु प्रथमसे ही प्राणियोंका मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान्के मनोवचनातीत स्वरूपमें प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परमकरुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकारके
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मंगलमय स्वरूपको धारण करते हैं। उपनिषदोंमें दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या, वैश्वानर-विद्याओंके रूपमें इनकी ही अनेक सगुण उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। ये ही भगवान् विघ्नराज श्रीगणेशके रूपमें ऋद्धि-सिद्धि आदि निज शक्तियोंसहित आराधित होकर भक्तोंका सर्वविघ्ननिवारण, सर्वाभीष्ट- सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम गति देते हैं और ये ही विश्वचक्षु भगवान् भास्करके रूपमें उपास्य होकर सर्वरोगनिवारणपूर्वक अपने पारमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार कराकर भवरोगसे मुक्त कर देते हैं। ऐसे ही ये ही वेदान्तवेद्य शुद्ध भगवान् अविद्याशक्तिप्रधान होकर प्रपंचका निर्माण करते हैं, विद्याशक्तिप्रधान होकर मोक्ष प्रदान करते हैं और अनन्त अखण्ड विशुद्ध चिति-शक्ति- रूपसे सर्व दृश्यके अधिष्ठानरूप विराजमान होते हैं। वे ही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि रूपमें उपास्य होकर सर्वभुक्ति-मुक्ति-प्रदायक होते हैं। वे ही विशुद्ध ब्रह्म, भूतभावन भगवान् विश्वनाथ, श्रीविष्णु, नृसिंह एवं श्रीमद्राघवेन्द्र रामभद्र तथा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दरूपमें उपासित होकर सर्वसिद्धि प्रदान करते हैं। अस्तु— श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है इन सभी स्वरूपोंकी गायत्र्यादि वैदिक मन्त्रों एवं वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तकर्मोंद्वारा की गयी उपासना मुख्य है। वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म-कर्मके अनुष्ठानके बिना पाशविकी उच्छृंखल चेष्टाओंका अन्त नहीं होता। बिना श्रौत-स्मार्तशृंखलाबद्ध चेष्टाओंके इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदिका नियन्त्रण असम्भव है और बिना सर्व करण-रोधके अदृश्य विशुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार भी असम्भव है। अतः श्रौत-स्मार्त-कर्म-धर्मद्वारा ही परमेश्वरका मुख्य आराधन है। इसी विशुद्ध वैदिक धर्मका बौद्ध आदि अवैदिक एवं वैदिकाभासोंद्वारा विप्लव होनेपर भगवान् शंकराचार्यने अवतीर्ण होकर उसे पुनः प्रतिष्ठित किया है। श्रीविद्यारण्यप्रभृति विद्वानोंने तथा अन्यान्य प्राचीन-अर्वाचीन सन्तोंने भी इसी मतका पोषण किया है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदासने भी इसी परम उदार सिद्धान्तका पोषण किया है। उसमें तीनों वर्णोंके लिये गायत्री मुख्य उपास्य है। जिनके लिये गायत्रीका अधिकार नहीं है, उन अवैदिकोंके लिये अवैदिकी उपासनाएँ हैं। जो गायत्रीमन्त्रके अधिकारी त्रैवर्णिक वैदिकसंस्कार-सम्पन्न हों, उन्हें यदि गायत्रीमें परितोष न हो तो विष्णु, शिव आदि देवताओंका विष्णु, शिव आदि मन्त्रोंसे आराधन कर सकते हैं। वैदिकसंस्कार-सम्पन्न होनेके कारण इन मन्त्रोंमें उनका अधिकार सहज सिद्ध है। अर्थात् गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु तथा सूर्य—इन पंच देवताओंकी, किंवा अन्य सगुण एवं निर्गुण ब्रह्मकी उपासना गायत्रीमन्त्रद्वारा ही पूर्ण सुसम्पन्न हो सकती है और इसके सिवा वैदिक शिव, विष्णु आदि मन्त्रोंसे भी तत्तत् उपासनाएँ हो सकती हैं। इन समस्त वैदिक उपासनाओंमें वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तधर्मका अनुष्ठान भी परमावश्यक है। वेदने उपासनाविहीन कर्मोंको स्वप्रकाश ब्रह्मकी अपेक्षा स्वर्गादि तुच्छ फलके देनेवाले होनेसे अन्धतमकी प्राप्तिका कारण कहा है। परंतु कर्मविहीन उपासनाओंसे तो घोर अन्धतमकी प्राप्ति कही गयी है; क्योंकि स्वधर्मानुष्ठानके बिना इष्टमें चित्तकी एकाग्रतारूप उपासना भी सम्पन्न न हो सकेगी। स्वधर्मभ्रष्टके लिये कहा गया है कि चाहे कितना भी श्रीहरिकी भक्ति, किंवा ध्यानमें तत्पर क्यों न हो, परंतु यदि आश्रमके आचारोंसे भ्रष्ट है तो वह पतित ही कहा जाता है। यथा— हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानपरोऽपि वा। भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥ (बृहन्नारदीयपु० ४।२४) अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो—सबको वेदशास्त्रोक्त स्वधर्मका अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजोंके