भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्गुण या सगुण ५९३ ज्ञानीजन परमार्थतः भगवान्को अपना अन्तरात्मा समझकर पुनः काल्पनिक भेदका अवलम्बन करके भगवान्को भजते हैं। 'पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥' पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस भावनासे यदि भक्ति हो, तब तो यह भक्ति अपरिगणित मुक्तियोंसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि अद्वैत-प्रबोध बिना यह द्वैत सर्वानर्थका मूल ही है। राग, द्वेष, शोक, मोह—सबका प्रसव इस द्वैतसे ही होता है; परंतु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वमनीषाकल्पित द्वैत तो अद्वैतसे भी अति सुन्दर है— द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी। उनकी उपासना भेदभावना तथा अभेदभावना दोनों ही प्रकारसे हो सकती है। स्वयं श्रीमुखकी उक्ति है कि— ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ (गीता ९।१५) कोई भक्तियोगसे, कोई ज्ञानयोगसे मेरा यजन करते हुए उपासना करते हैं। कुछ लोग एकत्वभावसे और कुछ पृथक्त्वभावसे मुझ विश्वतोमुखकी उपासना करते हैं। ज्ञानी अत्यन्त निष्काम तथा निष्कपट होकर भगवान्को भजता है। अतएव 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्तिर्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि स्थलोंमें श्रीभगवान्ने ही ज्ञानीको अपनेमें अनन्य प्रीतिमान और उसे निज अन्तरात्मा ही बतलाया है। भगवद्भावापन्न भगवान्के अन्तरात्मस्वरूप ज्ञानीको भगवान्से भिन्न कोई वस्तु ही दृष्टिगोचर नहीं होती। इसीलिये मुक्तोपसृप्य भगवान्को प्राप्त कर लेनेसे मुक्तिकी भी स्पृहा मिट जाती है। अतएव— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) ये भक्त उसी तरह कभी निर्विकल्प समाधिसे भगवान्के अंकमें उनके साथ एकमेक होकर विराजमान होते हैं और कभी श्रद्धाभक्तिसे भगवान्के श्रीचरणकमलके सौन्दर्य-माधुर्यादिका सेवन करते हैं, जिस तरह प्रेयसी कभी प्रियतमके अंकमें एवं वक्षस्थलपर यथेष्ट क्रीड़ा करती है और कभी सावधानीसे प्रियतमके पादपद्मका आराधन करती है। प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्याम्प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे चतुरा नायिका प्रियतमके साथ एकमेक होकर भी व्यवहारमें अपने प्रियतमको चैलांचलके व्यवधान (घूँघट-पटकी ओट)-से ही देखती है। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी॥ खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ (रा०च०मा० २।११७।६-७) ठीक वैसे ही ज्ञानी यद्यपि अपने निरतिशय निरुपाधिक प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्के साथ सर्वथा एकमेक ही रहते हैं तथापि व्यवहारमें भेद-भावनासे ही अपने भगवान्की भक्ति करते हैं। विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्पनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ तथा रोम- रोममें आन्तर-बाह्य सर्वरूपसे प्रभुका सुमधुर स्वरूप अनुभव करनेके लिये ही ज्ञानीजन भक्तियोगसे श्रीपरमहंस हो जाते हैं और वे ही शुद्ध प्रेमी होते हैं। अतः इनके लिये प्रभुका प्रादुर्भाव है। ऐसे ही शुद्ध-प्रेमियोंमें