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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

निर्गुण या सगुण ५९३ ज्ञानीजन परमार्थतः भगवान्‌को अपना अन्तरात्मा समझकर पुनः काल्पनिक भेदका अवलम्बन करके भगवान्‌को भजते हैं। 'पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात् सा तु मुक्तिशताधिका॥' पारमार्थिक अद्वैत और भजनके लिये द्वैत, बस इस भावनासे यदि भक्ति हो, तब तो यह भक्ति अपरिगणित मुक्तियोंसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि अद्वैत-प्रबोध बिना यह द्वैत सर्वानर्थका मूल ही है। राग, द्वेष, शोक, मोह—सबका प्रसव इस द्वैतसे ही होता है; परंतु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वमनीषाकल्पित द्वैत तो अद्वैतसे भी अति सुन्दर है— द्वैतं मोहाय बोधात् प्राक् जाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्॥ भगवान् निर्गुण भी हैं और सगुण भी। उनकी उपासना भेदभावना तथा अभेदभावना दोनों ही प्रकारसे हो सकती है। स्वयं श्रीमुखकी उक्ति है कि— ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥ (गीता ९।१५) कोई भक्तियोगसे, कोई ज्ञानयोगसे मेरा यजन करते हुए उपासना करते हैं। कुछ लोग एकत्वभावसे और कुछ पृथक्त्वभावसे मुझ विश्वतोमुखकी उपासना करते हैं। ज्ञानी अत्यन्त निष्काम तथा निष्कपट होकर भगवान्‌को भजता है। अतएव 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्', (गीता ७।१८) 'एकभक्तिर्विशिष्यते' (गीता ७।१७) इत्यादि स्थलोंमें श्रीभगवान्‌ने ही ज्ञानीको अपनेमें अनन्य प्रीतिमान और उसे निज अन्तरात्मा ही बतलाया है। भगवद्भावापन्न भगवान्‌के अन्तरात्मस्वरूप ज्ञानीको भगवान्‌से भिन्न कोई वस्तु ही दृष्टिगोचर नहीं होती। इसीलिये मुक्तोपसृप्य भगवान्‌को प्राप्त कर लेनेसे मुक्तिकी भी स्पृहा मिट जाती है। अतएव— न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।३४) ये भक्त उसी तरह कभी निर्विकल्प समाधिसे भगवान्‌के अंकमें उनके साथ एकमेक होकर विराजमान होते हैं और कभी श्रद्धाभक्तिसे भगवान्‌के श्रीचरणकमलके सौन्दर्य-माधुर्यादिका सेवन करते हैं, जिस तरह प्रेयसी कभी प्रियतमके अंकमें एवं वक्षस्थलपर यथेष्ट क्रीड़ा करती है और कभी सावधानीसे प्रियतमके पादपद्मका आराधन करती है। प्रियतमहृदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्याम्प्रेयसी वा विधत्ताम्। विहरतु विदितार्थो निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद्द्वयं स्यात्॥ जैसे चतुरा नायिका प्रियतमके साथ एकमेक होकर भी व्यवहारमें अपने प्रियतमको चैलांचलके व्यवधान (घूँघट-पटकी ओट)-से ही देखती है। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी॥ खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥ (रा०च०मा० २।११७।६-७) ठीक वैसे ही ज्ञानी यद्यपि अपने निरतिशय निरुपाधिक प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्‌के साथ सर्वथा एकमेक ही रहते हैं तथापि व्यवहारमें भेद-भावनासे ही अपने भगवान्‌की भक्ति करते हैं। विश्वेश्वरोऽपि सुधिया गलितेऽपि भेदे भावेन भक्तिसहितेन समर्पनीयः। प्राणेश्वरश्चतुरया मिलितेऽपि चित्ते चैलाञ्चलव्यवहितेन निरीक्षणीयः॥ अन्तरात्मा, अन्तःकरण, प्राण, इन्द्रियाँ तथा रोम- रोममें आन्तर-बाह्य सर्वरूपसे प्रभुका सुमधुर स्वरूप अनुभव करनेके लिये ही ज्ञानीजन भक्तियोगसे श्रीपरमहंस हो जाते हैं और वे ही शुद्ध प्रेमी होते हैं। अतः इनके लिये प्रभुका प्रादुर्भाव है। ऐसे ही शुद्ध-प्रेमियोंमें

५९४ भक्तसुधा श्रीव्रजांगना प्रभृति थीं, जिन्हें श्रीकृष्णके विरहमें एक क्षण भी सहस्रों युगके समान प्रतीत होते थे और श्रीकृष्णके सम्मिलनमें सहस्र कल्प भी क्षणहीके समान प्रतीत होते हैं। इस तरह जो प्रभुके बिना प्राण- धारण ही नहीं कर सकते, उनके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इस शुद्ध तत्त्वनिष्ठ प्रेमीके लिये मुख्यरूपसे प्रभुका प्राकट्य होता है। फिर तो मुमुक्षुओंके लिये, किं बहुना प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इसी वास्ते तो श्रीशुकदेवजीने प्राणिमात्रके निःश्रेयसको ही प्रभु-प्राकट्यका प्रयोजन कहा है—'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) यहाँ 'नृणां' से 'नरमात्राभिमानिनां' यह अर्थ समझना चाहिये। जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' यहाँपर श्रीशंकराचार्य भगवान्ने 'नरे' का 'नरमात्राभिमानिनि' यह अर्थ किया है। भावार्थ यह हुआ कि ज्ञानी और उपासकोंसे भिन्न साधारण अज्ञ-प्राणियोंके निःश्रेयसके लिये निर्गुण निराकार निर्विकार भगवान्का सगुणरूपमें प्राकट्य होता है। भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण अतएव काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय, स्नेह आदि किसी भी भावसे भगवान्में चित्त लगानेसे प्राणियोंका कल्याण हो जाता है, अर्थात् यहाँ ज्ञानके बिना भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जैसे विष-बुद्धिसे भी अमृतपान करनेसे अमृतत्व-लाभ होता है, वैसे ही ब्रह्मबुद्धि बिना भी जिस किसी तरह भी श्रीकृष्णका सेवन करनेसे भगवत्प्राप्ति हो ही जाती है; क्योंकि वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करती। यद्यपि यों तो जब 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सब कुछ ब्रह्म ही है, फिर प्राकृत स्त्री-पुत्र आदिके प्रेमियोंको भी मुक्त हो जाना चाहिये; क्योंकि जब सब वस्तु ब्रह्मकी है, ज्ञानकी अपेक्षा है ही नहीं, फिर पत्नी-सेवन भी ब्रह्मसेवन क्यों न माना जाय? इत्यादि शंकाएँ होती हैं। तथापि भगवान् निरावरण ब्रह्म हैं और प्रपंच सावरण ब्रह्म है। बस, इसी भेदसे भगवान्का सेवन ज्ञान बिना भी कल्याणकारक है और प्रपंच-सेवन ज्ञान बिना प्रपंचका ही प्रापक है। जैसे मेघके सम्बन्धसे आदित्यका रूप छिप जाता है; परंतु दिव्य उपनेत्र या दूरबीनके सम्बन्धसे आदित्यका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु अतिदिव्य स्वरूपमें स्पष्ट होता है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी मलिन शक्तिके सम्बन्धसे प्रपंचरूपमें प्रकट ब्रह्मका निजी दिव्यरूप तिरोहित या आवृत हो जाता है; परंतु दिव्य लीलाशक्तिके योगसे दिव्य मधुर सगुण साकार श्रीराम श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्मका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु दिव्य स्वरूपमें प्रकट होता है। अतः निरावरणरूपमें ज्ञानकी आवश्यकता नहीं, सावरण- रूपमें ही है। सत्त्वादिगुणकृत प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण ही ये निर्गुण भी कहे जाते हैं। इसी आशयसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्' (श्रीमद्भा० १०।८८।५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। इन्हें जार-बुद्धिसे समाश्रयण करके भी कुछ व्रजांगनाएँ मुक्त हो गयीं— 'तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।११) जैसे चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे भी प्रवृत्त होनेसे प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही निरावरण श्रीकृष्ण परमात्मामें किसी भी बुद्धिसे प्रवृत्त क्यों न हो, प्राप्ति अखण्ड अनन्त निरावरण ब्रह्मकी ही होगी।

तृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व भगवत्प्राप्ति प्रायः लोग पूछा करते हैं कि 'क्या भगवत्प्राप्ति इसी जन्ममें हो सकती है?' उनके प्रश्नका उत्तर है—ऐसा एक ही जन्ममें हो सकता है या अनेक जन्मोंमें, इसका कोई नियम नहीं है, किंतु जब भी भगवान्‌के प्रति प्रेमका गाढ़ उदय हो जाता है, भगवान् तभी मिल जाते हैं— हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ (रा०च०मा० १।१८४।५) अनेक जन्मोंतक भी यदि प्रेमका संचार न हो तो भगवान् नहीं प्राप्त होते, प्रेम प्रकट हो जानेपर भगवान् एक ही जन्ममें मिल जाते हैं। जिस समय भक्त भगवान्‌से मिलनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वाध्याय, ध्यान आदिको प्राप्त होता है; उस समय भगवान्‌को अवश्य प्रकट होना पड़ता है। आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, परम निष्काम भगवान् परम स्वतन्त्र हैं तथापि भक्तप्रेममें पराधीन होना उनका एक स्वभाव है। अनुभवी लोगोंने कहा है— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यद्बद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ 'अहो! कोई निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मको, कोई सगुण-साकार ब्रह्मको भजते हैं, परंतु मैं तो उस प्रेमबन्धनको भजता हूँ, जिससे बँधकर अनन्त प्राणियोंको मुक्ति देनेवाला, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म भक्तोंका खिलौना बन जाता है।' जिस समय भक्त भगवान्‌के बिना न रह सके, उस समय भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते। जैसे पंखरहित पतंग-शावक अपनी माँको पानेके लिये व्याकुल रहते हैं, जैसे क्षुधार्त वत्सतर (छोटे गोवत्स) माँका दूध चाहते हैं, किंवा परदेश गये हुए प्रियतमसे मिलनेके लिये प्रेयसी विषण्ण (व्याकुल) होती है, हे कमलनयन! मेरा मन आपको देखनेके लिये वैसे ही उत्कण्ठित होता है— अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥ (श्रीमद्भा० ६।११।२६) भगवान्‌में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति इस प्रकारकी सोत्कण्ठ भक्तकी प्रार्थनासे भगवान् द्रुत होकर भक्तसे मिलने दौड़ पड़ते हैं। हाँ, यह ठीक है कि भगवत्सम्मिलनकी ऐसी उत्कट उत्कण्ठा सरल नहीं है, किंतु जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरोंके पुण्यपुंजसे ही भगवान्‌में उत्कट प्रीति प्राप्त होती है। इसीलिये उपनिषदोंने कहा है कि ब्राह्मणादि अधिकारी यज्ञ, तप, दान और अनशनादि सत्कर्मोंसे उन परमतत्त्व भगवान्‌को जाननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न करते हैं— 'तमे तं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन विविदिषन्ति।' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२२) जब उस परमतत्त्वकी जिज्ञासा ही उत्पन्न करनेमें अनेक जन्मोंके सत्कर्मोंकी अपेक्षा होती है, तब स्पष्ट ही है कि जिसे भगवत्सम्मिलनकी उत्कट कामना है, जिसे भगवान्‌के न मिलनेसे महती व्याकुलता है, वह केवल इसी जन्मका सत्कर्मी नहीं, अपितु पहले जन्मोंसे भी उसका इस सम्बन्धमें प्रयत्न चल रहा है। इस दृष्टिसे ध्रुवकी जन्मान्तरीय तपस्याओं तथा 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।' (गीता ७।१९) इत्यादि वचनोंकी संगति लग जाती

५९६ भक्तिसुधा है। प्रेमके उत्कट हो जानेपर उसी क्षण भगवान्‌का दर्शन होता है। फूल तोड़नेमें विलम्ब हो सकता है, किंतु उस समय भगवान्‌के मिलनेमें किंचित् भी विलम्ब नहीं होता। भगवान् प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वसाक्षी हैं, उनको पानेमें कौन कठिनाई— कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- रूपासने स्वे हृदि छिद्रवत् स्वतः। (श्रीमद्भा० ७।७।३८) —इत्यादि बातोंकी भी संगति लगती है। भगवत्प्राप्तिमें अत्यन्त प्रयत्न करनेकी अपेक्षा बतलानेके लिये शास्त्रोंने भगवान्‌को अत्यन्त दुर्लभ कहा है, निराशा मिटाकर उत्साह बढ़ानेके लिये भगवान्‌को अत्यन्त सुगम भी कहा है— 'दूरात्सुदूरे अन्तिकात् तदु अन्तिके च।' भगवान् दूर-से-दूर और समीप-से भी समीप हैं। नामरूपकी उपयोगिता नामरूपक्रियासे अतीत—अनाम, अरूप, निष्क्रिय परमतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही प्राणीको अनेक क्रियाओं, नामों एवं रूपोंका अवलम्बन करना पड़ता है। अनामके नामकरण एवं अरूपके रूपकी कल्पना सचमुच अपरमेयको परिमित और निःसीमको सीमित करना है। किसी महानुभावने कहा है— गत्यानया व्यापकता हता ते स्तुत्यानया वाक्परता हता ते। दृष्ट्यानयागोचरता तथा हता ममापराधस्त्रितयं क्षमस्व॥ अर्थात् 'हे नाथ! इतने दूर आपके दर्शनार्थ चलकर मैंने आपकी व्यापकतापर तथा दर्शनसे आपकी अगोचरतापर अविश्वास किया और स्तुतिसे आपकी वाक्परताकी भी अवहेलना की। हे दयामय! इन मेरे तीन अपराधोंको कृपया आप क्षमा करना।' जैसे प्राणी व्यष्टि-नामरूपकी उपाधिमें आसक्त होकर व्यक्तिगत स्वार्थके लिये समष्टि-हितका विघातक बन जाता है या समष्टि-हितके कार्योंमें भी सम्मान, ख्याति या धन-लाभादि स्वार्थोंको ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपमें प्रधानता देने लगता है; वैसे ही सर्वाधार, परमतथ्य, पारमार्थिक वस्तुमें भी नाम- रूपोंकी कल्पनाओंसे ही नाना विपत्तियोंको खड़ा करता है। सच बात तो यह है कि नामविशेष और रूपविशेषके अभिमानवालोंको व्यक्तिगत विशिष्ट नामों और रूपोंसे स्तुतिकी स्पृहा होती है। ग्राहसे पीड़ित गजराजने निर्विशेष परब्रह्मका ही स्तवन किया। उस स्तवनमें किसी व्यक्तिविशेष या नामरूपकी व्यंजना नहीं थी। उसने यही कहा कि— ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२) मैं उस परमतत्त्वको नमन करता हूँ, जिससे जड़ विश्व चेतित हो रहा है, जो निखिल विश्वका आदि बीज और परेश है, जिससे तथा जिसमें विश्व उत्पन्न तथा स्थित होता है और जिससे उसका धारण होता है। उस स्वयम्भूको नमस्कार है, जो पर-अपर कार्य- कारणसे अतीत है। भिन्न-भिन्न नामरूपके अभिमानी देवगण गजेन्द्रकी स्थिति देखते थे, उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करनेमें समर्थ भी थे, परंतु उनके नामरूपमें उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिये उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्रके रक्षणमें नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुई, जो किसी नामरूपविशेषका अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपोंको अपना ही मानता था। आज भी सामाजिक क्षेत्रोंमें व्यक्तिगत ख्याति या सम्मानकी ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातियोंको अपना ही समझकर कार्यमें अग्रसर

नामरूपकी उपयोगिता ५१७ होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूपकल्पनाका दुष्परिणाम किसीसे छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वरके नाम और उपचारपद्धतियोंपर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें द्वन्द्व मच रहा है। ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज, ब्रह्मसमाजके अतिरिक्त सनातनधर्मियोंमें ही नामरूपोंपर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित हैं कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवालेके मनमें नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओंके उपासक अपने-अपने इष्ट और अपनी-अपनी उपासना- पद्धतिका ही महत्त्व सिद्ध करनेके लिये दूसरोंकी निन्दा और खण्डनमें कुछ भी कसर नहीं रखते। इतना ही क्यों, विष्णुके ही विविध स्वरूपोंमें इस नाम या इस रूपसे मुक्ति होती है, दूसरेसे नहीं; श्रीकृष्णका वन्दन अमुक वेश-भूषामें ही हो सकता है, दूसरेमें नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित हैं, जो वैमनस्य और विद्वेषके मूल बन रहे हैं, परंतु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओंकी कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञोंका तो कहना है कि प्राणी जबतक सत्त्व, रजस्, तमस् आदि गुणों और विविध नामरूप एवं कर्मोंमें बँधा हुआ है, तबतक उसे गुण एवं नामरूपक्रियाव्यतीत वस्तुका दर्शन और उसकी उपलब्धि असम्भव ही है। नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति वेदान्त तो पग-पगपर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्त्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहारविषय तथ्य नहीं है, परंतु जो अनेक तापोंसे सन्तप्त एवं अशान्त है, उसे क्या मात्र इन वचनोंसे शान्ति हो सकती है? अतः जैसे रजसे ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टकसे ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विषसे ही विषका प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्मसे ही कर्मका निर्हार और नामरूपसे ही नामरूपातीत तत्त्व प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाता है। निर्गुण, निराकार, निष्प्रपंच असंगसे ही सगुण, साकार समस्त प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्त्वसे बहिर्मुख होकर अनादिकालसे इस दुर्गम भवाटवीमें भटक रहे हैं। कहा जाता है कि मन, बुद्धिके हलचलसे ही परमार्थ परमतत्त्व आवृत हो जाता है। जैसे छायाके पीछे चलनेसे वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन-बुद्धिको स्थिर करनेके प्रयत्नसे वे वशमें नहीं किये जा सकते। मनमें निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होनेपर ही निर्दृश्य, निर्विकल्प वस्तुका बोध या उपलब्ध होता है। मनके व्यापारसे ही दृश्य या विकल्पकी उपस्थिति होती है। मनके निर्व्यापारता या अमनीभावमें विकल्प प्रतीतिविरुद्ध होनेसे निर्विकल्प वस्तुका अनायास ही स्फुरण होता है', परंतु यह क्या जैसा कहनेमें सुगम है, वैसे ही अनुष्ठानमें भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षणके लिये भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो। जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय वस्तुकी कोरी बातोंसे क्या लाभ? मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित यह कह देना बहुत सरल है कि 'स्वयं विज्ञाता या मन्ताको ही विचार या मनन करने-न करनेमें स्वतन्त्रता है। कर्ता चाहे तो करणोंको व्यापृत करे- न करे, उनसे काम ले अथवा न ले।' परंतु क्या मन मन्ताकी रुचिका अनुवर्तन करता है अथवा मन्ताकी रुचि न होते हुए भी उसको हठात् आकर्षित करता है? इसीलिये विवेकियोंने अध्यारोप और अपवादसे निष्प्रपंचका ही प्रपंचन किया है—'अध्यारो- पापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते। शिष्याणां बोधसिद्ध्यर्थं तत्त्वज्ञैः कल्पितः क्रमः॥' जब प्रपंच एवं तदन्तर्गत नामरूपक्रियाओंके आलम्बनद्वारा ही सर्वातीत तत्त्वको प्राप्त करना है,

५९८ भक्तिसुधा तब फिर उसमें उल्बण भावोंको सोच-समझकर त्यागनेके लिये पहले शान्त भावोंका अवलम्बन करना पड़ता है। तामस कर्म तथा विचार दूर करनेके लिये राजस और राजसको मिटानेके लिये सात्त्विक कर्मों तथा ज्ञानका आश्रयण किया जाता है। स्वाभाविक या पाशविक कर्मों तथा ज्ञानको मिटानेके लिये वेदशास्त्रसम्मत कर्म और ज्ञानोंका अवलम्बन करना आवश्यक होता है। योगशास्त्रने क्लिष्टा वृत्तियोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये अक्लिष्टा वृत्तियोंका अवलम्बन करना बतलाया है। घोर तथा मूढ़वृत्तियाँ बिना शान्तवृत्तियोंके सेवनके कभी भी दूर नहीं हो सकतीं। जब प्रपंचातीत परमतत्त्वसे प्रच्युत होकर जीव व्यावहारिक जगत्में अवतीर्ण होता है, तब उसके सामने विश्वके शुभ- अशुभ, न्याय-अन्याय, अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकारके विषय और व्यवहार उपस्थित होते हैं। भलाई-बुराई, विष-अमृत आदि भेद जब मानने पड़ते हैं, क्षुधा-पिपासा मिटानेके लिये अन्न-जलकी अपेक्षा होती है, तब फिर पुण्य-पापकी व्यवस्था भी माननी पड़ती है। अतएव वर्णाश्रमानुसार वेदशास्त्रोक्त कर्म- धर्मकी आवश्यकता होती है। बिना किसी निर्दोष सात्त्विक आलम्बनके मनको निरालम्ब नहीं किया जा सकता। नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीला- शक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण- साकार रूपमें अभिव्यक्ति वैदिकोंका मत है कि नामरूपसे अतीत वेदान्तवेद्य, परमतत्त्व ही स्वांशभूत प्राणियोंके कल्याणार्थ अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे परम मनोहर नामरूपको स्वीकार करते हैं। जैसे कोई परमकारुणिक चिकित्सक किसी कुपथ्यप्रिय, अदीर्घदर्शी, अबोध शिशुको उसके अभीष्ट कुपथ्यरूपमें दिव्य महौषध प्रदान करता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयोंमें आसक्तचित्त प्राणियोंके मनको प्रपंचातीत भगवान्‌के निजस्वरूपमें आकर्षित करनेके लिये ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्ययका ही दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रूप-सम्पन्न रूपमें प्रादुर्भाव होता है। भक्तोंके अभीष्ट भिन्न स्वरूपोंके विशिष्ट सौन्दर्य, माधुर्यादि लोकोत्तर गुणगणोंमें चित्तके आसक्त होनेके अनन्तर वही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य परमतत्त्व सुस्पष्ट रूपमें व्यक्त हो जाता है। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि वेदशास्त्र- सम्मत सभी स्वरूपोंमें एक वही पूर्णतम तत्त्व व्यक्त होता है। इसीलिये उनके माहात्म्य-प्रतिपादक सभी सद्ग्रन्थोंमें अन्तिम स्वरूप एक ही मिलता है। एक अनन्त, अखण्ड, निर्विशेष, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्द ही सर्वाधार, साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है। सभी नामरूप भगवान्‌के ही हैं गीतामें तो यहाँतक कहा गया है कि विश्वमें जो भी कोई ‘विभूतिमत् ऊर्जिततत्त्व’ दिखलायी देता हो, उसे भी भगवान्‌का ही रूप समझना चाहिये— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ (१०।४१) आचार्यप्रवर श्रीविद्यारण्यजीने ‘पंचदशी’ में कहा है कि परमेश्वरके भिन्न स्वरूपोंमें विवाद नहीं करना चाहिये। जब निखिल विश्व ही परमेश्वरका स्वरूप है, तब अमुक परमेश्वर है, अमुक नहीं, ऐसे विवादका अवसर ही कहाँ? इसीलिये अश्वत्थ, वट, हल, कुदालतककी पूजा अपने धर्ममें होती है। सभीमें पूर्णतम, परमतत्त्वका ही पारमार्थिक रूप उपलब्ध हो सकता है, फिर उसका नाम या रूप चाहे जो कुछ भी हो। इसीलिये नामविशेषपर आग्रह न करके अभिज्ञोंने ‘कस्मै चिन्महसे नमः, कस्मै देवाय हविषा विधेम’ इस रूपसे ही परमतत्त्वका वन्दन किया है, परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भगवान्‌में नाम और रूप हैं ही नहीं। यदि नामरूप हैं तो सब भगवान्‌के ही हैं, अन्य किसीके नहीं।

इष्टदेवकी उपासना ५९९

'किम्' शब्द सर्वनाम है, अतः वह सभीका वाचक है। जो सर्वस्वरूप है, उसमें ही 'किम्' शब्दका प्रयोग हो सकता है। जिस वस्तुपर किसी एकका अधिकार नहीं होता, वह राजाकी समझी जाती है। जो राजाकी वस्तु है, वह सबके उपयोगमें आती है। अतः 'किम्' शब्दका जैसे यह अर्थ है कि परमतत्त्वका विशेष नाम नहीं है, वैसे ही यह भी आशय है कि सब नाम और रूप उन्हींके हैं। भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति फिर भी राजस, तामस, सात्त्विक ऋषि, देवता या भगवत्सम्बन्धिनी नामरूपक्रियाएँ भवबन्धनसे छुड़ाकर परमतत्त्वको प्राप्त कराती हैं और उनके विपरीत नामरूपक्रियाएँ अनेक अनर्थयुक्त संसारमें भटकानेवाली होती हैं। इसीलिये वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त क्रियाएँ, मन्त्र एवं भगवन्नाम आदरणीय तथा समाश्रयणीय हैं। इसी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न गुणरूपविशिष्ट विग्रह और प्रतिमाओंकी आराधनाएँ मान्य हैं। उन सबकी पद्धति, अधिकार, शुद्धि, अशुद्धि सभी शास्त्रविधानके अनुसार ही होनी चाहिये। पारमार्थिक चर्चाओं एवं ज्ञानाभिमानसे उन सबकी अवहेलना केवल प्रमाद है। जैसे घी और बत्तीके संयोगसे व्यापक निर्विकार अग्नि दिव्य दीपशिखाके रूपमें प्रकट होती है, जैसे शैत्यके योगसे जल हिमरूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही अचिन्त्य लीलाशक्तिके योगसे अनामरूप भगवान् ही दिव्य नामरूप स्वरूपमें प्रकट होते हैं। अतएव भगवान्‌का नाम और रूप निरावरण भगवान्‌का साक्षात्स्वरूप ही है। जैसे काष्ठ, पाषाण, प्रासाद—जहाँ भी कहीं पैर रखा जाय, वह सब कुछ पृथ्वी ही है, वैसे ही जिस किसी भी नामरूपसे भगवान्‌का ही दर्शन और श्रवण है। तब भी विशुद्ध लीलाशक्तिकी महिमासे प्रकट भगवान्‌के नामरूप एवं लीलाएँ निरावरण भगवान्‌के रूप हैं, त्रिगुणमयी प्रकृतिके योगसे अभिव्यक्त इतर नामरूपक्रियाएँ सावरण भगवान्‌के रूप हैं। जैसे मेघादि अस्वच्छ उपाधियोंसे सूर्यमण्डल आवृत रहता है, परंतु दूरवीक्षणादि विशेष मन्त्रोंके द्वारा व्यवधान होनेपर भी वह आवृत नहीं होता, वैसे ही अविद्यादि मलिन शक्तियोंके योगसे नामरूप विवर्तमें पारमार्थिक तत्त्व आवृत रहता है, परंतु विद्या या लीला आदि दिव्य शक्तियोंके योगसे प्रकट भगवान्‌के नामरूपमें निरावरण भगवान्‌का स्पष्ट रूपसे भान होता है।

इष्टदेवकी उपासना

निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें शास्त्ररहस्यको जाननेवाले महानुभावोंका कहना है कि शैवग्रन्थोंमें श्रीविष्णुकी और वैष्णवग्रन्थोंमें श्रीशिवकी जो निन्दा पायी जाती है, वहाँ इस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अन्य देवताकी निन्दामें नहीं है, अपितु वह ग्रन्थ जिस देवताका वर्णन कर रहा है, उसकी प्रशंसामें है। इसपर कोई कहे कि 'अपने इष्ट देवतामें अनन्यताकी प्राप्तिके लिये उनसे भिन्न देवताकी उपेक्षा अपेक्षित है और वह उपेक्षा बिना अन्य देवताकी निन्दाके कैसे सिद्ध हो सकती है? इस तरह उस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अपने इष्ट देवतासे अन्य देवताकी उपेक्षाके लिये उसकी निन्दामें ही हो सकता है। किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसने अनन्यताके स्वरूपको ही यथार्थतया समझा नहीं है। क्या अपने एकमात्र इष्टदेवमें ही तत्परताको अनन्यता कहें? किंतु ऐसी अनन्यता खान-पान आदि लौकिक एवं सन्ध्यावन्दनादि वैदिक व्यवहार करनेवाले पुरुषमें सम्भव नहीं है। यदि कहा जाय कि उन लौकिक- वैदिक सब कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी ही उपासना करनेसे अनन्यता बन जायगी तो फिर जैसे अन्यान्य लौकिक-वैदिक कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी उपासना की जा सकती है, वैसे ही अन्य देवताकी पूजा

आदिके द्वारा भी अपने इष्टदेवकी उपासना करते हुए अनन्यता बन सकती है। यथार्थमें तो— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ अर्थात् '[हे राजन्!] प्राणी अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्म करते हुए उस पुरुषोत्तम हरिकी आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त भगवान्‌की प्रसन्नताका और अन्य कोई साधन नहीं है।' यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (गीता ९।२७) अर्थात् 'हे अर्जुन ! भोजन, होम, दान, तपस्या आदि जो कुछ भी करो, वह सब मुझे अर्पण कर दो।' 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) अर्थात् 'मनुष्य अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्‌की पूजा करके मुक्तिको प्राप्त कर सकता है।' —इत्यादि वचनोंसे शास्त्रोंने अपने-अपने वर्ण- आश्रमके अनुसार श्रौत-स्मार्त कर्मोंसे ही श्रीभगवान्‌की उपासना करना बतलाया है और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें तो पद-पदपर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र, प्रजापति आदि देवताओंकी पूजा दिखलायी पड़ती है। ऐसी हालतमें अपनेको वैदिक माननेवाला कोई पुरुष यह कहनेका साहस कैसे कर सकता है कि 'विष्णुके सिवाय कोई अन्य देवता मेरे लिये पूजनीय नहीं है।' यदि कहा जाय कि वहाँ उन इन्द्रादि देवताओंके रूपमें भगवान् विष्णुकी ही पूजा होती है तो इस तरह फिर सभी देवताओंकी पूजा की जा सकती है। जिन कामिनी, कांचन आदि विषयोंकी बड़े-बड़े विवेकी महापुरुषोंने निन्दा की है, उन्हीं तुच्छ विषयरूप विषसे भस्मीभूत चित्तवाले और उन्हीं विषयोंकी प्राप्तिके लोभसे वशीभूत होकर और तो क्या, म्लेच्छोंके चरणोंपर भी मस्तक झुकानेवाले लोग समस्त पापसमुदायका नाश करनेमें समर्थ श्रीशिव, विष्णु आदिके वन्दनको जब अनन्यताका विघातक कहते हैं, तब बड़ा आश्चर्य होता है। अपने इष्टमें अनन्यता अस्तु, इस तरह यह सिद्ध होता है कि श्रीभगवान्‌को प्रसन्न करनेकी बुद्धिसे भगवान्‌के लिये ही किये गये समस्त कर्मोंको परमगुरु श्रीभगवान्‌के चरणोंमें समर्पण करना ही यथार्थ अनन्यता है। काशीखण्डके इक्कीसवें अध्यायमें ध्रुवजी श्रीविष्णुजीसे स्तुतिमें कहते हैं कि— मित्राणां हि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबन्धुषु । त्वत्तो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण चराचरे ॥ त्वमेव माता त्वं तातस्त्वं सुहृत्त्वं महाधनम्। त्वमेव सौख्यसम्पत्तिस्त्वमायुर्जीवनेश्वरः ॥ सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्त्वदर्पितम्। तत्कर्म यत्त्वदर्थं वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः॥ अहो पुंसां महामोहस्त्वहो पुंसां प्रमादता। वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः ॥ अधोक्षजातपरो धर्मो नार्थो नारायणात्परः । न कामः केशवादन्यो नापवर्गो हरिं विना ॥ इयमेव परा हानिरुपसर्गोऽयमेव हि। अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं न यत्स्मरेत् ॥ गोविन्दं परमानन्दं मुकुन्दं मधुसूदनम्। त्यक्त्वाऽन्यं नैव जानामि न भजामि स्मरामि न ॥ न नमामि न च स्तौमि न पश्यामीह चक्षुषा । न स्पृशामि न वा यामि गायामि न हरिं विना ॥ अर्थात् 'हे नारायण ! इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्में आपसे अन्य कुछ भी नहीं है। मित्रोंमें भार्या, सब बन्धुओंमें परम हितैषी धर्म आप ही हैं। माता, पिता, सुहृद्, धन, सौख्य, सम्पत्ति और तो क्या— प्राणेश्वर आप ही हैं। कथा वही है, जिसमें आपका नाम हो, मन वही है जो आपमें अर्पित हो, काम वही है जो आपके लिये ही किया जाय और तपस्या वही है, जिसमें आपका स्मरण होता रहे। प्राणियोंके उस

इष्टदेवकी उपासना ६०१

महामोहको उस प्रमादिताको देखकर बड़ा ही खेद और आश्चर्य होता है, जिससे आपका अनादर करके वे अन्य विषयोंमें महान् परिश्रम करते हैं। हे भगवन्! आपसे श्रेष्ठ ऐसा अन्य कोई न धर्म है, न अर्थ, न काम और न मोक्ष ही। भगवान् वासुदेवका स्मरण न होना ही परम हानि, परम उपद्रव, परम दुर्भाग्य है। परमानन्दकन्द मुकुन्द मधुसूदन भगवान् गोविन्दको छोड़कर मैं न तो अन्य किसीको जानता ही हूँ, न स्मरण करता हूँ, न भजता हूँ। न नमन करता हूँ, न किसी दूसरेकी स्तुति करता हूँ, न अन्यको आँखसे देखता हूँ, न स्पर्श करता हूँ, न अन्यत्र कहीं जाता हूँ, न बिना हरिके अन्यका गान करता हूँ।' इत्यादि श्लोकोंके द्वारा अनन्यताका स्वरूप प्रदर्शित किया है। शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि इतना सब मन्थन करनेका तात्पर्य यही है कि भगवान् श्री

६०२ भक्तिसुधा करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरी जो परमशक्ति है, उसको देनेवाले सुदर्शनचक्रके दाता श्रीविश्वनाथ ही हैं। पूर्वकालमें जालन्धर नामका एक दैत्य हुआ था, जिसके पराक्रमसे मैं भी भयभीत हो गया था। किंतु भगवान् श्रीशंकरने अपने पैरके अँगूठेके अग्रभागसे चक्र बनाकर, उससे जालन्धरको मार डाला था। अपने नेत्रकमलोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करके मैंने वही चक्र उनसे प्राप्त किया। दैत्यसमुदायको मर्दन करनेवाला वही यह सुदर्शनचक्र मेरे पास है। समस्त दुष्ट प्राणियोंको भगानेवाले उस सुदर्शनचक्रको तुम्हारी रक्षाके लिये आगे भेजकर मैं यहाँ आया हूँ। अब इस समय श्रीविश्वनाथका दर्शन करनेके लिये मैं काशीकी ओर चल रहा हूँ। उसके बाद पंचक्रोशीकी सीमाके पास पहुँचकर वे गरुड़से नीचे उतरे और उन्होंने ध्रुवका हाथ पकड़कर मणिकर्णिकामें स्नान किया। फिर श्रीविश्वनाथका पूजन करके ध्रुवके हितकी कामनासे कहा—हे ध्रुव ! तुम इस अविमुक्त वाराणसीक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्‌के लिंगकी स्थापना करो। इससे त्रैलोक्यस्थापन करनेका अक्षय पुण्य तुम्हें प्राप्त होगा' इत्यादि। ऐसे इस गम्भीर शास्त्रीय अभिप्रायको न समझकर शैव-वैष्णव-नामधारी पाखण्डसे नष्टबुद्धि मायामोहित जन ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमें भेदभाव देखते हैं। यह नहीं जान पाते कि वे तीनों एक ही सच्चिदानन्दघन पूर्ण अद्वितीय तत्त्व हैं। ब्रह्माणं केशवं रुद्रं भेदभावेन मोहिताः। पश्यन्त्येकं न जानन्ति पाषण्डोपहता जनाः ॥ वे ऐसे सैकड़ों शास्त्रवचनोंसे उपदेश किये गये अभेदको नहीं देखते। इस बातकी उपेक्षा करते हैं कि एक ही परमकारण तत्त्व अनेक रूपमें विराजमान है। उन परमेश्वरके अनेक रूपोंमेंसे किसी एकको लेकर दूसरे रूपोंकी निन्दा करते हुए आपसमें कलह करते हैं। ऐसा करके मानो अपने उसी आराध्य भगवान्‌से ही द्रोह करके नरकमें जानेकी तैयारी करते हैं। एक-दूसरेपर अनन्य प्रीति करनेवाले दो मालिकोंके नौकर यदि एक-दूसरेके स्वामीकी निन्दा करें तो वे दोनों जैसे स्वामिद्रोही ही कहे जाते हैं, वैसे ही एक- दूसरेके आत्मा और एक-दूसरेके ध्यानमें निमग्न मा- धव श्रीविष्णु और उमा-धव श्रीशिवकी निन्दा करनेवाले स्वामिद्रोही ही हैं। जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये कोई जिज्ञासु ऐसा प्रश्न कर सकता है कि भगवान् शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि देवताओंमेंसे किसकी उपासना करनी चाहिये ? कोई किसीको निकृष्ट तो कोई किसीको बड़ा बतलाता है। ऐसी स्थितिमें बुद्धि व्याकुल हो जाती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि भगवान्‌के विचित्र प्रपंचमें विचित्र स्वभावके जीवोंका निवास है। इसीलिये श्रीभगवान् भिन्न स्वभाववाले जीवोंकी विभिन्न रुचियोंका अनुसरण करके विभिन्न रूपोंमें प्रकट होते हैं। किसीका चित्त भगवान्‌के किसी स्वरूपमें खिंचता है, किसीका किसीमें। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रतिपादित सभी रूप भगवान्‌के ही हैं। अतः जिस रूपमें प्रीति हो, उसी रूपकी उपासना करनी चाहिये। अनभिज्ञ लोग एककी निन्दा और दूसरे रूपकी प्रशंसा करते हैं, अभिज्ञ तो सभी रूपोंमें अपने प्रभुको ही देखकर सन्तुष्ट होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अनेक विद्याओंमें निपुण होनेके कारण अपने अनेक वेष और नामोंसे अनेक कार्य करता हो, भिन्न-भिन्न कार्यार्थी पृथक् वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों और उसे ही सर्वोत्कृष्ट समझने लगें। दूसरे लोग दूसरे वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों। उनमें कुछ लोग किसी रूपके प्रशंसक हों और कुछ किसीके निन्दक हों, इसलिये परस्पर युद्ध होने लगे, वहाँ जो लोग वस्तु-स्थितिको जाननेवाले होंगे, वे तो दोनों ही विवादी दलोंकी मूर्खतापर परिहास करेंगे; क्योंकि वे दोनों ही वेषोंमें एक ही तत्त्वको देखते हैं।

इष्टदेवकी उपासना ६०३ उपासनाके लिये अपनी कुल- परम्पराका समादर योगवासिष्ठके विपश्चिदाख्यानमें मृगरूपसे समागत विपश्चित्को देखकर श्रीवसिष्ठजीने यही विचार किया था कि जिस व्यक्तिका जो स्वरूप कभी भी उपास्य हो, उसका कल्याण उसके ही द्वारा सुगम होता है। यह समझकर करोड़ों जन्मके पहले अग्निकी उपासना करनेवाले मृगरूप विपश्चित्के सामने अपने योगबलसे उन्होंने अग्निका प्राकट्य किया। अग्निका दर्शन होते ही वह मृग ऐसी स्नेहभरी दृष्टिसे अग्निको देखने लगा, जैसे अग्निके साथ उसका कोई बहुत पुराना सम्बन्ध हो। अनन्तर वसिष्ठजीकी कृपासे उसका कल्याण हुआ। अस्तु, प्रकृतमें कहना यही है कि स्वप्नदर्शन तथा माहात्म्यश्रवण आदिसे चित्तका आकर्षण देखकर अपने इष्टदेवका निर्णय करना चाहिये। यह स्पष्ट है कि अनेक जन्मके साधनोंसे प्राणीकी उपासनामें उन्नति होती है। जन्म-जन्ममें मार्ग-परिवर्तन करनेसे यथेष्ट लाभ सम्भव नहीं है। अतः पूर्वकी उपासनाके संस्कारका ज्ञान करके उसी उपासनामें प्रवृत्त होना चाहिये। पितृपितामह-परम्पराकी उपासनाओंके अनुसार ही प्राणीको उपासना करनी चाहिये। वर्तमान जन्मकी सत्प्रवृत्ति और दुष्प्रवृत्तिमें पिछले जन्मोंके संस्कार भी अपेक्षित होते हैं। यदि किसीको दुर्देववश किसी ऐसे देश-कालमें ऐसे माता-पिता, गुरुजनों तथा ग्रन्थोंका संसर्ग हुआ कि जिनसे दुराचार-दुर्विचारको ही उत्तेजना मिली तो उस व्यक्तिके लिये दुःसंग और असद्विचारवाले शास्त्रोंको छोड़कर सत्पुरुषसंग, सच्छास्त्रके अभ्यास एवं तदनुसार सदाचार-सद्विचारके सम्पादनमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिसे पूर्वसंस्कारके अनुसार शुद्ध विचारवाले देश-काल तथा माता-पिता एवं गुरुजनोंका संयोग प्राप्त हुआ और सच्छास्त्र ही अध्ययन करनेको मिले, उसके लिये सदाचार-सद्विचारकी वृद्धिमें बड़ी सहायता मिलती है। इसीलिये प्रायः सन्मार्गस्थ सदाचारीको उसकी भावना और उपासनाके अनुसार ही समीचीन देश-काल और माता-पिता तथा शास्त्रोंका संसर्ग मिलता है। इसी बातकी इंगना श्रीभगवान्ने 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' 'अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।', 'पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।' (गीता ६।४१-४२,४४) इत्यादि वचनोंसे की है। इसीलिये यह बहुत सम्भव है कि हमारी उपासनाके अनुकूल ही कुलमें हमारा जन्म हुआ हो। अतः हमें माता-पिता, गुरुजनोंके अनुसार ही उपासना करनी चाहिये। यों भी इस बातके समझनेमें सुगमता होगी कि जैसे कोई पुरुष किसी अपरिचित मार्गसे किसी अभीष्ट देशमें जा रहा हो, आगे चलकर उसे तीन मार्ग दिखायी दें और तीनोंपर कुछ लोग चल रहे हों, प्रश्न करनेपर सभी अपने मार्गको ही निर्विघ्न बतलाते हों, साथ ही दूसरे मार्गोंको नाना प्रकारके सिंह- व्याघ्र-सर्प-वृश्चिक-कण्टकाकीर्ण गर्तोंसे उपद्रुत बतलाते हों, ऐसी स्थितिमें यदि जाना आवश्यक ही हो तो वह प्राणी किस मार्गका अवलम्बन करेगा? समझदार तो यही कहेंगे कि उन मार्गानुगामियोंमेंसे अधिक विश्वास उन्हींपर किया जा सकता है; जो अपने राष्ट्र, प्रान्त, नगर तथा ग्रामके हों या अपने कुटुम्बियोंमेंसे हों। यह बात दूसरी है कि जब बहुत विशिष्ट अनुभवोंसे उस मार्गके दूषित तथा मार्गान्तरके निर्विघ्न होनेकी बात निश्चित हो गयी हो, तब किसी दूसरे मार्गका अवलम्बन किया जाय। इसलिये भी अपनी पितृ-पितामह-परम्परामें जो उपासना और आचार तथा शास्त्र मान्य हों, वही उचित हैं। वेदने भी 'किंस्वित् पुत्रेभ्यः पितरावुपावतः' इस वाक्यसे परम्परागत आचारका समर्थन किया है। श्रीनीलकण्ठजीने इसका यही अभिप्राय बतलाया है कि पुत्रके हितके लिये माता, पिता या पितामह- प्रभृतिने जिस व्रतका पालन किया हो या जिस देवताकी उपासना की हो, उस पुत्रको उसी व्रत या देवताका अवलम्बन करना चाहिये। ऐसे ही

सम्प्रदायभेदसे भस्म, गोपीचन्दन आदिकी भी व्यवस्था बतायी गयी है। उसमें भी यह व्यवस्था शुद्ध शास्त्रीय है कि स्नान करके मृत्तिका और होम करके भस्म और देवपूजनके पश्चात् चन्दन आदि लगाया जाय; क्योंकि भस्म वैदिकोंके लिये किसी अवस्थामें त्याज्य नहीं हो सकता। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि 'यद्यपि इस तरहसे किसी भी देवताकी आराधना, भस्म, रुद्राक्ष, गोपीचन्दनादिका धारण संगत मालूम होता है तथापि साम्प्रदायिक लोगोंकी बातें सुनकर जी घबराता है। कोई शिवजीके तथा भस्म-रुद्राक्षके निन्दनमें सहस्रों वचन उपस्थित करते हैं तो कोई विष्णु तथा गोपीचन्दनादिके निन्दनमें सहस्रों वचन देते हैं। इसका क्या आशय है? उनको यही उत्तर दिया जा सकता है कि कुछ वचन तो निन्दामें तात्पर्य न रखकर एककी स्तुतिमें ही तात्पर्य रखते हैं। जैसे शैवोंकी शिवमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये विष्णुके निन्दासूचक और विष्णुमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये शिवके निन्दापरक वचन कहे जा सकते हैं, परंतु कुछ ऐसे भी वचन हैं, जिनका सिवा राग-द्वेषके और कोई मूल ही नहीं हो सकता। बहुत-से सद्ग्रन्थ साम्प्रदायिकोंके कलहोंमें बिगाड़े गये हैं। इसीलिये तो गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ (रा०च०मा० ४।१४) ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायोंमें कहा यह जाता है कि बिना इन आचारोंके प्राणीका कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परंतु इन आचारोंके बिना उसके हाथसे जल भी अग्राह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारोंके विषयमें भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचारसे एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचारसे दूसरा सम्प्रदाय सर्वथा पतन बतलाता है। एक वैसे आचारविहीनके दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्तवालेके ही दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदायमें जो आचार प्रचलित है, उसीके लिये उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ- पितामहादिमें जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिये। विवादका मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्योंकी निन्दा करके अपने सम्प्रदायके आचारों एवं सिद्धान्तोंको स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥' (गीता ६।३२) भगवान्के इन भावोंको भूल जाते हैं। लोगोंको इस बातपर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्तिको अपने सम्प्रदायमें मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदायके व्यक्तिको अपनेमें मिलायेंगे तो अन्य लोगोंको भी वैसे ही क्षोभ होगा। परंतु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायोंमें मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई साम्प्रदायिक भी स्मार्त बना लिये जाते हैं। यही राग- द्वेषका मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दू- मुसलमानोंसे भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिकोंमें दृष्टिगोचर होता है। कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण वेदान्तवेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान् ही सकल सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यके विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्मसे समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवनका चरम फल है। परंतु प्रथमसे ही प्राणियोंका मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान्के मनोवचनातीत स्वरूपमें प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परमकरुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकारके

इष्टदेवकी उपासना ६०५

मंगलमय स्वरूपको धारण करते हैं। उपनिषदोंमें दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या, वैश्वानर-विद्याओंके रूपमें इनकी ही अनेक सगुण उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। ये ही भगवान् विघ्नराज श्रीगणेशके रूपमें ऋद्धि-सिद्धि आदि निज शक्तियोंसहित आराधित होकर भक्तोंका सर्वविघ्ननिवारण, सर्वाभीष्ट- सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम गति देते हैं और ये ही विश्वचक्षु भगवान् भास्करके रूपमें उपास्य होकर सर्वरोगनिवारणपूर्वक अपने पारमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार कराकर भवरोगसे मुक्त कर देते हैं। ऐसे ही ये ही वेदान्तवेद्य शुद्ध भगवान् अविद्याशक्तिप्रधान होकर प्रपंचका निर्माण करते हैं, विद्याशक्तिप्रधान होकर मोक्ष प्रदान करते हैं और अनन्त अखण्ड विशुद्ध चिति-शक्ति- रूपसे सर्व दृश्यके अधिष्ठानरूप विराजमान होते हैं। वे ही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि रूपमें उपास्य होकर सर्वभुक्ति-मुक्ति-प्रदायक होते हैं। वे ही विशुद्ध ब्रह्म, भूतभावन भगवान् विश्वनाथ, श्रीविष्णु, नृसिंह एवं श्रीमद्राघवेन्द्र रामभद्र तथा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दरूपमें उपासित होकर सर्वसिद्धि प्रदान करते हैं। अस्तु— श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है इन सभी स्वरूपोंकी गायत्र्यादि वैदिक मन्त्रों एवं वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तकर्मोंद्वारा की गयी उपासना मुख्य है। वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म-कर्मके अनुष्ठानके बिना पाशविकी उच्छृंखल चेष्टाओंका अन्त नहीं होता। बिना श्रौत-स्मार्तशृंखलाबद्ध चेष्टाओंके इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदिका नियन्त्रण असम्भव है और बिना सर्व करण-रोधके अदृश्य विशुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार भी असम्भव है। अतः श्रौत-स्मार्त-कर्म-धर्मद्वारा ही परमेश्वरका मुख्य आराधन है। इसी विशुद्ध वैदिक धर्मका बौद्ध आदि अवैदिक एवं वैदिकाभासोंद्वारा विप्लव होनेपर भगवान् शंकराचार्यने अवतीर्ण होकर उसे पुनः प्रतिष्ठित किया है। श्रीविद्यारण्यप्रभृति विद्वानोंने तथा अन्यान्य प्राचीन-अर्वाचीन सन्तोंने भी इसी मतका पोषण किया है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदासने भी इसी परम उदार सिद्धान्तका पोषण किया है। उसमें तीनों वर्णोंके लिये गायत्री मुख्य उपास्य है। जिनके लिये गायत्रीका अधिकार नहीं है, उन अवैदिकोंके लिये अवैदिकी उपासनाएँ हैं। जो गायत्रीमन्त्रके अधिकारी त्रैवर्णिक वैदिकसंस्कार-सम्पन्न हों, उन्हें यदि गायत्रीमें परितोष न हो तो विष्णु, शिव आदि देवताओंका विष्णु, शिव आदि मन्त्रोंसे आराधन कर सकते हैं। वैदिकसंस्कार-सम्पन्न होनेके कारण इन मन्त्रोंमें उनका अधिकार सहज सिद्ध है। अर्थात् गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु तथा सूर्य—इन पंच देवताओंकी, किंवा अन्य सगुण एवं निर्गुण ब्रह्मकी उपासना गायत्रीमन्त्रद्वारा ही पूर्ण सुसम्पन्न हो सकती है और इसके सिवा वैदिक शिव, विष्णु आदि मन्त्रोंसे भी तत्तत् उपासनाएँ हो सकती हैं। इन समस्त वैदिक उपासनाओंमें वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तधर्मका अनुष्ठान भी परमावश्यक है। वेदने उपासनाविहीन कर्मोंको स्वप्रकाश ब्रह्मकी अपेक्षा स्वर्गादि तुच्छ फलके देनेवाले होनेसे अन्धतमकी प्राप्तिका कारण कहा है। परंतु कर्मविहीन उपासनाओंसे तो घोर अन्धतमकी प्राप्ति कही गयी है; क्योंकि स्वधर्मानुष्ठानके बिना इष्टमें चित्तकी एकाग्रतारूप उपासना भी सम्पन्न न हो सकेगी। स्वधर्मभ्रष्टके लिये कहा गया है कि चाहे कितना भी श्रीहरिकी भक्ति, किंवा ध्यानमें तत्पर क्यों न हो, परंतु यदि आश्रमके आचारोंसे भ्रष्ट है तो वह पतित ही कहा जाता है। यथा— हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानपरोऽपि वा। भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥ (बृहन्नारदीयपु० ४।२४) अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो—सबको वेदशास्त्रोक्त स्वधर्मका अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजोंके

६०६ भक्तिसुधा जो आचार-व्यवहारचिह्न हैं, वे सभी उसको अत्यन्त आदरणीय होने चाहिये। कोई जिज्ञासु यह पूछ सकता है कि 'कुछ शैव तथा वैष्णवोंका कहना है कि गायत्री, यज्ञोपवीत एवं अन्यान्य ब्राह्मणादि धर्म शैव या वैष्णवके लिये गौण हैं, उनके लिये तो अष्टाक्षर, पंचाक्षरादि मन्त्रका ही अत्यन्त प्राधान्य होना चाहिये। वेद-शास्त्र तथा तदुक्त वर्णाश्रम-धर्मके बिना भी केवल शैव एवं वैष्णवधर्मसे उनका कल्याण हो जाता है।' इसका यह उत्तर है कि यद्यपि विष्णुमन्त्रादि प्राणिकल्याणके साधनरूपमें आदरणीय हैं तथापि वैष्णवतादिसे द्विजत्व ही अधिक प्रबल है; क्योंकि द्विजत्व परमेश्वरदत्त है। वैष्णवत्व, शैवत्व आदि प्राणिसम्पादित हैं, अतः वैष्णवतादिके निमित्तसे होनेवाले धर्मोंका सम्मान अवश्य करना चाहिये; परंतु परमेश्वरदत्त द्विजत्वकी रक्षाका भी ध्यान रखना परमावश्यक है। द्विजत्वकी अभिव्यक्ति यज्ञोपवीत, भस्म एवं शिखासे होती है। वैष्णवताकी अभिव्यक्ति कण्ठी, गोपीचन्दनादिसे होती है। वैष्णवताके चिह्नोंसे द्विजत्वके चिह्नोंका तिरस्कार अत्यन्त असंगत है। इसलिये वैदिकोंके गृहमें वैष्णवताको द्विजत्वसे अवरुद्ध होकर ही रहना चाहिये। अवैदिकोंके यहाँ यथारुचि व्यक्त लिंगोंसे वैष्णवता भले ही रहे। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि शैव, वैष्णव, शाक्त—इन सभी सम्प्रदायोंमें प्रधान रूपसे दो भेद हो गये हैं—एक वैदिक, दूसरा अवैदिक। वैदिकोंके यहाँ वेद तथा वेदोक्त कर्म एवं तदनुसारी लिंगोंका प्राधान्य होता है और तदविरुद्ध प्रकारसे ही विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासना होती है तथा सभी देवताओंका सम्मान होता है। इन वैदिकोंमें किसी दूसरे देवताकी निन्दा करना पाप समझा जाता है। परंतु अवैदिक वैष्णवों तथा शैवोंके यहाँ वेद या तदुक्त धर्म-कर्म तथा तदनुकूल लिंगोंका कोई सम्मान नहीं, केवल साम्प्रदायिक आगम-तन्त्रादिके अनुसार आचार एवं चिह्नोंका ही अधिक सम्मान है। द्विजके लिये वैदिक चिह्नोंका तिरस्कार अयुक्त है, शैवत्व या वैष्णवत्व पितृपरम्परासे नियत नहीं है। वैदिक लोगोंका तो यही कहना है कि जिस पुत्रके कल्याणके लिये उसके पिता, माता, पितामह-प्रपितामह आदिने जिस व्रतका या देवताका अनुष्ठान-आराधन किया हो, उस पुत्रके कल्याणका मूल वही व्रत एवं उसी देवताका आराधन है। ऐसी व्यवस्था माननेसे राग-द्वेष मिट जाते हैं। अतः जिसकी मातृ-पितृ- परम्परामें जिस देवताकी आराधना प्रचलित हो, उसे उसी देवताके आराधनमें तत्पर होना चाहिये।

मानसी आराधना

अजगररूपधारी अघासुरके मुखमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने भी अपने बछड़ोंकी रक्षाके लिये प्रवेश किया। अघासुर अपनी अजगर-देहको छोड़ भगवान्‌के स्वरूपमें मिल गया। साधारण दृष्टिसे यहाँ आश्चर्य हो सकता था कि गो-ब्राह्मणोंके मांस- रुधिरोंसे उदर-पोषण करनेवाले, देवधर्म-शास्त्रद्रोही उस असुरको भगवत्सायुज्यपद कैसे प्राप्त हुआ ? इसीपर श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकने परीक्षित्‌से कहा— राजन् ! जिसके मंगलमय श्रीअंगकी मानसी प्रतिमा एक बार हृदयमें धारण करनेसे अपरिगणित प्राणियोंको मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वे मायातीत सच्चिदानन्द भगवान् जिसके हृदयमें साक्षात् प्रविष्ट हुए, उसके सायुज्य (मुक्ति)-में क्या आश्चर्य— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भगवान्‌के मंगलमय श्रीअंगकी काष्ठमयी, धातुमयी प्रतिमा भी श्रद्धा-उत्कण्ठापूर्वक हृदयमें धारण और

मानसी आराधना ६०७ चिन्तन करनेसे प्राणियोंको परम सद्गति प्रदान करती है। जिन महानुभावोंके अन्तर हृदयमें भगवान्के श्रीअंगकी मनोमयी प्रतिमा सदा विराजमान रहती है, वे तो अपना ही क्या; विश्वका कल्याण कर सकते हैं। वे भगवान्की मानसी मूर्तिके ध्यानको ही परम पुरुषार्थ मानते हैं, त्रिभुवनसम्पत्तिके लिये भी भगवान्के मंगलमय श्रीचरणारविन्दसे लव या अर्धनिमेष भी चलायमान नहीं होते। जिस हृदयमें भगवान्के चरणारविन्दकी नखचन्द्र- चन्द्रिका विस्तीर्ण है, वहाँ शोक-मोह, पाप-ताप रह ही कैसे सकते हैं? जिस तरह शैत्यके योगसे निर्मल जल ही बर्फ, ओलारूपसे उपलब्ध होता है, किंवा घृत-वर्तिका या विचित्र जलादिके संघर्षसे अदृश्य व्यापक अग्नि ही दाहकत्व-प्रकाशकत्व-विशिष्ट दीपशिखा या विद्युल्लता-रूपमें अभिव्यक्त होती है, उसी तरह विशुद्ध सत्त्वमयी स्वेच्छा या कृपाके योगसे ही अदृश्य, अनन्त, आनन्दसुधाम्बुनिधि परतत्त्व ही मायासे अनभिभूत या असंस्पृष्ट दिव्य मूर्तिमान् होकर व्यक्त होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श, अनुभव, परतत्त्वका ही अनुभव है। अतएव जिन लोगोंने भगवान् श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका दर्शन, स्पर्श, अनुगमन किया; वे सभी परम पदके भागी हुए— स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ (श्रीमद्भा० ९।११।२२) सीताके सन्देशसे प्रसन्न होकर मारुतिको अपने श्रीअंगका परिष्वंग (आलिंगन) देते हुए भगवान्ने ही कहा है— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) अर्थात् महात्मा मारुतिको इस अवसरपर मैं सर्वस्वभूत यह परिष्वंग (ब्राह्मसंस्पर्श) देता हूँ। इन बातोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण, निरंजन, विगत-विनोद, व्यापक ब्रह्म ही श्रीकौसल्यानन्दवर्धन राम या यशोदोत्संगललित श्रीकृष्णके रूपमें व्यक्त होता है। फिर उनके संस्पर्शसे उनकी प्राप्ति—ब्रह्मकी प्राप्ति क्यों न हो? इतना ही नहीं, भावुकोंके मानस- पंकजमें व्यक्त भगवान्की मंगलमयी मानसी प्रतिमा भी शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही है, तभी उसका हृदयमें आधान होनेसे मुक्तिकी बात संगत हो सकती है। यद्यपि मनकी और कल्पनाएँ मनोराज्य-कोटिमें परिगणित होती हैं तथापि श्रीभगवान्के सम्बन्धकी सभी कल्पनाएँ—भावनाएँ—आराधनापदसे व्यवहृत होती हैं। जैसे—कामुक विधुरकी भावनासे होनेवाले कामिनी- साक्षात्कारको प्रमा (यथार्थ ज्ञान) न मानकर भ्रमरूप ही माना जाता है, वैसे उत्कण्ठापूर्वक भावनासे होनेवाले भगवान्के साक्षात्कारको भ्रमरूप नहीं समझा जाता; क्योंकि जैसे भावरूप निदिध्यासन या निर्गुणोपासनसे निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, वैसे ही सगुण ब्रह्मकी भावनासे उसका साक्षात्कार होता है। यद्यपि कामुक-कामित कामिनी-साक्षात्कार और भक्तभावित भगवत्साक्षात्कार—इन दोनों ही स्थलोंमें पुनः-पुनः साभिनिवेश चिन्तनरूप अभ्याससे जन्य संस्कारप्रचय (संस्कार-समूह) ही कारण है, अर्थात् अभ्यासजन्य संस्कार-प्रचयकी ही महिमासे ब्रह्मका साक्षात्कार और उसीसे भावित कामिन्यादिका साक्षात्कार होता है तथापि ब्रह्मसाक्षात्कार-स्थलमें प्रमाणका संवाद होनेसे उसे प्रमा (यथार्थ ज्ञान) माना जाता है। प्रमाण-संवाद न होनेसे ही भावित कामिन्यादि साक्षात्कारको भ्रमरूप माना जाता है। जिस ब्रह्मका अभ्यासजन्य संस्कारसंस्कृत अन्तःकरणसे जिस रूपमें साक्षात्कार होता है, वह अपौरुषेय स्वतःप्रमाण वेदान्तसे सम्मत है। अतः वह साक्षात्कार प्रमाणरूप है, परंतु अन्यभावनाजन्य प्रत्यक्षोंमें प्रमाणका संवाद नहीं है। इसके सिवा विधुरभावित कामिनी या शीतातुरभावित अग्निका साक्षात्कार तो होता है, परंतु वहाँ तो वे हैं ही नहीं। जब जिसका साक्षात्कार होता हो और वह वस्तु वहाँ न हो, तब उस साक्षात्कारको प्रमा कैसे

कहा जा सकता है? परमात्मवस्तु तो सर्वत्र सर्वदा ही विराजमान है, अतः उसके प्रमाणान्तरसंवादी साक्षात्कारको भ्रम माननेका कोई भी कारण न होते हुए भी योगमायासे आवृत होनेके कारण सबको नहीं उपलब्ध होते। जिसके प्रति योगमायारूप जवनिका (पर्दा)-का अपसारण हो जाता है, उसे ही भगवान्‌का साक्षात्कार होता है। भगवान्‌के स्वेच्छामय स्वरूपका प्रादुर्भाव कहीं भी हो सकता है। परीक्षित्‌के रक्षार्थ उत्तराके गर्भमें; प्रह्लादके रक्षार्थ स्तम्भमें जैसे उनका आविर्भाव हो सकता है, वैसे ही भक्तकी भावनासे भक्तके हृदयमें भी प्रादुर्भाव होता है। इसीलिये भावुकोंने कहा है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भगवन्! भक्त अपनी बुद्धिसे आपके जैसे-जैसे रूपका भावन करता है, आप वैसे-वैसे ही स्वरूपको धारण करते हैं। इसीलिये भक्तकी इच्छासे ही भगवान्‌का रूप बनता है। उपासनामें भावनाका प्राधान्य प्रथम शास्त्रों और सत्पुरुषोंके वचनोंसे भगवान्‌के स्वरूप और सौन्दर्य, माधुर्य, भूषण, वसन, अंग- उपांग आदिकी मनसे ही भावना की जाती है और वह भावना नीलमेघ, पंकज, मणि, सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि उपमाओंके ही आधारपर होती है, पश्चात् ध्यान और मानसपूजनकी महिमासे वही साधारण-सी ही भावनामयी मूर्ति दिव्य श्रीविग्रहरूपमें व्यक्त हो जाती है। इसीलिये यहाँकी भावना केवल मनोराज्य नहीं है। धातुमयी मूर्तिमें भी यद्यपि ईश्वरके व्यापक होने और मन्त्रकी विचित्र शक्तिसे उनका आविर्भाव माना जाता है तथापि भावनाकी वहाँ भी बड़ी प्रधानता है। तभी कहा गया है कि भावमें ही देवता है, इसीलिये भाव ही मुख्य कारण है— भावेषु विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥ साधारण-से-साधारण भोग या नैवेद्यमें भावनाकी महिमासे प्रियत्वसम्पत्ति हो जाती है। भावुक लोग भगवान्‌के सम्मुख स्थापित नैवेद्यमें श्रीलक्ष्मीनिर्मित दिव्यभोगकी भावना करते हैं। कौसल्या-सुमित्रादि माताओं और सुनयनादि श्वश्रुओंसे निर्मित अनन्त व्यंजनोंकी भावना साधारण शाकमें भी बनायी जा सकती है। भक्त कहता है— 'नाथ! आपने जिस रुचिसे शबरीके बेर और सुदामाके तण्डुलको ग्रहण किया था, उसी रुचिसे मेरे इस नैवेद्यको ग्रहण करो। देव! श्रीयशोदा, रोहिणीके हाथके नवनीत और दधिकी भावनासे मेरे इन पदार्थोंको ग्रहण करो।' श्रीसीता-राधासे परिवेशित व्यंजनोंकी भावनासे सचमुच भक्तसमर्पित वस्तु वैसी ही हो जाती है। भगवान्‌के सम्मुख स्थित नैवेद्योंमें श्रीराधाकी अधर- सुधा और भूषण-वसनोंमें श्रीराधाकी ही भावनासे अपनी समर्पित वस्तुओंका महत्त्व बढ़ा लिया जाता है। किसी कर्ममें साभिनिवेश मनका योग होनेसे उसका महत्त्व बढ़ जाता है। यज्ञ, दान, तप आदि भी विद्याभावनासहित किये जानेसे उच्चतम फलके कारण बन जाते हैं। कायिक, वाचिक, मानस—विविध कर्मोंमें मानस कर्मकी महिमा अधिक है। कायिक, वाचिक, कर्मोंका मूल भी मानस कर्म ही है। जैसे सूर्यकान्तापर सूर्य व्यक्त होता है, वैसे ही शुद्ध भावनापर भगवान्‌का प्राकट्य होता है। भावनामयी मूर्तिपर भगवान्‌का प्राकट्य होता है। जैसे वह्निकी ज्वाला, चन्द्र-सूर्यकी ज्योत्स्ना या प्रभा अन्यत्र अव्यक्त होनेपर भी अभिव्यंजक संस्थानके योगसे व्यक्त होती है, वैसे ही मन्त्रविधान और भावनाकी महिमासे मूर्तियोंमें देवतत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है। इन दृष्टियोंसे मनोमयी मूर्तिमें तो साक्षात् ही भगवान्‌का आविर्भाव होता है। यद्यपि सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मतत्त्वका स्वरूप श्रुति-युक्तिसे समझ लिया जा सकता है और इसे भी अनन्तानन्त जन्मोंके पुण्यपुंजका ही परिणाम समझना चाहिये तथापि श्रद्धाभक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन एवं भावनाके बिना तत्त्वका अपरोक्ष नहीं होता। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की निखिल-

सगुणोपासनामें सरलता ६०९ रसामृतमूर्ति मनोहर विग्रहका ध्यान, भावन, मानस- आराधन ही समस्त पुरुषार्थोंका परम मूल है। बिना इसके सगुण या निर्गुण किसी भी स्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो सकता। पुरुषार्थका मूल ही क्या, महानुभावोंने इसीको परम पुरुषार्थ भी स्वीकार किया है। यदि मनका अखण्ड प्रवाह सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि भगवान्‌के श्रीअंगकी ओर हो, पदनखमणिचन्द्रिका या अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्य-रसास्वादनमें दृष्टि आसक्त हो जाय, तब तो कुछ अवशिष्ट ही नहीं रहता। परंतु जबतक मनोमयी भगवदीय मूर्तिरूपमें भगवान्‌का प्राकट्य नहीं हुआ और इस ओर पूर्ण मानसी स्थिति नहीं हुई, तबतक उसकी सिद्धिके लिये अन्य अर्चा आदि मूर्तियोंमें भगवान्‌की तनुजा और वित्तजा आराधना करनी चाहिये। आचार्योंने कहा है कि प्राणियोंको सदा ही श्रीकृष्ण-सेवामें संलग्न रहना चाहिये। उनमें भी मानसी सेवा बड़े महत्त्वकी है। चित्तकी भगवत्प्रवणता (भगवान्‌में तन्मयता) ही मानसी सेवा है, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ (श्रीमद्वल्लभाचार्य) सगुणोपासनामें सरलता श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द भगवान्‌से अर्जुनने प्रश्न किया कि जो भक्त आपकी परम श्रद्धासहित उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षरकी उपासना करते हैं, इन दोनोंमें कौन अतिशय रूपसे आत्यन्तिक पुरुषार्थप्राप्तिके उपायको जाननेवाले हैं? एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ (गीता १२।१) प्रश्नका आशय यह है कि गीतामें द्वितीय अध्यायसे लेकर दशम अध्यायपर्यन्त भगवान्‌ने भिन्न- भिन्न स्थलोंमें सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, निराकार, निर्विकार, सर्वेन्द्रियाद्यगोचर ब्रह्मकी एवं सर्वैश्वर्यसर्वज्ञानशक्त्यादि- सम्पन्न विशुद्ध सत्त्वमय सगुण भगवत्स्वरूपकी उपासनाका वर्णन किया है। विशेषतः विश्वरूपाध्यायमें भगवान्‌ने सगुण परमेश्वरके अचिन्त्य, अद्भुत, लोकोत्तर- चमत्कारी स्वरूपका दर्शन भी कराया और अन्तमें ‘मत्कर्मकृत्’ (११।५५)—इस वचनसे यह कहा कि मेरे लिये श्रौत-स्मार्तकर्म करता हुआ, मुझे ही ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य समझता हुआ मेरी भक्ति करे और सर्वभूतोंमें वैरभावविवर्जित हो तो प्राणी मुझे प्राप्त कर लेता है। सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य ऐसी स्थितिमें यह सन्देह होना स्वाभाविक है कि दोनों उपासनाओंमें कौन श्रेष्ठ है? ‘एवं’ शब्दसे अव्यवहित पूर्वोक्त प्रकारका परामर्श होता है। यद्यपि अव्यवहित पूर्व ग्यारहवें अध्यायमें विश्वरूपका वर्णन है तथापि यहाँ सविशेष स्वरूपमात्रकी उपासनाका प्रश्न समझना चाहिये अर्थात् जो कोई भगवान्‌के अचिन्त्यानन्त कल्याणगुणगणार्णव विश्वरूप एवं श्रीमन्नारायण, श्रीसदाशिव अथवा श्रीकृष्णचन्द्र परमा- नन्दकन्द, श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रकी उपासनामें निरत है और जो भगवान्‌के निर्विशेष स्वरूपमें निरत है, इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? तब श्रीभगवान्‌ने कहा—जो महानुभाव मेरे सगुणस्वरूपमें मन लगाकर परम श्रद्धासे उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें अत्यन्त श्रेष्ठ हैं— मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ (गीता १२।२) तब क्या निर्गुण स्वरूपमें परिनिष्ठित श्रेष्ठ नहीं है? इस आशंकाका समाधान करते हुए भगवान् कहते हैं कि अव्यक्त, निर्गुण ब्रह्ममें निरतचित्त

पुरुषोंको क्लेश अधिकतर होता है; क्योंकि देहधारियों— देहाभिमानियोंको अव्यक्त गति—निर्गुणप्राप्ति सम्पादित करनी बहुत कठिन है— क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ (गीता १२।५) यहाँ यह कहा जा सकता है कि 'जब श्रुतियोंमें निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे अविद्या, तत्कार्यात्मक- प्रपंचनिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप मोक्ष सद्यः श्रुत है एवं सविशेष ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति कही गयी है, जिससे कालान्तरमें कैवल्य प्राप्त होता है, तब निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे सविशेष सगुण- ब्रह्मकी उपासनाका उत्कृष्टत्व कैसे कहा जा सकता है?' यद्यपि यह ठीक है कि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, निराकार, निर्विकार, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म परमात्माकी उपासनासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे मूल अविद्याकी निवृत्ति होती है और अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचकी निवृत्ति होते ही अनावृत परमानन्दघन ब्रह्मात्मनावस्थानरूप सद्योमुक्ति प्राप्त हो जाती है और सगुण ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति एवं कल्पान्तमें ब्रह्माके साथ कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है, अतः सगुणोपासनाकी अपेक्षा फलदृष्टिसे निर्गुणोपासनाका ही महत्त्व है तथापि निर्गुणोपासनामें कठिनाई अधिक है, सगुणोपासनामें सरलता है—'क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्।' (गीता १२।५) यदि कहा जाय कि 'निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति उत्कृष्ट है, अतः उसमें अधिकतर क्लेश होना उसकी निकृष्टताका हेतु नहीं है; क्योंकि उत्कृष्ट फलप्राप्तिमें अधिकतर क्लेश होता ही है' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सगुण-उपासनासे भी उसी फलकी प्राप्ति होती है, जिसकी निर्गुणोपासनासे। इसका कारण यह है कि भगवत्कृपासे भगवत्स्वरूप साक्षात्कारद्वारा उसी निर्गुणोपासक-प्राप्य कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाती है। मनोवचनातीत, अनिद्मात्मक (दृश्यप्रपंचसे अतीत), अनिर्देश्य ब्रह्मका प्राणिबुद्धिमें आरोहण ही अतिकठिन होता है। नामरूपक्रियात्मक दृश्यप्रतीतिका निराकरणके बिना निर्दृश्यक दृक्का अभिव्यंजन होना अशक्य है; क्योंकि जैसे चन्द्रमाके किसी असाधारण अवस्थाविशेष विशिष्टस्वरूपपर ही राहुका प्राकट्य होता है, अन्यथा नहीं, वैसे ही दृश्याकार परिणामविवर्जित रजस्तमोऽननुविद्ध विशुद्धचित्तसत्त्वपर ही— प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्विशेष ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी तादृशी अवस्था सम्पत्ति देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त दुःशक है। इसके विपरीत सगुणोपासनामें सरलता है। यद्यपि बाह्य विषयोंसे मनःप्रत्यावर्तनपूर्वक भगवत्स्वरूपमें मनोयोग करना कठिन ही है तथापि निर्गुण, निर्विशेषमें मनोयोग उससे भी कठिन है। उसकी अपेक्षा सगुणमें मनका आकर्षण होना सरल है। भगवान्की मंगलमयी मनोरंजक लीलाएँ मुक्त, मुमुक्षु, विषयी आदि सब तरहके अधिकारियोंके चित्तको खींचनेवाली होती हैं। जनसाधारण, वे चाहे ज्ञान, तत्साधनविहीन भी क्यों न हों, उनके कल्याणार्थ निर्गुण, निराकार, निर्विकार, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म सगुण, साकाररूपमें प्रकट होता है— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) राम, कृष्ण, विष्णु, शिवकी उपासना शुद्ध ब्रह्मकी ही उपासना है। बुद्धि कुछ भी हो, किंतु जिस वस्तुकी उपासना होती है, उसीकी प्राप्ति होती है। जैसे दीपक-बुद्धिसे भी यदि चिन्तामणिमें प्रवृत्त हुआ जाय तो भी प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही चाहे जिस बुद्धिसे भगवान्की उपासना हो, प्राप्ति उस परमात्माकी ही होती है। सच्चिदानन्द परब्रह्म आकाशादि समस्त प्रपंचका कारण है और सर्वत्र विराजमान है। विशेषतः बुद्धिरूपा गुहा या हार्दाकाशमें उसका विशेष रूपसे

उपलम्भ होता है। जैसे चन्द्रके सम्बन्धसे राहुका दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिके सम्बन्धसे परमात्मपदका दर्शन होता है। भावना-भावित भगवान्‌की सगुण मूर्ति ही वास्तविक दिव्य मूर्तिरूपमें व्यक्त होती है। भगवान् सर्वत्र होते हुए भी मायाजवनिका (पर्दे)-से ढके हैं। उसे हटाकर वे जहाँसे चाहें वहाँसे व्यक्त हो सकते हैं। पाषाणसे भी मायाजवनिकाको हटाकर भगवान् प्रह्लादके लिये प्रकट हो सकते हैं, तब फिर शुद्ध मन तो भगवान्‌के उपलम्भका साधन ही है। वस्तुतः किसी भी वस्तुमें चित्तको एकाग्र करनेसे मूल परमात्मपदकी ही प्राप्ति होती है। जैसे स्फटिकमें लालपुष्पके सम्बन्धसे 'रक्तः स्फटिकः' (लाल स्फटिक है) ऐसी बुद्धि होती है, उसीमें यदि किसीको 'स्फटिक है' ऐसा ज्ञान प्रमुष्ट (विलुप्त) हो जाता है तो उसे उसमें पद्मरागमणिकी बुद्धि होती है। आगे चलकर चन्द्रकी चाँदनी आदिके संसर्गसे उसीमें इन्द्रनीलकी बुद्धि होने लगती है। फिर भी इन सभी बुद्धियोंका आलम्बन एक स्वच्छ स्फटिक ही है। वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्मतत्त्व ही मायाके सम्बन्धसे अव्यक्त ब्रह्म और सूक्ष्म प्रपंच उपाधिसे उपहित होनेपर हिरण्यगर्भ एवं स्थूल प्रपंचसे उपहित होकर वही विराट् कहलाता है। जैसे स्वच्छ स्फटिकमें ही इन्द्रनीलबुद्धिसे दृढ़ चिन्तनद्वारा इन्द्रनीलबुद्धि मिटकर पद्मरागबुद्धि होगी। यह दृढ़ चिन्तनकी महिमा है कि वह चिन्तनीय वस्तुका यथार्थ स्वरूप अवगत करा देता है। अतः पद्मरागका चिन्तन रक्त स्फटिकका बोध करा देगा। पुनश्च उसके चिन्तनसे अन्तमें अवश्य ही 'शुद्धः स्फटिकः' ऐसा बोध हो जाता है। वैसे ही स्थूलका चिन्तन करते-करते सूक्ष्मका और फिर उसका चिन्तन करते-करते कारणका, फिर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्मका बोध (साक्षात्कार) होता है। शुद्ध मन तो ऐसी सुन्दर उपाधि है, जहाँ 'स्वच्छः स्फटिकः' के समान शुद्ध ब्रह्मका बोध होता है। अन्य मूर्तियोंके चिन्तनमें चिन्तनीय पदार्थ पृथक् होता है, मन चिन्तन-व्यापारमें ही लगा रहता है। परंतु यहाँ तो मन ही ध्येय भगवान्‌की मूर्तिरूपसे भी व्यक्त होता है और वही चिन्तन करनेवाला होता है। मानसजपमें भी यही हाल है, वहाँ मनको ही मानसमन्त्र बनना पड़ता है। इस मानसजप और ध्यानसे मनकी शुद्धि, एकाग्रता, भगवान्‌के वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति बड़ी ही सुविधाके साथ हो जाती है।

अव्यभिचार भक्तियोग

प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्‌को अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवाले सात्त्विक, राजस, तामस गुणोंका उल्लंघन करके ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। गुणमय संसारसे छूटनेका एकमात्र यही सुन्दर उपाय है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन करनेपर जिस प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परमात्मतत्त्वका निश्चय होता है उसीका निरन्तर निदिध्यासन करनेसे उसीका साक्षात्कार होता है। रज्जु आदि अधिष्ठानके साक्षात्कारसे उसमें कल्पित सर्प, धारा, माला आदिका जैसे अभाव हो जाता है, वैसे ही निर्विकार सर्वाधिष्ठान चिदात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे उसमें कल्पित गुणमय प्रपंचका आत्यन्तिक अभाव हो जाता है। इसी कारण 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।' (गीता १४।२६) यहाँपर अव्यभिचार भक्तियोगसे शुद्ध परब्रह्मका निदिध्यासन या ज्ञानाभ्यास ही लिया जाता है। यद्यपि भक्तिका ज्ञान या निदिध्यासन अर्थ पक्षपातयुक्त-सा प्रतीत होता है तथापि 'स्व- स्वरूपानुसन्धान' को भक्ति कहा है। विचार करनेसे यह ठीक भी मालूम पड़ता है। विषयाकारका भजन करनेवाला ज्ञान 'भक्ति' शब्दसे कहा जा सकता है।

६१२ भक्तिसुधा

'विषयाकारं भजतीति भक्तिः'। इसके अतिरिक्त 'भज सेवायाम्' धातुसे 'भक्ति' शब्दकी सिद्धि होती है—'भजनं भक्तिः।' भजन अर्थात् सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। मानसी सेवा सेवा यद्यपि शरीर, इन्द्रिय, बुद्धिसे की गयी कायिकी, ऐन्द्रियिकी, मानसी भेदसे अनेक हैं तथापि मुख्य सेवा मानसी ही है। मानसी सेवा ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीवल्लभाचार्यजीने भी कहा है— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ अर्थात् प्राणीको सदा श्रीकृष्णसेवा करनी चाहिये। सेवामें भी मानसी सेवा ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। चित्तकी कृष्णोन्मुखता या कृष्णमें तन्मयता ही सेवा है। मानसी सेवाकी सिद्धिके लिये ही तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये। अर्थात् कायिकी, वाचिकी आदि सेवा करते-करते अन्तमें मानसी सेवाकी योग्यता प्राप्त होती है। 'विजातीयप्रत्ययनिरासपूर्वकं सेव्याकाराकारित मानसी वृत्तिप्रवाह' ही मानसी सेवा है। जिस प्रकार समुद्रोन्मुखी गंगाका अखण्ड प्रवाह चलता है, उसी प्रकार भगवदुन्मुखी मानसी वृत्तियोंका प्रवाह चलना ही भगवान्‌की मानसी सेवा है। जैसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्द भगवान्‌के आकारसे आकारित वृत्तिका प्रवाह होता है, वैसा ही वेदान्तवेद्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान्‌की स्वरूपविषयीणी वृत्तियोंका भी प्रवाह होता है। निर्विकार परब्रह्माकार मानस प्रवाह ही भक्ति, भजन या सेवा है और वही भगवान्‌का प्रापक होनेसे या एकाग्रता होनेसे योग भी है। जब वह बीच-बीचमें भगवान्‌से हटकर बाह्य प्रपंचोंसे जुड़ जाता है, तब व्यभिचारी कहा जाता है। अतः अन्यसम्बन्धविवर्जित, निर्विशेष भगवान्‌के आकारसे आकारित अविच्छिन्न मानस वृत्ति-प्रवाह ही अव्यभिचार भक्तियोग है, वही ज्ञानाभ्यास है और वही निदिध्यासन भी है। चार प्रकारके भक्त इस अव्यभिचार भक्तियोगसे भगवान्‌का सेवन करनेसे साक्षात्कारद्वारा अति शीघ्र ही गुणमय प्रपंचका बाध हो जाता है। ज्ञान चतुर्थी भक्ति है। अतः भगवान्‌के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार भक्त होते हैं—'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।' (गीता ७।१६) ज्ञानी ज्ञानसे ही भगवान्‌का भजन या सेवन करता है। ज्ञानी भगवान्‌का अत्यन्त प्रिय भक्त है। यद्यपि भगवान्‌के भजन करनेवाले सभी भगवान्‌के प्रिय एवं उदार हैं तथापि ज्ञानी तो एकमात्र भगवान्‌में ही भक्ति करता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें भगवान्‌से भिन्न दूसरी वस्तु रहती ही नहीं। अतएव ज्ञानीको भगवान् एक क्षणके लिये भी अदृश्य नहीं होते और भगवान्‌को ज्ञानी अदृश्य नहीं होता— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (गीता ६।३०) प्रथम सूक्ष्मतत्त्वमें मनकी स्थिति असम्भव है, अतः विराट्, हिरण्यगर्भादि तत्त्वोंमें मनको स्थित करके फिर क्रमेण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् सगुणमें स्थिति-सम्पादन करते हुए निर्गुण, निराकार, निर्विशेष, ब्रह्ममें स्थिति सम्पन्न होती है। स्थूल आलम्बनोंका अपोहन करते हुए सूक्ष्म आलम्बनोंमें चित्तकी एकाग्रता करते हुए अन्तमें चित्त अत्यन्त निरालम्ब बनाया जा सकता है। श्रीकपिलदेवजीने भी निर्गुण, निर्विकार ब्रह्ममें स्थितिके लिये भगवान्‌की मधुर, मनोहर, मंगलमयी, सगुण, साकार सच्चिदानन्दमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया है। प्रथम अस्त्र-शस्त्र, भूषण, वसनादिसे सुसज्जित मूर्तिका ध्यान कहा है, फिर अस्त्र-शस्त्ररहित केवल श्रीअंगका ध्यान करना बतलाया है। एक-एक अंगका ध्यान और उसके सौन्दर्य, माधुर्य एवं महिमाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन बतलाया है। फिर श्रीचरणारविन्दकी नखमणिचन्द्रिका या