भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

नामरूपकी उपयोगिता ५१७ होनेवाले विरले ही होते हैं। नामरूपकल्पनाका दुष्परिणाम किसीसे छिपा नहीं है। पृथक्-पृथक् परमेश्वरके नाम और उपचारपद्धतियोंपर ही आज भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें द्वन्द्व मच रहा है। ईसाई, मुसलमान, आर्यसमाज, ब्रह्मसमाजके अतिरिक्त सनातनधर्मियोंमें ही नामरूपोंपर इतने साम्प्रदायिक भेद उपस्थित हैं कि जिसकी कल्पना भी साधारण बुद्धिवालेके मनमें नहीं हो सकती। शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश, सूर्य आदि भिन्न-भिन्न देवताओंके उपासक अपने-अपने इष्ट और अपनी-अपनी उपासना- पद्धतिका ही महत्त्व सिद्ध करनेके लिये दूसरोंकी निन्दा और खण्डनमें कुछ भी कसर नहीं रखते। इतना ही क्यों, विष्णुके ही विविध स्वरूपोंमें इस नाम या इस रूपसे मुक्ति होती है, दूसरेसे नहीं; श्रीकृष्णका वन्दन अमुक वेश-भूषामें ही हो सकता है, दूसरेमें नहीं, ऐसे विचित्र विचार भी प्रचलित हैं, जो वैमनस्य और विद्वेषके मूल बन रहे हैं, परंतु फिर भी क्या यह नामरूप और क्रियाओंकी कल्पना व्यर्थ है? अभिज्ञोंका तो कहना है कि प्राणी जबतक सत्त्व, रजस्, तमस् आदि गुणों और विविध नामरूप एवं कर्मोंमें बँधा हुआ है, तबतक उसे गुण एवं नामरूपक्रियाव्यतीत वस्तुका दर्शन और उसकी उपलब्धि असम्भव ही है। नामरूपसे नामरूपातीत तत्त्वकी प्राप्ति वेदान्त तो पग-पगपर यही उपदेश करता है कि मनोवचनातीत, अनिर्देश्य, अव्यवहार्य, प्रपंचातीत, परमतत्त्व ही सब कुछ है, उससे भिन्न कोई भी व्यवहारविषय तथ्य नहीं है, परंतु जो अनेक तापोंसे सन्तप्त एवं अशान्त है, उसे क्या मात्र इन वचनोंसे शान्ति हो सकती है? अतः जैसे रजसे ही दर्पणगत रज दूर किया जाता है, कण्टकसे ही कण्टक निकाला जाता है, किंवा विषसे ही विषका प्रभाव दूर किया जाता है, वैसे ही कर्मसे ही कर्मका निर्हार और नामरूपसे ही नामरूपातीत तत्त्व प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाता है। निर्गुण, निराकार, निष्प्रपंच असंगसे ही सगुण, साकार समस्त प्रपंच व्यक्त हुआ है। इसमें ही आबद्ध जन्तु अपने मूल परमतत्त्वसे बहिर्मुख होकर अनादिकालसे इस दुर्गम भवाटवीमें भटक रहे हैं। कहा जाता है कि मन, बुद्धिके हलचलसे ही परमार्थ परमतत्त्व आवृत हो जाता है। जैसे छायाके पीछे चलनेसे वह पकड़कर स्थिर नहीं की जा सकती, वैसे ही मन-बुद्धिको स्थिर करनेके प्रयत्नसे वे वशमें नहीं किये जा सकते। मनमें निर्विचारता या निर्व्यापारता स्थिर होनेपर ही निर्दृश्य, निर्विकल्प वस्तुका बोध या उपलब्ध होता है। मनके व्यापारसे ही दृश्य या विकल्पकी उपस्थिति होती है। मनके निर्व्यापारता या अमनीभावमें विकल्प प्रतीतिविरुद्ध होनेसे निर्विकल्प वस्तुका अनायास ही स्फुरण होता है', परंतु यह क्या जैसा कहनेमें सुगम है, वैसे ही अनुष्ठानमें भी? क्या महाप्रयास बिना एक क्षणके लिये भी ऐसा सम्भव है कि मन निश्चल रहे और उसमें आवश्यक-अनावश्यक अन्धकार, प्रकाश, आकाश, तृण कोई-न-कोई दृश्य स्फुरित न हो। जब ऐसा सम्भव ही नहीं, तब अनिर्देश्य, अनाम, अरूप, निष्क्रिय वस्तुकी कोरी बातोंसे क्या लाभ? मनकी एकाग्रताके लिये सात्त्विक कर्म और ज्ञानका अवलम्बन अपेक्षित यह कह देना बहुत सरल है कि 'स्वयं विज्ञाता या मन्ताको ही विचार या मनन करने-न करनेमें स्वतन्त्रता है। कर्ता चाहे तो करणोंको व्यापृत करे- न करे, उनसे काम ले अथवा न ले।' परंतु क्या मन मन्ताकी रुचिका अनुवर्तन करता है अथवा मन्ताकी रुचि न होते हुए भी उसको हठात् आकर्षित करता है? इसीलिये विवेकियोंने अध्यारोप और अपवादसे निष्प्रपंचका ही प्रपंचन किया है—'अध्यारो- पापवादाभ्यां निष्प्रपञ्चं प्रपञ्च्यते। शिष्याणां बोधसिद्ध्यर्थं तत्त्वज्ञैः कल्पितः क्रमः॥' जब प्रपंच एवं तदन्तर्गत नामरूपक्रियाओंके आलम्बनद्वारा ही सर्वातीत तत्त्वको प्राप्त करना है,