भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 606

५९६ भक्तिसुधा है। प्रेमके उत्कट हो जानेपर उसी क्षण भगवान्‌का दर्शन होता है। फूल तोड़नेमें विलम्ब हो सकता है, किंतु उस समय भगवान्‌के मिलनेमें किंचित् भी विलम्ब नहीं होता। भगवान् प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वसाक्षी हैं, उनको पानेमें कौन कठिनाई— कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- रूपासने स्वे हृदि छिद्रवत् स्वतः। (श्रीमद्भा० ७।७।३८) —इत्यादि बातोंकी भी संगति लगती है। भगवत्प्राप्तिमें अत्यन्त प्रयत्न करनेकी अपेक्षा बतलानेके लिये शास्त्रोंने भगवान्‌को अत्यन्त दुर्लभ कहा है, निराशा मिटाकर उत्साह बढ़ानेके लिये भगवान्‌को अत्यन्त सुगम भी कहा है— 'दूरात्सुदूरे अन्तिकात् तदु अन्तिके च।' भगवान् दूर-से-दूर और समीप-से भी समीप हैं। नामरूपकी उपयोगिता नामरूपक्रियासे अतीत—अनाम, अरूप, निष्क्रिय परमतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही प्राणीको अनेक क्रियाओं, नामों एवं रूपोंका अवलम्बन करना पड़ता है। अनामके नामकरण एवं अरूपके रूपकी कल्पना सचमुच अपरमेयको परिमित और निःसीमको सीमित करना है। किसी महानुभावने कहा है— गत्यानया व्यापकता हता ते स्तुत्यानया वाक्परता हता ते। दृष्ट्यानयागोचरता तथा हता ममापराधस्त्रितयं क्षमस्व॥ अर्थात् 'हे नाथ! इतने दूर आपके दर्शनार्थ चलकर मैंने आपकी व्यापकतापर तथा दर्शनसे आपकी अगोचरतापर अविश्वास किया और स्तुतिसे आपकी वाक्परताकी भी अवहेलना की। हे दयामय! इन मेरे तीन अपराधोंको कृपया आप क्षमा करना।' जैसे प्राणी व्यष्टि-नामरूपकी उपाधिमें आसक्त होकर व्यक्तिगत स्वार्थके लिये समष्टि-हितका विघातक बन जाता है या समष्टि-हितके कार्योंमें भी सम्मान, ख्याति या धन-लाभादि स्वार्थोंको ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपमें प्रधानता देने लगता है; वैसे ही सर्वाधार, परमतथ्य, पारमार्थिक वस्तुमें भी नाम- रूपोंकी कल्पनाओंसे ही नाना विपत्तियोंको खड़ा करता है। सच बात तो यह है कि नामविशेष और रूपविशेषके अभिमानवालोंको व्यक्तिगत विशिष्ट नामों और रूपोंसे स्तुतिकी स्पृहा होती है। ग्राहसे पीड़ित गजराजने निर्विशेष परब्रह्मका ही स्तवन किया। उस स्तवनमें किसी व्यक्तिविशेष या नामरूपकी व्यंजना नहीं थी। उसने यही कहा कि— ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्। पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ (श्रीमद्भा० ८।३।२) मैं उस परमतत्त्वको नमन करता हूँ, जिससे जड़ विश्व चेतित हो रहा है, जो निखिल विश्वका आदि बीज और परेश है, जिससे तथा जिसमें विश्व उत्पन्न तथा स्थित होता है और जिससे उसका धारण होता है। उस स्वयम्भूको नमस्कार है, जो पर-अपर कार्य- कारणसे अतीत है। भिन्न-भिन्न नामरूपके अभिमानी देवगण गजेन्द्रकी स्थिति देखते थे, उसकी स्तुति भी सुन रहे थे, उसको मुक्त करनेमें समर्थ भी थे, परंतु उनके नामरूपमें उनकी स्तुति नहीं थी, इसीलिये उनकी प्रवृत्ति गजेन्द्रके रक्षणमें नहीं हुई। उसकी रक्षा तो उसीसे हुई, जो किसी नामरूपविशेषका अभिमानी नहीं था। जो सभी नामों तथा रूपोंको अपना ही मानता था। आज भी सामाजिक क्षेत्रोंमें व्यक्तिगत ख्याति या सम्मानकी ओर ध्यान न देकर सभी नामों और ख्यातियोंको अपना ही समझकर कार्यमें अग्रसर