भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय खण्ड—भक्तितत्त्व भगवत्प्राप्ति प्रायः लोग पूछा करते हैं कि 'क्या भगवत्प्राप्ति इसी जन्ममें हो सकती है?' उनके प्रश्नका उत्तर है—ऐसा एक ही जन्ममें हो सकता है या अनेक जन्मोंमें, इसका कोई नियम नहीं है, किंतु जब भी भगवान्के प्रति प्रेमका गाढ़ उदय हो जाता है, भगवान् तभी मिल जाते हैं— हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ (रा०च०मा० १।१८४।५) अनेक जन्मोंतक भी यदि प्रेमका संचार न हो तो भगवान् नहीं प्राप्त होते, प्रेम प्रकट हो जानेपर भगवान् एक ही जन्ममें मिल जाते हैं। जिस समय भक्त भगवान्से मिलनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित होकर स्वाध्याय, ध्यान आदिको प्राप्त होता है; उस समय भगवान्को अवश्य प्रकट होना पड़ता है। आप्तकाम, पूर्णकाम, आत्माराम, परम निष्काम भगवान् परम स्वतन्त्र हैं तथापि भक्तप्रेममें पराधीन होना उनका एक स्वभाव है। अनुभवी लोगोंने कहा है— अहो चित्रमहो चित्रं वन्दे तत्प्रेमबन्धनम्। यद्बद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्म क्रीडामृगीकृतम्॥ 'अहो! कोई निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्मको, कोई सगुण-साकार ब्रह्मको भजते हैं, परंतु मैं तो उस प्रेमबन्धनको भजता हूँ, जिससे बँधकर अनन्त प्राणियोंको मुक्ति देनेवाला, स्वयं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्म भक्तोंका खिलौना बन जाता है।' जिस समय भक्त भगवान्के बिना न रह सके, उस समय भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते। जैसे पंखरहित पतंग-शावक अपनी माँको पानेके लिये व्याकुल रहते हैं, जैसे क्षुधार्त वत्सतर (छोटे गोवत्स) माँका दूध चाहते हैं, किंवा परदेश गये हुए प्रियतमसे मिलनेके लिये प्रेयसी विषण्ण (व्याकुल) होती है, हे कमलनयन! मेरा मन आपको देखनेके लिये वैसे ही उत्कण्ठित होता है— अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः। प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥ (श्रीमद्भा० ६।११।२६) भगवान्में उत्कट प्रीति होनेपर तत्क्षण ही भगवत्प्राप्ति इस प्रकारकी सोत्कण्ठ भक्तकी प्रार्थनासे भगवान् द्रुत होकर भक्तसे मिलने दौड़ पड़ते हैं। हाँ, यह ठीक है कि भगवत्सम्मिलनकी ऐसी उत्कट उत्कण्ठा सरल नहीं है, किंतु जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरोंके पुण्यपुंजसे ही भगवान्में उत्कट प्रीति प्राप्त होती है। इसीलिये उपनिषदोंने कहा है कि ब्राह्मणादि अधिकारी यज्ञ, तप, दान और अनशनादि सत्कर्मोंसे उन परमतत्त्व भगवान्को जाननेकी उत्कट इच्छा उत्पन्न करते हैं— 'तमे तं ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन विविदिषन्ति।' (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२२) जब उस परमतत्त्वकी जिज्ञासा ही उत्पन्न करनेमें अनेक जन्मोंके सत्कर्मोंकी अपेक्षा होती है, तब स्पष्ट ही है कि जिसे भगवत्सम्मिलनकी उत्कट कामना है, जिसे भगवान्के न मिलनेसे महती व्याकुलता है, वह केवल इसी जन्मका सत्कर्मी नहीं, अपितु पहले जन्मोंसे भी उसका इस सम्बन्धमें प्रयत्न चल रहा है। इस दृष्टिसे ध्रुवकी जन्मान्तरीय तपस्याओं तथा 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।' (गीता ७।१९) इत्यादि वचनोंकी संगति लग जाती