भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

५९४ भक्तसुधा श्रीव्रजांगना प्रभृति थीं, जिन्हें श्रीकृष्णके विरहमें एक क्षण भी सहस्रों युगके समान प्रतीत होते थे और श्रीकृष्णके सम्मिलनमें सहस्र कल्प भी क्षणहीके समान प्रतीत होते हैं। इस तरह जो प्रभुके बिना प्राण- धारण ही नहीं कर सकते, उनके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इस शुद्ध तत्त्वनिष्ठ प्रेमीके लिये मुख्यरूपसे प्रभुका प्राकट्य होता है। फिर तो मुमुक्षुओंके लिये, किं बहुना प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भी प्रभुका प्राकट्य होता है। इसी वास्ते तो श्रीशुकदेवजीने प्राणिमात्रके निःश्रेयसको ही प्रभु-प्राकट्यका प्रयोजन कहा है—'नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) यहाँ 'नृणां' से 'नरमात्राभिमानिनां' यह अर्थ समझना चाहिये। जैसा कि 'न कर्म लिप्यते नरे' यहाँपर श्रीशंकराचार्य भगवान्ने 'नरे' का 'नरमात्राभिमानिनि' यह अर्थ किया है। भावार्थ यह हुआ कि ज्ञानी और उपासकोंसे भिन्न साधारण अज्ञ-प्राणियोंके निःश्रेयसके लिये निर्गुण निराकार निर्विकार भगवान्का सगुणरूपमें प्राकट्य होता है। भगवान्में चित्त लगानेसे परम कल्याण अतएव काम, क्रोध, ईर्ष्या, भय, स्नेह आदि किसी भी भावसे भगवान्में चित्त लगानेसे प्राणियोंका कल्याण हो जाता है, अर्थात् यहाँ ज्ञानके बिना भी प्राणियोंका कल्याण हो जाता है। जैसे विष-बुद्धिसे भी अमृतपान करनेसे अमृतत्व-लाभ होता है, वैसे ही ब्रह्मबुद्धि बिना भी जिस किसी तरह भी श्रीकृष्णका सेवन करनेसे भगवत्प्राप्ति हो ही जाती है; क्योंकि वस्तु-शक्ति ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करती। यद्यपि यों तो जब 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दोग्य० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सब कुछ ब्रह्म ही है, फिर प्राकृत स्त्री-पुत्र आदिके प्रेमियोंको भी मुक्त हो जाना चाहिये; क्योंकि जब सब वस्तु ब्रह्मकी है, ज्ञानकी अपेक्षा है ही नहीं, फिर पत्नी-सेवन भी ब्रह्मसेवन क्यों न माना जाय? इत्यादि शंकाएँ होती हैं। तथापि भगवान् निरावरण ब्रह्म हैं और प्रपंच सावरण ब्रह्म है। बस, इसी भेदसे भगवान्का सेवन ज्ञान बिना भी कल्याणकारक है और प्रपंच-सेवन ज्ञान बिना प्रपंचका ही प्रापक है। जैसे मेघके सम्बन्धसे आदित्यका रूप छिप जाता है; परंतु दिव्य उपनेत्र या दूरबीनके सम्बन्धसे आदित्यका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु अतिदिव्य स्वरूपमें स्पष्ट होता है, वैसे ही प्रपंचोत्पादिनी मलिन शक्तिके सम्बन्धसे प्रपंचरूपमें प्रकट ब्रह्मका निजी दिव्यरूप तिरोहित या आवृत हो जाता है; परंतु दिव्य लीलाशक्तिके योगसे दिव्य मधुर सगुण साकार श्रीराम श्रीकृष्णरूपमें प्रकट परब्रह्मका स्वरूप आवृत नहीं होता; किंतु दिव्य स्वरूपमें प्रकट होता है। अतः निरावरणरूपमें ज्ञानकी आवश्यकता नहीं, सावरण- रूपमें ही है। सत्त्वादिगुणकृत प्रभावसे विनिर्मुक्त होनेके कारण ही ये निर्गुण भी कहे जाते हैं। इसी आशयसे 'हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्' (श्रीमद्भा० १०।८८।५) इत्यादि उक्तियाँ हैं। इन्हें जार-बुद्धिसे समाश्रयण करके भी कुछ व्रजांगनाएँ मुक्त हो गयीं— 'तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२९।११) जैसे चिन्तामणिमें दीपक-बुद्धिसे भी प्रवृत्त होनेसे प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही निरावरण श्रीकृष्ण परमात्मामें किसी भी बुद्धिसे प्रवृत्त क्यों न हो, प्राप्ति अखण्ड अनन्त निरावरण ब्रह्मकी ही होगी।