भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

५९८ भक्तिसुधा तब फिर उसमें उल्बण भावोंको सोच-समझकर त्यागनेके लिये पहले शान्त भावोंका अवलम्बन करना पड़ता है। तामस कर्म तथा विचार दूर करनेके लिये राजस और राजसको मिटानेके लिये सात्त्विक कर्मों तथा ज्ञानका आश्रयण किया जाता है। स्वाभाविक या पाशविक कर्मों तथा ज्ञानको मिटानेके लिये वेदशास्त्रसम्मत कर्म और ज्ञानोंका अवलम्बन करना आवश्यक होता है। योगशास्त्रने क्लिष्टा वृत्तियोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये अक्लिष्टा वृत्तियोंका अवलम्बन करना बतलाया है। घोर तथा मूढ़वृत्तियाँ बिना शान्तवृत्तियोंके सेवनके कभी भी दूर नहीं हो सकतीं। जब प्रपंचातीत परमतत्त्वसे प्रच्युत होकर जीव व्यावहारिक जगत्में अवतीर्ण होता है, तब उसके सामने विश्वके शुभ- अशुभ, न्याय-अन्याय, अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकारके विषय और व्यवहार उपस्थित होते हैं। भलाई-बुराई, विष-अमृत आदि भेद जब मानने पड़ते हैं, क्षुधा-पिपासा मिटानेके लिये अन्न-जलकी अपेक्षा होती है, तब फिर पुण्य-पापकी व्यवस्था भी माननी पड़ती है। अतएव वर्णाश्रमानुसार वेदशास्त्रोक्त कर्म- धर्मकी आवश्यकता होती है। बिना किसी निर्दोष सात्त्विक आलम्बनके मनको निरालम्ब नहीं किया जा सकता। नामरूपसे अतीत परब्रह्मकी दिव्यलीला- शक्तिके सहयोगसे नामरूपयुक्त सगुण- साकार रूपमें अभिव्यक्ति वैदिकोंका मत है कि नामरूपसे अतीत वेदान्तवेद्य, परमतत्त्व ही स्वांशभूत प्राणियोंके कल्याणार्थ अपनी अचिन्त्य दिव्य लीलाशक्तिसे परम मनोहर नामरूपको स्वीकार करते हैं। जैसे कोई परमकारुणिक चिकित्सक किसी कुपथ्यप्रिय, अदीर्घदर्शी, अबोध शिशुको उसके अभीष्ट कुपथ्यरूपमें दिव्य महौषध प्रदान करता है, वैसे ही मनोहर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयोंमें आसक्तचित्त प्राणियोंके मनको प्रपंचातीत भगवान्‌के निजस्वरूपमें आकर्षित करनेके लिये ही अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्ययका ही दिव्य शब्द, दिव्य स्पर्श, दिव्य गन्ध, दिव्य रूप-सम्पन्न रूपमें प्रादुर्भाव होता है। भक्तोंके अभीष्ट भिन्न स्वरूपोंके विशिष्ट सौन्दर्य, माधुर्यादि लोकोत्तर गुणगणोंमें चित्तके आसक्त होनेके अनन्तर वही अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य परमतत्त्व सुस्पष्ट रूपमें व्यक्त हो जाता है। शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि वेदशास्त्र- सम्मत सभी स्वरूपोंमें एक वही पूर्णतम तत्त्व व्यक्त होता है। इसीलिये उनके माहात्म्य-प्रतिपादक सभी सद्ग्रन्थोंमें अन्तिम स्वरूप एक ही मिलता है। एक अनन्त, अखण्ड, निर्विशेष, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्द ही सर्वाधार, साक्षीरूपसे अवशिष्ट रहता है। सभी नामरूप भगवान्‌के ही हैं गीतामें तो यहाँतक कहा गया है कि विश्वमें जो भी कोई ‘विभूतिमत् ऊर्जिततत्त्व’ दिखलायी देता हो, उसे भी भगवान्‌का ही रूप समझना चाहिये— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ (१०।४१) आचार्यप्रवर श्रीविद्यारण्यजीने ‘पंचदशी’ में कहा है कि परमेश्वरके भिन्न स्वरूपोंमें विवाद नहीं करना चाहिये। जब निखिल विश्व ही परमेश्वरका स्वरूप है, तब अमुक परमेश्वर है, अमुक नहीं, ऐसे विवादका अवसर ही कहाँ? इसीलिये अश्वत्थ, वट, हल, कुदालतककी पूजा अपने धर्ममें होती है। सभीमें पूर्णतम, परमतत्त्वका ही पारमार्थिक रूप उपलब्ध हो सकता है, फिर उसका नाम या रूप चाहे जो कुछ भी हो। इसीलिये नामविशेषपर आग्रह न करके अभिज्ञोंने ‘कस्मै चिन्महसे नमः, कस्मै देवाय हविषा विधेम’ इस रूपसे ही परमतत्त्वका वन्दन किया है, परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि भगवान्‌में नाम और रूप हैं ही नहीं। यदि नामरूप हैं तो सब भगवान्‌के ही हैं, अन्य किसीके नहीं।