भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइष्टदेवकी उपासना ५९९
'किम्' शब्द सर्वनाम है, अतः वह सभीका वाचक है। जो सर्वस्वरूप है, उसमें ही 'किम्' शब्दका प्रयोग हो सकता है। जिस वस्तुपर किसी एकका अधिकार नहीं होता, वह राजाकी समझी जाती है। जो राजाकी वस्तु है, वह सबके उपयोगमें आती है। अतः 'किम्' शब्दका जैसे यह अर्थ है कि परमतत्त्वका विशेष नाम नहीं है, वैसे ही यह भी आशय है कि सब नाम और रूप उन्हींके हैं। भगवदर्थनामरूपकर्मसे भवबन्धनकी विमुक्ति फिर भी राजस, तामस, सात्त्विक ऋषि, देवता या भगवत्सम्बन्धिनी नामरूपक्रियाएँ भवबन्धनसे छुड़ाकर परमतत्त्वको प्राप्त कराती हैं और उनके विपरीत नामरूपक्रियाएँ अनेक अनर्थयुक्त संसारमें भटकानेवाली होती हैं। इसीलिये वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्त क्रियाएँ, मन्त्र एवं भगवन्नाम आदरणीय तथा समाश्रयणीय हैं। इसी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न गुणरूपविशिष्ट विग्रह और प्रतिमाओंकी आराधनाएँ मान्य हैं। उन सबकी पद्धति, अधिकार, शुद्धि, अशुद्धि सभी शास्त्रविधानके अनुसार ही होनी चाहिये। पारमार्थिक चर्चाओं एवं ज्ञानाभिमानसे उन सबकी अवहेलना केवल प्रमाद है। जैसे घी और बत्तीके संयोगसे व्यापक निर्विकार अग्नि दिव्य दीपशिखाके रूपमें प्रकट होती है, जैसे शैत्यके योगसे जल हिमरूपमें व्यक्त होता है, वैसे ही अचिन्त्य लीलाशक्तिके योगसे अनामरूप भगवान् ही दिव्य नामरूप स्वरूपमें प्रकट होते हैं। अतएव भगवान्का नाम और रूप निरावरण भगवान्का साक्षात्स्वरूप ही है। जैसे काष्ठ, पाषाण, प्रासाद—जहाँ भी कहीं पैर रखा जाय, वह सब कुछ पृथ्वी ही है, वैसे ही जिस किसी भी नामरूपसे भगवान्का ही दर्शन और श्रवण है। तब भी विशुद्ध लीलाशक्तिकी महिमासे प्रकट भगवान्के नामरूप एवं लीलाएँ निरावरण भगवान्के रूप हैं, त्रिगुणमयी प्रकृतिके योगसे अभिव्यक्त इतर नामरूपक्रियाएँ सावरण भगवान्के रूप हैं। जैसे मेघादि अस्वच्छ उपाधियोंसे सूर्यमण्डल आवृत रहता है, परंतु दूरवीक्षणादि विशेष मन्त्रोंके द्वारा व्यवधान होनेपर भी वह आवृत नहीं होता, वैसे ही अविद्यादि मलिन शक्तियोंके योगसे नामरूप विवर्तमें पारमार्थिक तत्त्व आवृत रहता है, परंतु विद्या या लीला आदि दिव्य शक्तियोंके योगसे प्रकट भगवान्के नामरूपमें निरावरण भगवान्का स्पष्ट रूपसे भान होता है।
इष्टदेवकी उपासना
निन्दाका तात्पर्य अपने अभीष्टकी प्रशंसामें शास्त्ररहस्यको जाननेवाले महानुभावोंका कहना है कि शैवग्रन्थोंमें श्रीविष्णुकी और वैष्णवग्रन्थोंमें श्रीशिवकी जो निन्दा पायी जाती है, वहाँ इस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अन्य देवताकी निन्दामें नहीं है, अपितु वह ग्रन्थ जिस देवताका वर्णन कर रहा है, उसकी प्रशंसामें है। इसपर कोई कहे कि 'अपने इष्ट देवतामें अनन्यताकी प्राप्तिके लिये उनसे भिन्न देवताकी उपेक्षा अपेक्षित है और वह उपेक्षा बिना अन्य देवताकी निन्दाके कैसे सिद्ध हो सकती है? इस तरह उस निन्दाका मुख्य तात्पर्य अपने इष्ट देवतासे अन्य देवताकी उपेक्षाके लिये उसकी निन्दामें ही हो सकता है। किंतु ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसने अनन्यताके स्वरूपको ही यथार्थतया समझा नहीं है। क्या अपने एकमात्र इष्टदेवमें ही तत्परताको अनन्यता कहें? किंतु ऐसी अनन्यता खान-पान आदि लौकिक एवं सन्ध्यावन्दनादि वैदिक व्यवहार करनेवाले पुरुषमें सम्भव नहीं है। यदि कहा जाय कि उन लौकिक- वैदिक सब कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी ही उपासना करनेसे अनन्यता बन जायगी तो फिर जैसे अन्यान्य लौकिक-वैदिक कर्मोंके द्वारा अपने इष्टदेवकी उपासना की जा सकती है, वैसे ही अन्य देवताकी पूजा