भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदिके द्वारा भी अपने इष्टदेवकी उपासना करते हुए अनन्यता बन सकती है। यथार्थमें तो— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ अर्थात् '[हे राजन्!] प्राणी अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्म करते हुए उस पुरुषोत्तम हरिकी आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त भगवान्की प्रसन्नताका और अन्य कोई साधन नहीं है।' यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (गीता ९।२७) अर्थात् 'हे अर्जुन ! भोजन, होम, दान, तपस्या आदि जो कुछ भी करो, वह सब मुझे अर्पण कर दो।' 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) अर्थात् 'मनुष्य अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्की पूजा करके मुक्तिको प्राप्त कर सकता है।' —इत्यादि वचनोंसे शास्त्रोंने अपने-अपने वर्ण- आश्रमके अनुसार श्रौत-स्मार्त कर्मोंसे ही श्रीभगवान्की उपासना करना बतलाया है और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें तो पद-पदपर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र, प्रजापति आदि देवताओंकी पूजा दिखलायी पड़ती है। ऐसी हालतमें अपनेको वैदिक माननेवाला कोई पुरुष यह कहनेका साहस कैसे कर सकता है कि 'विष्णुके सिवाय कोई अन्य देवता मेरे लिये पूजनीय नहीं है।' यदि कहा जाय कि वहाँ उन इन्द्रादि देवताओंके रूपमें भगवान् विष्णुकी ही पूजा होती है तो इस तरह फिर सभी देवताओंकी पूजा की जा सकती है। जिन कामिनी, कांचन आदि विषयोंकी बड़े-बड़े विवेकी महापुरुषोंने निन्दा की है, उन्हीं तुच्छ विषयरूप विषसे भस्मीभूत चित्तवाले और उन्हीं विषयोंकी प्राप्तिके लोभसे वशीभूत होकर और तो क्या, म्लेच्छोंके चरणोंपर भी मस्तक झुकानेवाले लोग समस्त पापसमुदायका नाश करनेमें समर्थ श्रीशिव, विष्णु आदिके वन्दनको जब अनन्यताका विघातक कहते हैं, तब बड़ा आश्चर्य होता है। अपने इष्टमें अनन्यता अस्तु, इस तरह यह सिद्ध होता है कि श्रीभगवान्को प्रसन्न करनेकी बुद्धिसे भगवान्के लिये ही किये गये समस्त कर्मोंको परमगुरु श्रीभगवान्के चरणोंमें समर्पण करना ही यथार्थ अनन्यता है। काशीखण्डके इक्कीसवें अध्यायमें ध्रुवजी श्रीविष्णुजीसे स्तुतिमें कहते हैं कि— मित्राणां हि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबन्धुषु । त्वत्तो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण चराचरे ॥ त्वमेव माता त्वं तातस्त्वं सुहृत्त्वं महाधनम्। त्वमेव सौख्यसम्पत्तिस्त्वमायुर्जीवनेश्वरः ॥ सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्त्वदर्पितम्। तत्कर्म यत्त्वदर्थं वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः॥ अहो पुंसां महामोहस्त्वहो पुंसां प्रमादता। वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः ॥ अधोक्षजातपरो धर्मो नार्थो नारायणात्परः । न कामः केशवादन्यो नापवर्गो हरिं विना ॥ इयमेव परा हानिरुपसर्गोऽयमेव हि। अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं न यत्स्मरेत् ॥ गोविन्दं परमानन्दं मुकुन्दं मधुसूदनम्। त्यक्त्वाऽन्यं नैव जानामि न भजामि स्मरामि न ॥ न नमामि न च स्तौमि न पश्यामीह चक्षुषा । न स्पृशामि न वा यामि गायामि न हरिं विना ॥ अर्थात् 'हे नारायण ! इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्में आपसे अन्य कुछ भी नहीं है। मित्रोंमें भार्या, सब बन्धुओंमें परम हितैषी धर्म आप ही हैं। माता, पिता, सुहृद्, धन, सौख्य, सम्पत्ति और तो क्या— प्राणेश्वर आप ही हैं। कथा वही है, जिसमें आपका नाम हो, मन वही है जो आपमें अर्पित हो, काम वही है जो आपके लिये ही किया जाय और तपस्या वही है, जिसमें आपका स्मरण होता रहे। प्राणियोंके उस