भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
आदिके द्वारा भी अपने इष्टदेवकी उपासना करते हुए अनन्यता बन सकती है। यथार्थमें तो— वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारकः॥ अर्थात् '[हे राजन्!] प्राणी अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्म करते हुए उस पुरुषोत्तम हरिकी आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त भगवान्की प्रसन्नताका और अन्य कोई साधन नहीं है।' यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (गीता ९।२७) अर्थात् 'हे अर्जुन ! भोजन, होम, दान, तपस्या आदि जो कुछ भी करो, वह सब मुझे अर्पण कर दो।' 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' (गीता १८।४६) अर्थात् 'मनुष्य अपने कर्मोंके द्वारा भगवान्की पूजा करके मुक्तिको प्राप्त कर सकता है।' —इत्यादि वचनोंसे शास्त्रोंने अपने-अपने वर्ण- आश्रमके अनुसार श्रौत-स्मार्त कर्मोंसे ही श्रीभगवान्की उपासना करना बतलाया है और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें तो पद-पदपर इन्द्र, अग्नि, वरुण, रुद्र, प्रजापति आदि देवताओंकी पूजा दिखलायी पड़ती है। ऐसी हालतमें अपनेको वैदिक माननेवाला कोई पुरुष यह कहनेका साहस कैसे कर सकता है कि 'विष्णुके सिवाय कोई अन्य देवता मेरे लिये पूजनीय नहीं है।' यदि कहा जाय कि वहाँ उन इन्द्रादि देवताओंके रूपमें भगवान् विष्णुकी ही पूजा होती है तो इस तरह फिर सभी देवताओंकी पूजा की जा सकती है। जिन कामिनी, कांचन आदि विषयोंकी बड़े-बड़े विवेकी महापुरुषोंने निन्दा की है, उन्हीं तुच्छ विषयरूप विषसे भस्मीभूत चित्तवाले और उन्हीं विषयोंकी प्राप्तिके लोभसे वशीभूत होकर और तो क्या, म्लेच्छोंके चरणोंपर भी मस्तक झुकानेवाले लोग समस्त पापसमुदायका नाश करनेमें समर्थ श्रीशिव, विष्णु आदिके वन्दनको जब अनन्यताका विघातक कहते हैं, तब बड़ा आश्चर्य होता है। अपने इष्टमें अनन्यता अस्तु, इस तरह यह सिद्ध होता है कि श्रीभगवान्को प्रसन्न करनेकी बुद्धिसे भगवान्के लिये ही किये गये समस्त कर्मोंको परमगुरु श्रीभगवान्के चरणोंमें समर्पण करना ही यथार्थ अनन्यता है। काशीखण्डके इक्कीसवें अध्यायमें ध्रुवजी श्रीविष्णुजीसे स्तुतिमें कहते हैं कि— मित्राणां हि कलत्रं त्वं धर्मस्त्वं सर्वबन्धुषु । त्वत्तो नान्यज्जगत्यस्मिन्नारायण चराचरे ॥ त्वमेव माता त्वं तातस्त्वं सुहृत्त्वं महाधनम्। त्वमेव सौख्यसम्पत्तिस्त्वमायुर्जीवनेश्वरः ॥ सा कथा यत्र ते नाम तन्मनो यत्त्वदर्पितम्। तत्कर्म यत्त्वदर्थं वै तत्तपो यद्भवत्स्मृतिः॥ अहो पुंसां महामोहस्त्वहो पुंसां प्रमादता। वासुदेवमनादृत्य यदन्यत्र कृतश्रमाः ॥ अधोक्षजातपरो धर्मो नार्थो नारायणात्परः । न कामः केशवादन्यो नापवर्गो हरिं विना ॥ इयमेव परा हानिरुपसर्गोऽयमेव हि। अभाग्यं परमं चैतद्वासुदेवं न यत्स्मरेत् ॥ गोविन्दं परमानन्दं मुकुन्दं मधुसूदनम्। त्यक्त्वाऽन्यं नैव जानामि न भजामि स्मरामि न ॥ न नमामि न च स्तौमि न पश्यामीह चक्षुषा । न स्पृशामि न वा यामि गायामि न हरिं विना ॥ अर्थात् 'हे नारायण ! इस स्थावर-जंगमात्मक जगत्में आपसे अन्य कुछ भी नहीं है। मित्रोंमें भार्या, सब बन्धुओंमें परम हितैषी धर्म आप ही हैं। माता, पिता, सुहृद्, धन, सौख्य, सम्पत्ति और तो क्या— प्राणेश्वर आप ही हैं। कथा वही है, जिसमें आपका नाम हो, मन वही है जो आपमें अर्पित हो, काम वही है जो आपके लिये ही किया जाय और तपस्या वही है, जिसमें आपका स्मरण होता रहे। प्राणियोंके उस
इष्टदेवकी उपासना ६०१
महामोहको उस प्रमादिताको देखकर बड़ा ही खेद और आश्चर्य होता है, जिससे आपका अनादर करके वे अन्य विषयोंमें महान् परिश्रम करते हैं। हे भगवन्! आपसे श्रेष्ठ ऐसा अन्य कोई न धर्म है, न अर्थ, न काम और न मोक्ष ही। भगवान् वासुदेवका स्मरण न होना ही परम हानि, परम उपद्रव, परम दुर्भाग्य है। परमानन्दकन्द मुकुन्द मधुसूदन भगवान् गोविन्दको छोड़कर मैं न तो अन्य किसीको जानता ही हूँ, न स्मरण करता हूँ, न भजता हूँ। न नमन करता हूँ, न किसी दूसरेकी स्तुति करता हूँ, न अन्यको आँखसे देखता हूँ, न स्पर्श करता हूँ, न अन्यत्र कहीं जाता हूँ, न बिना हरिके अन्यका गान करता हूँ।' इत्यादि श्लोकोंके द्वारा अनन्यताका स्वरूप प्रदर्शित किया है। शिव-विष्णुमें अभेद-बुद्धि इतना सब मन्थन करनेका तात्पर्य यही है कि भगवान् श्री
६०२ भक्तिसुधा करता हूँ। तीनों लोकोंकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरी जो परमशक्ति है, उसको देनेवाले सुदर्शनचक्रके दाता श्रीविश्वनाथ ही हैं। पूर्वकालमें जालन्धर नामका एक दैत्य हुआ था, जिसके पराक्रमसे मैं भी भयभीत हो गया था। किंतु भगवान् श्रीशंकरने अपने पैरके अँगूठेके अग्रभागसे चक्र बनाकर, उससे जालन्धरको मार डाला था। अपने नेत्रकमलोंसे भगवान् शंकरकी पूजा करके मैंने वही चक्र उनसे प्राप्त किया। दैत्यसमुदायको मर्दन करनेवाला वही यह सुदर्शनचक्र मेरे पास है। समस्त दुष्ट प्राणियोंको भगानेवाले उस सुदर्शनचक्रको तुम्हारी रक्षाके लिये आगे भेजकर मैं यहाँ आया हूँ। अब इस समय श्रीविश्वनाथका दर्शन करनेके लिये मैं काशीकी ओर चल रहा हूँ। उसके बाद पंचक्रोशीकी सीमाके पास पहुँचकर वे गरुड़से नीचे उतरे और उन्होंने ध्रुवका हाथ पकड़कर मणिकर्णिकामें स्नान किया। फिर श्रीविश्वनाथका पूजन करके ध्रुवके हितकी कामनासे कहा—हे ध्रुव ! तुम इस अविमुक्त वाराणसीक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक भगवान्के लिंगकी स्थापना करो। इससे त्रैलोक्यस्थापन करनेका अक्षय पुण्य तुम्हें प्राप्त होगा' इत्यादि। ऐसे इस गम्भीर शास्त्रीय अभिप्रायको न समझकर शैव-वैष्णव-नामधारी पाखण्डसे नष्टबुद्धि मायामोहित जन ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमें भेदभाव देखते हैं। यह नहीं जान पाते कि वे तीनों एक ही सच्चिदानन्दघन पूर्ण अद्वितीय तत्त्व हैं। ब्रह्माणं केशवं रुद्रं भेदभावेन मोहिताः। पश्यन्त्येकं न जानन्ति पाषण्डोपहता जनाः ॥ वे ऐसे सैकड़ों शास्त्रवचनोंसे उपदेश किये गये अभेदको नहीं देखते। इस बातकी उपेक्षा करते हैं कि एक ही परमकारण तत्त्व अनेक रूपमें विराजमान है। उन परमेश्वरके अनेक रूपोंमेंसे किसी एकको लेकर दूसरे रूपोंकी निन्दा करते हुए आपसमें कलह करते हैं। ऐसा करके मानो अपने उसी आराध्य भगवान्से ही द्रोह करके नरकमें जानेकी तैयारी करते हैं। एक-दूसरेपर अनन्य प्रीति करनेवाले दो मालिकोंके नौकर यदि एक-दूसरेके स्वामीकी निन्दा करें तो वे दोनों जैसे स्वामिद्रोही ही कहे जाते हैं, वैसे ही एक- दूसरेके आत्मा और एक-दूसरेके ध्यानमें निमग्न मा- धव श्रीविष्णु और उमा-धव श्रीशिवकी निन्दा करनेवाले स्वामिद्रोही ही हैं। जिस रूपमें प्रीति हो, उस रूपकी उपासना करनी चाहिये कोई जिज्ञासु ऐसा प्रश्न कर सकता है कि भगवान् शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि देवताओंमेंसे किसकी उपासना करनी चाहिये ? कोई किसीको निकृष्ट तो कोई किसीको बड़ा बतलाता है। ऐसी स्थितिमें बुद्धि व्याकुल हो जाती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि भगवान्के विचित्र प्रपंचमें विचित्र स्वभावके जीवोंका निवास है। इसीलिये श्रीभगवान् भिन्न स्वभाववाले जीवोंकी विभिन्न रुचियोंका अनुसरण करके विभिन्न रूपोंमें प्रकट होते हैं। किसीका चित्त भगवान्के किसी स्वरूपमें खिंचता है, किसीका किसीमें। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रतिपादित सभी रूप भगवान्के ही हैं। अतः जिस रूपमें प्रीति हो, उसी रूपकी उपासना करनी चाहिये। अनभिज्ञ लोग एककी निन्दा और दूसरे रूपकी प्रशंसा करते हैं, अभिज्ञ तो सभी रूपोंमें अपने प्रभुको ही देखकर सन्तुष्ट होते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अनेक विद्याओंमें निपुण होनेके कारण अपने अनेक वेष और नामोंसे अनेक कार्य करता हो, भिन्न-भिन्न कार्यार्थी पृथक् वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों और उसे ही सर्वोत्कृष्ट समझने लगें। दूसरे लोग दूसरे वेष और नामवाले रूपके अनुरागी हों। उनमें कुछ लोग किसी रूपके प्रशंसक हों और कुछ किसीके निन्दक हों, इसलिये परस्पर युद्ध होने लगे, वहाँ जो लोग वस्तु-स्थितिको जाननेवाले होंगे, वे तो दोनों ही विवादी दलोंकी मूर्खतापर परिहास करेंगे; क्योंकि वे दोनों ही वेषोंमें एक ही तत्त्वको देखते हैं।
इष्टदेवकी उपासना ६०३ उपासनाके लिये अपनी कुल- परम्पराका समादर योगवासिष्ठके विपश्चिदाख्यानमें मृगरूपसे समागत विपश्चित्को देखकर श्रीवसिष्ठजीने यही विचार किया था कि जिस व्यक्तिका जो स्वरूप कभी भी उपास्य हो, उसका कल्याण उसके ही द्वारा सुगम होता है। यह समझकर करोड़ों जन्मके पहले अग्निकी उपासना करनेवाले मृगरूप विपश्चित्के सामने अपने योगबलसे उन्होंने अग्निका प्राकट्य किया। अग्निका दर्शन होते ही वह मृग ऐसी स्नेहभरी दृष्टिसे अग्निको देखने लगा, जैसे अग्निके साथ उसका कोई बहुत पुराना सम्बन्ध हो। अनन्तर वसिष्ठजीकी कृपासे उसका कल्याण हुआ। अस्तु, प्रकृतमें कहना यही है कि स्वप्नदर्शन तथा माहात्म्यश्रवण आदिसे चित्तका आकर्षण देखकर अपने इष्टदेवका निर्णय करना चाहिये। यह स्पष्ट है कि अनेक जन्मके साधनोंसे प्राणीकी उपासनामें उन्नति होती है। जन्म-जन्ममें मार्ग-परिवर्तन करनेसे यथेष्ट लाभ सम्भव नहीं है। अतः पूर्वकी उपासनाके संस्कारका ज्ञान करके उसी उपासनामें प्रवृत्त होना चाहिये। पितृपितामह-परम्पराकी उपासनाओंके अनुसार ही प्राणीको उपासना करनी चाहिये। वर्तमान जन्मकी सत्प्रवृत्ति और दुष्प्रवृत्तिमें पिछले जन्मोंके संस्कार भी अपेक्षित होते हैं। यदि किसीको दुर्देववश किसी ऐसे देश-कालमें ऐसे माता-पिता, गुरुजनों तथा ग्रन्थोंका संसर्ग हुआ कि जिनसे दुराचार-दुर्विचारको ही उत्तेजना मिली तो उस व्यक्तिके लिये दुःसंग और असद्विचारवाले शास्त्रोंको छोड़कर सत्पुरुषसंग, सच्छास्त्रके अभ्यास एवं तदनुसार सदाचार-सद्विचारके सम्पादनमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिसे पूर्वसंस्कारके अनुसार शुद्ध विचारवाले देश-काल तथा माता-पिता एवं गुरुजनोंका संयोग प्राप्त हुआ और सच्छास्त्र ही अध्ययन करनेको मिले, उसके लिये सदाचार-सद्विचारकी वृद्धिमें बड़ी सहायता मिलती है। इसीलिये प्रायः सन्मार्गस्थ सदाचारीको उसकी भावना और उपासनाके अनुसार ही समीचीन देश-काल और माता-पिता तथा शास्त्रोंका संसर्ग मिलता है। इसी बातकी इंगना श्रीभगवान्ने 'शुचीनां श्रीमतां गेहे' 'अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।', 'पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।' (गीता ६।४१-४२,४४) इत्यादि वचनोंसे की है। इसीलिये यह बहुत सम्भव है कि हमारी उपासनाके अनुकूल ही कुलमें हमारा जन्म हुआ हो। अतः हमें माता-पिता, गुरुजनोंके अनुसार ही उपासना करनी चाहिये। यों भी इस बातके समझनेमें सुगमता होगी कि जैसे कोई पुरुष किसी अपरिचित मार्गसे किसी अभीष्ट देशमें जा रहा हो, आगे चलकर उसे तीन मार्ग दिखायी दें और तीनोंपर कुछ लोग चल रहे हों, प्रश्न करनेपर सभी अपने मार्गको ही निर्विघ्न बतलाते हों, साथ ही दूसरे मार्गोंको नाना प्रकारके सिंह- व्याघ्र-सर्प-वृश्चिक-कण्टकाकीर्ण गर्तोंसे उपद्रुत बतलाते हों, ऐसी स्थितिमें यदि जाना आवश्यक ही हो तो वह प्राणी किस मार्गका अवलम्बन करेगा? समझदार तो यही कहेंगे कि उन मार्गानुगामियोंमेंसे अधिक विश्वास उन्हींपर किया जा सकता है; जो अपने राष्ट्र, प्रान्त, नगर तथा ग्रामके हों या अपने कुटुम्बियोंमेंसे हों। यह बात दूसरी है कि जब बहुत विशिष्ट अनुभवोंसे उस मार्गके दूषित तथा मार्गान्तरके निर्विघ्न होनेकी बात निश्चित हो गयी हो, तब किसी दूसरे मार्गका अवलम्बन किया जाय। इसलिये भी अपनी पितृ-पितामह-परम्परामें जो उपासना और आचार तथा शास्त्र मान्य हों, वही उचित हैं। वेदने भी 'किंस्वित् पुत्रेभ्यः पितरावुपावतः' इस वाक्यसे परम्परागत आचारका समर्थन किया है। श्रीनीलकण्ठजीने इसका यही अभिप्राय बतलाया है कि पुत्रके हितके लिये माता, पिता या पितामह- प्रभृतिने जिस व्रतका पालन किया हो या जिस देवताकी उपासना की हो, उस पुत्रको उसी व्रत या देवताका अवलम्बन करना चाहिये। ऐसे ही
सम्प्रदायभेदसे भस्म, गोपीचन्दन आदिकी भी व्यवस्था बतायी गयी है। उसमें भी यह व्यवस्था शुद्ध शास्त्रीय है कि स्नान करके मृत्तिका और होम करके भस्म और देवपूजनके पश्चात् चन्दन आदि लगाया जाय; क्योंकि भस्म वैदिकोंके लिये किसी अवस्थामें त्याज्य नहीं हो सकता। यहाँ कोई प्रश्न कर सकता है कि 'यद्यपि इस तरहसे किसी भी देवताकी आराधना, भस्म, रुद्राक्ष, गोपीचन्दनादिका धारण संगत मालूम होता है तथापि साम्प्रदायिक लोगोंकी बातें सुनकर जी घबराता है। कोई शिवजीके तथा भस्म-रुद्राक्षके निन्दनमें सहस्रों वचन उपस्थित करते हैं तो कोई विष्णु तथा गोपीचन्दनादिके निन्दनमें सहस्रों वचन देते हैं। इसका क्या आशय है? उनको यही उत्तर दिया जा सकता है कि कुछ वचन तो निन्दामें तात्पर्य न रखकर एककी स्तुतिमें ही तात्पर्य रखते हैं। जैसे शैवोंकी शिवमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये विष्णुके निन्दासूचक और विष्णुमें निष्ठा दृढ़ करनेके लिये शिवके निन्दापरक वचन कहे जा सकते हैं, परंतु कुछ ऐसे भी वचन हैं, जिनका सिवा राग-द्वेषके और कोई मूल ही नहीं हो सकता। बहुत-से सद्ग्रन्थ साम्प्रदायिकोंके कलहोंमें बिगाड़े गये हैं। इसीलिये तो गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ (रा०च०मा० ४।१४) ऐसे ही यह भी प्रश्न होता है कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके आचार और व्यवहार प्रचलित हैं। उन-उन सम्प्रदायोंमें कहा यह जाता है कि बिना इन आचारोंके प्राणीका कल्याण हो ही नहीं सकता। चाहे कितना भी वैदिक शुद्ध ब्राह्मण क्यों न हो, परंतु इन आचारोंके बिना उसके हाथसे जल भी अग्राह्य है। ऐसे ही दूसरे साम्प्रदायिक अपने आचारोंके विषयमें भी उपर्युक्त बात ही कहते हैं। जिस आचारसे एक सम्प्रदाय परम कल्याण कहता है, उसी आचारसे दूसरा सम्प्रदाय सर्वथा पतन बतलाता है। एक वैसे आचारविहीनके दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं तो दूसरे उसी आचारयुक्तवालेके ही दर्शनसे प्रायश्चित्त बतलाते हैं। इसका यही उत्तर देना ठीक है कि जिसके सम्प्रदायमें जो आचार प्रचलित है, उसीके लिये उक्त उपदेश ठीक है और जिसके पितृ- पितामहादिमें जो आचार नहीं हैं, उन्हें नहीं ग्रहण करना चाहिये। विवादका मूल यही है कि लोग दूसरे सम्प्रदाय तथा आचार्योंकी निन्दा करके अपने सम्प्रदायके आचारों एवं सिद्धान्तोंको स्वीकार करना चाहते हैं और जब वैसा ही दूसरे लोग करते हैं, तब फिर क्षुब्ध होते हैं। वे 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥' (गीता ६।३२) भगवान्के इन भावोंको भूल जाते हैं। लोगोंको इस बातपर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि जैसे कोई हमारे साम्प्रदायिक व्यक्तिको अपने सम्प्रदायमें मिलाता है तो हमें क्षोभ होता है, वैसे ही यदि हम भी दूसरे सम्प्रदायके व्यक्तिको अपनेमें मिलायेंगे तो अन्य लोगोंको भी वैसे ही क्षोभ होगा। परंतु प्रायः देखते-देखते कितने स्मार्त भिन्न सम्प्रदायोंमें मिला लिये जाते हैं। साथ ही कहीं-कहीं कोई साम्प्रदायिक भी स्मार्त बना लिये जाते हैं। यही राग- द्वेषका मूल इतना बद्धमूल हो गया है कि हिन्दू- मुसलमानोंसे भी कहीं अधिक घनिष्ठ संघर्ष साम्प्रदायिकोंमें दृष्टिगोचर होता है। कृपापरवश भगवान्द्वारा अनेक मंगलमय स्वरूपोंका धारण वेदान्तवेद्य, पूर्ण परब्रह्म भगवान् ही सकल सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यके विषय हैं और यही वर्णाश्रमानुसार सर्व कर्म-धर्मसे समर्हणीय हैं। इनका अपरोक्ष साक्षात्कार ही जीवनका चरम फल है। परंतु प्रथमसे ही प्राणियोंका मन इन परम-दुरवगाह्य भगवान्के मनोवचनातीत स्वरूपमें प्रवेश नहीं कर सकता। अतः परमकरुण प्रभु भक्तानुग्रहार्थ ही अपने अनेक प्रकारके
इष्टदेवकी उपासना ६०५
मंगलमय स्वरूपको धारण करते हैं। उपनिषदोंमें दहर-विद्या, शाण्डिल्य-विद्या, वैश्वानर-विद्याओंके रूपमें इनकी ही अनेक सगुण उपासनाएँ विस्तीर्ण हैं। ये ही भगवान् विघ्नराज श्रीगणेशके रूपमें ऋद्धि-सिद्धि आदि निज शक्तियोंसहित आराधित होकर भक्तोंका सर्वविघ्ननिवारण, सर्वाभीष्ट- सम्पादनपूर्वक स्व-स्वरूप साक्षात्कार कराकर परम गति देते हैं और ये ही विश्वचक्षु भगवान् भास्करके रूपमें उपास्य होकर सर्वरोगनिवारणपूर्वक अपने पारमार्थिक विशुद्ध ब्रह्मस्वरूपका साक्षात्कार कराकर भवरोगसे मुक्त कर देते हैं। ऐसे ही ये ही वेदान्तवेद्य शुद्ध भगवान् अविद्याशक्तिप्रधान होकर प्रपंचका निर्माण करते हैं, विद्याशक्तिप्रधान होकर मोक्ष प्रदान करते हैं और अनन्त अखण्ड विशुद्ध चिति-शक्ति- रूपसे सर्व दृश्यके अधिष्ठानरूप विराजमान होते हैं। वे ही महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदि रूपमें उपास्य होकर सर्वभुक्ति-मुक्ति-प्रदायक होते हैं। वे ही विशुद्ध ब्रह्म, भूतभावन भगवान् विश्वनाथ, श्रीविष्णु, नृसिंह एवं श्रीमद्राघवेन्द्र रामभद्र तथा श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दरूपमें उपासित होकर सर्वसिद्धि प्रदान करते हैं। अस्तु— श्रौत-स्मार्तप्रतिपादित स्वधर्मका सम्पादन परमेश्वरका आराधन है इन सभी स्वरूपोंकी गायत्र्यादि वैदिक मन्त्रों एवं वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तकर्मोंद्वारा की गयी उपासना मुख्य है। वेदशास्त्रोक्त स्वधर्म-कर्मके अनुष्ठानके बिना पाशविकी उच्छृंखल चेष्टाओंका अन्त नहीं होता। बिना श्रौत-स्मार्तशृंखलाबद्ध चेष्टाओंके इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदिका नियन्त्रण असम्भव है और बिना सर्व करण-रोधके अदृश्य विशुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार भी असम्भव है। अतः श्रौत-स्मार्त-कर्म-धर्मद्वारा ही परमेश्वरका मुख्य आराधन है। इसी विशुद्ध वैदिक धर्मका बौद्ध आदि अवैदिक एवं वैदिकाभासोंद्वारा विप्लव होनेपर भगवान् शंकराचार्यने अवतीर्ण होकर उसे पुनः प्रतिष्ठित किया है। श्रीविद्यारण्यप्रभृति विद्वानोंने तथा अन्यान्य प्राचीन-अर्वाचीन सन्तोंने भी इसी मतका पोषण किया है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, तुलसीदासने भी इसी परम उदार सिद्धान्तका पोषण किया है। उसमें तीनों वर्णोंके लिये गायत्री मुख्य उपास्य है। जिनके लिये गायत्रीका अधिकार नहीं है, उन अवैदिकोंके लिये अवैदिकी उपासनाएँ हैं। जो गायत्रीमन्त्रके अधिकारी त्रैवर्णिक वैदिकसंस्कार-सम्पन्न हों, उन्हें यदि गायत्रीमें परितोष न हो तो विष्णु, शिव आदि देवताओंका विष्णु, शिव आदि मन्त्रोंसे आराधन कर सकते हैं। वैदिकसंस्कार-सम्पन्न होनेके कारण इन मन्त्रोंमें उनका अधिकार सहज सिद्ध है। अर्थात् गणेश, शिव, शक्ति, विष्णु तथा सूर्य—इन पंच देवताओंकी, किंवा अन्य सगुण एवं निर्गुण ब्रह्मकी उपासना गायत्रीमन्त्रद्वारा ही पूर्ण सुसम्पन्न हो सकती है और इसके सिवा वैदिक शिव, विष्णु आदि मन्त्रोंसे भी तत्तत् उपासनाएँ हो सकती हैं। इन समस्त वैदिक उपासनाओंमें वर्णाश्रमानुसार श्रौत-स्मार्तधर्मका अनुष्ठान भी परमावश्यक है। वेदने उपासनाविहीन कर्मोंको स्वप्रकाश ब्रह्मकी अपेक्षा स्वर्गादि तुच्छ फलके देनेवाले होनेसे अन्धतमकी प्राप्तिका कारण कहा है। परंतु कर्मविहीन उपासनाओंसे तो घोर अन्धतमकी प्राप्ति कही गयी है; क्योंकि स्वधर्मानुष्ठानके बिना इष्टमें चित्तकी एकाग्रतारूप उपासना भी सम्पन्न न हो सकेगी। स्वधर्मभ्रष्टके लिये कहा गया है कि चाहे कितना भी श्रीहरिकी भक्ति, किंवा ध्यानमें तत्पर क्यों न हो, परंतु यदि आश्रमके आचारोंसे भ्रष्ट है तो वह पतित ही कहा जाता है। यथा— हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानपरोऽपि वा। भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥ (बृहन्नारदीयपु० ४।२४) अतः चाहे वैष्णव हो, चाहे शैव हो—सबको वेदशास्त्रोक्त स्वधर्मका अनुष्ठान आवश्यक है। द्विजोंके
६०६ भक्तिसुधा जो आचार-व्यवहारचिह्न हैं, वे सभी उसको अत्यन्त आदरणीय होने चाहिये। कोई जिज्ञासु यह पूछ सकता है कि 'कुछ शैव तथा वैष्णवोंका कहना है कि गायत्री, यज्ञोपवीत एवं अन्यान्य ब्राह्मणादि धर्म शैव या वैष्णवके लिये गौण हैं, उनके लिये तो अष्टाक्षर, पंचाक्षरादि मन्त्रका ही अत्यन्त प्राधान्य होना चाहिये। वेद-शास्त्र तथा तदुक्त वर्णाश्रम-धर्मके बिना भी केवल शैव एवं वैष्णवधर्मसे उनका कल्याण हो जाता है।' इसका यह उत्तर है कि यद्यपि विष्णुमन्त्रादि प्राणिकल्याणके साधनरूपमें आदरणीय हैं तथापि वैष्णवतादिसे द्विजत्व ही अधिक प्रबल है; क्योंकि द्विजत्व परमेश्वरदत्त है। वैष्णवत्व, शैवत्व आदि प्राणिसम्पादित हैं, अतः वैष्णवतादिके निमित्तसे होनेवाले धर्मोंका सम्मान अवश्य करना चाहिये; परंतु परमेश्वरदत्त द्विजत्वकी रक्षाका भी ध्यान रखना परमावश्यक है। द्विजत्वकी अभिव्यक्ति यज्ञोपवीत, भस्म एवं शिखासे होती है। वैष्णवताकी अभिव्यक्ति कण्ठी, गोपीचन्दनादिसे होती है। वैष्णवताके चिह्नोंसे द्विजत्वके चिह्नोंका तिरस्कार अत्यन्त असंगत है। इसलिये वैदिकोंके गृहमें वैष्णवताको द्विजत्वसे अवरुद्ध होकर ही रहना चाहिये। अवैदिकोंके यहाँ यथारुचि व्यक्त लिंगोंसे वैष्णवता भले ही रहे। यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि शैव, वैष्णव, शाक्त—इन सभी सम्प्रदायोंमें प्रधान रूपसे दो भेद हो गये हैं—एक वैदिक, दूसरा अवैदिक। वैदिकोंके यहाँ वेद तथा वेदोक्त कर्म एवं तदनुसारी लिंगोंका प्राधान्य होता है और तदविरुद्ध प्रकारसे ही विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासना होती है तथा सभी देवताओंका सम्मान होता है। इन वैदिकोंमें किसी दूसरे देवताकी निन्दा करना पाप समझा जाता है। परंतु अवैदिक वैष्णवों तथा शैवोंके यहाँ वेद या तदुक्त धर्म-कर्म तथा तदनुकूल लिंगोंका कोई सम्मान नहीं, केवल साम्प्रदायिक आगम-तन्त्रादिके अनुसार आचार एवं चिह्नोंका ही अधिक सम्मान है। द्विजके लिये वैदिक चिह्नोंका तिरस्कार अयुक्त है, शैवत्व या वैष्णवत्व पितृपरम्परासे नियत नहीं है। वैदिक लोगोंका तो यही कहना है कि जिस पुत्रके कल्याणके लिये उसके पिता, माता, पितामह-प्रपितामह आदिने जिस व्रतका या देवताका अनुष्ठान-आराधन किया हो, उस पुत्रके कल्याणका मूल वही व्रत एवं उसी देवताका आराधन है। ऐसी व्यवस्था माननेसे राग-द्वेष मिट जाते हैं। अतः जिसकी मातृ-पितृ- परम्परामें जिस देवताकी आराधना प्रचलित हो, उसे उसी देवताके आराधनमें तत्पर होना चाहिये।
मानसी आराधना
अजगररूपधारी अघासुरके मुखमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्दने भी अपने बछड़ोंकी रक्षाके लिये प्रवेश किया। अघासुर अपनी अजगर-देहको छोड़ भगवान्के स्वरूपमें मिल गया। साधारण दृष्टिसे यहाँ आश्चर्य हो सकता था कि गो-ब्राह्मणोंके मांस- रुधिरोंसे उदर-पोषण करनेवाले, देवधर्म-शास्त्रद्रोही उस असुरको भगवत्सायुज्यपद कैसे प्राप्त हुआ ? इसीपर श्रीमद्भागवतमें श्रीशुकने परीक्षित्से कहा— राजन् ! जिसके मंगलमय श्रीअंगकी मानसी प्रतिमा एक बार हृदयमें धारण करनेसे अपरिगणित प्राणियोंको मुक्ति प्राप्त हो जाती है, वे मायातीत सच्चिदानन्द भगवान् जिसके हृदयमें साक्षात् प्रविष्ट हुए, उसके सायुज्य (मुक्ति)-में क्या आश्चर्य— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) भगवान्के मंगलमय श्रीअंगकी काष्ठमयी, धातुमयी प्रतिमा भी श्रद्धा-उत्कण्ठापूर्वक हृदयमें धारण और
मानसी आराधना ६०७ चिन्तन करनेसे प्राणियोंको परम सद्गति प्रदान करती है। जिन महानुभावोंके अन्तर हृदयमें भगवान्के श्रीअंगकी मनोमयी प्रतिमा सदा विराजमान रहती है, वे तो अपना ही क्या; विश्वका कल्याण कर सकते हैं। वे भगवान्की मानसी मूर्तिके ध्यानको ही परम पुरुषार्थ मानते हैं, त्रिभुवनसम्पत्तिके लिये भी भगवान्के मंगलमय श्रीचरणारविन्दसे लव या अर्धनिमेष भी चलायमान नहीं होते। जिस हृदयमें भगवान्के चरणारविन्दकी नखचन्द्र- चन्द्रिका विस्तीर्ण है, वहाँ शोक-मोह, पाप-ताप रह ही कैसे सकते हैं? जिस तरह शैत्यके योगसे निर्मल जल ही बर्फ, ओलारूपसे उपलब्ध होता है, किंवा घृत-वर्तिका या विचित्र जलादिके संघर्षसे अदृश्य व्यापक अग्नि ही दाहकत्व-प्रकाशकत्व-विशिष्ट दीपशिखा या विद्युल्लता-रूपमें अभिव्यक्त होती है, उसी तरह विशुद्ध सत्त्वमयी स्वेच्छा या कृपाके योगसे ही अदृश्य, अनन्त, आनन्दसुधाम्बुनिधि परतत्त्व ही मायासे अनभिभूत या असंस्पृष्ट दिव्य मूर्तिमान् होकर व्यक्त होते हैं। उनका दर्शन, स्पर्श, अनुभव, परतत्त्वका ही अनुभव है। अतएव जिन लोगोंने भगवान् श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रका दर्शन, स्पर्श, अनुगमन किया; वे सभी परम पदके भागी हुए— स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ (श्रीमद्भा० ९।११।२२) सीताके सन्देशसे प्रसन्न होकर मारुतिको अपने श्रीअंगका परिष्वंग (आलिंगन) देते हुए भगवान्ने ही कहा है— एष सर्वस्वभूतस्तु परिष्वङ्गो हनूमतः। मया कालमिमं प्राप्य दत्तस्तस्य महात्मनः॥ (वा०रा० ६।१।१३) अर्थात् महात्मा मारुतिको इस अवसरपर मैं सर्वस्वभूत यह परिष्वंग (ब्राह्मसंस्पर्श) देता हूँ। इन बातोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि निर्गुण, निरंजन, विगत-विनोद, व्यापक ब्रह्म ही श्रीकौसल्यानन्दवर्धन राम या यशोदोत्संगललित श्रीकृष्णके रूपमें व्यक्त होता है। फिर उनके संस्पर्शसे उनकी प्राप्ति—ब्रह्मकी प्राप्ति क्यों न हो? इतना ही नहीं, भावुकोंके मानस- पंकजमें व्यक्त भगवान्की मंगलमयी मानसी प्रतिमा भी शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही है, तभी उसका हृदयमें आधान होनेसे मुक्तिकी बात संगत हो सकती है। यद्यपि मनकी और कल्पनाएँ मनोराज्य-कोटिमें परिगणित होती हैं तथापि श्रीभगवान्के सम्बन्धकी सभी कल्पनाएँ—भावनाएँ—आराधनापदसे व्यवहृत होती हैं। जैसे—कामुक विधुरकी भावनासे होनेवाले कामिनी- साक्षात्कारको प्रमा (यथार्थ ज्ञान) न मानकर भ्रमरूप ही माना जाता है, वैसे उत्कण्ठापूर्वक भावनासे होनेवाले भगवान्के साक्षात्कारको भ्रमरूप नहीं समझा जाता; क्योंकि जैसे भावरूप निदिध्यासन या निर्गुणोपासनसे निर्गुण ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, वैसे ही सगुण ब्रह्मकी भावनासे उसका साक्षात्कार होता है। यद्यपि कामुक-कामित कामिनी-साक्षात्कार और भक्तभावित भगवत्साक्षात्कार—इन दोनों ही स्थलोंमें पुनः-पुनः साभिनिवेश चिन्तनरूप अभ्याससे जन्य संस्कारप्रचय (संस्कार-समूह) ही कारण है, अर्थात् अभ्यासजन्य संस्कार-प्रचयकी ही महिमासे ब्रह्मका साक्षात्कार और उसीसे भावित कामिन्यादिका साक्षात्कार होता है तथापि ब्रह्मसाक्षात्कार-स्थलमें प्रमाणका संवाद होनेसे उसे प्रमा (यथार्थ ज्ञान) माना जाता है। प्रमाण-संवाद न होनेसे ही भावित कामिन्यादि साक्षात्कारको भ्रमरूप माना जाता है। जिस ब्रह्मका अभ्यासजन्य संस्कारसंस्कृत अन्तःकरणसे जिस रूपमें साक्षात्कार होता है, वह अपौरुषेय स्वतःप्रमाण वेदान्तसे सम्मत है। अतः वह साक्षात्कार प्रमाणरूप है, परंतु अन्यभावनाजन्य प्रत्यक्षोंमें प्रमाणका संवाद नहीं है। इसके सिवा विधुरभावित कामिनी या शीतातुरभावित अग्निका साक्षात्कार तो होता है, परंतु वहाँ तो वे हैं ही नहीं। जब जिसका साक्षात्कार होता हो और वह वस्तु वहाँ न हो, तब उस साक्षात्कारको प्रमा कैसे
कहा जा सकता है? परमात्मवस्तु तो सर्वत्र सर्वदा ही विराजमान है, अतः उसके प्रमाणान्तरसंवादी साक्षात्कारको भ्रम माननेका कोई भी कारण न होते हुए भी योगमायासे आवृत होनेके कारण सबको नहीं उपलब्ध होते। जिसके प्रति योगमायारूप जवनिका (पर्दा)-का अपसारण हो जाता है, उसे ही भगवान्का साक्षात्कार होता है। भगवान्के स्वेच्छामय स्वरूपका प्रादुर्भाव कहीं भी हो सकता है। परीक्षित्के रक्षार्थ उत्तराके गर्भमें; प्रह्लादके रक्षार्थ स्तम्भमें जैसे उनका आविर्भाव हो सकता है, वैसे ही भक्तकी भावनासे भक्तके हृदयमें भी प्रादुर्भाव होता है। इसीलिये भावुकोंने कहा है— यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ (श्रीमद्भा० ३।९।११) अर्थात् भगवन्! भक्त अपनी बुद्धिसे आपके जैसे-जैसे रूपका भावन करता है, आप वैसे-वैसे ही स्वरूपको धारण करते हैं। इसीलिये भक्तकी इच्छासे ही भगवान्का रूप बनता है। उपासनामें भावनाका प्राधान्य प्रथम शास्त्रों और सत्पुरुषोंके वचनोंसे भगवान्के स्वरूप और सौन्दर्य, माधुर्य, भूषण, वसन, अंग- उपांग आदिकी मनसे ही भावना की जाती है और वह भावना नीलमेघ, पंकज, मणि, सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि उपमाओंके ही आधारपर होती है, पश्चात् ध्यान और मानसपूजनकी महिमासे वही साधारण-सी ही भावनामयी मूर्ति दिव्य श्रीविग्रहरूपमें व्यक्त हो जाती है। इसीलिये यहाँकी भावना केवल मनोराज्य नहीं है। धातुमयी मूर्तिमें भी यद्यपि ईश्वरके व्यापक होने और मन्त्रकी विचित्र शक्तिसे उनका आविर्भाव माना जाता है तथापि भावनाकी वहाँ भी बड़ी प्रधानता है। तभी कहा गया है कि भावमें ही देवता है, इसीलिये भाव ही मुख्य कारण है— भावेषु विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥ साधारण-से-साधारण भोग या नैवेद्यमें भावनाकी महिमासे प्रियत्वसम्पत्ति हो जाती है। भावुक लोग भगवान्के सम्मुख स्थापित नैवेद्यमें श्रीलक्ष्मीनिर्मित दिव्यभोगकी भावना करते हैं। कौसल्या-सुमित्रादि माताओं और सुनयनादि श्वश्रुओंसे निर्मित अनन्त व्यंजनोंकी भावना साधारण शाकमें भी बनायी जा सकती है। भक्त कहता है— 'नाथ! आपने जिस रुचिसे शबरीके बेर और सुदामाके तण्डुलको ग्रहण किया था, उसी रुचिसे मेरे इस नैवेद्यको ग्रहण करो। देव! श्रीयशोदा, रोहिणीके हाथके नवनीत और दधिकी भावनासे मेरे इन पदार्थोंको ग्रहण करो।' श्रीसीता-राधासे परिवेशित व्यंजनोंकी भावनासे सचमुच भक्तसमर्पित वस्तु वैसी ही हो जाती है। भगवान्के सम्मुख स्थित नैवेद्योंमें श्रीराधाकी अधर- सुधा और भूषण-वसनोंमें श्रीराधाकी ही भावनासे अपनी समर्पित वस्तुओंका महत्त्व बढ़ा लिया जाता है। किसी कर्ममें साभिनिवेश मनका योग होनेसे उसका महत्त्व बढ़ जाता है। यज्ञ, दान, तप आदि भी विद्याभावनासहित किये जानेसे उच्चतम फलके कारण बन जाते हैं। कायिक, वाचिक, मानस—विविध कर्मोंमें मानस कर्मकी महिमा अधिक है। कायिक, वाचिक, कर्मोंका मूल भी मानस कर्म ही है। जैसे सूर्यकान्तापर सूर्य व्यक्त होता है, वैसे ही शुद्ध भावनापर भगवान्का प्राकट्य होता है। भावनामयी मूर्तिपर भगवान्का प्राकट्य होता है। जैसे वह्निकी ज्वाला, चन्द्र-सूर्यकी ज्योत्स्ना या प्रभा अन्यत्र अव्यक्त होनेपर भी अभिव्यंजक संस्थानके योगसे व्यक्त होती है, वैसे ही मन्त्रविधान और भावनाकी महिमासे मूर्तियोंमें देवतत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है। इन दृष्टियोंसे मनोमयी मूर्तिमें तो साक्षात् ही भगवान्का आविर्भाव होता है। यद्यपि सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मतत्त्वका स्वरूप श्रुति-युक्तिसे समझ लिया जा सकता है और इसे भी अनन्तानन्त जन्मोंके पुण्यपुंजका ही परिणाम समझना चाहिये तथापि श्रद्धाभक्तिपूर्वक निरन्तर चिन्तन एवं भावनाके बिना तत्त्वका अपरोक्ष नहीं होता। सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान्की निखिल-
सगुणोपासनामें सरलता ६०९ रसामृतमूर्ति मनोहर विग्रहका ध्यान, भावन, मानस- आराधन ही समस्त पुरुषार्थोंका परम मूल है। बिना इसके सगुण या निर्गुण किसी भी स्वरूपका साक्षात्कार नहीं हो सकता। पुरुषार्थका मूल ही क्या, महानुभावोंने इसीको परम पुरुषार्थ भी स्वीकार किया है। यदि मनका अखण्ड प्रवाह सौन्दर्यमाधुर्यसुधाजलनिधि भगवान्के श्रीअंगकी ओर हो, पदनखमणिचन्द्रिका या अमृतमय मुखचन्द्रके माधुर्य-रसास्वादनमें दृष्टि आसक्त हो जाय, तब तो कुछ अवशिष्ट ही नहीं रहता। परंतु जबतक मनोमयी भगवदीय मूर्तिरूपमें भगवान्का प्राकट्य नहीं हुआ और इस ओर पूर्ण मानसी स्थिति नहीं हुई, तबतक उसकी सिद्धिके लिये अन्य अर्चा आदि मूर्तियोंमें भगवान्की तनुजा और वित्तजा आराधना करनी चाहिये। आचार्योंने कहा है कि प्राणियोंको सदा ही श्रीकृष्ण-सेवामें संलग्न रहना चाहिये। उनमें भी मानसी सेवा बड़े महत्त्वकी है। चित्तकी भगवत्प्रवणता (भगवान्में तन्मयता) ही मानसी सेवा है, उसीकी सिद्धिके लिये तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ (श्रीमद्वल्लभाचार्य) सगुणोपासनामें सरलता श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द भगवान्से अर्जुनने प्रश्न किया कि जो भक्त आपकी परम श्रद्धासहित उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षरकी उपासना करते हैं, इन दोनोंमें कौन अतिशय रूपसे आत्यन्तिक पुरुषार्थप्राप्तिके उपायको जाननेवाले हैं? एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ (गीता १२।१) प्रश्नका आशय यह है कि गीतामें द्वितीय अध्यायसे लेकर दशम अध्यायपर्यन्त भगवान्ने भिन्न- भिन्न स्थलोंमें सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, निराकार, निर्विकार, सर्वेन्द्रियाद्यगोचर ब्रह्मकी एवं सर्वैश्वर्यसर्वज्ञानशक्त्यादि- सम्पन्न विशुद्ध सत्त्वमय सगुण भगवत्स्वरूपकी उपासनाका वर्णन किया है। विशेषतः विश्वरूपाध्यायमें भगवान्ने सगुण परमेश्वरके अचिन्त्य, अद्भुत, लोकोत्तर- चमत्कारी स्वरूपका दर्शन भी कराया और अन्तमें ‘मत्कर्मकृत्’ (११।५५)—इस वचनसे यह कहा कि मेरे लिये श्रौत-स्मार्तकर्म करता हुआ, मुझे ही ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य समझता हुआ मेरी भक्ति करे और सर्वभूतोंमें वैरभावविवर्जित हो तो प्राणी मुझे प्राप्त कर लेता है। सगुणोपासना एवं निर्गुणोपासनाका तारतम्य ऐसी स्थितिमें यह सन्देह होना स्वाभाविक है कि दोनों उपासनाओंमें कौन श्रेष्ठ है? ‘एवं’ शब्दसे अव्यवहित पूर्वोक्त प्रकारका परामर्श होता है। यद्यपि अव्यवहित पूर्व ग्यारहवें अध्यायमें विश्वरूपका वर्णन है तथापि यहाँ सविशेष स्वरूपमात्रकी उपासनाका प्रश्न समझना चाहिये अर्थात् जो कोई भगवान्के अचिन्त्यानन्त कल्याणगुणगणार्णव विश्वरूप एवं श्रीमन्नारायण, श्रीसदाशिव अथवा श्रीकृष्णचन्द्र परमा- नन्दकन्द, श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्रकी उपासनामें निरत है और जो भगवान्के निर्विशेष स्वरूपमें निरत है, इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? तब श्रीभगवान्ने कहा—जो महानुभाव मेरे सगुणस्वरूपमें मन लगाकर परम श्रद्धासे उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें अत्यन्त श्रेष्ठ हैं— मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ (गीता १२।२) तब क्या निर्गुण स्वरूपमें परिनिष्ठित श्रेष्ठ नहीं है? इस आशंकाका समाधान करते हुए भगवान् कहते हैं कि अव्यक्त, निर्गुण ब्रह्ममें निरतचित्त
पुरुषोंको क्लेश अधिकतर होता है; क्योंकि देहधारियों— देहाभिमानियोंको अव्यक्त गति—निर्गुणप्राप्ति सम्पादित करनी बहुत कठिन है— क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ (गीता १२।५) यहाँ यह कहा जा सकता है कि 'जब श्रुतियोंमें निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे अविद्या, तत्कार्यात्मक- प्रपंचनिवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्तिरूप मोक्ष सद्यः श्रुत है एवं सविशेष ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति कही गयी है, जिससे कालान्तरमें कैवल्य प्राप्त होता है, तब निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनासे सविशेष सगुण- ब्रह्मकी उपासनाका उत्कृष्टत्व कैसे कहा जा सकता है?' यद्यपि यह ठीक है कि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, निराकार, निर्विकार, प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्म परमात्माकी उपासनासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मका साक्षात्कार होनेसे मूल अविद्याकी निवृत्ति होती है और अविद्या, तत्कार्यात्मक प्रपंचकी निवृत्ति होते ही अनावृत परमानन्दघन ब्रह्मात्मनावस्थानरूप सद्योमुक्ति प्राप्त हो जाती है और सगुण ब्रह्मकी उपासनासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति एवं कल्पान्तमें ब्रह्माके साथ कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है, अतः सगुणोपासनाकी अपेक्षा फलदृष्टिसे निर्गुणोपासनाका ही महत्त्व है तथापि निर्गुणोपासनामें कठिनाई अधिक है, सगुणोपासनामें सरलता है—'क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्।' (गीता १२।५) यदि कहा जाय कि 'निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति उत्कृष्ट है, अतः उसमें अधिकतर क्लेश होना उसकी निकृष्टताका हेतु नहीं है; क्योंकि उत्कृष्ट फलप्राप्तिमें अधिकतर क्लेश होता ही है' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सगुण-उपासनासे भी उसी फलकी प्राप्ति होती है, जिसकी निर्गुणोपासनासे। इसका कारण यह है कि भगवत्कृपासे भगवत्स्वरूप साक्षात्कारद्वारा उसी निर्गुणोपासक-प्राप्य कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाती है। मनोवचनातीत, अनिद्मात्मक (दृश्यप्रपंचसे अतीत), अनिर्देश्य ब्रह्मका प्राणिबुद्धिमें आरोहण ही अतिकठिन होता है। नामरूपक्रियात्मक दृश्यप्रतीतिका निराकरणके बिना निर्दृश्यक दृक्का अभिव्यंजन होना अशक्य है; क्योंकि जैसे चन्द्रमाके किसी असाधारण अवस्थाविशेष विशिष्टस्वरूपपर ही राहुका प्राकट्य होता है, अन्यथा नहीं, वैसे ही दृश्याकार परिणामविवर्जित रजस्तमोऽननुविद्ध विशुद्धचित्तसत्त्वपर ही— प्रत्यक्चैतन्याभिन्न निर्विशेष ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। चित्तकी तादृशी अवस्था सम्पत्ति देहाभिमानियोंके लिये अत्यन्त दुःशक है। इसके विपरीत सगुणोपासनामें सरलता है। यद्यपि बाह्य विषयोंसे मनःप्रत्यावर्तनपूर्वक भगवत्स्वरूपमें मनोयोग करना कठिन ही है तथापि निर्गुण, निर्विशेषमें मनोयोग उससे भी कठिन है। उसकी अपेक्षा सगुणमें मनका आकर्षण होना सरल है। भगवान्की मंगलमयी मनोरंजक लीलाएँ मुक्त, मुमुक्षु, विषयी आदि सब तरहके अधिकारियोंके चित्तको खींचनेवाली होती हैं। जनसाधारण, वे चाहे ज्ञान, तत्साधनविहीन भी क्यों न हों, उनके कल्याणार्थ निर्गुण, निराकार, निर्विकार, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म सगुण, साकाररूपमें प्रकट होता है— नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप। अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१४) राम, कृष्ण, विष्णु, शिवकी उपासना शुद्ध ब्रह्मकी ही उपासना है। बुद्धि कुछ भी हो, किंतु जिस वस्तुकी उपासना होती है, उसीकी प्राप्ति होती है। जैसे दीपक-बुद्धिसे भी यदि चिन्तामणिमें प्रवृत्त हुआ जाय तो भी प्राप्ति चिन्तामणिकी ही होती है, वैसे ही चाहे जिस बुद्धिसे भगवान्की उपासना हो, प्राप्ति उस परमात्माकी ही होती है। सच्चिदानन्द परब्रह्म आकाशादि समस्त प्रपंचका कारण है और सर्वत्र विराजमान है। विशेषतः बुद्धिरूपा गुहा या हार्दाकाशमें उसका विशेष रूपसे
उपलम्भ होता है। जैसे चन्द्रके सम्बन्धसे राहुका दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिके सम्बन्धसे परमात्मपदका दर्शन होता है। भावना-भावित भगवान्की सगुण मूर्ति ही वास्तविक दिव्य मूर्तिरूपमें व्यक्त होती है। भगवान् सर्वत्र होते हुए भी मायाजवनिका (पर्दे)-से ढके हैं। उसे हटाकर वे जहाँसे चाहें वहाँसे व्यक्त हो सकते हैं। पाषाणसे भी मायाजवनिकाको हटाकर भगवान् प्रह्लादके लिये प्रकट हो सकते हैं, तब फिर शुद्ध मन तो भगवान्के उपलम्भका साधन ही है। वस्तुतः किसी भी वस्तुमें चित्तको एकाग्र करनेसे मूल परमात्मपदकी ही प्राप्ति होती है। जैसे स्फटिकमें लालपुष्पके सम्बन्धसे 'रक्तः स्फटिकः' (लाल स्फटिक है) ऐसी बुद्धि होती है, उसीमें यदि किसीको 'स्फटिक है' ऐसा ज्ञान प्रमुष्ट (विलुप्त) हो जाता है तो उसे उसमें पद्मरागमणिकी बुद्धि होती है। आगे चलकर चन्द्रकी चाँदनी आदिके संसर्गसे उसीमें इन्द्रनीलकी बुद्धि होने लगती है। फिर भी इन सभी बुद्धियोंका आलम्बन एक स्वच्छ स्फटिक ही है। वैसे ही एक शुद्ध ब्रह्मतत्त्व ही मायाके सम्बन्धसे अव्यक्त ब्रह्म और सूक्ष्म प्रपंच उपाधिसे उपहित होनेपर हिरण्यगर्भ एवं स्थूल प्रपंचसे उपहित होकर वही विराट् कहलाता है। जैसे स्वच्छ स्फटिकमें ही इन्द्रनीलबुद्धिसे दृढ़ चिन्तनद्वारा इन्द्रनीलबुद्धि मिटकर पद्मरागबुद्धि होगी। यह दृढ़ चिन्तनकी महिमा है कि वह चिन्तनीय वस्तुका यथार्थ स्वरूप अवगत करा देता है। अतः पद्मरागका चिन्तन रक्त स्फटिकका बोध करा देगा। पुनश्च उसके चिन्तनसे अन्तमें अवश्य ही 'शुद्धः स्फटिकः' ऐसा बोध हो जाता है। वैसे ही स्थूलका चिन्तन करते-करते सूक्ष्मका और फिर उसका चिन्तन करते-करते कारणका, फिर कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्मका बोध (साक्षात्कार) होता है। शुद्ध मन तो ऐसी सुन्दर उपाधि है, जहाँ 'स्वच्छः स्फटिकः' के समान शुद्ध ब्रह्मका बोध होता है। अन्य मूर्तियोंके चिन्तनमें चिन्तनीय पदार्थ पृथक् होता है, मन चिन्तन-व्यापारमें ही लगा रहता है। परंतु यहाँ तो मन ही ध्येय भगवान्की मूर्तिरूपसे भी व्यक्त होता है और वही चिन्तन करनेवाला होता है। मानसजपमें भी यही हाल है, वहाँ मनको ही मानसमन्त्र बनना पड़ता है। इस मानसजप और ध्यानसे मनकी शुद्धि, एकाग्रता, भगवान्के वास्तविक स्वरूपकी प्राप्ति बड़ी ही सुविधाके साथ हो जाती है।
अव्यभिचार भक्तियोग
प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न भगवान्को अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवाले सात्त्विक, राजस, तामस गुणोंका उल्लंघन करके ब्रह्मभावको प्राप्त होते हैं। गुणमय संसारसे छूटनेका एकमात्र यही सुन्दर उपाय है। वेदान्तोंका श्रवण, मनन करनेपर जिस प्रत्यक्- चैतन्याभिन्न परमात्मतत्त्वका निश्चय होता है उसीका निरन्तर निदिध्यासन करनेसे उसीका साक्षात्कार होता है। रज्जु आदि अधिष्ठानके साक्षात्कारसे उसमें कल्पित सर्प, धारा, माला आदिका जैसे अभाव हो जाता है, वैसे ही निर्विकार सर्वाधिष्ठान चिदात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसे उसमें कल्पित गुणमय प्रपंचका आत्यन्तिक अभाव हो जाता है। इसी कारण 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।' (गीता १४।२६) यहाँपर अव्यभिचार भक्तियोगसे शुद्ध परब्रह्मका निदिध्यासन या ज्ञानाभ्यास ही लिया जाता है। यद्यपि भक्तिका ज्ञान या निदिध्यासन अर्थ पक्षपातयुक्त-सा प्रतीत होता है तथापि 'स्व- स्वरूपानुसन्धान' को भक्ति कहा है। विचार करनेसे यह ठीक भी मालूम पड़ता है। विषयाकारका भजन करनेवाला ज्ञान 'भक्ति' शब्दसे कहा जा सकता है।
६१२ भक्तिसुधा
'विषयाकारं भजतीति भक्तिः'। इसके अतिरिक्त 'भज सेवायाम्' धातुसे 'भक्ति' शब्दकी सिद्धि होती है—'भजनं भक्तिः।' भजन अर्थात् सेवनको ही भक्ति कहा जाता है। मानसी सेवा सेवा यद्यपि शरीर, इन्द्रिय, बुद्धिसे की गयी कायिकी, ऐन्द्रियिकी, मानसी भेदसे अनेक हैं तथापि मुख्य सेवा मानसी ही है। मानसी सेवा ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीवल्लभाचार्यजीने भी कहा है— कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत्सिद्ध्यै तनुवित्तजा॥ अर्थात् प्राणीको सदा श्रीकृष्णसेवा करनी चाहिये। सेवामें भी मानसी सेवा ही सर्वोत्कृष्ट सेवा है। चित्तकी कृष्णोन्मुखता या कृष्णमें तन्मयता ही सेवा है। मानसी सेवाकी सिद्धिके लिये ही तनुजा और वित्तजा सेवा करनी चाहिये। अर्थात् कायिकी, वाचिकी आदि सेवा करते-करते अन्तमें मानसी सेवाकी योग्यता प्राप्त होती है। 'विजातीयप्रत्ययनिरासपूर्वकं सेव्याकाराकारित मानसी वृत्तिप्रवाह' ही मानसी सेवा है। जिस प्रकार समुद्रोन्मुखी गंगाका अखण्ड प्रवाह चलता है, उसी प्रकार भगवदुन्मुखी मानसी वृत्तियोंका प्रवाह चलना ही भगवान्की मानसी सेवा है। जैसे सगुण, साकार, सच्चिदानन्द भगवान्के आकारसे आकारित वृत्तिका प्रवाह होता है, वैसा ही वेदान्तवेद्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य भगवान्की स्वरूपविषयीणी वृत्तियोंका भी प्रवाह होता है। निर्विकार परब्रह्माकार मानस प्रवाह ही भक्ति, भजन या सेवा है और वही भगवान्का प्रापक होनेसे या एकाग्रता होनेसे योग भी है। जब वह बीच-बीचमें भगवान्से हटकर बाह्य प्रपंचोंसे जुड़ जाता है, तब व्यभिचारी कहा जाता है। अतः अन्यसम्बन्धविवर्जित, निर्विशेष भगवान्के आकारसे आकारित अविच्छिन्न मानस वृत्ति-प्रवाह ही अव्यभिचार भक्तियोग है, वही ज्ञानाभ्यास है और वही निदिध्यासन भी है। चार प्रकारके भक्त इस अव्यभिचार भक्तियोगसे भगवान्का सेवन करनेसे साक्षात्कारद्वारा अति शीघ्र ही गुणमय प्रपंचका बाध हो जाता है। ज्ञान चतुर्थी भक्ति है। अतः भगवान्के आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार भक्त होते हैं—'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।' (गीता ७।१६) ज्ञानी ज्ञानसे ही भगवान्का भजन या सेवन करता है। ज्ञानी भगवान्का अत्यन्त प्रिय भक्त है। यद्यपि भगवान्के भजन करनेवाले सभी भगवान्के प्रिय एवं उदार हैं तथापि ज्ञानी तो एकमात्र भगवान्में ही भक्ति करता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें भगवान्से भिन्न दूसरी वस्तु रहती ही नहीं। अतएव ज्ञानीको भगवान् एक क्षणके लिये भी अदृश्य नहीं होते और भगवान्को ज्ञानी अदृश्य नहीं होता— यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ (गीता ६।३०) प्रथम सूक्ष्मतत्त्वमें मनकी स्थिति असम्भव है, अतः विराट्, हिरण्यगर्भादि तत्त्वोंमें मनको स्थित करके फिर क्रमेण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् सगुणमें स्थिति-सम्पादन करते हुए निर्गुण, निराकार, निर्विशेष, ब्रह्ममें स्थिति सम्पन्न होती है। स्थूल आलम्बनोंका अपोहन करते हुए सूक्ष्म आलम्बनोंमें चित्तकी एकाग्रता करते हुए अन्तमें चित्त अत्यन्त निरालम्ब बनाया जा सकता है। श्रीकपिलदेवजीने भी निर्गुण, निर्विकार ब्रह्ममें स्थितिके लिये भगवान्की मधुर, मनोहर, मंगलमयी, सगुण, साकार सच्चिदानन्दमयी मूर्तिका ध्यान बतलाया है। प्रथम अस्त्र-शस्त्र, भूषण, वसनादिसे सुसज्जित मूर्तिका ध्यान कहा है, फिर अस्त्र-शस्त्ररहित केवल श्रीअंगका ध्यान करना बतलाया है। एक-एक अंगका ध्यान और उसके सौन्दर्य, माधुर्य एवं महिमाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन बतलाया है। फिर श्रीचरणारविन्दकी नखमणिचन्द्रिका या
अव्यभिचार भक्तियोग ६१३
अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य, माधुर्यमें मनकी तल्लीनता कही गयी है। परम पवित्रता, अद्भुत महिमा, लोकोत्तर सौन्दर्य, माधुर्यके चिन्तनसे भावुकका मन प्रेमोन्मादमें विभोर हो जाता है। प्रेममें जैसे अंग एवं वागादि इन्द्रियोंमें शैथिल्य होता है, वैसे ही मनमें भी शैथिल्य आता है, जिससे कि वह ध्येयस्वरूपको भी ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाता है। जब मन सब दृश्योंसे रहित हो जाता है, यहाँतक कि ध्येयस्वरूपसे भी शून्य हो जाता है, तब ध्येयके अभावमें ध्येयाकार वृत्तिरूप ध्यान और ध्यानका आश्रयरूप ध्याता भी नहीं उपलब्ध होता। उस समय ध्याता-ध्यान-ध्येयके बाधके अवधि एवं साक्षिरूपसे भगवान्का प्राकट्य होता है। अर्थात् भावुकोंका मन आकर्षण करनेके लिये ही भगवान् ध्येयरूपसे प्रकट होते हैं। उसे आकर्षित करके फिर वही भगवान् ध्येयातीत अग्राह्य रूपमें प्रकट होते हैं। यों भी भगवान्में ही चित्त लगाकर भगवत्परायण होकर सर्वभावसे जो भगवान्को भजते हैं, भगवान् उनके ऊपर कृपा करके उन्हें बुद्धियोग प्रदान करते हैं। उनके हृदयमें तेजोमय ज्ञानदीपका प्रकाश करके अज्ञानान्धकार दूर कर देते हैं— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ (गीता १०।१०-११) सविकल्पक और निर्विकल्पक ब्रह्म यद्यपि वेदान्तवेद्य परमतत्त्व अत्यन्त अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य है तथापि भगवान्के भक्त निश्चिन्त रहते हैं। वे जानते हैं कि हमें निरन्तर प्रभुके पाद- पंकजमें आत्मसमर्पण करके प्रभुका भजन ही करना चाहिये। यदि प्रभु अपने निर्गुण, निराकार, निर्विकार स्वरूपका साक्षात् कराना आवश्यक समझेंगे तो जिस किसी तरह साक्षात्कार करा देंगे। अत्यन्त बधिरके लिये शब्द एवं जन्मान्धको रूप वैसे ही दुर्ग्राह्य हैं, जैसे अज्ञानीको ब्रह्म दुर्ग्राह्य है, परंतु भगवान् श्रोत्र और नेत्रका निर्माण करके दुर्ग्राह्य शब्द और रूपको सुग्राह्य एवं सुज्ञेय बना देते हैं। उन भगवान्को अपने अत्यन्त अचिन्त्य एवं दुर्ज्ञेय निराकार रूपका साक्षात्कार करा देनेमें कोई भी कठिनाई नहीं पड़ती। अतः पूर्ण विश्वास और आशासे भगवान्के पाद-पंकजका अव्यभिचार भक्तियोगसे सेवन करनेवालेको दुर्गम-से-दुर्गम सभी तत्त्व प्राप्त हो जाते हैं। फिर गुणोंका उल्लंघन भी उनके लिये सुगम हो जाता है— सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ श्रीमुखकी भी उक्ति है— ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ (गीता १४।२७) अर्थात् अमृत, अव्यय, शाश्वतधर्म एवं ऐकान्तिक सुखस्वरूप ब्रह्मकी मैं ही प्रतिष्ठा हूँ। मुझे भजनेसे गुणोंका अतिक्रमण बड़ी सरलतासे हो सकता है। 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यगात्मा है। भावार्थ यह हुआ कि जैसे महाकाश ही घटाकाशके रूपमें प्रतिष्ठित होता है, वैसे ही मैं प्रत्यगात्मा ही परब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। अर्थात् परमात्मा ही प्रत्यगात्मारूपमें प्रतिष्ठित होता है। अतः जैसे घटाकाश महाकाशसे अभिन्न ही है, उसी तरह प्रत्यगात्मा परमात्मस्वरूप ही है। परमात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा)-रूपसे प्रतिष्ठित होते हैं। प्रत्यगात्मा परमात्माकी प्रतिष्ठा है अथवा 'अहं' पदका अर्थ प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, मायातीत, अदृश्य, अग्राह्य, अलक्षण, निर्विकल्प, निर्विशेष शुद्ध परमात्मा है, जैसा कि 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना' (गीता ९।४), 'ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्' (गीता १२।३), 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव' (गीता १२।४) इत्यादि स्थलोंमें विवक्षित है। ब्रह्मपदका अर्थ मायाविशिष्ट सविशेष सविकल्प ब्रह्म है। इस तरह भावार्थ यह हुआ कि मैं निर्विकल्प ब्रह्म सविकल्प ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। निर्विकल्प ब्रह्ममें
६१४ भक्तिसुधा सविकल्प ब्रह्म प्रतिष्ठित कल्पित है। मुझे सेवन करनेसे सविकल्प प्रपंचका लंघन बड़ी सरलतासे हो सकता है अथवा 'ब्रह्म' पदका निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्म अर्थ है और 'अहं' पदका अर्थ सगुण, साकार, ब्रह्म (श्रीकृष्ण) है। अभिप्राय यह है कि मैं सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ। यहाँ 'राहोः शिरः' के समान सम्बन्धार्था षष्ठी अभेदमें ही है अर्थात् जैसे व्यापक, अव्यक्त अग्नि दहन, प्रकाशन, पाचनादि कार्य करनेके लिये घृत, वर्तिकादिके सम्बन्धसे व्यक्त साकार अग्निके रूपमें प्रतिष्ठित-प्रवृत्त होता है, वैसे ही निर्गुण, निराकार, निर्विकार, अव्यक्त ब्रह्म भक्तानुग्रहादि कार्य करनेके लिये अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे सगुण, साकार व्यक्तरूपमें प्रतिष्ठित होता है। इसीलिये सगुण ब्रह्म ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है। अतः मेरा आराधन करनेसे ही गुणोल्लंघन आदि भक्तानुग्रह सिद्ध होता है। कुछ लोगोंका कहना है कि सगुण ब्रह्म निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा अर्थात् आधार है। जैसे आतप (घाम)-की प्रतिष्ठा उसका उद्गमस्थान या आधार सूर्य है, सूर्यसे ही निकलकर सूर्यके सहारे ही आतप रहता है, वैसे ही सगुण, साकार श्रीकृष्णचन्द्रकी मधुर मूर्ति ही निर्गुण ब्रह्मकी प्रतिष्ठा या आधार है। सूर्यस्थानीय श्रीकृष्ण हैं, आतप-स्थानीय निर्गुण ब्रह्म है। 'अनादिमत्परं ब्रह्म' (गीता १३।१२)—इस वचनमें भी ब्रह्मको 'अनादि' और 'मत्परं' कहा गया है। यहाँ 'मत्परं' का अर्थ यह है कि 'अहं श्रीकृष्णः पर उत्कृष्टो यस्मात्तन्मत्परम्।' मैं श्रीकृष्ण ही हूँ, पर-उत्कृष्ट, जिससे—निर्गुण ब्रह्मसे उत्कृष्ट मैं सगुण ब्रह्म हूँ। इसीलिये उन लोगोंका मत है कि औपनिषद ब्रह्मात्मदर्शियोंका ब्रह्म आतपके समान है और भक्तोंका भगवान् सूर्यस्थानीय है। परंतु उनका यह कथन श्रुति-सूत्रोंके विरुद्ध है। वेद, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र आदि सभी शास्त्रोंका परम तात्पर्य ब्रह्ममें ही है। 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्तिरीय० २।१), 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीय० २।१), 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि वाक्योंमें सर्वत्र ब्रह्मका ही विचार चलता है। श्रीकृष्ण वैदिक औपनिषद परब्रह्मसे भिन्न होते तब तो उनमें वेदवेद्यता नहीं सिद्ध होती, जो कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो' (गीता १५।१५) इत्यादि वचनोंसे भगवान्ने स्वीकार की है। अतएव 'अनादिमत्परं ब्रह्म' यहाँ भी 'मत्परं' ऐसा पदच्छेद न करके 'अनादिमत्परं ब्रह्म' ऐसा पदच्छेद करना युक्त है, जिसका सारांश यह है कि ब्रह्म अनादिमान् एवं पर अर्थात् सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म-पर्यवसायी- प्रकरणको विच्छिन्न करके अन्य वर्णनका प्रसंग लाना अप्राकृत प्रक्रिया है एवं ब्रह्मज्ञानकी प्रशंसाके प्रसंगमें उसे किसीसे भी अपकृष्ट कहना सर्वथा विचारशून्यता है। श्रीमद्भागवतमें भी सजातीय, विजातीय, स्वगतभेदरहित, स्वप्रकाश, नित्य विज्ञानको ही तत्त्व कहा है— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ (श्रीमद्भा० १।२।११) 'अद्वय ज्ञानको ही तत्त्वविद् लोग तत्त्व कहते हैं, उसीको ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् कहा जाता है।' कुछ लोगोंका कहना है कि यहाँ ब्रह्मसे परमात्मामें और उससे भगवान्में उत्कर्ष विवक्षित है। यदुकुलभूषण श्रीकृष्णकी सभामें बैठे हुए यादवोंने आकाश-मार्गसे आते हुए देवर्षि श्रीनारदजीको प्रथम केवल तेजःपुंज ही समझा। कुछ समीप आनेपर कोई देहधारी समझा और अधिक समीप होनेपर पुरुष एवं सर्वथा सान्निध्यमें श्रीनारद समझा। चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा ततः शरीरीति विभाविताकृतिम्। विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः॥ (शिशुपालवध १।३) ठीक उसी तरह तत्त्वसे अति दूरस्थ अधिकारीको प्रथम केवल चिन्मात्र ब्रह्मका बोध होता है, कुछ
सामीप्य होनेपर योगियोंको कतिपय गुण-विशिष्ट परमात्मा, सर्वथा सान्निध्य होनेपर अनन्त कल्याण- गुणगण-विशिष्ट भगवान्के रूपमें तत्त्वका उपलम्भ होता है। इन्हीं लोगोंमें ही मनमानी कल्पना करनेवाले कुछ लोग श्रीकृष्णको आदित्यस्थानीय और ब्रह्मको प्रकाशस्थानीय मानते हैं। कुछ श्रीवृषभानुकिशोरीके नख-मणि-प्रकाश या नूपुर-प्रकाशको ही औपनिषद परब्रह्म कहते हैं, परन्तु वैदिकोंकी दृष्टिमें तो वेदोंका महान् तात्पर्य ब्रह्महीमें है और वही सब तरहसे सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्म—अतिशयताकी कल्पनासे अतीत संकोचका कारण न होनेसे वृद्ध्यर्थक ‘बृहि’ धातुसे निष्पन्न ‘ब्रह्म’ शब्दका अर्थ निरतिशय बृहत्तम तत्त्व होता है। जो देश-काल-वस्तु-परिच्छेदवाला हो, वह तो परिच्छिन्न होनेके कारण क्षुद्र ही है, निरतिशय बृहत् नहीं। यदि जड़ हो तो भी दृश्य होनेसे अल्प और मर्त्य होगा। अतः अनन्त, स्वप्रकाश, सदानन्द तत्त्व ही ‘ब्रह्म’ पदका अर्थ होता है और वही भूमा अमृत है। उससे भिन्न सभीको अल्प और मर्त्य ही समझना चाहिये। फिर अनन्त पदके साथ पठित ‘ब्रह्म’ शब्दका सुतरां यही अर्थ है। उसमें अतिशयताकी कल्पना निर्मूल है। किसी राजाने ऐसी कहानी सुननी चाही कि जिसका अन्त ही न हो। एक चतुरने सुनाना आरम्भ किया। राजन्! एक वृक्ष था, उसकी अनन्त शाखाएँ थीं, उन शाखाओंमें अनन्त उपशाखाएँ थीं, उपशाखाओंमें भी अनन्त पल्लव थे और उनपर अनन्त पक्षी बैठे थे। कुछ कालमें एक पक्षी उड़ा ‘फुर्र’। राजाने कहा आगे कहिये, इसपर उसने कहा दूसरा उड़ा ‘फुर्र’। तब राजाने कहा और आगे कहिये, तब उस चतुरने कहा कि पहले पक्षियोंका उड़ना पूरा हो तब आगे बढूँ। यहाँ एक-एक पक्षीका उड़ना समाप्त ही नहीं हो सकता। इसी तरह कल्पनाओंका अन्त ही नहीं है। अतः एक शब्दमें यही कहा जाता है कि अतिशयताकी कल्पना करते-करते वाचस्पति तथा प्रजापतिकी भी मति जब विरत हो जाय और जिससे आगे कभी भी कोई कल्पना कर ही न सके, तब उसी अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश, परमानन्दघन, भगवान्को वेदान्ती ब्रह्म कहते हैं। उसीका ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ इत्यादि व्याससूत्रोंसे विचार किया गया है। प्रकाशकी अपेक्षा आदित्यमें जिस अतिशयताकी कल्पना की जाती है। उससे भी अनन्तकोटि-गुणित अतिशयताकी कल्पनाके पश्चात् जिस अन्तिम निरतिशय, सर्व बृहत् पदार्थकी सिद्धि हो उसमें भी देश, काल, वस्तुके परिच्छेदोंको मिटाकर परिच्छिन्न या एकदेशिता आदि दूषणोंका अत्यन्ताभाव-सम्पादन करे, तब उसे ब्रह्म शब्दका अर्थ जानना चाहिये। इसीको ‘तत्त्व’ कहा जाता है। इसका ही लक्षण है—‘तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।’ इसीका नाम ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् है। लक्षणके भेदसे लक्ष्य-भेद हो सकता है, नाम-भेदसे नहीं। जैसे कम्बुग्रीवादिमत्त्व घटका एक लक्षण है, अतएव घट, कुम्भ, कलशादि नामसे उसका भेद नहीं है। हाँ, ब्रह्म अनेक हैं— कार्यब्रह्म, कारणब्रह्म, कार्यकारणातीत ब्रह्म। ऐसी स्थितिमें यह हो सकता है कि कार्यकारणातीत वेदान्तवेद्य शुद्ध-ब्रह्मरूप भगवान्के प्रकाशस्थानमें कार्यब्रह्म या कारणब्रह्म हो। प्रायः यह भी कहा जाता है कि निर्गुण ब्रह्म भगवान्का धाम है। यद्यपि धाम शब्द ऐसे स्थलोंमें स्वरूपभूत आत्मज्योतिका ही बोधक होता हैं—‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।’ (गीता १०।१२) ‘हे नाथ! आप परमात्मा हैं, परम प्रकाश (परम ज्योति) और परम पवित्र हैं’ तथापि कुछ अविवेकियोंकी यही अटल धारणा है कि धामका अर्थ निवासस्थान ही होता है। अस्तु, वे लोग अव्यक्तरूप कारण-ब्रह्मको ही वेदान्तवेद्य ब्रह्म मान बैठते हैं। कार्यकारणातीत तत्त्वतक उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। इस कारण यदि ब्रह्मको धाम भी मान लें तो भी सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं पड़ती। यह भेद वेदान्तियोंको इष्ट ही है कि स्थूल कार्य-ब्रह्मके ऊपर सूक्ष्म कार्यरूप ब्रह्म, उसके ऊपर कारणब्रह्म और इस अव्यक्त कारणब्रह्मके ऊपर
६१६ भक्तिसुधा कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म स्थित है। यह अन्तिम तत्त्व ही अद्वितीय अनन्त शुद्ध बोधरूप है। इसका ही विवर्त समस्त चराचर प्रपंच है। यदि सर्वाधिष्ठान होनेके कारण इसे सर्वनिवासस्थान भी कहें तो भी कोई हानि नहीं। इसी अंशका स्पष्टीकरण भागवतके इन पद्योंमें किया गया है— ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्मनिर्गणम्। अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा॥ (श्रीमद्भा० ३।३२।२८) एक अद्वितीय नित्य बोध ही भ्रान्तजनोंको अविद्या- प्रत्युपस्थापित बहिर्मुख इन्द्रियाँ तथा मन-बुद्धि आदि द्वारा शब्दादि-धर्मक प्रपंचरूपसे भासित होता है। श्रीमद्भागवतने भी श्रीकृष्णको परब्रह्म ही कहा है— अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३२) अतः पूर्वोक्त अर्थ ही श्रेष्ठ है और वही अव्यभिचार भक्तियोग है।
सबसे सगे भगवान्
जीवात्मा सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका अंश है। जैसे घटाकाश, महाकाश; शरावाकाशके भीतर, बाहर, मध्यमें महाकाश, कटक, मुकुट, कुण्डल आदिके भीतर, बाहर, मध्यमें सुवर्ण और तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें जल विद्यमान है; वैसे ही चेतन, अमल, सहज सुखराशि जीवात्माओंके भीतर, बाहर, मध्यमें सच्चिदानन्द परमात्मा विद्यमान हैं। इस दृष्टिसे जीवात्मा भगवान्का पुत्र, अंश एवं स्वरूप है। जैसे शूकर-कूकुरके बच्चे शूकर-कूकुर होते हैं, सिंहके बच्चे सिंह होते हैं, वैसे ही 'अमृतस्य पुत्राः,' (श्वेताश्वतर० २।५) 'ममैवांशो जीवलोके' (गीता १५।७) इत्यादि श्रुतिस्मृतिके अनुसार भगवान्के पुत्र या अंश जीवात्मा भगवान्के स्वरूप ही ठहरते हैं। जैसे निर्मल जल पृथ्वीपर पड़ते ही मलिन हो जाता है, वैसे ही शुद्ध चिदात्मा मायाके संसर्गसे मलिन हो जाता है। भगवान् जीवोंके परम अन्तरङ्ग और घनिष्ठ सम्बन्धी हैं। संसारकी सब वस्तुओंका वियोग अनिवार्य है। कलत्र, पुत्र, मित्र, क्षेत्र सभी वस्तुओंके साथ जीवात्माका सम्बन्ध गौण ही है। मुख्य सम्बन्ध तो भगवान्का ही है। जीवात्मा स्वर्ग, नरक जहाँ भी जाय, भगवान् ही उसके साथ होते हैं और सभी लोग सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। अघासुरके मुखमें ग्वालबाल प्रविष्ट हो गये, उसके विषसे उन्हें जलते हुए देखकर प्रभु श्रीकृष्ण भी प्रविष्ट हो गये। संसारमें है किसीकी प्रीति या शक्ति ऐसी, जो एक साँपके मुखमें पड़े पुत्र या मित्रके साथ स्वयं भी जाय ? किसी स्त्रीका पुत्र कूपमें गिरता है, वह कूपके तटपर खड़ी होकर चिल्लाती है—'दौड़ो, दौड़ो, बच्चेको निकालो' पर कूपमें उतरनेकी हिम्मत उसकी
सबसे सगे भगवान् ६१७ एक वहम है' तब कहीं व्यापक भूकम्पोंद्वारा, कहीं महामारियोंद्वारा, कहीं प्राकृतिक विकट तूफानों या विश्वव्यापी नरसंहारोंद्वारा प्राणियोंको परमात्माका स्मरण दिलाया जाता है। फिर भी जैसे कल्याणमयी, करुणामयी, पुत्रवत्सला अम्बा अपने शिशुओंका कभी भी अहित नहीं चाहती, वैसे ही प्रभु भी कभी भी प्राणियोंका अहित नहीं चाहते। तभी तो वे निरीश्वरवादी प्राणियोंका भी कल्याण चाहते हैं। उनपर भी कुपित नहीं होते। इसी आशापर तो ब्रह्माने कहा था कि 'हे नाथ ! यद्यपि मैंने आपकी कौतुकपूर्ण क्रीड़ामें विघ्न डाला, आपके बछड़ों और ग्वालबालोंका हरण करके बड़ा ही अपराध किया तथापि प्रभो, जैसे अम्बा गर्भगत शिशुके पैर चलानेको अपराध नहीं मानती, वैसे ही आप भी हमारे ऐसे कर्मोंपर ध्यान न दें। प्रभो, सम्पूर्ण विश्व ही आपके उदरमें है फिर गर्भगत शिशुके समान ही प्राणियोंके अपराधोंको क्षमा करना क्या उचित नहीं है ?' उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) एकमात्र भगवान्का सम्बन्ध ही स्थिर है प्रभुने क्षमा भी कर दिया। उन्होंने सरल-से- सरल उपाय शास्त्रोंद्वारा बता रखा है। पत्र, पुष्प, फल, जल, नमस्कारसे ही प्रभु प्रसन्न हो सकते हैं। कुछ भी न हो तो केवल मनसे ही पूजन, स्मरण और वह भी न बने तो भाव, कुभाव जिस किसी तरह भगवान्के नाम- जपसे ही परम गति प्राप्त हो सकती है। जब एक अदृष्टकी, जो वस्तुतः सबका द्रष्टा या असली स्वरूप है, उसपर विश्वास होगा, तब सम्पूर्ण दुनियाके सम्बन्ध, नाते अपने-आप फीके लगने लगेंगे। संसारके कलत्र, मित्र, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, क्षेत्र, वित्त आदि सभी वस्तुओंका सम्बन्ध केवल स्थूल देहके साथ ही है। उसके नष्ट होते ही वे सब सम्बन्ध अपने-आप ही छूट जाते हैं। 'यदद्य पच्यते ह्यन्नं सायं तच्च विनश्यति ।' जो भात आज प्रातःकाल पकाया जाता है, वह सायंकालतक सड़ जाता है। उसमें दुर्गन्ध आने लगती है। फिर, ऐसे विनश्वर, क्षणभंगुर शरीरका आत्माके साथ कहाँतक सम्बन्ध रह सकता है? एक जन्मकी बात कौन कहे, जन्म-जन्मान्तरों, युग-युगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंके देहों एवं तत्सम्बन्धी पुत्र, पौत्र, कलत्रोंका स्मरण करें तो चित्तकी क्या दशा होगी? यही समझकर आचार्यचरणोंने कहा है— कति नाम सुता न लालिता कति वा नेह वधूरभुञ्जिहि। क्वनु ते क्वनु ताश्च वा वयं भवसङ्गः खलु पान्थसङ्गमः॥ जन्म-जन्मान्तरोंमें कितने पुत्रोंका लालन नहीं किया, कितनी सुन्दरी रमणियोंका संस्पर्श नहीं किया, परंतु आज कहाँ वे पुत्रादि, कहाँ वे रमणियाँ, कहाँ हम सब ? यह संसारका संगम केवल यात्रियोंके संगके समान अस्थिर है। स्थिर सम्बन्ध तो एकमात्र भगवान्का ही है, जो कि स्वर्ग, नरक, कहीं भी जीवका संग नहीं छोड़ते। जीवात्मा और परमात्मा दोनों ही एक शोभन पंखवाले सुपर्ण पक्षी हैं, दोनों सुपर्ण एक जातिके पक्षी हैं, इसलिये भी उन दोनोंका आपसमें मुख्य सम्बन्ध है। साथ ही दोनोंकी परस्पर पूर्ण मैत्री है। परमात्मा पालकसखा है, जीवात्मा बालकसखा है। दोनोंहीकी 'चेतन अमल सहज-सुख-राशिरूप' से ख्याति भी है। कहीं साजात्य सख्य होनेपर भी दुर्दैवयोगसे भिन्न देशमें रहनेके कारण सम्बन्ध कमजोर हो जाता है। परंतु यहाँ तो एक ही शरीररूप वृक्षपर जीवात्मा-परमात्मा दोनों ही पक्षी रहते हैं। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्य—तीनों तरहके सम्बन्ध दृढ़ हैं। यद्यपि भगवान् जड़वर्गसे सर्वदा असंस्पृष्ट और निर्लेप ही रहते हैं तथापि चिद्रूप जीवात्माके साथ तो भगवान्का तादात्म्य या अभेद सम्बन्ध रहता है। अतः साजात्य, सख्य, सादेश्यके समान ही सायुज्य भी सर्वदा ही रहता है। जैसे कभी घटाकाश महाकाशसे वियुक्त नहीं होता, तरंग जलसे पृथक् नहीं होती, घट-
६१८ भक्तिसुधा शरावादि मृत्तिकासे वियुक्त नहीं होते, कटक-मुकुटादि सुवर्णसे पृथक् नहीं होते, वैसे ही जीवात्मा कभी भी भगवान्से विमुख नहीं होता। इस तरह अपने असली सम्बन्धी भगवान्को भूल जानेसे ही प्राणी अनेकानर्थपरिप्लुत भवाटवीमें ही भटकता है और दुःख पाता है। जब कभी भी सावधान होकर वह भगवान्की ओर दृष्टि करता है, प्रभु उसपर पूर्ण कृपा करके अपना लेते हैं। विभीषण-शरणागति भगवान्के चरणपंकजमें पहुँचे बिना, इस अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनाट्यके सूत्रधार प्रभुके शरण गये बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। पृथ्वी, जल, तेज, सूर्य, अग्नि, चन्द्रमण्डल, नक्षत्रमण्डल जिसके संकेतपर नाचते हैं, उसकी शरणागतिके बिना अखण्ड शान्ति कहाँ ? पूर्ण अस्तित्व, पूर्ण बोध, पूर्ण आनन्द, पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण शान्ति एवं पूर्ण नियामकत्व भगवान्में ही होता है। सब लोग चाहते हैं कि 'आनन्दस्वरूप बन जाऊँ, पूर्ण स्वतन्त्र हो जाऊँ, सबका नियमन- शासन करूँ।' इस तरह जिसके लिये समस्त चेष्टाएँ हो रही हैं, वह आनन्द अत्यन्त प्रसिद्ध है। संसारभरकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम जिसके लिये हो और जो स्वयं निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेमका आस्पद हो अर्थात् जो अन्यके लिये प्रिय न हो, वही आनन्द होता है। स्पष्ट ही है कि समस्त आनन्दके साधनोंमें प्रेम अस्थिर होता है। स्त्री-पुत्रादिमें प्रेम तभीतक है, जबतक वे अनुकूल हैं, प्रतिकूल होते ही वे द्वेष्य हो जाते हैं। परंतु सुख और आनन्द सदा ही प्रिय रहते हैं। कभी किसीको भी आनन्दसे द्वेष हो, यह नहीं कहा जा सकता। इस तरह नास्तिकसे भी नास्तिक आनन्दको चाहता है, उसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्नशील और उसके लिये लालायित होता है। परंतु उसमें पहचाननेकी ही कमी है; क्योंकि जिस आनन्द और सुखके लिये नास्तिक व्यग्र है, उसे वह पहचानता नहीं। वह तो सुख-साधन स्त्री-पुत्रादि, शब्द, स्पर्श आदि सम्भोगमें ही सुखकी भ्रान्तिसे फँसकर उसमें ही सन्तुष्ट हो जाता है। विवेचन करनेसे विदित हो जाता है कि जिनमें कभी प्रेम-द्वेष होता है, वह सुख नहीं है। सदा ही जिसमें निरतिशय एवं निरुपाधिक प्रेम होता है, वही सुख है। सांसारिक सम्भोग-साधन- पदार्थ ऐसे हैं नहीं, अतः वे सुखरूप नहीं हैं। किंतु अभिलषित पदार्थकी प्राप्तिमें तृष्णा-प्रशमनके अनन्तर शान्त, अन्तर्मुख मनपर जिस सुखका आभास पड़ता है, उस आभास या प्रतिबिम्बका निदान या बिम्बभूत जो शुद्ध अन्तरात्मा है, वही आनन्द है; क्योंकि जो लक्षण आनन्दका है, वही अन्तरात्माका भी है। जैसे सब कुछ आनन्दके लिये प्रिय है, आनन्द और किसीके लिये प्रिय नहीं होता, ठीक वैसे ही समस्त वस्तु आत्माके लिये प्रिय होती है, आत्मा किसी दूसरेके लिये प्रिय नहीं होता। अतः अन्तरात्मा ही आनन्द और निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमका आस्पद है। उसीका आभास अन्तर्मुख अन्तःकरणपर पड़नेसे 'अहं सुखी' इत्यादि व्यवहार होता है। वही सुख किंवा अन्तरात्मा है। इसीके लिये समस्त कार्य- करणसंघातकी प्रवृत्ति होती है। यही सुख-दुःख- मोहात्मक, नानात्मक संघातसे विलक्षण, सुख-दुःख- मोहातीत, असंहत, असंग, अद्वितीय तत्त्व ही सच्चिदानन्दका आनन्दरूप है। जीवभावसे मुक्त हुए बिना पूर्ण स्वातन्त्र्य सम्भव नहीं इसी तरह प्राणिमात्र स्वतन्त्रता चाहता है। एक चींटीको भी पकड़नेपर वह व्याकुलताके साथ हाथ- पैर चलाती है। शुक-सारिकादि विहंगम सुवर्णके भी पंजरमें रहकर सुन्दर, मधुर, भक्ष्य-पेयको नहीं पसन्द करते, किंतु बन्धनमुक्त होकर स्वतन्त्रतासे वनमें खट्टे फलोंको भी खाकर जीवन बिताना अच्छा समझते हैं।
इस तरह प्राणिमात्र बन्धनसे छूटने तथा स्वतन्त्रताके लिये लालायित हैं। ऐसी स्थितिमें कौन नास्तिक बन्धनमुक्ति और स्वतन्त्रता न चाहेगा ? परंतु स्वतन्त्रताके वास्तविक रूपका विवेचन करनेसे स्पष्ट होगा कि यह भी भगवान्का स्वरूप है, क्योंकि बिना असंग सच्चिदानन्दको प्राप्त किये बन्धनमुक्ति एवं स्वतन्त्रताकी कल्पना अत्यन्त ही निरालम्बन है। जबतक स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण देहका सम्बन्ध विद्यमान है, तबतक स्वतन्त्रता कैसी ? भले ही कोई माता, पिता, गुरुजनों तथा वेद-शास्त्रकी आज्ञाओंको न माने और उनसे अपनेको स्वतन्त्र मान ले, परंतु जन्म, जरा, व्याधि, विपत्ति, दरिद्रता, मृत्यु आदिके परतन्त्र तो प्राणिमात्रको होना ही पड़ेगा; क्योंकि जबतक कुछ स्वतन्त्रताका त्यागकर शास्त्रों एवं गुरुजनोंके परतन्त्र होकर कर्म, उपासना एवं ज्ञानद्वारा मल, विक्षेप, आवरणको दूरकर शरीरत्रयबन्धन किंवा जीवभावसे मुक्त होकर निजी निर्विकार स्वरूपको न प्राप्त कर ले, तबतक पूर्ण स्वातन्त्र्य मिल नहीं सकता। इस विवेचनसे यह स्पष्ट होता है कि यह बन्धन, मुक्ति और स्वातन्त्र्य भी सर्वोपाधिविनिर्मुक्त, असंग, अनन्त, स्वप्रकाश, प्रत्यगभिन्न, सच्चिदानन्द भगवान्का ही स्वरूप है। इसी तरह प्राणिमात्रको यह भी रुचि होती है कि सब कुछ हमारे अधीन हो और मैं स्वाधीन रहूँ। यहाँतक कि माता-पिता, गुरुजनोंके प्रति भी यही रुचि होती है कि ये सब हमारी प्रार्थना मान लिया करें और सब तरहसे मेरे अनुकूल रहें। यही स्थिति देवताओंके प्रति भी होती है। यह सभी भाव जीवभावके रहते पूर्ण नहीं हो सकते। समस्त कल्पित पदार्थ कल्पनाके अधिष्ठानभूत भगवान्के ही परतन्त्र हो सकते हैं। जब आस्तिक-नास्तिक सभी पूर्ण स्वातन्त्र्य, नियामकत्व, पूर्ण बोध, पूर्णानन्द, पूर्ण अबाध्यता या सत्ताके लिये व्यग्र तथा इनकी प्राप्तिके लिये जी-जानसे प्रयत्न करते हैं, तब कौन कह सकता है कि अज्ञानी किंवा नास्तिक भी जिसकी प्राप्तिके लिये व्यग्र हैं, वह तत्त्व भक्तों और ज्ञानियोंके ध्येय, ज्ञेय, परमाराध्य, परब्रह्म भगवान् नहीं हैं; क्योंकि प्राणिमात्रके अन्तरात्मा भगवान् ही हैं, फिर उनसे विमुख होकर निःसत्व, निःस्फूर्ति कौन होना चाहेगा ? इसी आशयसे श्रीवाल्मीकिजीकी उक्ति है कि 'लोके न हि स विद्यते यो न राममनुव्रतः।' लोकमें कोई ऐसा हुआ नहीं, जो रामका अनुगामी न हो। भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है निजी सर्वस्वके बिना किसीको भी कैसी विश्रान्ति ? अतएव तरंगकी जैसे समुद्रानुगामिता है, ठीक वैसे ही प्राणिमात्रकी भगवदनुगामिता है। भेद यह है कि ज्ञानी अपने प्रियतमको जानकर प्रेम करता है, दूसरे उसीके लिये व्यग्र होते हुए भी उसे नहीं जानते। अस्तु, स्वसम्बन्धित्वेन ज्ञानपूर्वक प्रभुको ही 'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्' (गीता ९।१८) जानकर उनसे प्रेम करना चाहिये। भगवान्के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है। भक्तिसे ही पूर्णानुरागरससारसिन्धु मर्यादापुरुषोत्तम श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र प्रभुके अमृतमय मुखचन्द्रके प्रत्यक्ष दर्शन हो सकते हैं। 'रसो वै सः। रसꣳ ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।' भक्तिसे ही अरविन्दनयन भगवान्के श्रीचरणार- विन्द-मकरन्दरसका समास्वादन प्राप्त होता है। प्रेमी भक्त श्रीआनन्दकन्द कोसलचन्द्रके अनुरागभरे कटाक्ष- पातसे युक्त अमृतमय मुखचन्द्रके सौन्दर्य-माधुर्यामृतका पान करनेमें ही अपनेको कृतकृत्य समझते हैं और निर्निमेष नयनोंसे उसी दिव्य रूपमाधुरीका पान करते हुए आनन्दोन्मत्त हो जाते हैं। इनका भगवान्में स्वाभाविक सहज, अकृत्रिम प्रेम होता है। विशुद्ध प्रेममें कुछ भी कामना नहीं होती। इसी विशुद्ध प्रेमका वर्णन देवर्षि नारदने अपने भक्तिसूत्र (५४)- में किया है—'गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण- वर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥' प्रेमीको अपने निरतिशय, निरुपाधिक, परप्रेमास्पद प्राणधन भगवान्में गुण-दोष देखनेका अवकाश ही नहीं मिलता। वे इसलिये भगवान्में प्रेम नहीं करते कि हमारे भगवान् अचिन्त्य, अनन्तकल्याणगुणगणनिलय हैं, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक हैं, सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाश